
इक्कीसवीं सदी का आईना हैं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
अब किसे याद है कि यह वर्ष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की 175वीं जयन्ती समाप्ति पर है? साहित्यिक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक जगत में भी इस अवसर पर अपेक्षित गम्भीर विमर्श दिखाई नहीं दिया। हमारी स्मृति ऐसी उलझनों और तात्कालिकताओं में फँस गयी है कि उत्तर-आधुनिक समय में आधुनिक हिन्दी की पहली सशक्त कलम को याद करने की भी फुरसत नहीं बची। विडम्बना यह है कि जिस लेखक ने हिन्दी को आधुनिक चेतना, राष्ट्रीय आत्मबोध और सार्वजनिक संवाद की नयी भाषा दी, उसी की जयन्ती हमारे सांस्कृतिक कैलेण्डर में लगभग मौन होकर गुजर रही है।
भारतेन्दु को याद करने का अर्थ केवल उनकी जन्मतिथि या उनकी साहित्यिक उपलब्धियों को दोहराना नहीं है। असल जरूरत यह देखने की है कि जिस समय उन्होंने अपने चारों ओर के समाज, शासन और जनता की पीड़ा को इतनी तीखी निगाह से देखा था, क्या आज हम अपने समय को उसी सजगता से देख पा रहे हैं? उनकी रचनाओं की विशेषता यह है कि वे अपने समय की सच्चाइयों को दर्ज करते हुए भविष्य के पाठकों के लिए भी सवाल छोड़ जाती हैं।
यह केवल एक साहित्यकार को भूल जाना नहीं है। यह अपनी आधुनिक बौद्धिक परम्परा की जड़ों से दूर हो जाने का संकेत है। भारतेन्दु को याद करना किसी मूर्ति का पूजन नहीं है। यह उस रचनात्मक ऊर्जा, वैचारिक साहस और सांस्कृतिक दृष्टि को पुनः खोजने का प्रयास है, जिसने आधुनिक हिन्दी साहित्य को नया तेज दिया।
भारतेन्दु को आधुनिक हिन्दी साहित्य का पितामह माना जाता है। इनके साहित्य का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य उसकी विविधता है। यह विविधता केवल भावों, संवेदनाओं और विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक विधाओं और अभिव्यक्ति-शैलियों तक फैली हुई है। उन्होंने भक्ति, शृंगार, देशभक्ति, सामाजिक आलोचना, व्यंग्य, प्रकृति, लोकजीवन और समकालीन यथार्थ जैसे अनेक विषयों पर समान अधिकार के साथ लेखन किया। कविता के अतिरिक्त नाटक, निबन्ध, पत्रकारिता, यात्रावृत्त, अनुवाद और आलोचना जैसी अनेक विधाओं में भी उनका योगदान हिन्दी साहित्य को बहुआयामी बनाता है, यद्यपि उनका जीवन बहुत छोटा रहा।
भारतेन्दु के बाद हिन्दी कविता का विकास अनेक महत्त्वपूर्ण दिशाओं में हुआ, किन्तु धीरे-धीरे उसमें विषयगत और शैलीगत विशिष्टताओं के साथ-साथ एक प्रकार का वैचारिक केन्द्रीकरण भी दिखाई देने लगा। द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता—इन सभी धाराओं ने हिन्दी कविता को नयी ऊँचाइयाँ दीं, पर प्रत्येक आन्दोलन ने अपने-अपने आग्रहों के कारण कविता की सम्भावित विविधता को कुछ सीमा तक एक विशेष दिशा में केन्द्रित भी किया। परिणामस्वरूप भारतेन्दु जैसी व्यापक और बहुरंगी रचनात्मकता अपेक्षाकृत दुर्लभ होती गयी। आज जब साहित्य में विविधता, बहुलता और संवाद की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब भारतेन्दु की रचनाशीलता नये सिरे से प्रेरक दिखाई देती है।
भारतेन्दु के समय की समस्याएँ थीं—देश का धन विदेश जाना, अत्यधिक कर, सरकारी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता और जनता की दुर्दशा। उन्होंने इन सबको निर्भीकता से अपनी कविता में दर्ज किया। भारतेन्दु की ‘नये जमाने की मुकरी’ न केवल इन समस्याओं को लोक चेतना का हिस्सा बनाती है, बल्कि शासन पर प्रहार भी करती है।
