
यूफोरिया: बचपन का मुजरिम हो जाना
हाल ही में जियो हॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही फिल्म ‘यूफोरिया’ एक बेहद गंभीर, संवेदनशील और समाज को आईना दिखाने वाली बेहद महत्वपूर्ण फिल्म है। प्रसिद्ध निर्देशक गुणशेखर द्वारा निर्देशित यह फिल्म वर्ष 2022 में हैदराबाद के जुबली हिल्स में हुई चर्चित घटना से प्रेरित है। फिल्म में हैदराबाद और विशाखापत्तनम के कई स्थानों को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया है। ‘यूफोरिया’ का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह केवल अपराध की कहानी नहीं कहती, बल्कि अपराध के पीछे मौजूद परवरिश, पारिवारिक माहौल, सामाजिक सोच और जिम्मेदारी जैसे अहम् सवालों के तरफ भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है। आज की युवा पीढ़ी के भटकाव में माता-पिता की भूमिका क्या है? क्या बच्चों को केवल सफलता और सुविधाएं देना पर्याप्त है, या उन्हें संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और सही-गलत के बीच अंतर करना भी सिखाना जरूरी है? फिल्म इन्हीं असहज सवालों के इर्द-गिर्द घूमती है।
इस फिल्म देखते हुए हाल ही में ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ के वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री ‘रील से क्राइम तक’ बार-बार जेहन में आती है। 26 अगस्त को ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ के मंच पर रिलीज हुई इस डॉक्यूमेंट्री में नाबालिग लड़कों के रील बनाने और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के लिए धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में प्रवेश करने की समस्या को रेखांकित किया गया है। डॉक्यूमेंट्री बताती है कि किस तरह बड़े गैंगस्टरों की नजर इन नाबालिगों पर रहती है और उनकी कम उम्र का फायदा उठाकर उनसे आपराधिक गतिविधियां करवायी जाती है। बदले में उन्हें मामूली रकम या लोकप्रियता का लालच दिया जाता है। ये नाबालिग हाफ मर्डर तक को अंजाम देने में भी नहीं हिचकते हैं। सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स बढ़ाने और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की चाह कई बार इन किशोरों को नशे, हिंसा और गंभीर अपराधों तक ले जाती है। जिस उम्र में इन बच्चों के हाथ में कॉपी-कलम होनी चाहिए, उस उम्र में तलवार, चाक़ू और कट्टे हैं। इस लिहाज से ‘रील से क्राइम तक’ और ‘यूफोरिया’ दोनों अलग-अलग रास्तों से एक ही बड़े सवाल तक पहुंचती हैं—हमारी नई पीढ़ी अपराध की ओर क्यों बढ़ रही है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
हालांकि, ‘यूफोरिया’ इस सवाल को एक अलग दृष्टि से देखती है। फिल्म नाबालिगों के अपराध के पीछे पेरेंटिंग और पारिवारिक संस्कारों के सवाल को प्रमुखता से उठाती है। फिल्म की शुरुआत ही बेहद असहज कर देने वाले दृश्य से होती है जिसमें एक जज को यह कहते हुए दिखते हैं कि- यह उनके जीवन का पहला ऐसा मामला है, जिसमें कोई दोषी स्वयं अदालत में आकर अपने किए अपराध की सजा मांग रहा है। इसके बाद भूमिका चावला को अदालत में याचिकाकर्ता के रूप में दिखाया जाता है। वह अपने बेटे द्वारा किए गए अपराध की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए स्वयं सजा की मांग करती है। यह कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है और 17 वर्षीय चैत्रा (सारा अर्जुन) के इर्द-गिर्द घूमती है। चैत्रा एक होनहार छात्रा रहती है और सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही है। एक पार्टी के दौरान उसके साथ एक भयावह घटना घटती है। विकास (विघ्नेश गावी रेड्डी) नाम का एक अमीर और बिगड़ैल लड़का अपने दोस्तों के साथ मिलकर उसे गुमराह करके अगवा करता है