बिहार

अपराध-मुक्त बिहार का दावा और शासन की सच्चाई

बिहार की राजनीति में अपराध और कानून-व्यवस्था का प्रश्न लम्बे समय से सत्ता के संघर्ष, चुनावी विमर्श और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का प्रमुख आधार रहा है। एक दौर में राष्ट्रीय जनता दल के शासन को भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों ने ‘जंगलराज’ की संज्ञा दी। इस शब्द का इस्तेमाल केवल चुनावों में ही नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों की व्याख्या करने के लिए भी लगातार किया जाता रहा है। अभी बिहार के मुख्यमन्त्री भारतीय जनता पार्टी के नेता सम्राट चौधरी हैं। उनके नाम से प्रसारित एक बयान ने फिर इस बहस को चर्चा के केन्द्र में ला दिया है। उन्होंने कहा कि बिहार में अब अपराध नहीं है, हालाँकि क्राइम हो सकता है। उनके कथन का चर्चित अंश था—‘क्राइम हो सकता है, लेकिन अपराध नहीं।’ अँग्रेजी और हिन्दी के इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है। इसलिए यह कथन अपने आप में विरोधाभासी और हास्यास्पद प्रतीत होता है। यह बयान 3 नवम्बर 2026 को दिल्ली में बिहार सरकार और केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मन्त्रालय के बीच एक समझौते से सम्बन्धित कार्यक्रम में दिया गया था। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने भी इस पर सवाल उठाये। जाहिर है, यह केवल भाषाई चूक का मामला नहीं है। जब किसी राज्य का मुख्यमन्त्री अपराध और कानून-व्यवस्था पर बोलता है, तो उसके शब्दों में प्रशासनिक जिम्मेदारी और नागरिकों की सुरक्षा के प्रति गम्भीरता दिखाई देनी चाहिए। आखिर बिहार में अपराध की वास्तविक स्थिति क्या है? क्या लालू प्रसाद यादव के शासनकाल का ‘जंगलराज’ और वर्तमान सरकार का सुशासन एक ही कसौटी पर परखे जा सकते हैं? और क्या सम्राट चौधरी का अपना राजनीतिक अतीत इस बहस को एक नया सन्दर्भ नहीं देता?

बिहार में 1990 से 2005 तक का राजनीतिक दौर मुख्यतः लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासन के रूप में जाना जाता है। इस अवधि में बिहार की राजनीति में एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन हुआ। पिछड़े वर्गों, दलितों और वंचित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी तथा परम्परागत सत्ता संरचना को चुनौती मिली। लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय को राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में स्थापित किया। इस परिवर्तन का ऐतिहासिक महत्त्व है और इसे केवल सत्ता परिवर्तन की सामान्य घटना मानकर नहीं देखा जा सकता। लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति और सुशासन दो अलग-अलग कसौटियाँ हैं। सामाजिक प्रतिनिधित्व का विस्तार प्रशासनिक दक्षता और कानून के शासन का विकल्प नहीं हो सकता। लालू-राबड़ी शासनकाल में अपराध, अपहरण, फिरौती, रंगदारी, जातीय हिंसा और प्रशासनिक कमजोरी की गम्भीर समस्याएँ मौजूद थीं। व्यापारियों, चिकित्सकों, ठेकेदारों और आम नागरिकों के बीच असुरक्षा की भावना व्यापक थी। फिरौती के लिए अपहरण उस समय बिहार की कानून-व्यवस्था की पहचान बन गया था। राज्य से बाहर रोजगार और शिक्षा के लिए पलायन के अनेक कारण थे, लेकिन असुरक्षा और कमजोर प्रशासन भी इसके महत्त्वपूर्ण कारणों में शामिल थे।

बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2011-12 में प्रकाशित गृह विभाग के आँकड़े इस दौर की स्थिति को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। वर्ष 2001 में हत्या के 3,619 मामले दर्ज हुए। 2002 में यह संख्या 3,634, 2003 में 3,652 और 2004 में 3,861 तक पहुँच गयी। वर्ष 2005 में हत्या के 3,423 मामले दर्ज हुए। इसी तरह डकैती के मामले 2001 में 1,293, 2002 में 1,259, 2003 में 1,203 और 2004 में 1,297 थे। फिरौती के लिए अपहरण के मामले 2001 में 385, 2002 में 396, 2003 में 335 और 2004 में 411 दर्ज किये गये। ये आँकड़े उस समय की गम्भीर कानून-व्यवस्था सम्बन्धी चुनौतियों की पुष्टि करते हैं। इसलिए ‘जंगलराज’ शब्द के पीछे मौजूद अपराध और प्रशासनिक विफलता की वास्तविकता को पूरी तरह राजनीतिक कल्पना बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस शब्द का इस्तेमाल बिहार के सामाजिक न्याय आन्दोलन और पिछड़े समुदायों की राजनीतिक चेतना को अपमानित करने के लिए न किया जाए। किसी शासन का मूल्यांकन उसके सामाजिक योगदान और प्रशासनिक प्रदर्शन, दोनों को अलग-अलग समझकर करना चाहिए।

वर्ष 2005 के बाद बिहार की राजनीति में एक नया दौर शुरू हुआ। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी सरकारों ने कानून-व्यवस्था, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार के अनेक प्रयास किये। पुलिस व्यवस्था को सक्रिय बनाने, त्वरित न्यायालयों के माध्यम से मुकदमों के निस्तारण और आधारभूत संरचना के विस्तार पर जोर दिया गया। इन प्रयासों के परिणाम भी दिखाई दिये। उदाहरण के लिए, फिरौती के लिए अपहरण के मामले 2004 के 411 से घटकर 2007 में 89 और 2011 में 57 रह गये। डकैती के मामले भी 2004 के 1,297 से घटकर 2011 में 556 हो गये। हत्या के मामलों में भी 2004 के उच्च स्तर के बाद गिरावट दर्ज हुई, हालाँकि वे समाप्त नहीं हुए। इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि 2005 के बाद बिहार में अपराध के कुछ पारम्परिक और गम्भीर स्वरूपों पर नियन्त्रण स्थापित करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई। इस परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन इसका श्रेय किसी एक नेता या राजनीतिक दल को देकर अन्य प्रशासनिक और संस्थागत प्रयासों की भूमिका को भुला देना भी उचित नहीं होगा।

लेकिन बिहार की अपराध सम्बन्धी उपलब्धियों और चुनौतियों का मूल्यांकन करते समय सम्राट चौधरी के राजनीतिक अतीत को भी समझना जरूरी है। उनका सम्बन्ध लालू प्रसाद यादव के परिवार से नहीं है, लेकिन उनका राजनीतिक जीवन लालू-राबड़ी शासन से जुड़ा रहा है। सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत समता पार्टी से की थी और 1999 में वे राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली सरकार में मन्त्री बने। बाद में वे राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े और वर्ष 2000 तथा 2010 में परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से राजद के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2018 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। इस प्रकार जिस शासनकाल को भाजपा आज ‘जंगलराज’ कहकर राजनीतिक आलोचना का आधार बनाती है, उसी शासन में सम्राट चौधरी स्वयं मन्त्री रह चुके हैं और राजद के विधायक भी रहे हैं। यह उनके राजनीतिक जीवन का प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उस शासन की सभी विफलताओं के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाए। राजनीतिक दल बदलना लोकतान्त्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति का अधिकार है। लेकिन जब कोई नेता अपने पूर्व राजनीतिक दल और शासन की आलोचना करता है, तो उसके अपने राजनीतिक अतीत पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। राजनीतिक नैतिकता यह अपेक्षा करती है कि इतिहास का मूल्यांकन सुविधानुसार नहीं, बल्कि समान कसौटी पर किया जाए।