भीतर भीतर सब रस चूसै।
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन में अति तेज।
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज॥
यह मुकरी अँग्रेजी शासन के चरित्र को तार-तार कर देती है। यहाँ ‘भीतर भीतर सब रस चूसै’ केवल आर्थिक शोषण का संकेत नहीं है, बल्कि भारत की सम्पदा, श्रम, उद्योग और सांस्कृतिक शक्ति के सुनियोजित दोहन का संकेत है। ‘हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै’ में शासन की वह नीति दिखाई देती है, जो सभ्यता, न्याय और सुधार के मुखौटे के पीछे आम नागरिकों का तन, मन और धन—सब कुछ लूटती है। ‘जाहिर बातन में अति तेज’ आज के सन्दर्भ में करारी व्यंजना है। यह अँग्रेजों की लुभावनी भाषा, प्रशासनिक कौशल तथा आधुनिकता और विकास के दावों की ओर संकेत करती है, जबकि अन्तिम पंक्ति—‘क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज’—तीखा व्यंग्य है। अर्थात जो ऊपर से सज्जन दिखाई देता है, वही भीतर सबसे बड़ा फरेबी है।
अँग्रेज राज सुख साज, सबै विधि भारी।
पै धन विदेश चलि जात, यहै अति ख्वारी।।
यह पंक्ति ब्रिटिश शासन के सबसे बड़े अन्तर्विरोध को उजागर करती है। भारतेन्दु ने बहुत पहले ही पहचान लिया था कि अँग्रेजी शासन ने जो रेल, डाक, तार, शिक्षा और प्रशासन जैसी सुविधाएँ दी हैं, वे ‘सुख साज’ हैं। किन्तु इन सुविधाओं की वास्तविक कीमत भारत की आर्थिक लूट थी। ‘पै धन विदेश चलि जात’ में उस आर्थिक प्रक्रिया की ओर संकेत है, जिसे बाद में दादाभाई नौरोजी ने ‘धन-निकासी सिद्धान्त’ (ड्रेन थ्योरी) के रूप में व्यवस्थित ढंग से प्रतिपादित किया। भारतेन्दु ने इसे किसी अर्थशास्त्री की भाषा में नहीं, बल्कि एक कवि की संवेदना से बहुत पहले पहचान लिया था।
धन लेकर कछु काम न आव। ऊँची नीची राह दिखाव।
समय पड़े पर साधै गुंगी। क्यों सखि सज्जन नहिं सखि चुंगी॥
यह मुकरी केवल ब्रिटिशकालीन चुंगी व्यवस्था तक सीमित नहीं है। आज भी जब नागरिक कर देते हैं, लेकिन बदले में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ, पारदर्शिता या समय पर प्रशासनिक सहायता नहीं मिलती, तब भारतेन्दु का यह व्यंग्य उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है। ये पंक्तियाँ केवल कर-व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि ऐसी शासन-व्यवस्था की आलोचना हैं, जो जनता से संसाधन तो लेती है, पर उत्तरदायित्व निभाने में विफल रहती है।
तीन बुलाए तेरह आवैं। निज निज बिपता रोइ सुनावैं।
आँखौ फूटे भरा न पेट। क्यों सखि सज्जन नहिं ग्रेजुएट॥
यह मुकरी आज भी अर्थवान है। आज भी अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में कुछ पदों के लिए लाखों आवेदन आते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी, अल्परोजगार और अवसरों की कमी से जूझते हैं। इसलिए भारतेन्दु का यह व्यंग्य केवल उन्नीसवीं शताब्दी का ही आईना नहीं है, बल्कि आज की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था पर एक खाँटी और खरी टिप्पणी है।
मतलब ही की बोलै बात। राखै सदा काम की घात।
होले पहिने सुन्दर समला। क्यों सखि सज्जन नहिं सखि अमला॥
यह व्यंग्य आज भी प्रासंगिक प्रतीत होता है। जब सरकारी तन्त्र में लालफीताशाही, अनावश्यक विलम्ब, स्वार्थ, भ्रष्टाचार या दिखावटी औपचारिकता दिखाई देती है, तब भारतेन्दु की यह मुकरी याद आती है। इसलिए यह रचना केवल उन्नीसवीं शताब्दी की नौकरशाही की आलोचना नहीं, बल्कि किसी भी ऐसे प्रशासनिक तन्त्र पर लागू होती है, जहाँ सेवा-भाव के स्थान पर स्वार्थ और अवसरवाद हावी हो जाए।
