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सामयिक

टाइगर को बचाना मतलब धरती पर जीवन को बचाना है

 

आज 29 जुलाई है। इस दिन को पूरी दुनिया में वैश्विक टाइगर दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसे 2010 में रूस में आयोजित सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट के दौरान घोषित किया गया। यहाँ सवाल उठाना लाजिमी है कि जब दुनिया पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, सूखा, बाढ़, भूख, गरीबी और पलायन समेत कोरोना जैसी तमाम बीमारियों से लगातार जूझ रही है तो ऐसे समय में टाइगर जैसे जानवर को बचाने को लेकर भारत समेत दुनिया के बड़े – बड़े देश आखिर इतना चिंतित क्यों हैं? दरअसल हम यह भूल जाते हैं कि दुनिया या इस धरती का मतलब केवल मानव जीवन नहीं है बल्कि इसका मतलब धरती के सम्पूर्ण जीवन से है, जिसमें पेड़ – पौधों, छोटे – छोटे जीवों से लेकर विशालकाय जीव और मानव तक समाहित हैं। इनसे जीवन की एक पूरी कड़ी बनती है, जो इस धरती पर जीवन का आधार है।

धरती से टाइगर का विलुप्त होना पर्यावरण और जलवायु के लिए उतना ही बड़ा खतरा है, जितना गिद्धों का खत्म हो जाना। गिद्ध जहाँ पर्यावरणीय संतुलन बनाने का काम करते हैं और धरती को साफ – सुथरा बनाये रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं, वहीं टाइगर स्वस्थ वन्य परिस्थितिकी का प्रतीक है। जहाँ टाइगर है इसका मतलब है कि वहाँ पेड़-पौधे हैं, पानी है और घना जंगल है, जिसमें उसके आहार के स्वस्थ जानवर मौजूद हैं। उसके आहार के जानवरों को जिन्दा रहने के लिए और भी जानवरों और वनस्पतियों को होना ज़रूरी है। कहने का आशय है कि धरती पर टाइगर के हैबिटेट के होने का मतलब है धरती पर संतुलित जीवन और पर्यावरण का मौजूद होना। यही कारण है कि दुनिया की तमाम समस्याओं के बीच बाघ संरक्षण बेहद ज़रूरी और बहुत ही संवेदनशील विषय है।

दुनिया भर में करीब 1 शताब्दी पहले टाइगर की संख्या 1 लाख से भी अधिक थी, जो घटकर 4000 से भी कम रह गयी है। दुनिया के जिन देशों में टाइगर पाये जाते हैं, उनमें से ज़्यादातर एशिया के हैं। टाइगर के लगातार विलुप्त होने के पीछे जो कारण हैं उनमें सबसे दो महत्वपूर्ण कारणों में से पहला है – टाइगर के हैबिटेट को मानवीय गतिविधियों द्वारा नष्ट करना और दूसरा है – टाइगर का अवैध शिकार करना। टाइगर की खाल, हड्डियों, दाँत समेत शरीर के तमाम हिस्सों का दुनिया भर में अवैध व्यापार होता रहा है। यही कारण है कि दुनिया भर में टाइगर खतरे में आ गया और दुनिया में उनके हैबिटेट का क्षेत्र भी लगातार सिकुड़ता चला गया। पहले की तुलना में दुनिया भर में टाइगर के हैबिटेट में करीब 95% की कमी आई है, यह केवल टाइगर के लिहाज़ से नहीं बल्कि धरती पर जीवन की निरंतरता के हिसाब से भी बड़े खतरे का संकेत है।

भारत टाइगर का घर माना जाता है। पिछले साल जुलाई में, प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा जारी टाइगर जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, भारत में टाइगर की संख्या करीब एक तिहाई बढ़कर लगभग 3000 तक पहुँच गयी है। इस हिसाब से अकेले भारत में करीब तीन चौथाई टाइगर रहते हैं। भारत में मुख्य रूप से शिवालिक हिल्स और गंगा के मैदान, मध्य भारतीय लैंडस्केप और पूर्वी घाट, पश्चिमी घाट, नॉर्थ-ईस्ट हिल्स और ब्रह्मपुत्र  मैदान और सुंदरवन क्षेत्रों में टाइगर पाये जाते हैं। दुनिया के दूसरे हिस्सों की तरह भारत में भी 20वीं शताब्दी में टाइगर की संख्या में कमी आनी शुरू हो गयी।

इसके बाद भारत में सामान्य वन्यजीव संरक्षण से अलग हटकर टाइगर के संरक्षण के लिए विशेष अभियानों की प्रभावी शुरूआत की गयी और 1 अप्रैल, 1973 को भारत में टाइगर परियोजना की शुरुआत की गयी और पहला देश का पहला नेशनल पार्क जिम कार्बेट स्थापित किया गया। इसके तहत भारत में 50 टाइगर रिजर्व हैं। इसके साथ ही साल 2006 वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के प्रावधानों में संसोधन करके बाघ संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना की गयी।Global Tiger Forum: Latest News, Videos and Photos on Global Tiger ...

