
आइडियोलॉजी की हानियाँ
यह अक्तूबर 1888 की बात है। रूस में युवा चेखव का नये लेखक के रूप में उभरना शुरू ही हुआ था। कोई उन्हें उदारवादी तो कोई दकियानूसी कहते थे। तब वरिष्ठ साहित्यकार अलेक्सेई प्लेशचियेव ने चेखव से पूछा। उत्तर में चेखव ने कहा कि वे ऐसे विशेषणों को ही भ्रामक मानते हैं। क्योंकि: “दिखावा, मूर्खता, और जबरदस्ती केवल धनियों या शासकों में नहीं है। मैं उसे विद्वतलेखन, साहित्य, और युवा पीढ़ी में भी पाता हूँ। इसीलिए मुझे न तो राजकीय लोगों, न कसाइयों, न विद्वानों, न लेखकों, या युवा पीढ़ी के प्रति कोई झुकाव है। मैं ऐसे हर सामान्यीकरण और बिल्लों को अन्धविश्वास मानता हूँ। मेरे लिए तो मनुष्य, उस का स्वास्थ्य, मेधा, प्रतिभा, सद्प्रेरणा, प्रेम, और उस की पूर्ण स्वतन्त्रता ही सब से पवित्र चीजें हैं। किसी भी प्रकार की जबरदस्ती और झूठ से स्वतन्त्रता।”
अगले पत्र में चेखव ने यह भी लिखा: “क्या मैं उदारवादी कहलाने से डरता हूँ? मैं तो उदारवादी कहलाने या न कहलाने से अधिक पसन्द करूँगा कि मुझे पेटू, लोभी, पियक्कड़, क्षुद्रबुद्धि, संवेदनहीन, आदि कुछ भी कहा जाए।” फिर अपनी रचनाओं के उदाहरण से स्पष्ट किया कि वे जैसे हैं वैसे उन्हें प्रस्तुत करते हैं। वे किसी पात्र के विचार या व्यवहार में सन्तुलन दिखाने की कोशिश नहीं करते। क्योंकि कोई गुण अवगुण कहीं भी, किसी में भी, किन्हीं अवसर पर मिल सकते हैं। व्यक्तियों, गुणों या अवगुणों को लेबल देना व्यर्थ है। सो, “मुझे किसी का उदारवादी या दकियानूसी होना मुख्य बात नहीं लगती। मुख्य है पात्रों की सचाई, न कि उनका झूठ।”
उपर्युक्त प्रसंग आइडियोलॉजी सम्बन्धी किसी भी चर्चा के लिए सदा प्रासंगिक है। क्योंकि आइडियोलॉजी ठीक उस आधार पर खड़ी है, जिस से चेखव को वितृष्णा थी। लोगों, घटनाओं, संस्थाओं को खाने में बाँटकर उस पर ऊँचा या नीचा का बिल्ला लगाना। इस में लोगों में वर्ग-भेद करके ही हर बात होती है। पर यह बड़े हाल की चीज है।
‘आइडियोलॉजी’ की अवधारणा यूरोप में भी फ्रांसीसी क्रान्ति के समय से ही आयी। उस से पहले ज्ञान एवं चिन्तन ही था। तदनुरूप दार्शनिक, विद्वान या कवि महत्त्वपूर्ण थे। वे अपनी धुन में रहते थे। लोग उन की सुनें, इस की उन्हें चिन्ता नहीं थी। जबकि आइडियोलॉजी में मताग्रह है। अपनी मनवाना और भिन्न विचार को हराना। भारत में आइडियोलॉजी का आगमन बीसवीं सदी के आरम्भ से दिखता है। तब से उस की बढ़त और तदनुसार हानियाँ बेहिसाब हैं। आज हमारी सम्पूर्ण सामाजिक शिक्षा, सोशल साइंस व ह्यूमैनिटीज, तथा बौद्धिक विमर्श उस से ग्रस्त है। वह अलग अध्याय है।
