चर्चा में

लोकतंत्र में दिमागी नक्सली

 

15 अगस्त 2026 को लालकिले की प्राचीर से माननीय प्रधानमंत्री के उद्बोधन में दिमागी नक्सली शब्द के प्रयोग के पश्चात् इस शब्द को लेकर तीव्र विमर्श आरम्भ हो गया है। इस शब्द के निहितार्थ, प्रयोजन और सामाजिक प्रभाव को लेकर देश-दुनिया में विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। किसी के लिए यह एक वैचारिक प्रवृत्ति का संकेत है, तो किसी के लिए असहमति रखने वाले व्यक्तियों को संबोधित करने वाली एक राजनीतिक अभिव्यक्ति। किंतु, इन समस्त विमर्शों के मध्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दिमागी नक्सली जैसे शब्द का समाज में क्या संदेश संप्रेषित हो रहा है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसकी क्या उपयोगिता है?

समाज में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो केवल शब्द तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वह एक विचार और सामाजिक अवधारणा का रूप धारण कर लेते हैं। इसके माध्यम से किसी व्यक्ति की विचारधारा, प्रवृत्ति और व्यक्तित्व के संबंध में एक निश्चित धारणा निर्मित होने लगती है। , ‘देशद्रोही’, ‘राष्ट्रविरोधी’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘दिमागी नक्सली’, ‘जातिवादी’ तथा ‘नस्लवादी’ जैसे शब्द अकसर राजनीतिक विमर्श के केंद्र रहते हैं,  जिसका उपयोग अथवा दुरूपयोग किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का विश्लेषण करने के स्थान पर उसके नकारात्मक छवि को स्थापित करने के लिए किया जाता है। समस्या उस समय उत्पन्न होती है, जब किसी व्यक्ति की असहमति, आलोचना अथवा प्रश्नाकुलता को ही उसके विरुद्ध आरोप का आधार बना दिया जाता है। किसी व्यक्ति के विचारों का मूल्यांकन उसके तर्क, तथ्य और आचरण के आधार पर होना चाहिए, न कि उसे किसी विशेष संज्ञा से संबोधित करके उसके विचारों को पहले ही निष्प्रभावी कर दिया जाए।

दिमागी नक्सली शब्द को समझने के लिए नक्सली शब्द की सामान्य अवधारणा को समझना आवश्यक है। नक्सलवाद शब्द सुनते ही हमारे मानस-पटल पर हिंसा, शस्त्र, संघर्ष और सशस्त्र विद्रोह की छवि उभरती है। विशेषतः बस्तर और सुकमा जैसे क्षेत्रों के संदर्भ में नक्सली हिंसा ने राज्य तथा समाज के समक्ष दीर्घकाल तक गंभीर चुनौती प्रस्तुत की है। किंतु, नक्सलवाद को केवल शस्त्र और हिंसा के संदर्भ में समझना पर्याप्त नहीं है। उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा ऐतिहासिक कारणों का विवेचन भी आवश्यक है। परंतु ‘दिमागी नक्सली’ में नक्सली शब्द के साथ दिमागी विशेषण जुड़ते ही इसका आशय भिन्न हो जाता है। यहाँ एक मूल प्रश्न यह है कि दिमागी नक्सली किसे कहा जाए? किसी व्यक्ति को यह संज्ञा प्रदान करने का अधिकार किसके पास है? और इसका आधार क्या होगा? यदि किसी व्यक्ति का किसी शासन-व्यवस्था, संस्था, संगठन अथवा सामाजिक संरचना के प्रति असंतोष है, तो उसके कारणों को समझना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता है, उसका शोषण किया जाता है, उसकी शिकायतों की उपेक्षा की जाती है अथवा उसकी बात सुनने से निरंतर इंकार किया जाता है, तो उसके भीतर असंतोष और आक्रोश का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। जब यह आक्रोश निरंतर उपेक्षा और अन्याय के कारण तीव्र होता जाता है, तब व्यक्ति के भीतर व्यवस्था के प्रति गहरी असहमति जन्म ले सकती है। लेकिन क्या केवल असहमति अथवा आक्रोश के कारण किसी व्यक्ति को दिमागी नक्सली कहा जा सकता है? यहीं से लोकतंत्र का मूल प्रश्न आरंभ होता है कि क्या सत्ता से प्रश्न करना व्यवस्था के विरुद्ध होना है? क्या शासन की आलोचना करना राष्ट्रविरोध है? क्या किसी संस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना उस संस्था का विरोधी बन जाना है?

लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान करने के अधिकार तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नागरिकों की स्वतंत्र चेतना, असहमति, संवाद, आलोचना और प्रश्न करने की क्षमता में निहित होती है। यदि नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग नहीं होंगे तथा शासन और सार्वजनिक संस्थाओं के कार्यों पर दृष्टि नहीं रखेंगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में धीरे-धीरे निरंकुश प्रवृत्तियों के लिए स्थान निर्मित हो सकता है।

अतः प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि वह शासन के कार्यों के प्रति सजग रहे, सार्वजनिक नीतियों का विवेकपूर्ण परीक्षण करे और आवश्यकता पड़ने पर प्रश्न उठाए। सजग नागरिक लोकतंत्र का प्रहरी होता है। हाल के दिनों में युवाओं द्वारा अपने अधिकारों तथा भविष्य से जुड़े प्रश्नों को लेकर किए गए आंदोलनों को भी इसी लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। युवाओं का अपने शैक्षिक भविष्य और परीक्षात्मक व्यवस्था से संबंधित प्रश्नों को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज उठाना लोकतांत्रिक सहभागिता का परिचायक है। यदि किसी आंदोलन में कुछ व्यक्तियों द्वारा अमर्यादित भाषा का उपयोग किया गया है, तो उस भाषा की निःसंदेह आलोचना होनी चाहिए। किंतु, कुछ व्यक्तियों के आचरण के आधार पर संपूर्ण आंदोलन अथवा उससे जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की वैचारिक पहचान निर्धारित करना उचित नहीं हो सकता।

किसी विचार से असहमति है तो उसका प्रतिकार तर्क, तथ्य और संवाद के माध्यम से होना चाहिए। विचार का उत्तर विचार से, तर्क का उत्तर तर्क से और आरोप का उत्तर तथ्य से दिया जाना चाहिए। यदि किसी आंदोलन के उद्देश्य से सहमति है, किंतु उसके तरीकों से असहमति है, तो उसके तरीकों की आलोचना की जा सकती है। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श की पहचान और लोकतंत्र की आत्मा है।

समस्या उस समय उत्पन्न होती है, जब विचार और हिंसा के मध्य का अंतर जानबूझकर समाप्त कर दिया जाता है। किसी व्यक्ति को केवल इसलिए दिमागी नक्सली कह देना कि वह स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाता है, सत्ता अथवा संस्था की आलोचना करता है या किसी प्रचलित विचार से असहमति व्यक्त करता है, लोकतांत्रिक समाज में भय और आत्म-सेंसरशिप की प्रवृत्ति को जन्म दे सकता है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछने वाला नागरिक शत्रु नहीं होता। वह लोकतांत्रिक चेतना का वाहक होता है।

देश के प्रबुद्ध वर्ग की भूमिका इस संदर्भ में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यदि बुद्धिजीवी, शिक्षक, पत्रकार, लेखक और अन्य जागरूक नागरिक सत्ता के प्रत्येक निर्णय पर केवल ‘हाँ’ में ‘हाँ’ और ‘न’ में ‘न’ मिलाने लगें, तो समाज में बौद्धिक जड़ता उत्पन्न होने लगती है। ऐसी स्थिति किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।

विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी प्रश्न करते हैं, शिक्षक व्यवस्थाओं और नीतियों की समीक्षा करते हैं, पत्रकार शासन से उत्तरदायित्व की अपेक्षा करते हैं, लेखक स्थापित धारणाओं को चुनौती देते हैं और नागरिक सार्वजनिक नीतियों की आलोचना करते हैं। यही किसी जीवंत लोकतांत्रिक समाज की पहचान है।

असहमति व्यक्त करना कोई मानसिक विकृति अथवा सामाजिक अपराध नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति का सम्मान आवश्यक है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब असहमति का उत्तर तर्क और संवाद से देने के स्थान पर उसे अन्याय, अनैतिकता अथवा अपराध की भाषा में परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है।

इसलिए आज आवश्यकता दिमागी नक्सली खोजने की नहीं, बल्कि स्वतंत्र मस्तिष्क वाले नागरिकों का निर्माण करने की है। ऐसे नागरिक, जो सत्ता से प्रश्न कर सकें, किंतु हिंसा का मार्ग न अपनाएँ; जो व्यवस्था की आलोचना कर सकें, किंतु संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान करें; जो असहमति व्यक्त कर सकें, किंतु असहमति को घृणा में परिवर्तित न करें।

देश के प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी मानसिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखे। किसी विचार को केवल इसलिए स्वीकार न करे कि वह बहुसंख्यक मत है और किसी विचार को केवल इसलिए अस्वीकार भी न करे कि वह अल्पमत में है। विचारों का परीक्षण तर्क, तथ्य और विवेक की कसौटी पर होना चाहिए।

अतः ‘दिमागी नक्सली’ बनने या किसी को ‘दिमागी नक्सली’ घोषित करने की प्रवृत्ति से कहीं अधिक आवश्यक है कि हम अपने मस्तिष्क को स्वतंत्र रखें। जिस समाज में नागरिक निर्भीक होकर सोच सकें, प्रश्न पूछ सकें, असहमति व्यक्त कर सकें और अन्याय को अन्याय कहने का साहस रख सकें। वही समाज वास्तव में लोकतांत्रिक समाज कहलाने का अधिकारी है। लोकतंत्र की रक्षा मौन नागरिक नहीं, बल्कि सजग, विवेकशील और प्रश्नाकुल नागरिक करते हैं।

 

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संतोष बघेल

लेखक शिक्षाविद् एवं स्‍वतन्त्र लेखक हैं| सम्पर्क- +919479273685, santosh.baghel@gmail.com
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