
यथार्थ और भ्रम के बीच महिला दिवस
18 फ़रवरी 2026 को दैनिक भास्कर में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से जुड़ी एक अजीब सी खबर पढ़ने को मिली जो कुछ समय बाद ही पूरे देश भर में वायरल हो गया। यह खबर बलात्कार से जुड़े एक फैसले का था जिसमें आरोपी की सजा आधी कर दी गयी थी। इस संदर्भ में जज का यह कहना था कि यदि किसी मामले में महिला के साथ पूरा पेनिट्रेशन यानि प्रवेश साबित नहीं होता, केवल प्राइवेट पार्ट को रगड़ा गया है तो इसे कानून की नजर में बलात्कार नहीं माना जाएगा। ऐसा कृत्य अटेम्प्ट टू रेप अर्थात् बलात्कार के कोशिश की श्रेणी में आयेगा। जबकि आरोपी ने पीड़िता को जबरदस्ती खींचकर अपने घर ले गया। वहाँ उसने अपने और पीड़िता के कपड़े उतारे और उसकी मर्जी के खिलाफ शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश की। उसने पीड़िता के हाथ-पैर बांध दिए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया।

एक व्यक्ति किसी महिला के साथ इतना कुछ जबरदस्ती करता है, इसके बावजूद जज के दिल में आरोपी के प्रति जो रहमों-करम सामने आयी वह सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक सोच का ही परिचायक है, जहाँ एक महिला को भोगने की भोगवादी नजरिया समाज का हिस्सा रहा है जिसे मर्दांगी की संज्ञा दी गयी है। कोई व्यक्ति यदि किसी महिला को इच्छा के विरुद्ध छू भी देता है तो जो मनोस्थिति उस महिला की बन जाती है उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है और इस सदमे से उबर पाना मुश्किल होता है। फिर यहाँ तो पीड़ित महिला के साथ इतना कुछ किया गया, इसके बावजूद आरोपी की सजा कम करना दुर्भाग्यजनक है। जब न्याय देने वाले व्यक्ति की सोच ऐसी हो तो फिर हम किससे न्याय की उम्मीद करेंगे? ऐसी घटनायें महिला शोषण के बदलते स्वरूप को रेखांकित करता है जो अलग-अलग रूप में सामने आते रहता है।
महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव का एक और बहुत ही अजीब सा मामला सामने आया। घटना 14 सितम्बर 2024 की है जब मैं उत्तराखण्ड में एसोसिएट प्रोफेसर का पदभार ग्रहण करने के बाद पौड़ी के जिला अस्पताल में फिटनेस टेस्ट करवाने गयी। यह मेरे लिए किसी अचंभे से कम नहीं था कि महिलाओं और लड़कियों को फिटनेस सर्टिफिकेट के लिए प्रेगनेंसी टेस्ट कराना यहाँ अनिवार्य था। यह टेस्ट सिर्फ विवाहित महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि अविवाहितों के लिए भी अनिवार्य था। कुछ तो बहुत कम उम्र की लड़कियां भी फिटनेस सर्टिफिकेट के लिए आयी थी जो कहीं एडमिशन लेने जाना चाहती थी। उन्हें जब प्रेगनेंसी किट टेस्ट के लिए दिया गया तो वे समझ भी नहीं पायी कि इस किट का क्या करना है। जब उन लड़कियों ने वहाँ मौजूद महिला नर्स से पूछा तब बताया गया कि यह प्रेगनेंसी किट है और इसे इस तरह से उपयोग करना है।
इतना सुनते ही वे लड़कियां और उनके घर वाले आश्चर्य से भर गयें। लगभग मैं भी कुछ ऐसी ही स्थिति में थी क्योंकि इसके पहले भी मैं स्थायी नौकरियों के लिए फिटनेस टेस्ट से गुजर चुकी थी लेकिन ऐसा कभी देखने-सुनने को कहीं नहीं मिला था और महिला-पुरूष दोनों के लिए समान टेस्ट ही लिया जाता था। जब मैंने पूछा कि ऐसा किस नियम के तहत कराया जा रहा है तो किसी ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और इतना कह दिया कि नहीं करवाएंगी तो आपका सर्टिफिकेट नहीं बनेगा। एक कर्मचारी ने तो यहाँ तक बोल दिया कि जो प्रेग्नेंट होंगे उन्हें फिटनेस सर्टिफिकेट देंगे ही नहीं। मैंने काफी लोगों से बात की लेकिन कोई भी इसमें कुछ बोलने और विरोध करने को तैयार नहीं हुए और सबने टेस्ट दे दिया। इसीलिए कहते हैं, “मरता क्या न करता।” उत्तराखण्ड में लिंग भेदभाव का यह मेरा पहला अनुभव था।
