
अनसुनी आवाजों की सिनेमाई अनुगूँज
एक ऑस्कर नॉमिनेटीड फ़िल्म जिसे वेनिस फ़िल्म फेस्टिवल के वर्ल्ड प्रीमियम पर 23 मिनट तक स्टैंडिंग ओवेशन मिला। फ़िल्म दुनिया भर में सराही गई लेकिन भारत में इसके प्रदर्शन को लेकर कुछ समय तक अनिश्चितता बनी रही। यह आशंका जताई गई कि इसके रिलीज़ होने पर ‘भारत-इजरायल के संबधों पर नकारात्मक असर होगा। आश्चर्य कि ‘इजरायल’ और ‘अमेरिका’ में भी फ़िल्म दिखाई जा रही थी। खैर अंतत: 19 जून 2026 को केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड ने इसे बिना किसी कट के ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ मंजूरी दे दी।
बात हो रही है फ़िल्म ‘द वायस ऑफ़ हिन्द रजब’ की। ‘रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर्स’ को पाँच साल की बच्ची की इमरजेंसी कॉल आती है। गाज़ा में आईडीएफ की गोलाबारी के बीच कार में वह मदद की गुहार लगा रही है, वे उसे फ़ोन पर बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं । फ़िल्म उसी कॉल की वास्तविक रिकॉर्डिंग का प्रयोग करते हुए आगे बढ़ती है। फ़िल्म की निर्देशक कौथर बेन हानिया मूलत: डॉक्यूमेंट्री निर्माता हैं । जब सोशल मीडिया स्क्रोल करते हुए उन्होंने ‘हिन्द रजब’ की पुकार सुनी तो वे विचलित हो उठीं। उन्होंने इस आवाज़ को डॉक्यूमेंट्री के बजाय संवेदनात्मक सिनेमाई अनुभव के रूप में विश्व तक पहुँचाने का निर्णय लिया । सिनेमा जोकि दृश्य-श्रव्य माध्यम है, में यहाँ कौथर बेन दृश्य से अधिक ध्वनि का इस्तेमाल करती हैं । हिन्द की ‘आवाज़’ ही दर्शक को उस मानसिक अवस्था में ले जाती है, जहाँ वे उसके डर, घुटन और असहायता को महसूस करते हैं, ‘जी’ रहे होते हैं । यही सिनेमा की शक्ति है जो ‘सोशल मीडिया’ में नहीं क्योंकि सिनेमा सूचनाओं,या खबरों को क्षणभंगुरता से आगे ले जाकर स्थायी स्मृति में बदल देता है ।
फ़िल्म का यह महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू ‘ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ की याद दिलाता है, जहाँ एक हँसता-खेलता समृद्ध परिवार दिख रहा है, लेकिन पृष्ठभूमि में ‘होलोकास्ट’ (जो घर के पीछे ही है) से लगातार गोलियों की धांय-धांय, धमकाने, चीखने-चिल्लाने और रोने की आवाज़े आ रही हैं । घर में बस उनका पालतू कुत्ता जो बिना पूँछ हिलाए इस बैचैनी को अभिव्यक्त करता है, जबकि बाकी पूरा परिवार अनभिज्ञ न होकर भी संवेदनशून्य है । इस फ़िल्म में भी निर्देशक ‘हिन्द रज़ब’ को दिखाने के बजाय उसकी आवाज़ को केंद्र में रखती हैं जो दर्शकों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालती है और एक स्मृति बिम्ब बनाती है।
‘द वायस ऑफ़ हिन्द रजब’ ‘हिन्द रजब’ की ही दर्दनाक गुहार नहीं रह जाती, यह आवाज़ युद्ध-अपराध में मारे जा रहे मासूम बच्चों का ‘आर्तनाद’ बन जाती है । फ़िल्म ने ‘हिन्द रज़ब’ की आवाज़ को जो सिनेमाई ‘अनुगूँज’ प्रदान की वह वास्तव में मानवीय अधिकारों और सरोकारों से जुड़ी है। पाँच वर्ष की बच्ची, जो सामान्यतः मृत्यु का अर्थ भी नहीं समझती, यहाँ स्पष्ट रूप से जानती है कि ‘कौन मार रहा है’ और ‘कौन बचा सकता है’। उसकी कार पर मिले 335 गोलियों के निशान केवल भौतिक हिंसा के प्रमाण नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की क्रूरता के प्रतीक हैं, जिसमें बचपन का कोई मूल्य नहीं बचा। यह जानकार सचमुच अपनी विवशता पर क्रोध आता है कि यह फ़िल्म नहीं, सच्ची घटनाओं का फिल्मांतरण है, जो इसकी शक्ति है ।