और दोस्तों के साथ मिलकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार करता है। इस घटना के बाद चैत्रा लंबे समय तक सदमे में रहती है। बाद में वह अपनी मां को पूरी घटना बताती है। जब उसके पिता को इसकी जानकारी मिलती है तो वह पुलिस में शिकायत करने की बात करते हैं। चैत्रा भी मजबूती से इस लड़ाई को लड़ती है। फिल्म यहां उस पितृसत्तात्मक सोच पर सीधा प्रहार करती है, जिसमें किसी भी यौन अपराध के बाद सवाल अपराधी से पहले पीड़िता से की जाती है। चैत्रा पूछती है—क्या किसी लड़की का पब में जाना अपराध है? यदि लड़की लड़कों के बीच अपनी मर्यादा और विवेक नहीं खोती, तो लड़के अपने आप पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पाते? ये सवाल केवल फिल्म के पात्रों के सवाल नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज से भी है। दुर्भाग्य यह है कि इसका संतोषजनक उत्तर आज भी किसी के पास नहीं है।
मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में होती है। उपलब्ध सबूतों के आधार पर सभी आरोपियों को 20 वर्ष की सजा सुनायी जाती है। इस पूरे मामले में पुलिस की जांच भी फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सबसे पहले पुलिस यह समझने की कोशिश करती है कि नाबालिग अपराध की ओर कैसे बढ़ते हैं? वह उस अपराध के पीछे की कड़ियों को जोड़ती है। फिल्म पुलिस की पूछताछ के पारंपरिक तौर-तरीकों पर भी व्यंग्य करती है। जब थर्ड डिग्री के पुराने तरीके काम नहीं करते तो एक नया तरीका अपनाया जाता है—आरोपियों को जबरन पांच प्लेट बिरयानी खिलाने का जिससे आरोपी अंततः सारी जानकारी दे देते हैं। मामले में पुलिस कमिश्नर एक और महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं। नाबालिग आरोपियों की पहचान सार्वजनिक करने के बजाय उनके प्रभावशाली माता-पिता की पहचान उजागर की जाती है। ये माता-पिता समाज और राजनीति के प्रभावशाली लोग होते हैं। इस निर्णय के कारण कमिश्नर को आलोचना का सामना करना पड़ता है और अंततः उन्हें निलंबित कर दिया जाता है। यह प्रसंग यह सवाल भी उठाता है कि कानून और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच संघर्ष में आखिर किसका पक्ष लिया जाना चाहिए।
लेकिन फिल्म का सबसे गहरा और संवेदनशील पक्ष विंध्या के चरित्र में दिखाई देता है, जिसे भूमिका चावला ने निभाया है। वह मुख्य आरोपी विकास की मां है और एक प्रतिष्ठित स्कूल की प्रिंसिपल तथा मैनेजिंग डायरेक्टर है। बेटे के अपराध के सामने आने के बाद वह स्कूल से इस्तीफा दे देती है और समाज के तानों का सामना करती है। विंध्या के भीतर लगातार यह सवाल चलता रहता है कि आखिर उसकी परवरिश में ऐसी क्या कमी रह गई कि उसका बेटा इतना वीभत्स अपराध कर बैठा। उसका पति भी उसे ही दोषी ठहराता है और कहता है कि उसने बेटे पर कम और स्कूल पर ज्यादा ध्यान दिया, जिसका परिणाम सामने है। यह संवाद कामकाजी महिलाओं की उस सामाजिक विडंबना को सामने लाता है, जहां बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी अक्सर सबसे पहले मां के कंधों पर डाल दी जाती है। जहां महिलाओं का जीवन घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच सिमटकर रह जाता है। लेकिन सवाल यह है—हर गलती के लिए सिर्फ मां ही जिम्मेदार क्यों? बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी केवल मां की क्यों हो? फिल्म इसी बिंदु पर पेरेंटिंग के व्यापक प्रश्न को सामने लाती है। बच्चे को महंगे स्कूल में पढ़ाना, उसकी जरूरतें पूरी करना और उसके करियर की चिंता करना ही अच्छी परवरिश नहीं है। उसे सहमति का महत्त्व, संवेदनशीलता, सम्मान, जिम्मेदारी और दूसरों की गरिमा का अर्थ समझाना भी उतना ही जरूरी है। विंध्या लगातार उस लड़की के बारे में