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मुद्दास्त्रीकाल

सेरोगेसी मदर – रेशमा त्रिपाठी

 

  • रेशमा त्रिपाठी

 

“सरोगेसी बच्चें की सौंगात आज के समय में टूटते बिखरते परिवारों के लिए एक वरदान के रूप में उभर कर सामने आ रहा हैं । लोगों के स्वयं के बच्चे होने के सपने पूरे हो रहे हैं जिसकी एक झलक हम इतिहास के पन्नों में भी अप्रत्यक्ष रूप से देख चुके हैं वासुदेव पुत्र श्री कृष्ण के रूप में , किस प्रकार श्री कृष्ण देवकी पुत्र होने के बाद भी वह यशोदा के लाल कहलाते हैं यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि यदि उस दौर में भी भारतीय ‘टेक्नोलॉजी एआरटी आर्टिफिशियली स्टीमुलेंटिंग प्रेग्नेंसी प्राॅसेस’ होता तो श्री कृष्ण यशोदा पुत्र ही होते।

हालांकि वर्तमान दौर में इसका विकास 1987 में अमेरिका की टाइम पत्रिका के कवर पर ‘बेबी एम्’ से जुड़ी खबर ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और मामला कोर्ट में गया वहाॅ॑ सेरोगेसी से सामाजिक, नैतिक मूल्यों की जटिलता पर बहस छिड़ी और अन्त में कोर्ट को नया कानून बनाना पड़ा । कुछ वर्षों बाद अहमदाबाद में सन् 1998 में ‘बावीसी फर्टिलिटी इंस्टीट्यूट’ के डाॅक्टर :हिमांशु ने सरोगेसी से एक बच्चें को जन्म कराया । फीर धीरे –धीरे सामाजिक भ्रांतियां दूर होती गई और फिल्म जगत की कई हस्तियों ने भी सेरोगेसी माता-पिता बनकर एक नया मोड़ देना समाज को शुरू किया साथ ही स्वयं भी सुखी जीवन व्यतीत करने लगे जिसमें शाहरुख खान और गौरी का नाम भी आता है जिन्होंने वर्ष 2011 में अपने दूसरे बच्चे योहान को जन्म दिया।

उनका यह कदम साहसी था । जो कि समाज को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई ।अब तो यह आम बात हो गई हैं साथ-साथ एक वर्ग विशेष की स्त्रियों का यह पैसन भी हो गया हैं इसमें मुख्यत मॉडल अभिनेत्री कार्पोरेट की बुलंदियों पर पहुॅ॑चने की दौड़ में शामिल होने वाली प्रमुख स्त्रियाॅ॑ हैं हालांकि 57 वर्षीय डॉ फिरोजा पारिख का कहना हैं कि सेरोगेसी में सिर्फ 50 से 70फीसदी ही कामयाबी की संभावना होती है इसमें भी दो प्रकार की होती हैं पहला हैं- ‘ट्रेडिशनल’ जिसमें पिता के शुक्राणुओं को एक अन्य महिला के शुक्राणुओं के साथ निषेचित किया जाता हैं जिसका सीधा संबंध पिता से होता हैं यह अधिकतर सिंगल मदर/ फादर के रूप में किया जाता हैं जिसमें एकता कपूर और उनके भाई तुषार कपूर का नाम लिया जा सकता हैं दूसरा हैं– ‘जेस्टेशनल’ इसमें माता-पिता दोनों के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से प्रत्यारोपित किया जाता हैं जिसमें माता-पिता दोनों का जैनेटिक संबंध होता है। किन्तु इसमें संभावनाएं कम होती हैं । किन्तु आज के समय में वेश्यावृत्ति के जैसें किराए की कोख भी भरण पोषण का कार्य करने लगी हैं एक वर्ग विशेष इसका व्यवसायीकरण करने लगा हैं ।


डिजिटल इंडिया जनसंख्या के दृष्टिकोण से बात करें तो लिखित आंकड़ों में जनसंख्या वृद्धि में रोक का कार्य कर रही हैं किन्तु वही मिथक तथ्यों के आधार पर जनसंख्या वृद्धि का कार्य कर रही हैं इसका कारण यह है कि भारत देश में सरोगेसी पर नाम मात्र का बिल पारित हुआ है 19 दिसम्बर 2018 को लेकिन कोई ठोस कानून नहीं बना । जबकि ब्रिटेन और कुछ अन्य देशों में सेरोगेट मदर को मां का दर्जा मिलता हैं वहीं एक रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस नीदरलैंड में कमर्शियल सेरोगेसी की इजाजत नहीं हैं लेकिन इन सब तथ्यों के बाद भी इतिहास के पन्नों में जो दत्तक पुत्र हुआ करता था वह अब अपना पुत्र होने लगा हैं यही कारण हैं कि आज के माता पिता बनने की इच्छा रखने वाले दंपत्ति इसका लाभ ले रहे हैं और अपना सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि मनुष्य का सुखी व प्रसन्न होना ही उसकी प्रथम प्राथमिकता हैं जो उसे स्वस्थ रखने में कारगर होती हैं हालांकि वर्तमान समय में सेरोगेसी का सबसे बड़ा हब जाॅर्जिया और युकेन में उभर कर आ रहा हैं क्योंकि अब तक यहाॅ॑ पर कोई कानून नहीं हैं किन्तु यदि सुरक्षा की दृष्टि से विचार करें तो सरोगेसी बच्चा, किराए की कोख , गर्भ और महिला सुरक्षा सोचनीय एवम् संवेदनशील विषय हैं जिस पर लोगों के विचार, भाव ,व्यवहार ही अधिक प्रभावशाली माना जाना चाहिए । इसलिए कि मानव सर्वप्रथम बच्चा ही होता हैं वह फिर बाल रुप में श्री कृष्ण ही क्यों ना हो । किन्तु साथ ही बच्चों के भविष्य की सुरक्षा के लिए मां और बच्चे के लिए विशेष कानून बनाया जाना चाहिए ।
अतः यह कहा जा सकता हैं की वैज्ञानिक टेक्नोलॉजी ने सेरोगेसी विधि द्वारा अनेक घरों में खुशियों की सौगात दी हैं जो कि सराहनीय एवम् चिकित्सा के क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि हैं और एक नए भारत को जन्म के रूप में परिवर्तित हो रहा हैं ।। ”

लेखिका हिन्दी भाषा साहित्य से जेआरएफ हैं और पीएचडी प्रवेश की तैयारी कर रही हैं|

सम्पर्क- +919415606173, reshmatripathi005@gmail.com

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13Aug
सामयिक

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