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एपीजे अब्दुल कलाम
शख्सियत

एपीजे अब्दुल कलाम : जनता के राष्ट्रपति

 

आजाद भारत के असली सितारे -53

 

भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डॉ. अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम (15.10.1931-27.07.2015) जब आईआईएम शिलाँग में व्याख्यान देने के बहाने अपने जीवन की अंतिम यात्रा पर निकल रहे थे तो सृजनपाल सिंह विशेष ड्यूटी पर अधिकारी के रूप में उनके साथ थे। गुवाहाटी तक फ्लाइट से यात्रा हुई थी और उसके बाद आईआईएम शिलाँग तक ढाई घंटे कार से। सृजनपाल सिंह ने लिखा है, “हम 6-7 कारों के काफिले में थे। डॉ. कलाम और मैं दूसरी कार में थे। हमारे सामने एक खुली जिप्सी थी जिसमें तीन सैनिक थे। उनमें से दो लोग दोनो तरफ बैठे थे और एक दुबला पतला आदमी अपनी बंदूक पकड़े हुए ऊपर खड़ा था। सड़क यात्रा में एक घंटे के बाद डॉ. कलाम ने कहा, “वह क्यों खड़ा है? वह थक जाएगा। यह सजा की तरह है। क्या आप दिए गए एक वायरलेस संदेश के जरिए पूछ सकते हैं कि वह बैठ क्यों नहीं सकता है?” मुझे उन्हें समझाना पड़ा, “उसे शायद बेहतर सुरक्षा के लिए खड़े रहने के निर्देश दिए गए हैं।” उन्हें भरोसा नहीं हुआ। हमने रेडियो मेसेजिंग की कोशिश की, वह काम नहीं आया। यात्रा के अगले डेढ़ घंटे में उन्होंने मुझे तीन बार याद दिलाया कि क्या मैं उसे बैठने के लिए संकेत दे सकता हूँ? अंत में यह महसूस करते हुए कि थोड़ी सी दूरी और बची है हम शान्त रहे। उन्होंने मुझसे कहा, “मैं उससे मिलना चाहता हूँ और उसे धन्यवाद देना चाहता हूँ।” बाद में जब हम आईआईएम शिलाँग में उतरे तो मैंने सुरक्षा के लोगों से पूछताछ की और खड़े रहने वाले आदमी को पकड़ लिया। मैं उसे अंदर ले गया और डॉ. कलाम ने उसका अभिवादन किया। उन्होंने उससे हाथ मिलाया, ‘शुक्रिया दोस्त’ कहा, “क्या आप थक गए हैं? क्या आपको खाने में कुछ चाहिए? मुझे खेद है कि आपको मेरी वजह से इतने लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ा।” काले कपड़े में लिपटा दुबला- पतला गार्ड इस रवैये से हैरान था। उसने शब्द खो दिए थे। बस कहा, “सर, आपके लिए तो 6 घंटे भी खड़ा रहेंगे।”

मैंने जब 2017 में अपनी पत्नी के साथ मंदिरों के शहर रामेश्वरम् की यात्रा की थी तो मस्जिद वाली गली में स्थित ‘कलाम हाउस’ को देखने गया। यह उनका पुस्तैनी घर था जो अब एक म्यूजियम का रूप ले चुका था। इस म्यूजियम में डॉ. कलाम के जीवन की संघर्ष-यात्रा चित्रों के माध्यम से उकेरी गई हैं।

डॉ. कलाम ने गुलाम भारत के एक गरीब मुस्लिम परिवार में जन्म लिया था। बचपन आर्थिक अभावों में कटा। खर्च चलाने के लिए उन्हें अखबार भी बेचने पड़े थे। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की समूची शिक्षा उन्होंने देश की बेहतरीन सरकारी शिक्षण संस्थाओं से प्राप्त की थी। अर्थाभाव उनकी शिक्षा के मार्ग में बाधक नहीं बना। इस महापुरुष की संघर्ष-यात्रा को देखकर ‘कलाम हाउस’ की चौखठ पर मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया था। यह सोचकर दुख जरूर हुआ था कि आजादी के सत्तर साल बाद अपने देश में शिक्षा इतनी मँहगी हो गई है कि कलाम जैसे गरीब के घर का बालक आज कलाम के किसी ऑफिस का क्लर्क भी नहीं बन सकता।

