
भयमुक्त भारत का अधूरा स्वप्न
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ऐसे भारत का स्वप्न देखा था, ‘जहाँ मन भयमुक्त हो और मस्तक ऊँचा रहे।’ महात्मा गाँधी ऐसे राष्ट्र की कल्पना करते थे, जहाँ सभी धर्म पारस्परिक सम्मान के साथ सह-अस्तित्व में रहें। जवाहरलाल नेहरू विज्ञान, विवेक और लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर आधारित धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के पक्षधर थे। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने ऐसा संविधान रचा, जो जाति, धर्म, लिंग, भाषा और नस्लीय पहचान से परे प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और कानून के समक्ष समानता का आश्वासन देता है।
दशकों तक भारतीय लोकतन्त्र को अपूर्ण और अनेक चुनौतियों से घिरा माना जाता रहा, फिर भी वह मानव इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोगों में एक बना रहा—एक ऐसा देश, जिसने अपनी असाधारण विविधता के बीच लोकतान्त्रिक सहमति के आधार पर स्वयं अपना शासन चलाने का प्रयास किया। आज अनेक पर्यवेक्षकों को आशंका है कि यह प्रयोग एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राजनीतिक प्रभुत्व और उसके वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत, अनेक विश्लेषकों के अनुसार, संवैधानिक बहुलतावाद से धीरे-धीरे हटकर अधिक केन्द्रीकृत और बहुसंख्यकवादी राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। समर्थक इसे राष्ट्रीय पुनर्जागरण और सभ्यतागत पुनरुत्थान मानते हैं, जबकि आलोचकों की दृष्टि में यह लोकतान्त्रिक संस्थाओं के क्षरण, सत्ता के बढ़ते केन्द्रीकरण और एकदलीय राजनीतिक संस्कृति की ओर बढ़ता कदम है। मतभेद चाहे जितने हों, इतना स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में भारत की राजनीतिक संस्कृति में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है।
लोकतन्त्र की आधारशिला जवाबदेही है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह पत्रकारों, विपक्ष, नागरिक समाज और आम नागरिकों के कठिन प्रश्नों का उत्तर दे तथा अपने निर्णयों का सार्वजनिक औचित्य प्रस्तुत करे। किन्तु समकालीन भारत में जवाबदेही का यह स्वरूप लगातार सीमित होता दिखाई देता है।
नरेन्द्र मोदी, जिन्हें इन्दिरा गाँधी के बाद भारत के सबसे शक्तिशाली प्रधानमन्त्रियों में गिना जाता है, बहुत कम अवसरों पर खुली प्रेस वार्ताओं में असंयमित प्रश्नों का सामना करते हैं। अनेक महत्त्वपूर्ण नीतिगत निर्णय व्यापक सार्वजनिक बहस के बजाय शीर्ष स्तर से घोषित किए जाते हैं। संसद भी धीरे-धीरे ऐसी संस्था बनती दिखाई देती है, जहाँ विधेयक अपेक्षाकृत कम चर्चा और सीमित परीक्षण के साथ पारित हो जाते हैं।
विपक्षी दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि अनेक लोकतान्त्रिक संस्थाएँ निष्पक्ष मध्यस्थ के बजाय सत्तारूढ़ व्यवस्था के प्रति अधिक अनुकूल दिखाई देती हैं। इन आरोपों की सत्यता पर मतभेद हो सकते हैं, किन्तु यह भी सच है कि बड़ी संख्या में नागरिक सार्वजनिक संस्थाओं की स्वतन्त्रता को लेकर पहले की अपेक्षा अधिक चिन्तित हैं। लोकतन्त्र केवल नियमित चुनावों से नहीं, बल्कि संस्थाओं की निष्पक्षता और उन पर जन-विश्वास से भी संचालित होता है।
एक समय भारतीय पत्रकारिता विश्व की सबसे जीवन्त परम्पराओं में गिनी जाती थी। समाचारपत्र और टेलीविजन सत्ता से असुविधाजनक प्रश्न पूछने और उसकी नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करने से नहीं हिचकते थे। आज स्थिति बदलती हुई दिखाई देती है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता पर निगरानी रखने वाले प्रहरी के बजाय सरकारी आख्यानों का प्रचारक अधिक प्रतीत होता है।