सोचती रहती है जिसके साथ उसके बेटे ने दरिंदगी की। धीरे-धीरे उसके भीतर ममता और नैतिकता का द्वंद्व गहरा होता जाता है। कहानी में निर्णायक मोड़ तब आता है जब वह स्वयं अदालत का दरवाजा खटखटाती है और कहती है—“मुझसे गलती हुई है, मुझे सजा दो।” एक मां अपने बेटे को बचाने के बजाय उसके अपराध की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करती है। वह चैत्रा को न्याय दिलाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से पुलिस को महत्वपूर्ण सबूत उपलब्ध कराती है और जांच में सहयोग करती है।
निर्देशक गुणशेखर ने ‘यूफोरिया’ के जरिए एक बेहद जरूरी सवाल हमारे सामने रखा है—क्या अपराध केवल उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जिसने उसे अंजाम दिया, या उस परिवार और समाज की भी, जिसने उसके भीतर अपराध की मानसिकता और उसके लिए परिस्थितियां तैयार की? यही फिल्म का केंद्रीय द्वंद्व है। ममता और नैतिकता के बीच चुनाव का प्रश्न केवल विंध्या का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि पूरे समाज का प्रश्न बन जाता है। ‘यूफोरिया’ यह भी याद दिलाती है कि न्याय केवल अदालत में नहीं होता। न्याय की पहली लड़ाई हमारे सामाजिक पूर्वाग्रहों, पितृसत्तात्मक सोच और पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा करने की मानसिकता के खिलाफ होती है। फिल्म का सबसे मजबूत संदेश यही है कि अपराधी केवल समाज के हाशिए पर नहीं पलते। वे कभी-कभी बड़े, संपन्न और प्रभावशाली परिवारों के भीतर भी पनपते हैं, जिन्हें समाज आदर्श मानता है।
नाबालिगों द्वारा किए जा रहे गंभीर अपराधों के संदर्भ में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है—बच्चों की, माता-पिता की, स्कूलों की या पूरे समाज की? शायद इसका उत्तर किसी एक के पास नहीं है। परवरिश एक साझा जिम्मेदारी है और संवेदनशील नागरिक तैयार करना परिवार, शिक्षण संस्थानों और समाज—तीनों का दायित्व है।
‘यूफोरिया’ अपराध की कहानी कम और उस समाज का आईना ज्यादा लगता है, जो अपराध के बाद भी अक्सर पीड़ित से ही सवाल पूछता है। फिल्म हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि सहमति, सम्मान और जिम्मेदारी की शिक्षा अपराध होने के बाद अदालत में नहीं, बल्कि बचपन से घर में शुरू होनी चाहिए। जब पुलिस कमिश्नर को सजा सुनायी जाती है और जब वे कोर्ट से बाहर निकलते हैं, तब वह वहां मौजूद महिलाओं से बोलते हैं कि “कंसेंट इज मैनडेटरी”। बिना सहमति के आपको कोई नहीं छू सकता, चाहे वह पिता हो, भाई हो या कोई और। इस फिल्म में एक और बेहद मजबूत संदेश यह देने की कोशिश की गयी है कि पीड़िता को अंत में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के रूप में दिखाया गया है और वह आरोपी को पढाई के लिए अनुमति देती दिखती है। एक रेप पीड़िता के संघर्ष के बाद की कामयाबी को दिखाकर कर देश की लाखों पीड़िताओं के मनोबल को बढ़ाने की कोशिश की गयी है। वहीं, दूसरी ओर पीड़िता की माँ को भी हिम्मत हारते नहीं दिखाया गया है जो अंत में अपने बेटे को सही रास्ते पर ले आती है। इस फिल्म में जेल के भीतर के अपराध को भी बेहद गंभीरता से दिखाया गया है, जहां एक नाबालिग के यौन शोषण की कोशिश होती है। उसे इतना परेशान किया जाता है कि सुधरने के बजाय वह और बड़ा अपराधी बन जाता है। इस प्रकार यह फिल्म समाज के कई गंभीर और संवेदनशील मुद्दों की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करता है और उसमें सुधार के लिए प्रेरित करता है। साथ ही समाज की जिम्मेदारी तो तय करती ही है, साथ ही यह भी संदेश देती है की समाज का काम सिर्फ लांछन लगाना नहीं होता बल्कि हर नागरिक को जिम्मेदार बनाना भी होता है।
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