डॉ. कलाम का जन्म रामेश्वरम् के एक सामान्य तमिल परिवार में हुआ था। वे अपने दस भाई-बहनों में से एक थे। उनके पिता का नाम था जैनुलाब्दीन और माँ का आशिअम्मा। पिता एक स्थानीय ठेकेदार के साथ मिलकर लकड़ी की नौकाएं बनाने का काम करते थे जो हिन्दू तीर्थयीत्रियों को रामेश्वरम् से धनुष्कोटि ले जाती थी। ईमानदारी और अनुशासन उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम् में, स्नातक की शिक्षा त्रिचिरापल्ली में और उच्च शिक्षा मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (एम.आई.टी) से हुई। एम.आई.टी. में उड़ान संबंधी मशीनों की विभिन्न कार्यप्रणालियों को समझाने के लिए नमूने के तौर पर रखे गए दो विमानों ने विद्यार्थी कलाम को काफी आकर्षित किया था और उन्होंने पहला साल पूरा करने के बाद एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को अपने विशेष विषय के रूप में चुना। स्नातक के बाद वे एम.आई.टी. से एक प्रशिक्षु के रूप में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.) बंगलौर चले गए।

डॉ. कलाम ने 1958 में रक्षा मंत्रालय में तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय के तकनीकी केंद्र (उड्डयन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर कार्यभार ग्रहण किया। इसके बाद लगातार अपनी प्रतिभा के बल पर वे ऊँचाई चढ़ते गए। वर्ष 1962 में वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से जुड़े। उन्हें प्रोज़ेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह (एसएलवी-3) प्रक्षेपास्त्र बनाने में सफल होने का श्रेय प्राप्त है। उन्होंने ‘अग्नि’ एवं ‘पृथ्वी’ जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों को स्वदेशी तकनीक से सफलतापूर्वक विकसित किया। इन मिसाइलों ने राष्ट्र की सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। लोग उन्हें ‘मिसाइल मैन’ कहकर पुकारते हैं। जुलाई 1980 में उन्होंने ‘रोहिणी’ उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित किया था। एपीजे अब्दुल कलाम ने 1998 में पोखरण में दूसरी बार सफल परमाणु परीक्षण में भी केन्द्रीय भूमिका निभाई।

डॉ. कलाम ने लगभग 20 साल तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में अनुसंधान किया और करीब इतने ही साल तक रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में भी कार्य किया। वे 10 साल तक डीआरडीओ के अध्यक्ष रहे, साथ ही उन्होंने रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार की भूमिका भी निभाई।

18 जुलाई, 2002 को संपन्न हुए चुनाव में डॉ. कलाम नब्बे प्रतिशत मतों के भारी बहुमत से भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति चुने गए थे। 25 जुलाई, 2002 को उन्होंने संसद भवन के अशोक कक्ष में राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। 25 जुलाई 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हो गया था। अपना कार्यकाल पूरा करके कलाम जब राष्ट्रपति भवन से जा रहे थे तो उनसे विदाई संदेश देने के लिये कहा गया। उनका कहना था, “विदाई कैसी, मैं अब भी एक अरब देशवासियों के साथ हूँ।” वे एक गैरराजनीतिक व्यक्ति थे। विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण वे इतने लोकप्रिय हुए कि देश ने उन्हें सिर माथे पर उठा लिया। एक वैज्ञानिक का राष्ट्रपति पद पर पहुँचना पूरे विज्ञान जगत के लिए सम्मान एवं प्रतिष्ठा की बात थी।

डॉ. कलाम वास्तव में एक शिक्षक थे। अपने अंतिम दिनों तक वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलाँग, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद तथा भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर में विजिटिंग प्रोफेसर बने हुए थे। वे भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान तिरुवंतपुरम् के कुलाधिपति तथा अन्ना विश्वविद्यालय चेन्नई में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर भी थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद में भी पढ़ाया था। सृजनपाल सिंह ने लिखा है कि अक्सर डॉ. कलाम उनसे पूछते थे, “आप युवा हैं, यह तय करें कि आप किसलिए याद किया जाना पसंद करेंगे?” सृजनपाल सिंह प्रभावशाली जवाबों के बारे में सोचते रहे और एकदिन उन्होंने टिट -फॉर -टॉट का सहारा लिया। उन्होंने डॉ. कलाम से पूछा, “पहले आप मुझे बताइए, आप किसके लिये याद किया जाना पसंद करेंगे? राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक, मिसाइल मैन, भारत-2020, लक्ष्य- 3 विलियन। क्या?“ उन्हें लगा कि उन्होंने विकल्प देकर प्रश्न को आसान बना दिया है। लेकिन डॉ. कलाम ने अपने जवाब से उन्हें चौंका दिया था। उन्होंने तपाक से कहा था, ‘शिक्षक’। उन्होंने अन्यत्र कहा है, “शिक्षण एक बहुत ही महान पेशा है जो किसी व्यक्ति के चरित्र, क्षमता और भविष्य को आकार देता है। अगर लोग मुझे एक अच्छे शिक्षक के रूप में याद रखते हैं, तो मेरे लिए ये सबसे बड़ा सम्मान होगा।”

