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नयी पीढ़ी अराजनीतिक नहीं, राजनीति की नयी भाषा है

नयी पीढ़ी को समझने की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसे समझने वाले अधिकांश लोग उस दुनिया की भाषा में सोचते हैं, जो उसके पैदा होने से पहले बन चुकी थी। हम उसे देखते हैं और कहते हैं—मोबाइल में डूबी हुई पीढ़ी। हम उसकी रील देखते हैं, उसका मीम देखते हैं, उसकी टूटी-फूटी हिंग्लिश सुनते हैं, उसके छोटे ध्यान-अन्तराल पर चुटकुले बनाते हैं और बहुत जल्दी फैसला सुना देते हैं कि राजनीति, इतिहास, समाज और विचार जैसे गम्भीर विषयों से उसका कोई रिश्ता नहीं बचा।

लेकिन शायद समस्या नयी पीढ़ी में नहीं है। समस्या हमारी निगाह में है। हम अभी भी राजनीति को वहीं खोज रहे हैं, जहाँ वह तीस या चालीस साल पहले दिखाई देती थी—पार्टी के दफ्तर में, जुलूस में, पोस्टर में, छात्र संगठन में, भाषण में, अखबार के सम्पादकीय में। जबकि सत्ता की जगह बदल चुकी है। और जब सत्ता की जगह बदलती है, राजनीति की जगह भी बदलती है।

आज सत्ता संसद में है, लेकिन केवल संसद में नहीं है। वह आपके मोबाइल की स्क्रीन में भी है। वह उस एल्गोरिदम में है, जो तय करता है कि आप सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले क्या देखेंगे। वह उस डेटाबेस में है, जिसमें आपकी पसन्द, भय, गुस्सा, बीमारी, खरीदारी, यात्रा और राजनीतिक रुचि का नक्शा जमा है। वह विश्वविद्यालय की बढ़ी हुई फीस में है। वह उस प्रतियोगी परीक्षा में है, जो दो साल तक पूरी नहीं होती। वह उस नौकरी में है, जिसमें नियुक्ति-पत्र तो मिलता है, लेकिन भविष्य की कोई गारण्टी नहीं मिलती। वह परिवार में है, जो लड़की से पूछता है कि वह किससे प्रेम करती है। वह जाति में है, जो आधुनिकता के कपड़े पहनकर भी विवाह के दरवाजे पर पुरोहित की तरह खड़ी रहती है। वह धर्म में है, भाषा में है, शहर में है, किराये के मकान में है, इण्टरनेट की गति में है और इस बात में भी है कि समाज किसकी आवाज को सामान्य मानेगा और किसकी आवाज को खतरा।

इसलिए पहला प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि नयी पीढ़ी राजनीतिक है या नहीं। पहला प्रश्न यह होना चाहिए कि हम राजनीति को पहचान भी पा रहे हैं या नहीं।

राजनीति चुनाव से बड़ी चीज है

लोकतन्त्र की सबसे सुविधाजनक परिभाषा है—चुनाव। हर पाँच साल में जनता वोट देगी, सरकार बनेगी और लोकतन्त्र चल पड़ेगा। यह परिभाषा सत्ता को बहुत पसन्द आती है, क्योंकि इसमें नागरिक की भूमिका मतदान केन्द्र के दरवाजे पर खत्म हो जाती है। लेकिन लोकतन्त्र वोट डालने से शुरू होता है, खत्म नहीं। लोकतन्त्र का असली प्रश्न चुनाव के अगले दिन पैदा होता है।

क्या चुनी हुई सत्ता से सवाल पूछा जा सकता है? क्या नागरिक कह सकता है कि सरकार गलत है? क्या विश्वविद्यालय के भीतर सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं मानी जाएगी? क्या कोई पत्रकार सत्ता के विरोध में खड़ा रहकर भी देशभक्त माना जाएगा? क्या कोई विद्यार्थी रोजगार माँगते हुए यह सवाल पूछ सकता है कि आर्थिक विकास का अर्थ केवल जीडीपी है या उसके जीवन में भी कोई भविष्य है? क्या कोई लड़की अपने शरीर और जीवन पर स्वयं फैसला करने का अधिकार रखती है? क्या कोई दलित नौजवान यह पूछ सकता है कि संविधान में बराबरी लिख देने भर से समाज बराबर क्यों नहीं हुआ?