इसके बाद भेदभाव के कई मामले सामने आते रहें जिनमें से अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े थे, जिससे मैं खुद भी नहीं बच पायी। अधिकांश जगह पर मेरा यही अनुभव रहा कि महिलाएं यदि अकेली हों तो उनका संघर्ष आज भी दोगुना बढ़ जाता है। खासतौर पर यह संघर्ष तब और बढ़ जाता है, जब वह महिला समझौतावादी और चापलूस न होकर अपने सिद्धांतो पर अडिग रहने वाली हो और वह अपनी सोच-समझ रखती हो। मेरे साथ भी प्रायः हर जगह यही होता रहा। विभाग में मेरे आते ही ऐसा लगा जैसे लोगों का साम्राज्य ही छीन रहा हो। विभाग के लगभग सारे पुरूष लामबंद हो गयें। एक महिला सहायक प्राध्यापक जिसके पति भी इसी विभाग में सहायक प्राध्यापक है, वह भी इसी गुट का हिस्सा बन गई और सबकी हर संभव कोशिश ये रहने लगी कि किसी तरह मुझे परेशान करके भगाया जाये। जब इन लोगों को कोई बहाना न मिला तब इन्होंने एक अद्भुत तरीका ढूंढ़ निकाला।
विभाग की उस एक मात्र महिला सहायक प्राध्यापक ने यह लिखकर कुलपति महोदय से मेरी शिकायत कर दी कि “डॉ. अमिता ने मेरी प्रेगनेंसी और मेडिकल कंडीशन के बारे में विद्यार्थियों से चर्चा की और यह कहा कि मैं प्रेगनेंसी के बहाने ड्यूटी नहीं करना चाहती हूँ।” इस बेबुनियाद आरोप पर पूरी कायनात ऐसे तत्पर हुई कि मैं सोचती रह गयी कि वास्तविक शिकायतों में भी यदि ऐसी ही तत्परता अपनायी जाये तो गलत करने वाले लोग गलत करने से पहले हज़ार बार सोचेंगे। जबकि इस महिला ने खुद ही जिम्मेदार अधिकारियों को ईमेल के माध्यम से लिखा था कि वह 2 महीने की गर्भवती है जिसके कारण वह परीक्षा ड्यूटी नहीं कर सकती है। जबकि ऐसी परिस्थिति के लिए चिकित्सकीय अवकाश की सुविधा होती है। दूसरी एक और बात इसमें बेहद महत्वपूर्ण है कि जब तक कोई महिला यह नहीं बताती है कि वह प्रेग्नेंट है, तब तक यह बात उसका पति भी शायद ही जान सकता है, बशर्ते की कोई आकाशवाणी न हो। खैर, शिकायत के तुरंत बाद इसे कार्रवाई के लिए आईसीसी (आंतरिक शिकायत समिति) में कुलपति महोदय द्वारा अग्रेषित कर दिया गया। फिर क्या था, हुक्म का पालन करते हुए आईसीसी की अध्यक्ष ने भी पूर्ण तत्परता दिखाते हुए मुझे नोटिस भेजा और सुनवाई में भी बुलाया ताकि मुझे परेशान किया जा सके।

जबकि यह समिति महिलाओं पर कार्यस्थल पर होने वाले यौन प्रताड़ना को रोकने के लिए पोश अधिनियम 2013 (Prevention of Sexual Harassment) के तहत गठित की जाती है ताकि महिलाओं को सुरक्षित माहौल प्रदान किया जा सके। लेकिन यहाँ एक महिला को प्रताड़ित करने के लिए इसका दुरूपयोग किया गया। यह संभवतः देश में पहला मामला होगा जब एक महिला की शिकायत पर दूसरी महिला पर इस तरीके की प्रक्रिया अपनायी गयी हो। वहीं, जब विभाग के पुरूष निदेशक के कई बार, कई महिलाओं के द्वारा शिकायत की गयी, तब पूरी सक्रियता जैसे समाप्त ही हो जाती थी और आरोप सिद्ध होने के बावजूद निदेशक पर पोश एक्ट के तहत आजतक कोई कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन यह महिला सहायक प्राध्यापक अपने पति के साथ है और खास पार्टी से जुड़ाव रखती है इसलिए जिम्मेदार अधिकारियों ने नियम को सही से खंगालना भी उचित नहीं समझा और नियमों का उल्लंघन शुरू कर दिया। ये घटना पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं के भीतर की पुरूषवादी सोच को स्पष्ट करती है।
लिंग भेदभाव अथवा महिला उत्पीड़न आज भी सर्विदित है बस इसके रूप अलग-अलग हैं। घर-गृहस्थी संभालने की जिम्मेदारी हो या पुरूषों के भोगवादी नजरिये का लांछन का जिम्मा, सब महिलाओं के ऊपर ही थोप दिया जाता है। ‘बेटी बचाओ बेटी बढ़ाओ’ की बात तो की जाती है और इस आधी आबादी को आरक्षण भी दिया जाता है लेकिन सदियों की बेड़ियों से आज़ाद नहीं किया जाता है। इन बेड़ियों की वजह से अक्सर वह अपने करियर में पीछे छूटती चली जाती हैं। हरियाणा के एक विश्वविद्यालय से मेरी एक दोस्त ने तो अजीब सा मामला बताया। उसने बताया कि उसके विश्वविद्यालय में कार्यरत कुछ महिला कर्मचारियों की बायोमेट्रिक उपस्थिति नहीं लग पाती है जिसके कारण उनका वेतन कट जाता है। जब मैंने इसकी वजह पूछी तो उसने बताया कि इन महिलाओं के हाथ काम करते-करते अक्सर या तो कट, जल जाते हैं या फिर बर्तन धोने के कारण घिसते चले जाते हैं जिसकी वजह से उंगली को मशीन पहचान ही नहीं पाती है। ऐसी न जाने कितनी ही व्यथायें एक महिला के जीवन को आजीवन घेरे रहती है।