 बच्चों और युवाओं से बातचीत करने का उन्हें बहुत शौक था। वे उन्हें सुनना और सुझाव देना पसंद करते थे। विद्यार्थियों से वे हमेशा बड़े सपने देखने के लिये कहते थे। उन्होंने सिखाया कि जीवन में चाहे जैसी भी परिस्थिति क्यों न हो मगर जब आप अपने सपने को पूरा करने की ठान लेते हैं तो उन्हें पूरा करके ही रहते हैं। वे कहा करते थे कि, “सपने वे नहीं हैं जो आप नींद में देखें, सपने वे हैं जो आपको नींद न आने दे।” वे यह भी कहते थे कि, “मनुष्य के लिए कठिनाइयाँ बहुत जरूरी हैं क्योंकि उनके बिना सफलता का आनंद नहीं लिया जा सकता”।

 डॉ. कलाम सभी मुद्दों को मानवता की कसौटी पर परखते थे। वे सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे। उनका मानवतावाद मनुष्यों की समानता के आधारभूत सिद्धांत पर आधारित था। जिस दिन उन्होंने भारत के राष्ट्रपति का पद भार ग्रहण किया, उस दिन राष्ट्रपति भवन में एक प्रार्थना सभा आयोजित की गई थी जिसमें रामेश्वरम् मस्जिद के मौलवी, रामेश्वरम् मंदिर के पुजारी, सेंट जोसेफ कॉलेज के फॉदर रेक्टर तथा अन्य दूसरे धर्मावलंबियों ने भी भाग लिया था। उदारता और परोपकार की भावना उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

भारत के भविष्य को लेकर उनके पास एक ‘विज़न’ था। वे चाहते थे कि भारत के युवा उनके इस विज़न को समझें और स्वीकारें। उन्हें विश्वास था कि युवाओं के योगदान से भारत 2020 तक एक विकसित राष्ट्र बन सकेगा। 2020 के भारत के बारे में उन्होंने अपनी परिकल्पनाएं ‘इंडिया 2020 : विज़न फ़ॉर न्यू मिलेनियम’ में विस्तार से लिखा है। यह पुस्तक उन्होंने 1998 में लिखी थी। इस किताब में डॉ. कलाम कहते हैं, “सैंकड़ों एक्सपर्ट से बात कर के और कई रिपोर्टें पढ़ने के बाद मैं ये समझ पाया हूँ कि हमारा देश साल 2020 तक विकसित देशों की सूची में शामिल हो सकता है।” भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए डॉ. कलाम जो मार्ग सुझाते हैं उसमें सबसे ज्यादा जोर वे बच्चों की शिक्षा और युवा पीढ़ी को सही मार्ग-दर्शन पर देते हैं। डॉ. कलाम के अनुसार, “भारत में हर साल दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इन सभी बच्चों का क्या भविष्य होगा? जीवन में उनका लक्ष्य क्या होगा? क्या हमें उनके भविष्य के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए या फिर हमें उन्हें उनके नसीब के सहारे छोड़, अभिजात्य वर्ग के फायदे के लिए ही काम करना चाहिए?”

कलाम प्रश्न करते हैं कि, “बाज़ार में माँग के अनुसार ‘स्ट्रेटेजी’ और ‘कंपटीशन का दौर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे या फिर आने वाले दो दशकों में उनके लिए कुछ ख़ास योजना तैयार करेंगे?” उन्होंने अपनी योजना में इस बात पर खासतौर से जोर दिया है कि विकास की राह में समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए। विकास का लाभ यदि समाज के थोड़े से लोगों तक ही पहुँचा तो देश अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकेगा। वे बार- बार चेतावनी देते हैं कि विज्ञान और तकनीक नागरिकों के लिए नए मौक़े बनाएंगे ज़रूर, लेकिन इसका फ़ायदा समाज के एक ही वर्ग को कतई नहीं मिलना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो विकास में तो देश पिछड़ेगा ही, समाज में टकराव पैदा होगा और भेदभाव भी बढ़ेगा।