ये सभी राजनीतिक प्रश्न हैं। और यहीं से नयी पीढ़ी की राजनीति शुरू होती है। वह कई बार किसी राजनीतिक पार्टी की सदस्य नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह सत्ता से मुक्त है। बल्कि सच यह है कि शायद किसी भी पिछली पीढ़ी की तुलना में सत्ता उसके जीवन में अधिक गहराई से घुसी हुई है। और इसी कारण उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी पहले से अधिक राजनीतिक हो गयी है।

हमें उसकी भाषा सुननी होगी

पुरानी पीढ़ियों की एक आदत होती है। वे अपनी भाषा को गम्भीरता और नयी भाषा को पतन मानती हैं। जो राजनीतिक बात हमने दो घण्टे के भाषण में कही, अगर वही बात कोई बाइस साल का लड़का बीस सेकेण्ड के वीडियो में कह दे, तो हमें लगता है कि उसने विचार को हल्का कर दिया। कभी-कभी भाषा बदलती है, विचार नहीं। कभी-कभी माध्यम छोटा होता है, लेकिन उसके भीतर विस्फोट बहुत बड़ा होता है।

एक मीम सत्ता की उस विडम्बना को उजागर कर सकता है, जिसे राजनीतिक विज्ञान की किताब दस पन्नों में समझाती है। एक लड़की का छोटा-सा वीडियो किसी ऐसे सामाजिक नियम को चुनौती दे सकता है, जिसे परिवार और समाज ने सदियों से सामान्य घोषित कर रखा था। एक छात्र का फोन से रिकॉर्ड किया हुआ दृश्य सत्ता और नागरिक के बीच सम्बन्ध का ऐसा दस्तावेज बन सकता है, जिसे पहले इतिहासकार वर्षों बाद अभिलेखागार में खोजते।

इसलिए रील को केवल मनोरंजन समझना वैसा ही है जैसे कभी छापेखाने को केवल कागज छापने की मशीन समझना। हर नयी तकनीक सूचना का माध्यम भर नहीं बदलती। वह शक्ति का वितरण भी बदलती है।

जिसके हाथ में कैमरा है, वह गवाह हो सकता है। जिसके हाथ में इण्टरनेट है, वह प्रकाशक हो सकता है। जिसके पास एक छोटा-सा अकाउंट है, वह कभी-कभी लाखों लोगों के बीच ऐसा प्रश्न फेंक सकता है, जिसे बड़ी संस्थाएँ दबाना चाहती थीं।

लेकिन यहीं से दूसरी समस्या शुरू होती है।

जिस तकनीक ने नागरिक को आवाज दी, वही उसे नियन्त्रित भी कर सकती है

हम अक्सर डिजिटल दुनिया को स्वतन्त्रता का उत्सव समझते हैं। हर किसी के पास बोलने का मंच है। हर किसी के पास अपनी राय है। हर किसी के पास कैमरा है। यह लोकतान्त्रिक लगता है। लेकिन हमें एक असुविधाजनक प्रश्न पूछना चाहिए—यह मंच किसका है? वह एल्गोरिदम किसका है, जो तय करता है कि किसकी आवाज लाखों लोगों तक जाएगी और किसकी 200 लोगों तक?

हम सोचते हैं कि हम मोबाइल देख रहे हैं। बहुत बार मोबाइल भी हमें देख रहा होता है। वह सीख रहा है कि हमें किस बात पर गुस्सा आता है। किस चेहरे पर हम रुकते हैं। किस तरह की खबर हमें डराती है। किस विचार से हम सहमत हो सकते हैं। किस झूठ को हम सच मानने के लिए पहले से तैयार हैं। यह केवल बाजार की जानकारी नहीं है। यह राजनीतिक शक्ति है।

इतिहास में सत्ता मनुष्य के शरीर पर नियन्त्रण चाहती थी। आधुनिक सत्ता उसके व्यवहार पर नियन्त्रण चाहती है। डिजिटल सत्ता उससे भी आगे जाकर उसके ध्यान पर नियन्त्रण चाहती है। और जिसका आपके ध्यान पर नियन्त्रण है, वह धीरे-धीरे आपकी वास्तविकता की संरचना पर भी असर डाल सकता है। यह नयी पीढ़ी की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई हो सकती है। पहले सवाल था—कौन शासन करता है? अब एक नया सवाल जुड़ गया है—कौन तय करता है कि हमें दुनिया दिखाई कैसे देगी?

