
बच्चे और हमारा समय
क्या हम अपने समय के बच्चों को जानते हैं? जिन्हें हम बच्चा कह रहे हैं, क्या वे बच्चे ही हैं? कहानीकार स्वयं प्रकाश ने कुछ अरसा बच्चों की एक पत्रिका में काम किया था। वहाँ के अनुभवों से उन्होंने कहा कि अब बच्चों को बच्चा नहीं, जूनियर सिटिजन कहना चाहिए। इस बात के गहरे आशय हैं। यदि कोई बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़ता है और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से थोड़े से भी ठीक माहौल में है, तो उसके बौद्धिक स्तर की तुलना अपने बचपन से करके देखिए। आपको लगेगा कि वह कितना आगे है। हमें स्वीकार करना होगा कि नयी तकनीक और तेजी से बदल रहे संसार ने बच्चों को समय से पहले परिपक्व बनाना शुरू कर दिया है। परिपक्व न भी कहें, तो ये बच्चे अपनी पिछली पीढ़ी से कहीं आगे हैं। यह खुश होने की बात है, लेकिन सवाल यह भी है कि इन बच्चों की जीवन-दृष्टि क्या है? ये देश, दुनिया और समाज के बारे में क्या सोचते हैं? और जो भी सोचते हैं, क्या वह सही है?
हमारे समय के बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनका बचपन तेजी से बदल रहा है। अब बच्चा तीन-चार साल का होते ही स्कूल जाने लगता है, जहाँ उसे जल्दी ही समझ आ जाता है कि वह एक कठिन प्रतियोगी समय में है। यहीं से वह अपने भविष्य को आकार देने लगता है और समय खराब करने के बजाय कैरियर की चिन्ता करने लगता है। अपने भविष्य को लेकर बच्चों में जैसी सजगता आज दिखाई देती है, वैसी पहले कम थी। लेकिन डर यह है कि भविष्य की भयावह अनिश्चितता कहीं उन्हें कुण्ठित न कर दे। बचपन का स्वाभाविक उत्साह यदि छोटी उम्र से ही उपलब्धियों, अंकों और दूसरों से आगे निकलने की चिन्ता में बदल जाए, तो बच्चों के व्यक्तित्व का सहज विकास कैसे होगा?
बच्चों के जीवन पर उपभोक्तावाद का प्रभाव भी तेजी से बढ़ा है। खान-पान, पहनावे और जीवन जीने के तौर-तरीकों में बाजार की उपस्थिति लगातार बढ़ रही है। विज्ञापन बच्चों को बताते हैं कि अच्छा जीवन महँगी वस्तुओं, नये उपकरणों और दूसरों से बेहतर दिखने में है। इससे उनकी इच्छाएँ बाजार के अनुसार आकार लेने लगती हैं। जिन बच्चों के परिवार इन वस्तुओं को नहीं खरीद सकते, उनके भीतर अभाव और हीनता का भाव पैदा हो सकता है। इस तरह आर्थिक असमानता बच्चों की दुनिया में भी प्रवेश कर जाती है।
भूमण्डलीकरण से पहले संचार के पारम्परिक माध्यम और साहित्य बच्चों को व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ते थे। कहानियाँ, उपन्यास और लोककथाएँ उनकी कल्पनाशीलता को विस्तार देते थे। आज डिजिटल माध्यमों ने सूचनाओं और मनोरंजन की विशाल दुनिया खोल दी है। बच्चे इनके माध्यम से बहुत कुछ सीख सकते हैं, लेकिन लगातार छोटे वीडियो देखने और तत्काल मनोरंजन की आदत उनकी एकाग्रता, धैर्य और गहराई से सोचने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। टेलीविजन और डिजिटल माध्यमों के एनीमेशन कल्पना की दुनिया रचते अवश्य हैं, लेकिन तैयार दृश्यों को देखने और स्वयं कल्पना करने में अन्तर है। सृजनशीलता केवल तैयार सामग्री से नहीं आती; उसके लिए अनुभव, जिज्ञासा और अपने ढंग से सोचने की स्वतन्त्रता भी चाहिए।