टेलीविजन बहसें अनेक बार पत्रकारिता से अधिक राजनीतिक रंगमंच का रूप ले लेती हैं। प्राइम टाइम में सांस्कृतिक संघर्ष, धार्मिक ध्रुवीकरण और योजनाबद्ध आक्रोश को प्रमुखता मिलती है, जबकि बेरोजगारी, महँगाई, किसानों की कठिनाइयाँ, शिक्षा, पर्यावरण और बढ़ती आर्थिक असमानता जैसे प्रश्न अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं।
मैं पहले भी इस प्रवृत्ति को “बहिष्करण की पत्रकारिता” (जर्नलिज़्म ऑफ एक्सक्लूजन) कह चुका हूँ। इसका आशय केवल भ्रामक सूचना से नहीं, बल्कि उन तथ्यों, आवाजों और दृष्टिकोणों को व्यवस्थित रूप से अनुपस्थित कर देने से है, जो प्रचलित राजनीतिक या आर्थिक शक्ति-संरचना को चुनौती देते हों। कई बार सबसे प्रभावी प्रचार झूठ बोलकर नहीं, बल्कि असुविधाजनक तथ्यों को चुपचाप छोड़कर काम करता है।
सरकार के समर्थक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ऊँची वृद्धि दर और भारत के विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताते हैं। किन्तु केवल आर्थिक वृद्धि पूरी कहानी नहीं कहती।
आर्थिक प्रगति के साथ सम्पत्ति का अभूतपूर्व केन्द्रीकरण भी हुआ है। अरबपतियों का एक छोटा-सा वर्ग राष्ट्रीय सम्पदा के बड़े हिस्से पर नियन्त्रण रखता है। आधारभूत संरचना, दूरसंचार, ऊर्जा, बन्दरगाह, हवाई अड्डे, खुदरा व्यापार, मीडिया और वित्त जैसे क्षेत्रों में बड़े कॉरपोरेट समूहों का प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा है।
दूसरी ओर, विशेषकर युवाओं में बेरोजगारी गम्भीर चिन्ता का विषय बनी हुई है। लाखों शिक्षित युवा सम्मानजनक रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संविदा आधारित रोजगार बढ़ा है, नौकरी की स्थिरता कम हुई है और ग्रामीण संकट अब भी व्यापक है। परिणामस्वरूप ऐसी अर्थव्यवस्था उभर रही है, जो शीर्ष पर असाधारण सम्पत्ति का सृजन करती है, जबकि बड़ी आबादी स्वयं को उसके लाभों से वंचित महसूस करती है।
भारतीय रुपये का अवमूल्यन भी अर्थव्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण कहानी कहता है। 2014 में एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 60 रुपये के आसपास था; आज वह अस्सी के उत्तरार्ध के स्तर पर पहुँच चुका है। कमजोर रुपया आयात को महँगा बनाता है और उसका प्रभाव कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, मशीनरी तथा अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों के माध्यम से पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
इसका असर हर परिवार महसूस करता है। परिवहन महँगा होता है, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, उर्वरक और बिजली उत्पादन की लागत बढ़ती है तथा छोटे व्यवसायों का खर्च भी बढ़ जाता है। इसलिए आधिकारिक आर्थिक आँकड़े चाहे जितने उत्साहजनक हों, आम नागरिक अर्थव्यवस्था का वास्तविक अनुभव अपने घरेलू बजट के माध्यम से करता है।
भारत में ऊर्जा की कीमतें हमेशा सबसे संवेदनशील राजनीतिक और आर्थिक प्रश्नों में रही हैं। वैश्विक तेल बाजार के उतार-चढ़ाव का प्रभाव स्वाभाविक है, किन्तु करों और अन्य संरचनात्मक कारणों से भारतीय उपभोक्ताओं को अक्सर अपेक्षाकृत अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। इसका सबसे अधिक बोझ कामकाजी और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। किसानों के लिए डीजल महँगा होता है, माल ढुलाई की लागत बढ़ती है और अन्ततः महँगाई पूरे आर्थिक तन्त्र में फैल जाती है। फिर भी अनेक बार इन प्रश्नों को उतना सार्वजनिक और मीडिया ध्यान नहीं मिलता, जितना प्रतीकात्मक सांस्कृतिक या धार्मिक विवादों को मिलता है।