लोकतन्त्र का संकट तब शुरू होता है जब साझा सच टूटने लगे

लोकतन्त्र में मतभेद कोई दुर्घटना नहीं है। मतभेद ही लोकतन्त्र का जीवन है। आप और मैं किसी नीति पर असहमत हो सकते हैं। किसी विचारधारा पर असहमत हो सकते हैं। किसी सरकार को लेकर असहमत हो सकते हैं। लेकिन बातचीत के लिए हमें कम से कम इतना साझा संसार चाहिए, जिसमें हम यह मान सकें कि तथ्य जैसी कोई चीज होती है। डिजिटल दुनिया इस साझा संसार को तोड़ रही है।

एक आदमी के मोबाइल में एक देश है। दूसरे आदमी के मोबाइल में दूसरा। दोनों एक ही शहर में रहते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक वास्तविकताएँ अलग-अलग हैं। एक के लिए कोई घटना राष्ट्रीय संकट है। दूसरे की स्क्रीन पर वह घटना आयी ही नहीं। एक को रोज बताया जा रहा है कि उसका धर्म खतरे में है। दूसरे को रोज बताया जा रहा है कि उसका भविष्य खतरे में है। एक को लगता है कि देश इतिहास के सबसे महान समय में प्रवेश कर चुका है। दूसरे को लगता है कि लोकतन्त्र इतिहास के सबसे कठिन समय से गुजर रहा है।

अगर नागरिकों के पास साझा तथ्य ही नहीं बचेंगे, तो सार्वजनिक संवाद कैसे बचेगा? और अगर सार्वजनिक संवाद नहीं बचेगा, तो लोकतन्त्र धीरे-धीरे नागरिकों के बीच बातचीत नहीं, समर्थकों की सेनाओं के बीच संघर्ष बन जाएगा। लोकतन्त्र मतदान से पहले संवाद की व्यवस्था है। अगर संवाद मर गया, तो चुनाव बचा रह सकता है, लोकतन्त्र नहीं।

नयी पीढ़ी को अराजनीतिक कहना सत्ता की सबसे आरामदेह कहानी है

हर व्यवस्था चाहती है कि नागरिक अपनी समस्या को निजी समस्या समझे। नौकरी नहीं मिली? अपना कौशल बढ़ाओ। तनख़्वाह कम है? और मेहनत करो। घर नहीं खरीद सकते? अपनी आर्थिक योजना सुधारो। अकेले हो? मेडिटेशन करो। उदास हो? ऐप डाउनलोड करो। प्रदूषण है? एयर प्यूरीफायर खरीदो।

व्यवस्था की हर सामूहिक समस्या को व्यक्ति की निजी जिम्मेदारी में बदल देना आधुनिक सत्ता की सबसे प्रभावी चालों में से एक है। क्योंकि जब बेरोजगार नौजवान यह मान लेता है कि उसकी बेरोजगारी केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता है, तब राजनीति खत्म हो जाती है। लेकिन जिस क्षण दस लाख बेरोजगार नौजवान समझते हैं कि उनका अनुभव एक साझा संरचनात्मक समस्या है, उसी क्षण राजनीति पैदा हो जाती है।

राजनीति का जन्म वहीं होता है, जहाँ “मैं” पहली बार “हम” में बदलता है। मेरी फीस। मेरी नौकरी। मेरी जाति। मेरी स्वतन्त्रता। मेरी भाषा। और फिर अचानक मनुष्य समझता है—यह केवल मेरी कहानी नहीं है। यही वह क्षण है, जिससे हर सत्ता असहज होती है।