डॉ. कलाम कहते हैं, “हमारे देश की ताक़त इसके संसाधनों में और लोगों में हैं। टेक्नोलॉजिकल विज़न का इस्तेमाल अधिक से अधिक लोगों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए किया जाना चाहिए।” साथ ही डॉ. कलाम ने यह भी कहा है कि देश का ध्यान जीडीपी, विदेशी मुद्रा का विनिमय, आयात-निर्यात, तकनीक और अर्थव्यवस्था की तरफ तो होना ही चाहिए, साथ ही लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषक भोजन भी देश की प्राथमिकता होनी चाहिए।

यदि भारत का सही ढंग से विकास हुआ, सबको उसका लाभ मिला तो 2020 तक, “भारत के लोग ग़रीब नहीं रहेंगे, वे लोग तरक्की के लिए अधिक कुशलता से काम करेंगे और हमारी शिक्षा व्यवस्था भी और बेहतर होगी। ये सपना नहीं बल्कि हम सभी लोगों के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए।”

डॉ. कलाम संगीत के बड़े प्रेमी थे। वे कर्नाटक भक्ति संगीत आमतौर पर सुनते थे। 2011 में ‘आई एम कलाम’ नाम से उनपर एक फिल्म भी बनी, जिसमें एक गरीब बच्चे पर कलाम के सकारात्मक प्रभाव को चित्रित किया गया था।

डॉ. कलाम एक महान लेखक भी हैं। उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हैं। ‘इग्नाइटेड माइंड्स : अनलीशिंग द पावर विदिन इंडिया’, ‘इंडिया- माय-ड्रीम’, ‘इनडॉमिटेबुल स्पिरिट’, ‘इंस्पायरिंग थॉट’ उनकी चिन्तनपरक पुस्तकें हें। ‘साइंटिस्ट टू प्रेसिडेंट’, ‘माय जर्नी’ उनकी आत्मकथात्मक कृतियाँ हैं। ‘विंग्स ऑफ फायर : एन आटोबायोग्राफी’ अरुण तिवारी के साथ लिखी गई उनकी जीवनी तथा ‘गाइडिंग सोल्स’ भी अरुण तिवारी के साथ उनका सहलेखन है जिसमें जीवन के उद्देश्यों के बार में उनसे परिचर्चा है। ‘2020 -ए विजन फॉर द न्यु मिलैनियम’, ‘एनविजनिंग एन एम्पावर्ड नेशन’, ‘डवलपमेंट्स इन फ्लूड मैकेनिक्स एंड स्पेस टेक्नॉलॉजी’, ‘मिसन इंडिया’ भी उनकी सहलिखित कृतियाँ हैं। ‘द लुमिनिअस स्पार्क्स’ कविताओं और रंगों में चित्रित उनकी जीवनी है। ‘चिल्ड्रेन आस्क कलाम’ बच्चों पर केन्द्रित उनकी कृति है। ‘द लाइफ ट्री’ उनकी कविताओं का संकलन है जिसे मानव गुप्ता ने अपने चित्रों से सँवारा है।  

डॉ कलाम की किताबें खूब बिकती हैं। वे अपनी किताबों की रॉयल्टी का अधिकाँश हिस्सा स्वयंसेवी संस्थाओं को मदद में दे देते थे। मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरीज आफ चैरिटी’ उनमें से एक है। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं। इनमें से कुछ पुरस्कारों के साथ नकद राशियाँ भी थीं। वह इन पुरस्कार- राशियों को परोपकार के कार्यों के लिए अलग रखते थे। जब-जब देश में प्राकृतिक आपदाएँ आती थीं, तब-तब डॉ. कलाम की मानवता और करुणा निखरकर सामने आ जाती थी। वे दूसरों के कष्ट के विचार मात्र से दुःखी हो जाते थे। वे आपदा प्रभावित लोगों को राहत पहुँचाने के लिए डी.आर.डी.ओ. के नियंत्रण में मौजूद सभी संसाधनों को एकत्रित करते थे। जब वे रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन में कार्यरत थे तो उन्होंने हर राष्ट्रीय आपदा में विभाग की ओर से बढ़ चढ़कर राहत कोष में मदद की थी।