हाल के वर्षों में लोकतान्त्रिक सफलता की कहानी के रूप में भारत की अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी गम्भीर प्रश्न उठे हैं। मानवाधिकारों से जुड़े अन्तरराष्ट्रीय संगठन, प्रेस की स्वतन्त्रता पर निगरानी रखने वाली संस्थाएँ, महिलाओं के अधिकारों के लिए कार्यरत समूह तथा नागरिक स्वतन्त्रताओं की पैरवी करने वाले अनेक मंच समय-समय पर भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, इण्टरनेटबन्दी, पत्रकारों के साथ व्यवहार और नागरिक समाज संगठनों पर लगाए गए प्रतिबन्धों को लेकर चिन्ता व्यक्त करते रहे हैं।
महिलाओं के अधिकारों का प्रश्न विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। भारत आज भी यौन हिंसा, लैंगिक भेदभाव, तथाकथित ऑनर किलिंग, मानव तस्करी और कार्यस्थलों पर असमानता जैसी गम्भीर चुनौतियों से जूझ रहा है। यद्यपि ये समस्याएँ वर्तमान सरकार से पहले भी मौजूद थीं, आलोचकों का कहना है कि अनेक अवसरों पर सरकारी प्रतिक्रिया व्यापक संस्थागत सुधारों की अपेक्षा राजनीतिक आख्यानों पर अधिक केन्द्रित दिखाई देती है। परिणामस्वरूप महिलाओं से जुड़े अपराध कई बार सामाजिक परिवर्तन का अवसर बनने के बजाय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाते हैं और वास्तविक पीड़ितों की न्याय की माँग पीछे छूट जाती है।
जो राष्ट्र अपने युवाओं को निराश करता है, वह अन्ततः अपने भविष्य को भी निराश करता है। नीट परीक्षा से जुड़ा विवाद भारत की शिक्षा व्यवस्था में जनता के विश्वास को गहराई से प्रभावित करने वाला प्रसंग बना। प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा संचालन में अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के आरोपों ने लाखों विद्यार्थियों तथा उनके परिवारों को असमंजस में डाल दिया। किन्तु यह केवल एक परीक्षा का संकट नहीं था; इसने शिक्षा व्यवस्था की गहरी संरचनात्मक समस्याओं को भी उजागर किया। विश्वविद्यालय वित्तीय संसाधनों की कमी, अकादमिक स्वतन्त्रता पर बढ़ते दबाव, शोध में अपर्याप्त निवेश और नियुक्तियों को लेकर उठते विवादों से जूझ रहे हैं। यदि भारत वास्तव में वैश्विक ज्ञान-शक्ति बनना चाहता है, तो उसे अपने युवाओं का विश्वास पुनः अर्जित करना होगा।
अयोध्या का राम मंदिर समकालीन भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट स्थान रखता है। करोड़ों हिन्दुओं के लिए उसका निर्माण लम्बे समय से जुड़ी धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक आकाँक्षा की पूर्ति का प्रतीक है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि यह धर्म और राज्यसत्ता के ऐसे मेल का प्रतीक भी बन गया है, जो भारत की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक परम्परा के सामने नये प्रश्न उपस्थित करता है। भूमि अधिग्रहण, वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर भी समय-समय पर प्रश्न उठे हैं। किन्तु इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या धार्मिक प्रतीक और सांस्कृतिक भावनाएँ धीरे-धीरे सुशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों का स्थान लेती जा रही हैं। किसी भी सरकार का मूल्यांकन अन्ततः इसी आधार पर होना चाहिए कि उसने नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता और स्वतन्त्रताओं को कितना सुदृढ़ किया।
