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गोपाल सेन
सामयिक

पश्चिम बंगाल में शिक्षक बेहाल

 

1970 साल! बंगाल में नक्सली अत्याचार की तरुणाई का काल। भारत के शिक्षा जगत में सुपरिचित जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति गोपाल सेन की गला काट कर हत्या कर दी गई। ये उसी बंगाल की धरती पर हुआ जिसे भारतीय पुनर्जागरण की धरती भी कहा जाता है। सत्ता बदली परन्तु शिक्षकों के मन में व्याप्त भय नहीं गया। शिशु शिक्षा केन्द्र से लेकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तक प्रत्येक स्तर के शिक्षकों पर हो रहे विभिन्न अत्याचारों और अपमानजनक कृत्यों की खबर मिडिया की सुर्खियों में रहती है। कुछ दिन पहले दक्षिण दिनाजपुर की एक शिक्षिका चैताली चाकी को एक मजहब विशेष के छात्री के परिजन और उनके पड़ोसियों ने विद्यालय के ‘स्टाफ रूम’ में घुस कर मारा पिटा, उनके कपड़े फाड़ दिए परन्तु अपराधियों की कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। शिशु शिक्षा केन्द्र और माध्यमिक शिक्षा केन्द्र के पांच शिक्षक-शिक्षिकाओं ने पिछले साल सरकार की स्थानांतरण नीति से तंग आकर जहर पी लिया था।

गत वर्ष परिक्षा परिणाम से असंतुष्ट छात्रों एवं उनके परिजनों ने एकाधिक प्रधानाचार्यों को सार्वजनिक रूप से धमकाया और अपमानित किया। अनैतिक रूप से उनके प्राप्तांक बढ़ाने की मांग को अस्वीकार करने पर शिक्षकों को हत्या तक की धमकी मिली। भयंकर परिणाम भुगतने वाली धमकियों की घटनाओं को व्यक्तिगत स्तर पर तथा अपने संगठन के माध्यम से भी शिक्षकों ने पश्चिम बंगाल माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को पत्र लिखकर अवगत करवाया था। कोननगर स्थित नवग्राम हिरालाल पाॅल महाविद्यालय के प्रोफेसर सुब्रत चट्टोपाध्याय को यहां के छात्र यूनियन के एक नेता ने इस लिए थप्पड़ मार दिया कि उन्होंने यूनियन और सिनियर छात्राओं के झगड़े में मध्यस्थता की थी! तृणमूल छात्र परिषद के सदस्यों का कैंपस में नामांकन में दलाली से लेकर हर गतिविधि में बल प्रयोग के द्वारा अपना दबदबा बनाए रखना चाहे वो छात्रों पर हो या शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारियों पर ये एक स्वाभाविक एवं सर्वज्ञात विषय है। महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से सत्तारूढ़ दल के रैलियों में भीड़ इकट्ठा करने के लिए पढ़ाई बधित कर जबरदस्ती सभा या रैलीस्थल पर ले जाना एक आम बात है।

प्राथमिक, मध्य एवं उच्च विद्यालयों की गतिविधियों और शिक्षक तथा शिक्षकेत्तर कर्मचारियों पर विद्यालय की समिति  का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रहता है। समिति के अधिकांश सदस्य सत्तारूढ़ दल से होते हैं एवं उन्हीं के इशारे पर विद्यालय संचालित होता है। ‘टीचर इन चार्ज’ हो या प्राधानाध्यापक सब स्थानीय नेताओं की  ‘जी हुजूरी’ के लिए बाध्य हैं। विगत कुछ दिनों से पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी नज़दीकी मित्र अर्पित शिक्षक भर्ती घोटाले और धन शोधन के अपराध में गिरफ्तारी के बाद मिडिया की सुर्खियों में हैं। यही पार्थ चटर्जी वर्ष 2020 में पूर्वी वर्धमान जिले की दो शिक्षिकाओं को इसलिए तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिए थे कि वे ‘यू’ से ‘अग्ली’ पढ़ाई थीं और पुस्तक में एक श्यामले लड़के का चित्र था। वो पुस्तक सरकार द्वारा अनुमोदित नहीं थी। वही पार्थ चटर्जी लाखों रूपए लेकर अयोग्य और ‘अपने लोगों’ के सिफारिश वाले लड़कों  की बहाली करवाने के मामले में न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि इस प्रकार से शिक्षक बनने वाले लोगों के लिए ये ‘शिक्षा सेवा’ होगी या कमाने वाला एक धंधा? क्या ऐसे तथाकथित शिक्षकों से ईमानदार नागरिकों के निर्माण की अपेक्षा समाज कर सकता है?

शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ मध्यान्ह भोजन योजनान्तर्गत वित्तीय अनियमितताओं में शिक्षकों की संलिप्तता का होना या दिखाया जाना पूरे देश के लिए एक चिंतनीय विषय है। ‘कट मनी’ कहते ही पश्चिम बंगाल के राजनेताओं का चेहरा हमारे सामने आ जाता है। यहां पर मध्यान्ह भोजन में दिए जाने वाले अंडे बच्चों की थाली से गायब कर दिए जाते हैं। समिति शिक्षकों पर आसानी से इल्जाम लगा देती है परन्तु शिक्षकों को अपनी बात रखने का कोई मंच ही नहीं मिलता और न ही वे सत्य को सिद्ध करने की स्थिति में होते हैं। समिति के सदस्यों के सर पर तो नेताओं का वरदहस्त होता है परन्तु शिक्षक असहाय महसूस करते है। आज पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था सोचनीय हो गई है। सरकारी तंत्र तथा राजनैतिक प्रभाव वाली समितियों की चंगुल में फंसी विद्यालयी व्यवस्थाएं कराह रही हैं। पीड़ित को उफ्फ तक करने की अनुमति नहीं है। क्यों? जो शिक्षक हैं उनमें से क‌ई तो कृपा पात्र के रूप में नौकरी पाए होंगे। फिर उनके पास कौन सी नैतिक शक्ति होगी जो अव्यवस्था के विरुद्ध शिक्षा की उन्नति एवं अपने छात्रों के भविष्य तथा शिक्षकों के स्वाभिमान के लिए सत्ता के समक्ष अपने सही मांगों के लिए खड़े होने का सामर्थ्य देगी?

मेधा युक्त नए शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया 2016 से ही बाधित है। इन शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण प्रक्रिया कब पूरी होगी इस प्रश्न का जवाब वर्त्तमान परिस्थिति में देना मुश्किल लग रहा है ? सिफारिशों के माध्यम से जो शिक्षक नियुक्त हुए है उनकी योग्यता और निष्ठा भी संदेह से परे नहीं है। पश्चिम बंगाल के राजनैतिक गलियारे में लोग आपके घर का रंग, आपकी पसंदीदा फूटबाल टीम, क्लब में आने जाने या न जाने की प्रवृत्ति, आपकी मित्र मंडली , यहाँ तक की आपके द्वारा पढ़े जाने वाले अख़बार से भी आपकी राजनीतिक निष्ठा या आपका समर्थन किस पार्टी को है ये तय कर तदनुरूप आपके साथ व्यवहार होता है। जीवन के प्रत्येक अंग में राजनीति का प्रवेश वामपंथियों की उपलब्धि है। विवाह तक राजनैतिक कारणों से टूट जाते हैं। समाज में जब इतनी गहराई तक राजनीति ने अपनी पेअर जमा लिए हो तन शिक्षकों के द्वारा तनाव मुक्त हो कर बिना किसी दबाव के अपना कार्य करना बहुत मुश्किल होता है।

पश्चिम बंगाल में आप सरकारी सेवा में रहते हुए भी सक्रिय राजनीति में सहभाग कर सकते हैं। इसलिए बहुत से शिक्षकों राजनितिक कार्यकर्ताओं की तरह राजनीतिक गतिविधिओं में सम्मिलित भी होते है। शिक्षकों के समाज में प्रभाव होता है। उनके विद्द्यार्थी और उसका परिवार भी इनके प्रभाव में रहता है। इसी प्रभाव को अपने राजनीतिक हितों के लिए प्रयोग करने की चाहत सभी राजनीतिक दलों में होती है। शिक्षक प्रकोष्ठ शिक्षकों की बात को सरकार तक पहुंचाने से ज्यादा सत्तारूढ़ दल की नीतियों को सभी शिक्षकों पर थोपने, मानने के लिए बाध्य करने अथवा स्थानांतरण और अन्य समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहने जैसी स्थिति उत्पन्न करने का कार्य ज्यादा कुशलता से करता है। इसलिए सिफारिशी शिक्षक बहाली में राजनीतिक दलों की रुचि ज्यादा रहती है। भर्ती के समय धन , राजनीतिक निष्ठा के लिए पारितोषिक दे कर  उसके पूरे परिवार की वोट को अपना करना और नौकरी के दौरान उस शिक्षक को ‘अपने आदमी’ की तरह व्यवहार करना इतने सारे फायदे आखिर कौन छोड़ना चाहेगा?

इसमें वास्तविक रूप से शिक्षा को अपने जीवन का ध्येय मानाने वाले योग्य शिक्षकों को मानसिक यंत्रणा का शिकार होना पड़ता है जिसका सीधा प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ता है। एक शिक्षक के लिए धन से भी ज्यादा महत्त्व उसके सम्मान और स्वाभिमान का है।  परन्तु शिक्षा के राजनीतिकरण के कारण शिक्षकों का स्वाभिमान,सम्मान और प्राण तीनों खतरे में दिखाई दे रहे है। जब तक इस घुन लगी व्यवस्था का कायाकल्प नहीं होगा तब तक स्वाधीनभाव से भय-मुक्त हो शिक्षक पढ़ा नहीं पाएंगे। शिक्षकों को भी राजनितिक कार्यकर्ता की भूमिका से मुक्त हो कर शिक्षा सेवा पर ध्यान केंद्रित करना होगा तभी वे इस बदहाली के दौर से बाहर निकल पाएंगे

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