रूप दिखावत सरबस लूटै। फन्दे में जो पड़ै न छूटै।
कपट कटारी जिय में हूलिस। क्यों सखि सज्जन नहिं सखि पुलिस॥
यह मुकरी ऐतिहासिक सन्दर्भ में ब्रिटिश पुलिस-तन्त्र की आलोचना है, लेकिन इसका मूल प्रश्न आज भी विचारणीय है—क्या पुलिस जनता की सुरक्षा और न्याय के लिए कार्य कर रही है, या कहीं-कहीं शक्ति, भय और दुरुपयोग का माध्यम बन जाती है? जब भी पुलिस सुधार, जवाबदेही, मानवाधिकार और नागरिक स्वतन्त्रता पर बहस होती है, भारतेन्दु की यह मुकरी नये अर्थों के साथ पढ़ी जा सकती है।
नयी-नयी नित तान सुनावै। अपने जाल में जगत फँसावै।
नित-नित हमैं करै बल-सून। क्यों सखि सज्जन नहिं कानून॥
न्याय का साधन बनने के बजाय नागरिक को भय और उलझन में डाल दे। भारतेन्दु ने अपने समय की समस्याओं को आधार बनाकर ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान की, जो हर युग में नये रूपों में सामने आती हैं। इन मुकरियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी एक घटना, व्यक्ति या शासन तक सीमित नहीं हैं। उनकी व्यंग्य-दृष्टि सत्ता, प्रशासन, कर-व्यवस्था, शिक्षा, न्याय और सामाजिक जीवन की उन विसंगतियों पर केन्द्रित है, जो समय बदलने के बावजूद बार-बार हमारे सामने उपस्थित होती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ केवल औपनिवेशिक भारत का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना की स्थायी अभिव्यक्ति हैं। उनकी मुकरियाँ आज भी पढ़ते समय समकालीन प्रतीत होती हैं और पाठक को अपने समय के बारे में सोचने के लिए विवश करती हैं।
मगर आज? आज भी हम आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महँगाई, करों के बोझ और सामाजिक विषमता की चर्चा करते हैं। अन्तर यह है कि भारतेन्दु के समय कविता और साहित्य इन प्रश्नों से सीधे टकराते थे; आज के साहित्य में निजी अनुभवों, पहचान, स्मृति और व्यक्तिकेन्द्रित विषयों की उपस्थिति अधिक दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि समकालीन साहित्य में सामाजिक प्रश्न नहीं हैं, लेकिन वे भारतेन्दु के यहाँ दिखाई देने वाली व्यापक राष्ट्रीय चेतना और जन-जागरण के स्वर में अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं।
भारतेन्दु की आधुनिकता का अर्थ केवल नयी विधाओं को अपनाना या हिन्दी को आधुनिक स्वरूप देना नहीं था। उनकी आधुनिकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष अपने समय की सत्ता, समाज और व्यवस्था को प्रश्नांकित करने का साहस भी था। उन्होंने साहित्य को जीवन से अलग करके नहीं देखा। इसीलिए उनकी रचनाओं में साहित्यिक सौन्दर्य के साथ सामाजिक बेचैनी, राजनीतिक चेतना और जनता के प्रति गहरी संवेदना दिखाई देती है।
इसीलिए आज यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है कि यदि आज भी धन, भ्रष्टाचार, करों का बोझ और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ मौजूद हैं, तो क्या हमारे साहित्य में भारतेन्दु जैसी निर्भीक सामाजिक दृष्टि और जनपक्षधर आवाज मुखर है? यह प्रश्न केवल साहित्यकारों से नहीं, पूरे समाज से पूछा जाना चाहिए।
भारतेन्दु की 175वीं जयन्ती पर उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि उनकी रचनाओं को केवल इतिहास का अध्याय मानकर नहीं बल्कि वर्तमान के आईने की तरह पढ़ा जाए।