हाल के वर्षों में सबसे अधिक विवादास्पद प्रवृत्तियों में से एक वह है, जिसे आलोचक ‘बुलडोजर राजनीति’ कहते हैं। अनेक राज्यों में ध्वस्तीकरण अभियान सार्वजनिक प्रदर्शन का रूप लेते दिखाई दिए हैं। प्रशासन इन्हें कानून के प्रभावी प्रवर्तन की कार्रवाई बताता है, जबकि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इनका प्रभाव प्रायः गरीबों और हाशिए पर स्थित समुदायों पर असमान रूप से पड़ता है। पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों की घटनाओं ने इन नीतियों के मानवीय परिणामों पर बहस को और तीखा किया है। हजारों फेरीवाले, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, छोटे दुकानदार और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक अपनी आजीविका से वंचित हुए। किसी सम्पन्न व्यक्ति के लिए सड़क किनारे की एक छोटी दुकान मामूली बात हो सकती है, किन्तु एक निर्धन परिवार के लिए वही उसकी आजीविका और भविष्य की सबसे बड़ी पूँजी होती है। लोकतन्त्र का मूल्यांकन केवल चुनावों से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर भी होना चाहिए कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएँ इसलिए टिकाऊ होती हैं क्योंकि उनकी संस्थाएँ सत्ता पर आवश्यक नियन्त्रण और सन्तुलन बनाए रखती हैं। आज भारत में जाँच एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, नियामक संस्थाओं, निर्वाचन सम्बन्धी तन्त्रों तथा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं की स्वतन्त्रता को लेकर चिन्ताएँ बढ़ती दिखाई देती हैं। विपक्षी दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि कानून का प्रयोग चयनात्मक ढंग से किया जा रहा है। इन आरोपों की सत्यता पर मतभेद हो सकते हैं, किन्तु यदि ऐसी धारणा व्यापक होने लगे, तो उसका प्रभाव लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर अवश्य पड़ता है। जन-विश्वास लोकतन्त्र की सबसे मूल्यवान पूँजी है; एक बार उसके कमजोर पड़ जाने पर उसे पुनः स्थापित करना अत्यन्त कठिन हो जाता है।
लोकतान्त्रिक संस्थाएँ केवल प्रशासनिक ढाँचे का हिस्सा नहीं होतीं; वे नागरिक और राज्य के बीच विश्वास का आधार भी निर्मित करती हैं। न्यायपालिका नागरिकों को यह आश्वासन देती है कि सत्ता भी कानून से ऊपर नहीं है। निर्वाचन तन्त्र यह विश्वास बनाए रखता है कि राजनीतिक परिवर्तन शान्तिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से सम्भव है। विश्वविद्यालय केवल ज्ञान के केन्द्र नहीं, बल्कि स्वतन्त्र विचार, आलोचनात्मक विवेक और नये सामाजिक विमर्शों के निर्माण के स्थल होते हैं। इसी प्रकार स्वतन्त्र मीडिया का दायित्व केवल समाचार देना नहीं, बल्कि सत्ता की निरन्तर सार्वजनिक समीक्षा करना भी है। जब ये संस्थाएँ अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह स्वायत्तता और निष्पक्षता के साथ करती हैं, तभी नागरिक अधिकार व्यावहारिक अर्थ प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत यदि संस्थाओं की निष्पक्षता पर व्यापक सन्देह उत्पन्न होने लगे, तो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार भी धीरे-धीरे औपचारिक घोषणाओं तक सीमित होने लगते हैं। लोकतन्त्र की वास्तविक शक्ति किसी एक लोकप्रिय नेता या सरकार में नहीं, बल्कि उन संस्थाओं में निहित होती है जो सत्ता के परिवर्तन के बावजूद नागरिकों के अधिकारों और संवैधानिक मर्यादाओं की निरन्तर रक्षा करती हैं।