अब वर्तमान बिहार की अपराध सम्बन्धी स्थिति पर विचार करना आवश्यक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ‘क्राईम इन इण्डिया 2024’ रिपोर्ट और बिहार पुलिस द्वारा जनवरी 2026 में जारी वर्ष 2025 के आँकड़े इस सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं। इन आँकड़ों के अनुसार बिहार में हत्या के 2,786 मामले दर्ज हुए। अपहरण और व्यपहरण के 7,305 मामले दर्ज किये गये। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि राज्य में गम्भीर अपराधों की समस्या आज भी मौजूद है। दूसरी ओर, बिहार पुलिस के महानिदेशक द्वारा जारी वर्ष 2025 के आँकड़ों में हत्या के 2,556 मामले दर्ज किये गये, जबकि 2024 में इनकी संख्या लगभग 2,786 थी। इसी प्रकार बलात्कार के मामले 2024 के 2,205 से घटकर 2025 में 2,025 हुए। डकैती के मामले 238 से घटकर 174 और दंगा सम्बन्धी मामले 3,186 से घटकर 2,502 रह गये। पुलिस द्वारा प्रस्तुत इन आँकड़ों के अनुसार कई प्रमुख अपराध श्रेणियों में गिरावट दर्ज हुई। इसे प्रशासनिक उपलब्धि के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन इसी अवधि में चोरी, सेंधमारी और साइबर अपराध जैसी कुछ श्रेणियों में वृद्धि की प्रवृत्ति भी सामने आई। इसका अर्थ है कि बिहार में अपराध की प्रकृति बदल रही है और कानून-व्यवस्था की चुनौतियाँ भी नये रूप ले रही हैं।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तथ्य को समझना आवश्यक है। वर्ष 2025 के ये आँकड़े सम्राट चौधरी के मुख्यमन्त्री बनने से पहले के हैं। वे अप्रैल 2026 में मुख्यमन्त्री बने। इसलिए वर्ष 2025 में अपराधों में आई गिरावट को उनकी सरकार की उपलब्धि बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। यह मुख्यतः नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल का प्रदर्शन है। सम्राट चौधरी की सरकार का निष्पक्ष मूल्यांकन उनके कार्यकाल के अपराध सम्बन्धी आँकड़ों और प्रशासनिक प्रदर्शन के आधार पर ही किया जाना चाहिए। किसी सरकार को सत्ता सँभालते ही अपराध-मुक्ति का प्रमाणपत्र देना उतना ही अनुचित है, जितना बिना आँकड़ों के उसे अपराध बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहराना।

अपराध के आँकड़ों की व्याख्या में एक और सावधानी जरूरी है। दर्ज अपराधों की संख्या और वास्तविक अपराध की संख्या हमेशा एक जैसी नहीं होती। यदि पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में सक्रिय हो, पीड़ितों को शिकायत करने का अवसर मिले और महिलाओं तथा कमजोर वर्गों में पुलिस के प्रति विश्वास बढ़े, तो दर्ज मामलों की संख्या बढ़ सकती है। इसके विपरीत, यदि राजनीतिक दबाव, पुलिस की उदासीनता अथवा स्थानीय प्रभाव के कारण शिकायतें दर्ज न हों, तो सरकारी आँकड़ों में अपराध कम दिखाई दे सकते हैं। इसलिए केवल दर्ज मुकदमों की संख्या के आधार पर किसी सरकार को सफल या असफल घोषित नहीं किया जा सकता। यह भी देखना चाहिए कि कितने मामलों में जाँच पूरी हुई, कितने आरोपपत्र दाखिल हुए, कितने मामलों में दोषसिद्धि हुई, मुकदमों के निस्तारण में कितना समय लगा और पीड़ितों को कितना न्याय मिला। अपराध नियन्त्रण की वास्तविक कसौटी केवल गिरफ्तारी नहीं, बल्कि निष्पक्ष जाँच और न्यायपूर्ण परिणाम है।