नयी पीढ़ी के गुस्से को समझना होगा

हम अक्सर कहते हैं कि आज के युवा अधीर हैं। सवाल है—धैर्य किस दुनिया के लिए? जिस बच्चे को दस साल की उम्र से बताया जाता है कि उसका जीवन एक प्रतियोगिता है, वह धैर्य कहाँ से लाए? स्कूल के बाद कोचिंग। कोचिंग के बाद परीक्षा। परीक्षा के बाद दूसरी परीक्षा। डिग्री के बाद इंटर्नशिप। इंटर्नशिप के बाद अनुबन्ध। अनुबन्ध के बाद अनिश्चितता। और इस पूरी यात्रा में उसे लगातार बताया जाता है कि अगर वह पीछे रह गया, तो दोष उसी का है।

हमने उसके सामने सफलता के चित्र बहुत बड़े कर दिये और सफलता तक पहुँचने वाले रास्ते बहुत सँकरे। हमने उसे दुनिया भर की विलासिता मोबाइल पर दिखाई, लेकिन उसके अपने जीवन की आर्थिक सुरक्षा कम कर दी। हमने उसे बताया कि वह वैश्विक नागरिक है, लेकिन नौकरी के लिए स्थानीय सिफारिश अब भी काम आती है। हमने उसे आधुनिकता दी, लेकिन जाति नहीं हटायी। हमने उसे प्रेम की स्वतन्त्रता का सिनेमा दिखाया, लेकिन विवाह में परिवार की सत्ता जस की तस रखी। हमने उसे इण्टरनेट दिया, लेकिन सत्य की गारण्टी नहीं दी। और फिर हम पूछते हैं—यह पीढ़ी इतनी बेचैन क्यों है? बेचैनी उसका चरित्र दोष नहीं है। बेचैनी उस समय का राजनीतिक दस्तावेज है, जिसमें वह जी रही है।

उसके सवाल हमसे अधिक आधुनिक हैं

नयी पीढ़ी की सबसे दिलचस्प बात उसके उत्तर नहीं, उसके प्रश्न हैं। वह पूछती है—किसी लड़की के कपड़े पर समाज की राय क्यों हो? वह पूछती है—जाति अगर पुरानी चीज है, तो शादी के विज्ञापन में आज भी क्यों लिखी जाती है? वह पूछती है—धर्म किसी नागरिक की देशभक्ति तय क्यों करेगा? वह पूछती है—नौकरी माँगना राष्ट्र-विरोध कैसे हो सकता है? वह पूछती है—विश्वविद्यालय का काम आज्ञाकारी नागरिक बनाना है या प्रश्न करने वाला मनुष्य? वह पूछती है—राष्ट्र और सरकार एक ही चीज क्यों माने जाएँ? वह पूछती है—अगर तकनीक इतनी महान है, तो उसका स्वामित्व कुछ कम्पनियों के पास क्यों है? वह पूछती है—अगर अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तो मेरा भविष्य इतना असुरक्षित क्यों है?

ये मामूली प्रश्न नहीं हैं। ये आधुनिक भारत के वैचारिक केन्द्र पर चोट करने वाले प्रश्न हैं। और शायद इसी कारण नयी पीढ़ी के सवाल हमें कई बार बदतमीज लगते हैं। क्योंकि हर सत्ता, चाहे वह राजनीतिक हो, पारिवारिक हो, धार्मिक हो या सांस्कृतिक, प्रश्न को पहले अनुशासनहीनता कहती है।

लेकिन नयी पीढ़ी को रोमांटिक बनाना भी गलत होगा

यह मान लेना भी मूर्खता होगी कि युवा होना अपने आप प्रगतिशील होना है। हर नयी पीढ़ी अपने समय के पूर्वाग्रह भी विरासत में लेती है। नयी पीढ़ी में जाति है। धार्मिक कट्टरता है। स्त्री-विरोध है। नफरत है। ट्रोलिंग है। भीड़ की हिंसा है। फेक न्यूज है। और सबसे खतरनाक चीज—विचारों को पहचान में बदल देने की प्रवृत्ति है।

जब विचार पहचान बन जाता है, तब मनुष्य तर्क सुनना बन्द कर देता है। किसी राजनीतिक विचार से असहमति अब विचार की आलोचना नहीं रहती, व्यक्ति पर हमला लगने लगती है। यही वह जगह है जहाँ लोकतन्त्र सबसे कमजोर होता है। लोकतन्त्र को केवल बोलने वाले नागरिक नहीं चाहिए। उसे सुनने वाले नागरिक भी चाहिए। असहमति का अधिकार तभी जीवित रह सकता है, जब हम अपने विरोधी के अस्तित्व के अधिकार को भी स्वीकार करें।

असली सवाल है—हमने उनके लिए कैसा भारत बनाया?