पहले आइडियोलॉजी को परखें। यह अपनी परिभाषा से ही एक बँधी-बँधाई संरचना होती है। अतः ‘आइडियोलॉजी’ के लिए हिन्दी में प्रयुक्त ‘विचारधारा’ शब्द गलत है। क्योंकि आइडियोलॉजी विचारों की मुक्त-धारा नहीं, अपितु कुछ बँधे विचारों का समुच्चय है। जबकि ‘धारा’ मुक्त रहती है। तभी धारा रहेगी – वरना डबरा हो जाएगी। सो, आइडियोलॉजी के लिए सही शब्द ‘मतवाद’ है। ‘वाद’ बँधा होता है। जैसे, लेनिनवाद, गाँधीवाद, संघवाद (जिसे आर.एस.एस के लोग ‘संघ-विचारधारा’ कहते हैं), आदि।
अपनी मान्यताओं की जिद से आइडियोलॉजी में एक सेल्फ-राइटियसनेस, हम सही बाकी गलत, की भावना अन्तर्निहित होती है। वह कोई स्वतन्त्र पैमाना नहीं मानती, जिससे सब की बातें परखी जा सके। वह अपनी बात स्वयंसिद्ध मानती है, पैमाना-निरपेक्ष। इसीलिए, आइडियोलॉजी के अनुयायी भी प्रायः अनम्य होते हैं। इसे अपनी वैचारिक ‘निष्ठा’ कहते हैं। पर इससे केवल दलबन्दी, गुटबन्दी बनती है। इस के दुष्प्रभाव में ही बुद्धिजीवियों के बीच किसी मानक से अधिक दल, गुट का महत्त्व रहा है। तदनुरूप प्रचार, उठा-पटक ही मुख्य चिन्ता रही। चतुराई से किन्हीं को चढ़ना-गिराना उनके लेखन, वाचन का नियमित काम हो जाता है। अपने मतवाद के मुंशी को भी ऋषि बताने की जिद रहती है।
इसीलिए आइडियोलॉजी वाली पुस्तकें जल्द ही चमक खो देती हैं। कम्युनिस्ट, गाँधीवादी, संघी, आदि किसी आइडियोलॉजी की शायद ही कोई पुस्तक मूल्यवत्ता में टिकाऊ रही। दबाव, सत्ता और प्रचार से जब तक उसका नाम चले। जबकि सच्ची ज्ञान-पुस्तकें सदियों बाद भी मूल्यवान रहती हैं। उपनिषद, धम्मपद, प्लेटो के ‘संवाद’, ऑरेलियस के ‘मेडिटेशंस’, शॉपेनहावर, तुलसी, टॉल्स्टॉय, विवेकानन्द, जैसे असंख्य ज्ञानियों की रचनाएँ इस के उदाहरण हैं। उन में शायद ही कुछ पुराना पड़ा। वही मानवता की निधि, नित्य बलदायी हैं।
दूसरी ओर, आइडियोलॉजी अपने दल, या सत्ता से शक्तिशाली दिखती है। स्वत: उस में कुछ खास नहीं होता। यह आज मार्क्सवाद, गाँधीवाद, आदि का हाल देखकर समझ सकते हैं। जब कि सत्य स्वयं प्रभावी होता है।
इसीलिए आइडियोलॉजी वालों को सत्ता के सहारे के साथ-साथ सेंसरशिप की भी जरूरत होती है। ताकि एक गोर्की, एक सोल्झेनित्सिन, एक सीताराम गोयल, एक तसलीमा नसरीन की बात भी लोगों तक न पहुँचे! क्योंकि एक सत्य निरूपण भी उस पाखण्ड को साफ दिखा सकता है, जिस का असर काटने में आइडियोलॉजी तथा उस की सत्ता भी परेशान हो जाती है। उसे झूठ से ढँकती है। क्योंकि केवल अपनी आइडियोलॉजी के सहारे उसकी काट नहीं होती।
आखिर कम्युनिस्ट रूस में सोल्झेनित्सिन ने आजीवन जो देखा, भोगा बस उतना ही लिखा था। उनके लेखन में कोई आह्वान, आक्रोश, या भर्त्सना तक नहीं है। बिलकुल सहज, शान्त रूप में अपनी या साथ के कैदी, ग्रामीण, आदि की आपबीती, आँखोंदेखी। परखी जा सकने वाली सच बातें। पर सोल्झेनित्सिन के लेखन का नैतिक बल इतना भारी पड़ा जिसने सोवियत सत्ता को हिला दिया। वह सत्य की शक्ति थी। उसके समक्ष आइडियोलॉजी अपनी विशाल राजसत्ता समेत असहाय रही।