सच्ची घटना पर आधारित यह सिनेमाई रूपांतरण सभ्यता के ख़िलाफ़ अभियोग है, जहाँ तमाम सुविधाओं के बावजूद एक पाँच वर्ष की बच्ची को बचाया न जा सका, जबकि वह मदद से मात्र 8 मिनट की दूरी पर थी। ‘रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर्स’ के प्रयासों से एम्बुलेंस बचाव के लिए पहुँच भी गयी थी लेकिन उस पर भी हमला बोल दिया गया । यह आठ मिनट का समय और दूरी नौकरशाही की लम्बी प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझकर घंटों में बदल जाती है । यह कम हिंसात्मक नहीं, जो दिखाता है कि नियम-क़ानून कैसे जीवन को मृत्यु में बदल देते हैं । विलंबित न्याय अंतत: न्याय से वंचित ही करना हो जाता है । फ़िल्म उस वैश्विक उदासीनता और उस चुप्पी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करती है जिसने मासूम को मरने दिया । यह पुकार उन हजारों लाखों बच्चों की सामूहिक प्रतिध्वनि बन जाती है, जिन्हें युद्धों में ‘कोलैटरल डैमेज’ यानी अनापेक्षित नुकसान कहकर भुला दिया जाता है ।
गाज़ा पर हुए इजरायल के हमले के बाद ‘हिन्द रजब’ का परिवार चाचा-चाची और कज़न के साथ गाज़ा से बच निकलने की कोशिश कर रहा था कि उनकी कार पर हमला हुआ । हिन्द रजब को छोड़कर परिवार के सभी सदस्य मारे गए। जर्मनी में रहने वाले उसके चाचा के माध्यम से उसका संपर्क ‘फ़िलीस्तीनी रेड क्रॉस सोसायटी’ के आपातकालीन बचाव दल से होता है। फ़िलीस्तीनी रेड क्रॉस सोसायटी के आपातकालीन बचाव दल ने उसे बचाने के लिए सुरक्षित मार्ग बनाया,लेकिन घटनास्थल पर पहुँची एम्बुलेंस पर भी हमला किया गया जिसमें चिकित्साकर्मी युसुफ़ अल-जीनो और अल-मधौन मारे गए। कार पर भी दोबारा गोलीबारी की आवाज़ आती है और फ़ोन कट जाता है। मासूम ‘हिन्द रजब’ मारी जाती है। यहाँ एक प्रश्न उठाया गया है कि क्या यह केवल एक ‘हमला था या अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के तहत ‘डबल टैप’ जैसी रणनीति ! पहले हमले के बाद बचाव दल, डॉक्टर-एम्बुलेंस या अन्य लोग घटनास्थल पर पहुँचते हैं कि सुनियोजित दूसरा हमला हो जाता है ।
ऑस्कर में नामांकित होने पर कॉल सेंटर ऑपरेटरकी भूमिका निभाने वाले मोताज मालहीज़ इन्स्टाग्राम पर लिखते हैं कि “मुझे फ़िलिस्तीनी नागरिकता के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश की अनुमति नहीं है…यह दुःखदाई है, लेकिन सच्चाई यही है आप पासपोर्ट तो रोक सकते हैं लेकिन आवाज़ नहीं। बात सिर्फ़ किसी कलाकार को रोकने या भारत में फ़िल्म प्रदर्शन के रोकने भर की भी नहीं है बल्कि यह कला और अभिव्यक्ति पर अदृश्य पहरा है, जो विडम्बनापूर्ण है । ‘कला’ जो स्वतंत्र है, वंचित और कमज़ोर के पक्ष में खड़ी है, उस पर सत्ता का नियंत्रण दुर्भाग्यपूर्ण है ।