बिहार की राजनीति में ‘जंगलराज’ और ‘सुशासन’ के दो राजनीतिक आख्यानों की तुलना करते समय यही निष्पक्षता आवश्यक है। यदि लालू-राबड़ी शासनकाल में हत्या, अपहरण और रंगदारी की घटनाएँ प्रशासनिक विफलता का प्रमाण थीं, तो वर्तमान शासन में होने वाली ऐसी घटनाओं को भी उसी गम्भीरता से देखा जाना चाहिए। किसी घटना का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं हो सकता कि सत्ता में कौन-सा दल है। अपराधी की जाति, धर्म, राजनीतिक सम्बन्ध अथवा सामाजिक प्रभाव से स्वतन्त्र होकर कानून का प्रवर्तन होना चाहिए। सत्ता पक्ष के किसी नेता या समर्थक पर आरोप लगे तो जाँच हो और विपक्ष से जुड़े व्यक्ति पर आरोप लगे तो भी वही प्रक्रिया अपनाई जाए। यही कानून के शासन का अर्थ है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपराध केवल पुलिस और प्रशासन का विषय नहीं है। बिहार में भूमि विवाद, जातीय तनाव, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, शिक्षा का अभाव और सामाजिक वर्चस्व जैसी समस्याएँ भी कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों को प्रभावित करती हैं। इन समस्याओं के समाधान के बिना अपराध पर स्थायी नियन्त्रण स्थापित करना कठिन है। इसका अर्थ यह नहीं कि गरीबी या बेरोजगारी अपराध का अनिवार्य कारण है, बल्कि यह कि सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से पैदा होने वाली असुरक्षा तथा संघर्ष की परिस्थितियों को दूर करना भी सरकार की जिम्मेदारी है। बिहार को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें व्यवसायी रंगदारी के भय से मुक्त होकर काम कर सके, किसान भूमि और फसल की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो, महिलाएँ निर्भय होकर सार्वजनिक जीवन में भाग ले सकें और गरीब व्यक्ति बिना किसी राजनीतिक सिफारिश के पुलिस तथा न्यायालय तक अपनी बात पहुँचा सके।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारण्टी देता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा करता है। इन प्रावधानों का वास्तविक अर्थ तभी है, जब नागरिक की सुरक्षा सरकार की कृपा नहीं, बल्कि उसका संवैधानिक अधिकार हो। पुलिस प्रशासन राजनीतिक दबाव से मुक्त हो, अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण न मिले, जाँच निष्पक्ष हो और न्यायालयों में मुकदमों का समयबद्ध निस्तारण हो। सरकार की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि वह नागरिकों को कितना सुरक्षित और न्यायपूर्ण वातावरण दे पा रही है, न कि इस बात से कि उसके नेता मंच से अपराध के अस्तित्व के बारे में क्या घोषणा कर रहे हैं।

बिहार के राजनीतिक इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन हमें दो अतियों से बचने की सीख देता है। पहली अति यह है कि लालू प्रसाद यादव के शासनकाल की कानून-व्यवस्था सम्बन्धी गम्भीर विफलताओं को सामाजिक न्याय की उपलब्धियों के नाम पर नकार दिया जाए। दूसरी अति यह है कि उस पूरे दौर को केवल ‘जंगलराज’ कहकर बिहार में हुए सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के महत्त्व को समाप्त कर दिया जाए। इसी तरह वर्तमान सरकार द्वारा अपराध के कुछ क्षेत्रों में सुधार के दावे को पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं है, लेकिन कुछ अपराधों में गिरावट को अपराध के पूर्ण उन्मूलन का प्रमाण मान लेना भी गलत है।

सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वे बिहार को अपराध-मुक्त घोषित करें, बल्कि यह है कि वे अपने शासन में कानून का ऐसा निष्पक्ष और विश्वसनीय तन्त्र स्थापित करें जिसमें अपराधी कितना भी प्रभावशाली और किसी भी जाति का क्यों न हो, कानून से बच न सके। उन्हें यह भी समझना होगा कि जिस राजनीतिक इतिहास में उनकी अपनी भूमिका रही है, उसकी आलोचना करते समय राजनीतिक सुविधा से अधिक ऐतिहासिक ईमानदारी जरूरी है।

बिहार को न तो अतीत के कथित जंगलराज में लौटना चाहिए और न ही वर्तमान की समस्याओं पर पर्दा डालकर अपराध-मुक्ति का राजनीतिक प्रमाणपत्र जारी करना चाहिए। उसे भय-मुक्त, न्यायपूर्ण और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित समाज बनना चाहिए। किसी भी सरकार के लिए यह दावा करना आसान है कि उसने अपराध समाप्त कर दिया, लेकिन नागरिकों के जीवन में सुरक्षा और न्याय का वास्तविक अनुभव पैदा करना कठिन काम है।

अन्ततः सवाल यह नहीं है कि बिहार में अपराध होता है या नहीं। सवाल यह है कि अपराध होने पर सरकार क्या करती है, पुलिस किसके प्रति जवाबदेह होती है, अपराधी को कितना संरक्षण मिलता है और पीड़ित को कितना न्याय मिलता है। किसी राज्य की महानता अपराध के आँकड़ों को छिपाने या उनके अस्तित्व से इनकार करने में नहीं, बल्कि अपराध के विरुद्ध निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई करने में है। इसलिए बिहार को अपराध-मुक्त घोषित करने से अधिक जरूरी है उसे भय-मुक्त और न्यायपूर्ण बनाना। यही सुशासन है और यही लोकतन्त्र में सरकार की असली परीक्षा भी है।

 

 

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राकेश कुमार गुप्त

लेखक इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं तथा संस्कृतिकर्म और लेखन में सक्रिय हैं। grakesh80@gmail.com +919839448782
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