बच्चों की कल्पनाशीलता मिट्टी में खेलने, पेड़ पर चढ़ने, कागज की नाव बनाने और दोस्तों के साथ खेल के नियम तय करने से भी विकसित होती है। इन अनुभवों से वे सहयोग, धैर्य, सामूहिक निर्णय और समस्याओं का समाधान करना सीखते हैं। लेकिन स्कूल, गृहकार्य, कोचिंग और स्क्रीन के बीच उनका समय सिमटता जा रहा है। एकल परिवारों, शहरीकरण और सुरक्षित खेल-स्थलों की कमी ने बच्चों के अकेलेपन को बढ़ाया है। दादा-दादी, नाना-नानी, पड़ोसियों और दूसरे बच्चों के साथ रहने से जो अनुभव मिलते थे, वे अनेक बच्चों के जीवन से दूर होते जा रहे हैं। महँगे खिलौने और डिजिटल उपकरण इस अकेलेपन का स्थायी समाधान नहीं हो सकते।
स्कूल से निकलते ही बच्चे कोचिंग के मायाजाल में फँसने लगते हैं। उच्च शिक्षा के सामान्य पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए भी सीयूईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षा देनी पड़ती है। चिकित्सा और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए तैयारी कई बार नौवीं-दसवीं कक्षा से ही शुरू हो जाती है। इस तरह तीन-चार साल तक बच्चे का जीवन परीक्षा की तैयारी के इर्द-गिर्द सिमटा रहता है। प्रतियोगिता अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन जब वही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाए, तो बच्चों की सहजता नष्ट होने लगती है। यह विचार करना जरूरी है कि क्या प्रत्येक पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए ऐसी प्रतियोगी परीक्षाएँ आवश्यक हैं? क्या प्रवेश की प्रक्रिया को सरल और न्यायसंगत नहीं बनाया जा सकता?
हर बच्चे की रुचि, क्षमता और सीखने की गति अलग होती है। कोई गणित में अच्छा होता है, कोई साहित्य में, कोई खेल में और कोई संगीत या चित्रकला में। शिक्षा व्यवस्था जब सभी को एक ही पैमाने पर परखती है, तो विविध प्रतिभाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता। परीक्षा में कम अंक पाने वाला बच्चा स्वयं को अयोग्य समझने लगता है, जबकि सम्भव है कि उसकी प्रतिभा किसी दूसरे क्षेत्र में विकसित हो सकती हो। असफलता को जीवन का अन्तिम निर्णय मानने के बजाय उसे सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा समझना चाहिए। बच्चों को यह भरोसा मिलना जरूरी है कि एक परीक्षा में असफल होने से उनकी सम्भावनाएँ समाप्त नहीं हो जातीं।
उच्च शिक्षा की बदहाली और रोजगार के सीमित अवसर भी बच्चों के भविष्य को अनिश्चित बनाते हैं। सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में संसाधनों की कमी तथा शिक्षा का रोजगार तक सीमित होता जाना चिन्ता का विषय है। विज्ञान, कला और मानविकी के अपने व्यापक सरोकार हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाने की योग्यता पैदा करना नहीं, बल्कि मनुष्य को विवेकशील, संवेदनशील और स्वतन्त्र विचार वाला नागरिक बनाना भी है। व्यावहारिक ज्ञान की अपनी उपयोगिता है, लेकिन जब उसे ही शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य मान लिया जाता है, तब ज्ञान के व्यापक संसार से हमारा सम्बन्ध कमजोर होने लगता है।