हालाँकि आलोचकों का यह भी मानना है कि फ़िल्म में रज़ब की वास्तविक आवाज़ का प्रयोग भावनात्मक रूप से झटका तो देती है लेकिन यह प्रतिरोध को सहानुभूति में अधिक बदलती है । फ़िल्म में ‘यह हिन्द रजब की रियल वॉयस है’ का बार-बार आना, अंततः ‘हिन्द’ की पीड़ा को एक उपभोग्य अनुभव में रूपान्तरित करने का भी खतरा पैदा करता है । फ़िल्म उसी अनजाने ट्रैप में फँसती-सी नज़र आती है, जहाँ हिंसा की छवियाँ और आवाजें दर्शक को संवेदनशील बनाने के बजाय संवेदना का ह्रास करती हैं । और अनुभव की तीव्रता सघन होने के बजाय उसे सामान्यीकृत करती है जिसे आजकल ‘न्यू-नार्मल’ कहा जाता है । असाधारण क्रूरता बार- बार प्रदर्शन से सामान्य लगने लगती है । इसे ऐसे समझें कि आजकल हिन्दी फ़िल्मों में होने वाली हिंसा की अतिवादिता दर्शक को आनन्द प्रदान करती है। इस ट्रेंड का शिकार प्रेम पर फ़िल्में बनाने वाले विशाल भारद्वाज भी होते हैं जब वे ‘एनिमल’, ‘धुरुंधर’, ‘पुष्पा’ जैसी फ़िल्मों के बाद ‘ओ रोमियो’ जैसी हिंसात्मक फ़िल्म बनाते है जो लोगों को पसंद आती है ।
आजकल भारत में भी वास्तविक के दृश्यों के साथ कल्पना का प्रयोग फ़िल्मों में होने लगा है जो दर्शकों को रोमांचित तो करता है लेकिन ‘कला का उद्देश्य – विरेचन’ कहीं पीछे रह जाता है ।
फ़िल्म का कथानक ‘जेनोसाइड’ अर्थात् नरसंहार को एक ‘बच्ची की आवाज़’ के जरिये मुखर करता है। ‘जेनोसाइड’ जिसे राफेल लेमकिन ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान परिभाषित किया। किसी जातीय,धार्मिक या नस्लीय समूह को योजनाबद्ध तरीके से पूर्णतया खत्म करने का का यह अपराध . आज भी विभिन्न रूपों में दुनिया के सामने उपस्थित है चाहे वह होलोकास्ट हो,रोहिंग्या संकट, सेब्रेनिका-नरसंहार, युक्रेन-रूस युद्ध अथवा इजरायल-फ़िलीस्तीनी युद्ध हो ! हिन्द रजब इन वैश्वी सन्दर्भों को सीधे न कहकर गाज़ा की त्रासदी को उसी क्रम में स्थापित करती है। लेकिन युद्ध केन्द्रित नरसंहार के क्रूरतम उदाहरण को यह फ़िल्म अन्य किसी भी युद्ध-फ़िल्म के राष्ट्रवादी गौरवगाथा की तरह नहीं, बल्कि मनुष्यता के विघटन के रूप में उभारती है।
वस्तुत: फ़िल्म का उद्देश्य मानवीय संवेदनाओं और सरोकारों को तीव्रता से सामने लाना है,जो अक्सर राजनीतिक विमर्शों-बहसों में दब जाते हैं। यह प्रोपेगैंडा फिल्म नहीं है, क्योंकि यह किसी विचारधारा को स्थापित करने के लिए तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ नहीं करती, बल्कि भावनाओं को उद्वेलित करती है । न ही यह दर्शकों को तथ्यों में उलझाती है, बल्कि उनसे सीधा सवाल करती है। जब एक मासूम को बचाया जा सकता था, तो वो कौन थे जो अवरोध पैदा कर रहे थे ? और हम उस चुप्पी के भागीदार कब-कैसे हो गए? एक अपराध बोध का अनुभव होता है और दर्शक एक नैतिक जिम्मेदारी अनुभव करता है । इस प्रकार यह फ़िल्म ‘अनसुनी आवाजों की सिनेमाई अनुगूँज’ है,एक वैश्विक अपील है, एक मानवीय पुकार कि युद्ध के धमाकों में इन बेक़सूर मासूम आवाजों को सुना जाए ताकि न्याय अधूरा न रहे ।










