
कांवड़ यात्रा के बवाल पर सवाल
इस बार कांवड़ यात्रा के दौरान दो बार मुझे भी कहीं-कहीं यात्रा करनी पड़ी। एक यात्रा उत्तराखंड से दिल्ली की और दूसरी दिल्ली से यमुनानगर, हरियाणा की। जब हम उत्तराखंड से दिल्ली के लिए निकले, तब हमारी गाड़ी को दूसरे रास्ते से मोड़ दिया गया, जिससे हमें ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन जब हम दिल्ली से यमुनानगर की ओर 7 अगस्त को निकले और जैसे ही हाईवे से शहर की ओर बढ़े, वैसे ही हम भीड़ में फंस गए। कांवड़ यात्रियों के जत्थे पूरी सड़कों पर फैले हुए थे। गाड़ी चलाना तो दूर, वहां से आगे बढ़ना भी मुश्किल हो रहा था। जत्था भी ऐसा, जिसे न कपड़ों का होश था और न ही आसपास के लोगों का। अधिकांश नशे में धुत्त और दुनिया से बेखबर लग रहे थे। तेज डीजे की कानफोड़ू और दिल की धड़कनों को रोक देने वाली आवाज के कारण हर पल मुश्किल लग रहा था। खैर, काफी मशक्कत के बाद किसी तरह हम मंजिल तक पहुंच पाए। लौटते समय और भी बुरा हुआ। रविवार का दिन था। ऋषिकेश पहुंचते ही हम भारी भीड़ में फंस गए। आधे घंटे के रास्ते को हमने लगभग दो घंटे में तय किया। श्रीनगर की ओर जाने के लिए कोई टैक्सी नहीं मिली और हमें रात भर ऋषिकेश में ही रुकना पड़ा। लोगों ने बताया कि लगभग तीन लाख कांवड़िए उस दिन सड़कों पर उतरे थे। इसलिए कोई टैक्सी ऊपर नहीं जाएगी।
एक दूसरी घटना दिल्ली से उत्तर प्रदेश जा रहे एक पत्रकार साथी के साथ घटी। रात में जब ये अपने घर जा रहे थे, तब जगह-जगह उन्हें डायवर्जन का सामना करना पड़ रहा था। रास्ते में कुछ लोगों को उन्होंने पुलिस वालों के सामने अपने घर के नजदीक वाले रास्ते पर जाने देने की बात कहते हुए गिड़गिड़ाते देखा। वे पुलिस वालों को बता रहे थे की 1-2 किलोमीटर के लिए उन्हें लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ेगी। लंबी दूरी तय करने की बाध्यता पर वे सवाल उठा रहे थे। किंतु पुलिस वाले आदेश का हवाला देकर उन्हें एक किलोमीटर के बदले 30-35 किलोमीटर तय करने के लिए बाध्य कर रहे थे। लेकिन जैसे ही मेरे एक पत्रकार साथी ने अपनी पत्रकारिता दिखाई और वीडियो बनाना शुरू किया, वैसे ही नजदीक रहने वाले लोगों को उसी रास्ते से आगे बढ़ने दिया
यह सावन का महीना तो समाप्त हो गया। कांवड़ यात्राएं भी अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच गईं। लाखों लोगों ने गंगाजल उठाया, लंबी यात्राएं कीं और अपने आराध्य शिव को जल अर्पित किया। यह भारतीय समाज की एक बड़ी धार्मिक परंपरा है और करोड़ों लोगों की आस्था इससे जुड़ी है। लेकिन इस वर्ष कांवड़ यात्रा की चर्चा केवल श्रद्धा और भक्ति के कारण नहीं हुई। इसके साथ विवाद, सड़क पर उत्पात, नशे, तेज आवाज, अश्लीलता, पुलिस से झड़प और सार्वजनिक अनुशासन से जुड़ी घटनाएं भी खूब चर्चा में रहीं। उत्तराखंड में एक बुजुर्ग की कांवड़िए की बाइक की चपेट में आने से मृत्यु जैसी घटना ने यह प्रश्न और गंभीर कर दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता अथवा आस्था और सार्वजनिक जिम्मेदारी के बीच किस प्रकार का संतुलन है? बहुत सारे कांवड़िए तो बाइक के साइलेंसर निकालकर तेज आवाज में वाहन चलाते दिखते थे। जिन रास्तों से कांवड़िए गुजर रहे थे, वहां रहने वाले लोगों के लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था; वह उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा भी था। किसी की रात की नींद, किसी की परीक्षा की तैयारी, किसी बीमार व्यक्ति का आराम और किसी बुजुर्ग की शांति—सब कुछ प्रभावित हो रहा था। फोन पर बात तक करना मुश्किल हो रहा था।

सवाल यह है कि आस्था हमें केवल धार्मिक बनाती है या जिम्मेदार नागरिक भी? धर्म मनुष्य को भीतर से बदलने की प्रक्रिया है। यह धार्मिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आस्था है। धर्म संयम और करुणा सिखाता है। धर्म दूसरे के दुख को समझना सिखाता है। धर्म अहंकार को कम करने की बात करता है। लेकिन जब धार्मिकता का प्रदर्शन इतना आक्रामक हो जाए कि दूसरे व्यक्ति को परेशानी होने लगे, सड़क पर कानून की अवहेलना होने लगे या किसी दूसरे की गरिमा प्रभावित होने लगे, लोगों की जान पर बन आए, तब हमें रुककर विचार करना चाहिए। क्या यह आस्था है या आस्था को बदनाम करने का प्रदर्शन? यह प्रश्न किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। धार्मिक समुदाय को इस पर विचार करना चाहिए। क्योंकि किसी भी धर्म की श्रेष्ठता उसके अनुयायियों के प्रदर्शन से नहीं, उनके व्यवहार और विचार से सिद्ध होती है।