बच्चों के विकास में खेल और अवकाश की भूमिका को भी समझना होगा। खेल केवल शरीर को स्वस्थ रखने का साधन नहीं हैं। इनके माध्यम से बच्चे सहयोग, अनुशासन, कल्पनाशीलता और सामूहिक निर्णय लेना सीखते हैं। वे समझते हैं कि हर बार जीतना सम्भव नहीं और हार के बाद भी जीवन आगे बढ़ता है। लेकिन शहरों में खुले मैदान कम हो रहे हैं और विद्यालयों में पढ़ाई के अतिरिक्त गतिविधियों के लिए समय घटता जा रहा है। बच्चों के लिए पार्क, पुस्तकालय, खेल के मैदान और सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र उपलब्ध कराना सार्वजनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। बचपन को केवल पढ़ाई और परीक्षा तक सीमित करके हम उसके विकास की बुनियादी जरूरतों की उपेक्षा करते हैं।
बच्चों की मानसिक दुनिया को समझना भी हमारे समय की बड़ी आवश्यकता है। हम उनसे पढ़ाई और भविष्य के बारे में सवाल करते हैं, लेकिन उनके डर, उदासी, मित्रता और छोटी-छोटी खुशियों के बारे में बात करने का समय नहीं निकालते। माता-पिता की अपेक्षाएँ, परीक्षा का दबाव और दूसरों से तुलना बच्चों में तनाव पैदा कर सकते हैं। ऐसे में उन्हें डाँटने या दूसरे बच्चों का उदाहरण देने के बजाय उनकी बात सुनना जरूरी है। उन्हें यह भरोसा मिलना चाहिए कि वे अपनी परेशानियाँ साझा कर सकते हैं और असफल होने पर भी परिवार का स्नेह उनके साथ रहेगा। बच्चों को समझने के लिए केवल उनकी उपलब्धियों पर नहीं, उनके अनुभवों और भावनाओं पर भी ध्यान देना होगा।
यह भी सच है कि अनुकूल परिस्थितियाँ और अवसर मिलने पर बच्चे अपनी प्रतिभा से उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल करते हैं। क्रिकेट जैसे खेलों में अवसरों के विस्तार ने अनेक प्रतिभाओं को सामने आने का मौका दिया है। लेकिन किसी एक क्षेत्र की सफलता को सभी बच्चों के लिए आदर्श नहीं बनाया जा सकता। हर बच्चे को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। जीवन की सफलता केवल प्रसिद्धि, धन या किसी प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश पाने में नहीं है। अपने काम में आनन्द पाना, दूसरों के साथ मिलकर रहना और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी जीवन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं।
समूचा परिदृश्य बताता है कि निश्चिन्तता वाला बचपन पीछे छूटता जा रहा है। बच्चे थोड़ा-सा समझदार होते ही कैरियर की आपाधापी में खो जाते हैं। यह आपाधापी बचपन को लील रही है और बच्चों को अन्धी, अन्तहीन दौड़ का घोड़ा बना रही है। आज के बच्चों को ऐसे संसार में बड़ा होना पड़ रहा है जहाँ उपभोक्तावाद, असमानता और भविष्य की अनिश्चितता उनके अनुभवों को प्रभावित करते हैं। उनसे सजग नागरिक और सामाजिक जीवन के प्रति उत्तरदायी मनुष्य बनने की अपेक्षा करने से पहले हमें उनके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनानी होंगी।
आवश्यक है कि बच्चों को ऐसा वातावरण मिले जिसमें उनके बचपन का आनन्द सुरक्षित रहे और वे विवेकवान मनुष्य बन सकें। अनावश्यक प्रतियोगिताओं के दबाव से मुक्ति, सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों की मजबूती, खेल और अवकाश के अवसर, पुस्तकालयों की उपलब्धता तथा परिवार के साथ संवाद के लिए पर्याप्त समय इस दिशा में महत्त्वपूर्ण हैं। बच्चों को अपनी रुचि का क्षेत्र चुनने और अपनी गति से सीखने की स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। उन्हें केवल भविष्य के लिए तैयार करने के नाम पर उनका वर्तमान छीन लेना किसी भी समाज के हित में नहीं हो सकता। आखिरकार, बचपन जीवन की तैयारी भर नहीं, अपने आप में जीवन का एक महत्त्वपूर्ण और अनमोल हिस्सा है।










