
छात्रों का कार्यक्रम : मुद्दों की जगह आरोप-प्रत्यारोप क्यों?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है। सरकार और विपक्ष के बीच वैचारिक विरोध होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब राजनीतिक संवाद का केंद्र नीतियों और जनसमस्याओं से हटकर व्यक्तियों पर टिप्पणियों, आरोपों, कटाक्षों और उपहास तक सीमित होने लगे तो लोकतांत्रिक विमर्श की गंभीरता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वर्तमान में भारत की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीतिक दल रचनात्मक विरोध की जगह अनुचित आरोप प्रत्यारोप की परिधि में लगातार सक्रिय हैं। इस प्रकार की राजनीति देश के लोकतंत्र के उत्थान का मार्ग बिलकुल भी तैयार नहीं कर सकती।
अभी कुछ पूर्व इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से जुड़ा मिमिक्री विवाद इसका ताजा उदाहरण है। कार्यक्रम का मूल विषय विद्यार्थियों की समस्याओं, शिक्षा, परीक्षाओं, रोजगार और छात्रावास जैसी चिंताओं से जुड़ा था। लेकिन ऐसा लगा कि कार्यक्रम अपने मूल उद्देश्य से भटक कर आरोपों और व्यक्तिगत खिल्ली उडाने पर ही केंद्रित होकर रह गया। आज चिंता इस बात की है कि छात्रों के सामने समस्या नहीं समाधान की चर्चा होना चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों के सामने इस अंदाज में अपनी बात रखने का प्रयास किया कि छात्र सरकार के विरोध में खड़े हो जाएं। जिन बातों का उल्लेख छात्रों के समक्ष होना चाहिए, वे मुद्दे भी कार्यक्रम में पूरी तरह गायब दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे राजनीतिक दल छात्रों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
हालांकि कार्यक्रम में कुछ मुद्दों पर सरकार पर सवाल भी उठाए। लेकिन ऐसे सवाल छात्रों के बीच नहीं आना चाहिए। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन गया। विपक्ष की ओर से इसे राजनीतिक व्यंग्य और अभिव्यक्ति के अधिकार के संदर्भ में देखा गया। क्या अभिव्यक्ति इस प्रकार की होना चाहिए, कदापि नहीं।

यहां प्रश्न केवल मिमिक्री का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक कार्यक्रमों में गंभीर मुद्दों को केंद्र में रखने के बजाय व्यक्तिगत कटाक्ष और उपहास को अधिक स्थान मिलना चाहिए?
राजनीति में व्यंग्य कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में व्यंग्य सत्ता से सवाल पूछने का माध्यम भी रहा है। नेता, सरकारें और नीतियां आलोचना के विषय बनती रही हैं। लेकिन व्यंग्य और व्यक्तिगत अवमानना के बीच एक महीन रेखा होती है। राजनीतिक विरोध कितना तीखा हो, यह राजनीतिक परिस्थितियां तय कर सकती हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा और व्यवहार की मर्यादा का प्रश्न हमेशा बना रहता है।
इंदौर की घटना में भी यही बहस सामने आई। इस पूरे प्रसंग से एक बड़ा सवाल जरूर निकलता है कि क्या विद्यार्थियों के मंच पर विद्यार्थियों के मूल प्रश्न पीछे छूट जाने चाहिए?