यही नहीं भारत के नेतृत्व में टाइगर बहुल 13 देशों ने 1993 में टाइगर की प्रजातियों को बचाने के लिए ग्लोबल टाइगर फोरम की स्थापना की, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। इसके साथ ही भारत ने रूस, नेपाल, चीन और बांग्लादेश के साथ टाइगर के हैबिटेट को बचाने एवं उनके अवैध शिकार तथा व्यापार को रोकने के लिए अलग – अलग करार किए हैं। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर 175 देशों ने वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किया हैं, जिसके तहत टाइगर या इससे बने समान का व्यापार नियंत्रित या प्रतिबन्धित है।

टाइगर को बचाने के वैश्विक और भारतीय प्रयासों के नतीजे सामने आने शुरू हो गए हैं। भारत समेत दुनिया के दूसरे देशों को मिलाकर 2015 में जहाँ करीब 3000 टाइगर थे, वहीं अब यह संख्या करीब 4000 पहुँच गयी है। भारत में टाइगर की संख्या चरणबद्ध तरीके से बढ़ी है, भारत में साल 2006 में इनकी संख्या जहाँ 1411 थी, वहीं साल 2010 बढ़कर 1706, 2014 में बढ़कर 2226 और 2018 के बाद इनकी संख्या 3000 के करीब पहुँच गयी है। निश्चित रूप से टाइगरों की संख्या के बढ़ते ये आँकड़े देश और दुनिया के लिए एक राहत की खबर है लेकिन यह स्थिति धरती के हैबिटेट, पर्यावरण और जलवायु के लिए सही नहीं है।

यह तो उसी तरह की बात है कि पहले हम किसी चीज को नष्ट करते हैं और फिर उसे बचाने का उपाय करते है। दुनिया में सस्टनेबल विकास की अवधारण केवल किताबों में दिखाई दे रही है। जंगलों और वन्यजीवों का अन्धाधुंध दोहन जारी है, जिसका सीधे तौर पर जिम्मेदार हमारी बेलगाम उपभोक्तावादी संस्कृति है, जो ज़रूरत आधारित न होकर माँग पैदा करने पर केन्द्रित हो गयी। अधिकाधिक मुनाफा, माँग और उत्पादन ने धरती पर जल, जमीन और जंगल के साथ जीवन को लहूलुहान कर दिया है, जो लगातार जारी है। अगर हम अभी भी नहीं सुधरे तो गिद्ध, टाइगर तमाम तरह के जीवों से होते यह कड़ी इन्सानों तक पहुँचने में देर नहीं लगेगी। टाइगर फूड चेन के सबसे ऊपरी कड़ी में आते हैं। इनके खतरे में आने का मतलब है कि फूड चेन का बैलेंस बिगड़ जाना। इसका प्रभाव धरती के दूसरे जीवों से होते हुए पर्यावरण और जलवायु पर पड़ रहा है जो अन्तत: मानव समुदाय के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होने जा रहा है।

यह खतरा कितना बड़ा है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले शताब्दी में धरती के औसत तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस के लगभग वृद्धि हुई है। पिछले कुछ दशकों में समुद्र के जल स्तर में सालाना  3 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई है और सालाना  4 प्रतिशत की रफ़्तार से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इसी का परिणाम है कि गर्मी के मौसम में बढ़ोत्तरी, ठंडी के मौसम में कमी, वायु.चक्रण के रुप में बदलाव, जेट स्ट्रीम, बिन मौसम बरसात, बर्फ की चोटियों का पिघलना, ओजोन परत में क्षरण, भयंकर तूफान, चक्रवात, बाढ़ए सूखा आदि तेजी से ज़ोर पकड़ रहे हैं। यही नहीं इसका प्रभाव खेती पर भी पड़ने लगा और जमीन की उत्पादकता में कमी आ रही है। यही कारण है कि अनेक वन्य और जलजीवों की कई प्रजातियाँ विलुप्त हो गयी हैं तो टाइगर समेत सैकडों प्रजातियाँ विलुप्त के कगार पर खड़ी हैं। इस तरह से जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता के अस्तित्व की लड़ाई बनने जा रहा है।

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