अतः मनुष्य के लिए बेहतर जीवन की परिकल्पना भी किसी आइडियोलॉजी की क्षमता से बाहर है। बल्कि वह उस में बाधक बनती है! सामने का सच भी देखने से मना करती है। बदले में हवाई किले बनाना, सपने देखना, दिखाना, तथा विरोधियों की छीछालेदर उसकी मुख्य गतिविधि रहती है।
जबकि सच और झूठ का कोई वर्ग चरित्र नहीं होता। न गुण या अवगुण पर किसी का एकाधिकार है। अच्छी समाज व्यवस्था बनाने का भी कोई बना-बनाया फार्मूला नहीं होता। इसलिए भी आइडियोलॉजी त्याज्य है। वह सीमित चीज है। जबकि प्रकृति, जीवन, और मानव सम्भावनाएँ अनन्त हैं। आइडियोलॉजी जल्द ही गतिशील जीवन से पिछड़ जाती है। यह मुहम्मद, मार्क्स, गाँधी, आदि सभी की आइडियोलॉजी की नियति रही है। तभी बल प्रयोग या कोसने-बिसूरने के सिवा उसके अनुयायियों को कुछ नहीं सूझता। आइडियोलॉजी इतनी बाँझ साबित होती है।
इसीलिए आइडियोलॉजी मानने वाले आरम्भ से ही संकीर्ण, विवश, फँसे हुए से हो जाते हैं। देर-सवेर उन्हें यह आभास भी होता है। वे कोई घटना, व्यक्ति, दल, या देश सम्बन्धी समाचार भी यथावत देख सकने में असुविधा महसूस करते हैं — जब वह उनकी आइडियोलॉजी के प्रणेता की बात के विपरीत लगे।
सो, आइडियोलॉजी-निष्ठा दृष्टि को संकुचित करती है। जबकि सत्यनिष्ठा सबको मुक्त रखती है, मुक्त करती है। इसीलिए आइडियोलॉजी जल्द फीकी पड़ने लगती है। फिर उसे बनावट, सत्ताबल, प्रोपेगण्डा, धमकी, आदि बल लगाकर बचाना पड़ता है। जैसे, इस्लामी मतवाद का पूरा तन्त्र।
पर सत्य को प्रतिष्ठा देने के लिए हिंसा या प्रोपेगण्डा की जरूरत नहीं होती। तभी हजारों साल पहले के प्लेटो के ‘संवाद’, या बुद्ध के ‘धम्मपद’ आज भी तरोताजा लगते हैं। जबकि ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ या ‘हिन्द स्वराज’ अब म्यूजियम-पीस जैसे हैं। मुल्ला-वर्ग तो अपने मतवाद के मूल स्त्रोत सीरा या हदीसों को छिपाने में ही भलाई समझता है। क्यों उनमें जीवन या समाज के लिए कुछ मूल्यवान पाना कठिन है। जबकि ‘विवेक चूड़ामणि’ या कबीर की ‘साखी’ नित्य मूल्यवान हैं।
अतः कोई अच्छा विचार, अवलोकन एक बात है। जो मार्क्स, गाँधी, नेहरू, जिन्ना, हेडगेवार, आदि ही नहीं, किसी गंगादीन या कल्लूमियाँ की भी सही हो सकती है। सामान्यत: व्यक्ति अपने विचारों में अनुभव से परिवर्तन करता, किसी को छोड़ता भी है। अर्थात् सही विचार रखना, तथा हानिकर या व्यर्थ विचार छोड़ना सहज बात है।
पर आइडियोलॉजी अपने पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष से बाहर के अच्छे से अच्छे विचार भी खारिज करती है। बस चले तो महान पुस्तकों तक को प्रतिबन्धित करती है जो उसके विपरीत पड़ें। ऐसा करना उचित और आवश्यक मानती है। आइडियोलॉजी प्रणेता और उनके अनुयाई अपने मतवाद को ही पैमाना मानकर उचित या अनुचित घोषित करते हैं। यह दूसरों पर जबरदस्ती तो है ही, स्वयं उनका अपना बौद्धिक विकास भी रोकती है। वे एक घिसा-पिटा रिकॉर्ड बजाते रहते हैं।
