संत तुकाराम
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प्रसंगवश
प्रभु! तेरे ‘रामलिंगम’ के देस में ‘कितनी शांति कितनी शांति!’
यह कहानी नहीं है। इसे लेख कहना भी कितना युक्तियुक्त होगा मैं नहीं जानता। वैसे यह पूरी तरह से संस्मरण भी नहीं है। इसमें विरोधाभासों से युक्त जीवन की आलोचना भी है और वर्तमान समय–संदर्भ में जीवन को देखने…
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