पूरे देश में महिला सुरक्षा और उन पर बढ़ती हिंसा आज भी सबसे ज्वलंत मुद्दा है। चुनाव में महिलायें वोट बैंक बन जाती हैं, इनके नाम पर तमाम घोषणाएं की जाती है लेकिन हर बार सबकुछ खोखला ही साबित होता है। देहरादून तो महिला हिंसा में सबसे ऊपर हो गया है। उत्तराखण्ड में हुई अंकिता भंडारी की हत्या यहाँ महिला सुरक्षा के मुद्दे पर लगातार सवाल उठा रहा है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि हिंसा अथवा अत्याचार से पीड़ित जीवित महिलाओं के साथ वह कुनबा क्यों खड़ा नहीं हो पाता जो इनके मरने के बाद न्याय के लिए खड़ा दिखता है। सड़कों पर रैलियां निकालने वाले लोग व्यवस्था की बलि चढ़ रही महिलाओं का साथ देने के लिए क्यों आगे नहीं आते हैं? क्या इसे यह समझूँ कि समाज का साथ पाने के लिए हिंसाग्रस्त महिला का मरना जरूरी है? क्या समाज में बने नियम-कानून सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं? या फिर नियम दुरूपयोग के लिए बने हैं? हर बार की तरह इस बार भी महिला दिवस के अवसर पर यह सवाल मेरे जहन में लगातार उठ रहे हैं। मेरे पास इसके पर्याप्त सबूत हैं कि महिला आयोग हो, मानवाधिकार आयोग हो या वन स्टॉप सेंटर जैसे मंचों का गठन, अधिकांश जगहों पर बहुत मशक्कत के बाद पीड़िता के केस की सिर्फ सुनवाई की जाती है, वह भी लंबी-लंबी तारीखों के अंतराल पर। पीड़िता अपनी शिकायत पर कार्रवाई के लिए गुहार लगा-लगाकर शिकायतकर्ता और पीड़ित होती चली जाती है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सिर्फ एक जश्न तक सिमटता नजर आता है। जबकि यह महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति का मूल्यांकन करने और उनके अधिकारों के लिए ठोस कदम उठाने का अवसर रहा है। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का उद्देश्य सभी महिलाओं के लिए “अधिकार, न्याय, कार्रवाई” है जो ‘पाने के लिए देना (गिव टू गेन) के मद्देनजर मनाया जा रहा है। लेकिन क्या यह उद्देश्य समाज में साकार हो पायेगा? क्या समाज की वंचित, शोषित महिलाएं अधिकार, न्याय पा सकेंगी? उनके ऊपर हो रहे अन्याय-अत्याचार पर कार्रवाई हो पायेगी? पितृसत्तात्मक सोच और महिलाओं के प्रति भोगवादी नजरिया, कार्यस्थल पर असमान अवसर, असमान वेतन, घरेलू और सामाजिक हिंसा, नीति निर्माण और निर्णय लेने वाले स्थानों पर न्यूनतम प्रतिनिधित्व महिलाओं के जीवन और उन्नति में आज भी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
यह बाधा सिर्फ महिलाओं के जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि यह घर, समाज और राष्ट्र को भी प्रभावित करती है। महिला दिवस जिन उद्देश्यों के साथ मनाना प्रारंभ हुआ, वह उद्देश्य कुछ हद तक ही सफल होता प्रतीत होता है जिसे वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम के जेंडर गैप रिपोर्ट के आधार पर भी समझा जा सकता है, जिसमें भारत 131 पायदान पर पहुंच गया है। राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो के आकड़े भी महिला हिंसा में बढ़ोतरी ही दिखाती है। सामाजिक नजरिये से देखें तो महिलाओं की स्थितियों में हो रहे बदलाव से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि स्थितियां जितनी सुधरी है उससे कहीं ज्यादा आज भी बिगड़ी हुई है। इसमें सर्वंगीण सुधार तभी संभव है जब सरकार जमीनी स्तर पर काम करे और नागरिक समाज के लोग भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। साथ ही सामाजिक सोच में परिवर्तन और पितृसत्तात्मक सोच का खात्मा सबसे ज्यादा जरूरी है जो महिलाओं और पुरूषों दोनों में निहित है।