यह लेनिनिज्म ही नहीं, गाँधीज्म, इस्लामिज्म आदि किसी भी ‘इज्म’ के लिए सच है। अपनी बँधी-बँधाई संरचना से बाहर के विचार के प्रति विद्वेष या उपेक्षा। अन्यथा वह ‘इज्म’, मतवाद होता ही नहीं। इस कारण ही वह भिन्न विचार के लोगों को चोट पहुँचाने के लिए भी बाध्य होता है। हिंसा या कटु शब्दों से।
उसी के अगले चरण में कोई आइडियोलॉजी जुल्म और अत्याचार भी करणीय समझती है। उसके संरक्षक और व्याख्याता — चेयरमैन, महासचिव, अयातुल्ला, या प्रचारक — बताते रहते हैं कि कौन सा कार्य ठीक या बेठीक है। इस प्रवृत्ति के भयंकर परिणाम सभी कम्युनिस्ट और इस्लामी देशों में देखे जा सकते हैं। अत्याचार करने वाले उसे आवश्यक कर्तव्य समझते हैं। इसीलिए पूरी निष्ठा से निरीह लोगों, लेखकों को प्रताड़ित करते हैं। उनका संहार तक। यह सब आइडियोलॉजी की देन है, जो अपने चरम ही नहीं, सामान्य रूप में भी व्यक्ति को संकीर्ण बनाती है। उसके विवेक को बढ़ाने के बजाए कुन्द करती है।
इस तथ्य को सोल्झेनित्सिन के शब्दों में देखिए:
“आइडियोलॉजी – यह वह चीज है जो बुरे काम के लिए लम्बे समय से खोजा जाता रहा औचित्य और बुरे काम करने वाले को जरूरी सामर्थ्य और दृढ़ता प्रदान करती है। यह वह सामाजिक सिद्धान्त है जो उसके काम को अपनी और दूसरे की दृष्टि में बुरे के बजाए अच्छे दिखने में मदद करती है, ताकि उसे शिकायत और शाप सुनने की बजाए प्रशंसा और सम्मान मिले।”
क्या आज तमाम जिहादी इसी भावना से अपनी योजनाएँ नहीं बनाते और लागू करते हैं? अपने-अपने तरह से लेनिन, हिटलर, माओ, पोल-पॉट, खुमैनी, तालिबान और इस्लामी स्टेट ने वही किया है। उनके कारनामो में किसी न किसी आइडियोलॉजी की प्रेरणा रही। उसके बिना वैसे भयंकर काम सहजता से किए ही नहीं जा सकते। आइडियोलॉजी ही व्यक्ति के सहज विवेक को ठस करके उससे ऊल-जुलूल करवाती है।
परन्तु अन्ततः व्यक्ति अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है। चाहे वह मतवादी नशे में किया गया हो। यद्यपि अपनी अन्तरात्मा में व्यक्ति को प्रायः संकेत मिलता रहता है कि उसने क्या किया है। सोल्झेनित्सिन के शब्दों में: “अच्छाई और बुराई के बीच की रेखा प्रत्येक मनुष्य के हृदय से होकर जाती है।” वह किसी मतवाद की पकड़ से दूर है।
इसीलिए नैतिक-अनैतिक, उचित-अनुचित की सहज मानवीय भावना के ऊपर किसी आइडियोलॉजी को रखना अनुचित है। अपनी और समाज की हानि करना है। स्वतन्त्र विवेक और मुक्त विचार ही सम्यक गुण है। क्योंकि जैसा गेटे ने कहा था: ‘सभी सिद्धान्त धूसर होते हैं, जबकि जीवन का वृक्ष सदाबहार है’।