यदि किसी छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही, यदि परीक्षा व्यवस्था को लेकर उसके मन में चिंता है, यदि रोजगार उसके भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न है या किसी छात्रा के सामने सुरक्षित और किफायती आवास की समस्या है, तो राजनीति का दायित्व है कि वह इन प्रश्नों को मजबूती से उठाए। इन सवालों के उत्तर भी उसी गंभीरता से मांगे जाने चाहिए। विपक्ष यदि सरकार की शिक्षा नीति से असहमत है तो उसे आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। सरकार यदि विपक्ष के आरोपों को गलत मानती है तो उसे आंकड़ों और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस का रास्ता है।
दुर्भाग्य यह है कि आज आरोप लगाना आसान हो गया है और आरोप का जवाब भी एक नए आरोप से देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एक नेता किसी नीति पर सवाल उठाता है तो जवाब में नीति की चर्चा करने के बजाय उसके पुराने बयान खोजे जाते हैं। किसी सरकार के निर्णय पर सवाल उठता है तो विपक्ष के पुराने कार्यकाल की कमियां गिनाई जाती हैं। किसी नेता की आलोचना होती है तो उसके जवाब में दूसरे नेता की आलोचना सामने आ जाती है।

इस प्रकार राजनीतिक संवाद एक ऐसी प्रतिस्पर्धा में बदल जाता है जिसमें यह साबित करने की कोशिश होती है कि सामने वाला अधिक गलत है। लेकिन जनता का सवाल इससे अलग है कि आप क्या करेंगे? राजनीतिक दलों की ठोस योजनाएं क्या हैं। इन सवालों का उत्तर किसी आरोप से नहीं दिया जा सकता।
राजनीति में व्यक्तिगत आक्षेप इसलिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि वे धीरे-धीरे राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। नेता जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसका प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। समर्थक उसी भाषा को दोहराते हैं और फिर राजनीतिक मतभेद सामाजिक कटुता में बदलने लगते हैं। लोकतंत्र में विरोध होना चाहिए, लेकिन विरोध का अर्थ वैमनस्य नहीं है। आज विपक्ष की ओर से सरकार के प्रति पूरी तरह कटुता का व्यवहार किया जा रहा है। इंदौर के कार्यक्रम में भी कटुता का खेल खेला गया। क्या छात्र ऐसी कटुता को अपने उत्थान और विकास के लिए जरूरी मानते हैं। यह सवाल राजनीतिक दलों से पूछने का साहस भी छात्रों को करना चाहिए।
यहां यह भी आवश्यक है कि इस प्रश्न को केवल एक दल या एक नेता तक सीमित न किया जाए। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, राजनीतिक मर्यादा की कसौटी सबके लिए समान होनी चाहिए। यदि विपक्ष किसी नेता की मिमिक्री करता है तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए; यदि सत्ता पक्ष विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत कटाक्ष करता है तो उस पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल उठना चाहिए। लोकतांत्रिक मर्यादा किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। विपक्ष को भी लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत कार्यक्रम करना चाहिए। इंदौर का कार्यक्रम राजनीतिक सभा या रैली नहीं था, वह छात्रों का कार्यक्रम था, इसलिए इस कार्यक्रम में प्रथम दृष्टया राजनीतिक आरोप लगना ही नहीं चाहिए। राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वे अपने विरोधी को कितनी तीखी भाषा में जवाब दे सकते हैं। चुनौती यह है कि वे जनता के सामने अपनी नीतियों और योजनाओं को कितनी स्पष्टता से रख सकते हैं।
आरोप-प्रत्यारोप से तालियां मिल सकती हैं, सोशल मीडिया पर चर्चा हो सकती है और समर्थकों का उत्साह भी बढ़ सकता है, लेकिन इससे समस्याओं का समाधान नहीं होता। बेरोजगार युवा को रोजगार चाहिए, उसे यह जानने में रुचि है कि सरकार और विपक्ष उसके लिए क्या करेंगे। विद्यार्थी को बेहतर शिक्षा चाहिए, उसे यह जानना है कि परीक्षा व्यवस्था कैसे विश्वसनीय बनेगी। परिवार को सुरक्षित भविष्य चाहिए, उसे राजनीतिक कटाक्षों से अधिक ठोस नीतियों की आवश्यकता है।
इसलिए आज राजनीति को फिर से मुद्दों की ओर लौटने की जरूरत है। विरोध कीजिए, लेकिन नीतियों का विरोध कीजिए। सरकार से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों के साथ पूछिए। विपक्ष के आरोपों का उत्तर दीजिए, लेकिन वैकल्पिक नीति के साथ दीजिए। व्यंग्य कीजिए, लेकिन ऐसी सीमा का ध्यान रखिए जहां राजनीतिक आलोचना व्यक्तिगत अपमान में न बदल जाए। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, किंतु असहमति को संवाद में बदलना उससे भी अधिक आवश्यक है। राजनीति का उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं होना चाहिए कि दूसरा पक्ष गलत है, राजनीति का बड़ा उद्देश्य यह बताना होना चाहिए कि जनता के लिए सही रास्ता क्या है और उस रास्ते पर चलने की योजना क्या है।
आज जनता राजनीतिक दलों से यही अपेक्षा कर रही है कि वे आरोपों की राजनीति से आगे बढ़ें और समाधान की राजनीति को केंद्र में लाएं। यदि राजनीति लगातार व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती रही तो मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। और जब मुद्दे पीछे छूटते हैं, तब लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता की वास्तविक समस्याएं भी राजनीतिक विमर्श से बाहर होने लगती हैं। इसलिए समय की मांग स्पष्ट है कि कटाक्ष कम हों, संवाद बढ़े, आरोप कम हों, तथ्य बढ़ें और व्यक्तियों से अधिक मुद्दों पर राजनीति हो। यही लोकतंत्र की गरिमा भी है और जनता के प्रति राजनीति की वास्तविक जिम्मेदारी भी।