डॉ. कलाम के 79 वें जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ‘विश्व विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाया गया था। 1997 में डॉ. कलाम को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। 27 जुलाई 2015 की शाम अब्दुल कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलाँग में ‘रहने योग्य ग्रह’ पर एक व्याख्यान दे रहे थे जब उन्हें तेज दिल का दौरा पड़ा और वे बेहोश हो कर गिर पड़े। लगभग 6:30 बजे गंभीर हालत में उन्हें बेथानी अस्पताल ले जाया गया। वे वहाँ आईसीयू में दो घंटे रहे। इसके बाद उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी गई।

डॉ. कलाम ऐसे पहले वैज्ञानिक हैं जो राष्ट्रपति बने और पहले राष्ट्रपति हैं जो अविवाहित थे। एक राष्ट्रपति के अलावा एक आम इन्सान के रूप में वे युवाओं को बहुत पसंद थे। जब भी लोग खुद को कमजोर महसूस करते हैं कलाम का नाम उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है।

सृजनपाल सिंह से बातचीत में उन्होंने कहा था, “ऐसा लगता है कि मानव निर्मित ताकतें प्रदूषण के रूप में पृथ्वी की जीवंतता के लिये बड़ा खतरा हैं। आप लोगों को इसके बारे में कुछ करना होगा। यह आपका भविष्य है।” हमारी पीढ़ी के लिए उनका सुझाव भी था और उनकी चिन्ता भी। सृजनपाल सिंह से जब यह सवाल पूछा गया कि कलाम साहब ने जिन्दगी में सफलता पाने के लिए आपको क्या गुरुमंत्र दिया तो उन्होंने जवाब दिया कि, “उनका मानना था कि असफलता से डरना छोड़ दो। किसी भी व्यक्ति में बुराई मत ढूँढो। कोशिश ये करो कि उसकी बुराई में भी अच्छाई खोज लो। लोगों में बुराई ढूँढना आसान है, लेकिन यदि इसको पीछे छोड़कर आप अच्छाई खोजना शुरू कर देंगे तो जिन्दगी बेहद आसान हो जाएगी।”

और अंत में अपनी माँ के ऊपर रचित उनकी एक कविता। यह कविता उनकी पुस्तक ‘विंग्स ऑफ फायर’ के हिन्दी अनुवाद ‘अग्नि की उड़ान’ में संकलित है,

“मेरी माँ”

समंदर की लहरें,
सुनहरी रेत,
श्रद्धानत तीर्थयात्री,
रामेश्वरम् द्वीप की वह छोटी-पूरी दुनिया।
सबमें तूँ निहित,
सब तुझमें समाहित।

तेरी बाँहों में पला मैं,
मेरी कायनात रही तूँ।
जब छिड़ा विश्वयुद्ध, छोटा सा मैं
जीवन बना था चुनौती, जिंदगी अमानत
मीलों चलते थे हम
पहुँचते किरणों से पहले।

कभी जाते मंदिर लेने स्वामी से ज्ञान,
कभी मौलाना के पास लेने अरबी का सबक,
स्टेशन को जाती रेत भरी सड़क,
बाँटे थे अखबार मैंने
चलते-पलते साये में तेरे।

दिन में स्कूल,
शाम में पढ़ाई,
मेहनत, मशक्कत, दिक्कतें, कठिनाई,
तेरी पाक शख्सीयत ने बना दीं मधुर यादें।
जब तूँ झुकती नमाज में उठाए हाथ
अल्लाह का नूर गिरता तेरी झोली में
जो बरसता मुझपर
और मेरे जैसे कितने नसीबवालों पर
दिया तूँने हमेशा दया का दान।

याद है अभी जैसे कल ही,
दस बरस का मैं
सोया तेरी गोद में,
बाकी बच्चों की ईर्ष्या का बना पात्र-
पूरनमासी की रात
भरती जिसमें तेरा प्यार।

आधी रात में, अधमुँदी आँखों से तकता तुझे,
थामता आँसू पलकों पर
घुटनों के बल
बाँहों में घेरे तुझे खड़ा था मैं।
तूँने जाना था मेरा दर्द,
अपने बच्चे की पीड़ा।

तेरी उँगलियों ने
निथारा था दर्द मेरे बालों से,
और भरी थी मुझमें
अपने विश्वास की शक्ति-
निर्भय हो जीने की, जीतने की।
जिया मैं
मेरी माँ !

और जीता मैं।
कयामत के दिन
मिलेगा तुझसे फिर तेरा कलाम,
माँ तुझे सलाम

.

नरेन्द्र दाभोलकर
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