सत्तावादी व्यवस्थाएँ प्रायः एक ही दिन में स्थापित नहीं होतीं। वे धीरे-धीरे विकसित होती हैं। सबसे पहले नागरिक स्वयं अपने विचारों पर अंकुश लगाने लगते हैं। पत्रकार संवेदनशील विषयों से बचते हैं, शिक्षक और प्राध्यापक अधिक सतर्क हो जाते हैं, कलाकार संकोच करने लगते हैं, प्रकाशक जोखिम लेने से बचते हैं और सामाजिक कार्यकर्ता मौन को अधिक सुरक्षित समझने लगते हैं। धीरे-धीरे भय सामान्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। सबसे प्रभावी सेंसरशिप वह नहीं होती, जिसे सरकार प्रत्यक्ष रूप से लागू करे, बल्कि वह होती है जिसमें नागरिक स्वयं ही अपने विचार व्यक्त करने से पहले उन्हें रोकने लगें। यही वह स्थिति है, जब लोकतन्त्र सबसे अधिक असुरक्षित हो जाता है।
आज का संघर्ष केवल चुनावी राजनीति का प्रश्न नहीं है। यह भारत की दो भिन्न राष्ट्रीय परिकल्पनाओं के बीच का वैचारिक संघर्ष भी है। एक दृष्टि विविधता को चुनौती मानती है और एकरूपता को समाधान, जबकि दूसरी भारत की बहुलता को उसकी सबसे बड़ी शक्ति मानती है। एक सांस्कृतिक और राजनीतिक अनुरूपता स्थापित करना चाहती है, दूसरी असहमति, सह-अस्तित्व और बहुलतावाद को लोकतन्त्र की आधारशिला मानती है। भारतीय संविधान स्पष्ट रूप से इसी दूसरी परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है। आज मूल प्रश्न यह है कि क्या संवैधानिक बहुलतावाद की यह परिकल्पना बहुसंख्यकवादी राजनीति, सम्पत्ति के बढ़ते केन्द्रीकरण, संस्थाओं की घटती स्वायत्तता और सामाजिक ध्रुवीकरण के दबावों के बीच स्वयं को सुरक्षित रख पाएगी।
लोकतन्त्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह असहमति को शत्रुता नहीं, बल्कि सार्वजनिक विवेक का आवश्यक आधार मानता है। चुनाव लोकतन्त्र का महत्त्वपूर्ण अंग हैं, किन्तु वे उसकी सम्पूर्ण परिभाषा नहीं हैं। लोकतन्त्र तब परिपक्व होता है, जब नागरिक निर्भय होकर अपनी बात कह सकें, न्यायालय निष्पक्ष होकर संविधान की रक्षा कर सकें, विश्वविद्यालय स्वतन्त्र चिन्तन का वातावरण बनाए रखें, मीडिया सत्ता और समाज दोनों से समान दूरी रखते हुए प्रश्न पूछ सके तथा विपक्ष को शासन का वैध लोकतान्त्रिक प्रतिपक्ष माना जाए। किसी भी राष्ट्र की लोकतान्त्रिक गुणवत्ता केवल इस बात से नहीं आँकी जाती कि वहाँ चुनाव कितनी नियमितता से होते हैं, बल्कि इस बात से भी कि सत्ता असहमति के साथ कैसा व्यवहार करती है, संस्थाएँ कितनी स्वायत्त रहती हैं और नागरिक अधिकार व्यवहार में कितने सुरक्षित हैं। यही वे कसौटियाँ हैं जिन पर किसी भी लोकतन्त्र की वास्तविक परिपक्वता और उसकी दीर्घकालिक स्थिरता का मूल्यांकन किया जाता है। भारत अपनी स्वतन्त्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है और उसके सामने एक ऐतिहासिक विकल्प उपस्थित है। क्या वह ऐसा राष्ट्र बनेगा जिसकी पहचान भय, अनुरूपता, बहिष्कार और सत्ता के बढ़ते केन्द्रीकरण से होगी, या वह लोकतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता, विविधता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को नये सिरे से सुदृढ़ करेगा?
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का स्वप्न आज भी अधूरा है। ‘जहाँ मन भयमुक्त हो’—उनकी यह कल्पना आज भी प्रत्येक पीढ़ी के सामने एक नैतिक चुनौती की तरह उपस्थित है। लेखक के अनुसार आज का संघर्ष किसी एक धर्म, राजनीतिक दल या वैचारिक ध्रुव के बीच का संघर्ष भर नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है। लगभग आठ दशकों तक भारत ने अपनी असाधारण विविधता के बीच लोकतन्त्र को जीवित रखकर विश्व के सामने एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस लोकतान्त्रिक विरासत की रक्षा करना अब प्रत्येक भारतीय नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। इतिहास अन्ततः इसी कसौटी पर हमारा मूल्यांकन करेगा कि हमने इस विरासत को सुदृढ़ किया या उसे धीरे-धीरे क्षीण होने दिया।