हर बुजुर्ग पीढ़ी को युवा पीढ़ी पर टिप्पणी करने से पहले एक नैतिक हिसाब देना चाहिए। हमने उन्हें कैसी शिक्षा दी? ऐसी शिक्षा, जो प्रश्न पूछना सिखाती है या उत्तर याद करना? हमने उन्हें कैसा रोजगार दिया? ऐसा रोजगार, जिसमें मेहनत के साथ सुरक्षा जुड़ी हो या ऐसा काम, जिसमें मनुष्य हमेशा अगली नौकरी के भय में रहे? हमने उन्हें कैसी राजनीति दी? विचारों की राजनीति या पहचान की? हमने उन्हें कैसा मीडिया दिया? सत्य खोजने वाला या उत्तेजना बेचने वाला? हमने उन्हें कैसी सार्वजनिक भाषा दी? तर्क की या अपमान की? हमने उन्हें कैसी टेक्नोलॉजी दी? मनुष्य को मुक्त करने वाली या मनुष्य के ध्यान को माल में बदल देने वाली? अगर इन सवालों के उत्तर असुविधाजनक हैं, तो नयी पीढ़ी पर मुक़दमा चलाने से पहले हमें कटघरे में स्वयं खड़ा होना चाहिए।

नया भारत आज्ञाकारी युवाओं से नहीं बनेगा

नया भारत वह नहीं होगा, जिसमें युवा अपने से पहले की पीढ़ियों के उत्तर याद कर लें। वह भारत नया कैसे होगा? नयी पीढ़ी का सबसे बड़ा ऐतिहासिक अधिकार यही है कि वह हमारे उत्तरों पर विश्वास न करे। वह पूछे। वह सन्देह करे। वह हमारी राष्ट्र की परिभाषा पर प्रश्न लगाए। हमारी नैतिकता पर। हमारी राजनीति पर। हमारी जाति पर। हमारे धर्म पर। हमारे विकास के मॉडल पर। हमारी टेक्नोलॉजी पर। हमारी सफलता की परिभाषा पर। और अन्ततः हमारी पीढ़ी पर भी। क्योंकि किसी समाज का भविष्य उसके युवाओं की आज्ञाकारिता से सुरक्षित नहीं होता। उसकी सुरक्षा उनकी स्वतन्त्र बुद्धि से होती है। जिस दिन कोई समाज अपने युवाओं से कहने लगे कि सवाल मत पूछो, उसी दिन वह अपने भविष्य से कह रहा होता है—नया मत बनो।

नयी पीढ़ी राजनीति से दूर नहीं है। वह शायद राजनीति की उस पुरानी परिभाषा से दूर है, जिसमें नागरिक का काम केवल समर्थन करना था। वह एक ऐसी राजनीति की तलाश में है, जिसमें नागरिक केवल मतदाता नहीं, विचार करने वाला मनुष्य हो। जिसमें राष्ट्र केवल नक्शा नहीं, लोगों के बीच न्यायपूर्ण सम्बन्ध हो। जिसमें स्वतन्त्रता केवल अपना जीवन जीने का अधिकार नहीं, दूसरे मनुष्य की स्वतन्त्रता की रक्षा की जिम्मेदारी भी हो। और जिसमें लोकतन्त्र का सबसे पवित्र शब्द “हाँ” नहीं हो। सबसे पवित्र शब्द हो—क्यों?

 

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अविनाश दास

अविनाश दास: लेखक चर्चित पत्रकार,कवि और फिल्मकार हैं। avinashonly@gmail.com
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