कांवड़ यात्रा को सिर्फ धार्मिक आयोजन के रूप में देखना सही प्रतीत नहीं होता। यह हमारे समाज की सामाजिक और आर्थिक संरचना की एक झलक भी देती है। मेरे व्यक्तिगत अवलोकन में इस यात्रा में बड़ी संख्या में निम्न आय और निम्न-मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले लोग और युवा दिखाई दिए। इसमें मैंने शायद ही कभी कोई मंत्री, विधायक या नेता के बच्चों को शामिल होते देखा है। मैंने कभी किसी बड़े अधिकारी और उनके परिवार वालों को इसमें पैदल जाते नहीं देखा। यह कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं है और न ही इसका अर्थ यह है कि कांवड़ यात्रा में शामिल प्रत्येक व्यक्ति गरीब, बेरोजगार या कम शिक्षित है। लेकिन इस दृश्य ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर पैदा किया—क्या हमारे समाज के उस युवा वर्ग तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसर पर्याप्त रूप से पहुंच पाए हैं?
यह सवाल कांवड़ियों से ज्यादा हमारी व्यवस्था से है। जिस देश में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हुए वर्षों गुजार देते हैं, जहां रोजगार की तलाश युवाओं के जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बनती जा रही है और जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अभी भी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से प्रभावित है, वहां युवा ऊर्जा की दिशा पर बात करना जरूरी है। युवा कैसे भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं, यह विचारणीय है। धार्मिक यात्राओं के नाम पर कोसों पैदल चलना, भारी-भरकम गंगाजल को खींचते हुए या कंधे पर ले जाना, दंडवत देते हुए पहाड़ों पर चढ़ना इस भीड़ के लिए जितना आम है, हमारे लिए उतना ही कष्टकारी।
हम शिक्षा को अक्सर डिग्री, परीक्षा और नौकरी से जोड़कर देखते हैं। लेकिन शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य इससे कहीं बड़ा है। शिक्षा व्यक्ति में सार्वजनिक जीवन की समझ विकसित करती है। कानून का पालन करना और उसके महत्व को बताती है। यह एहसास दिलाती है कि दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि स्वयं की। महिला भी सम्मान की अधिकारी होती हैं और उनकी गरिमा का ध्यान रखना सबका दायित्व है। पुलिस से असहमति हो सकती है, लेकिन हिंसा समाधान नहीं है। धार्मिक आस्था व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक स्थान पर व्यवहार सामाजिक जिम्मेदारी भी है। इसलिए हमें केवल स्कूली शिक्षा ही नहीं, बल्कि नागरिक शिक्षा की भी जरूरत है।
यहां एक और कठिन प्रश्न सामने आता है। जिस युवा के पास रोजगार नहीं है, स्थायी आय नहीं है, भविष्य को लेकर असुरक्षा है और समाज में अपनी पहचान स्थापित करने के सीमित अवसर हैं, उसके लिए सामूहिक पहचान का संकट है। ऐसी स्थिति में धर्म उसे समुदाय देता है। भीड़ उसे शक्ति का अहसास कराती है। सामूहिक नारा उसे अपनी मौजूदगी का एहसास कराता है। यह मनोविज्ञान केवल कांवड़ यात्रा तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में असुरक्षित समाजों में सामूहिक पहचान और समूह-आधारित राजनीति मजबूत होती रही है। इसलिए यदि हम युवाओं को केवल यह कहकर खारिज कर देंगे कि वे ‘अशिक्षित’ हैं या ‘भटक गए हैं’, तो हम समस्या की जड़ तक पहुंचना मुश्किल होगा। उन्हें शिक्षा कैसी मिली? रोजगार के अवसर कितने मिले? आदि जैसे प्रश्न विचारणीय हैं।
कांवड़ यात्रा या अन्य धार्मिक यात्राओं के दौरान प्रशासन की भी बड़ी भूमिका होती है। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े आयोजन में व्यवस्था बनाए रखना आसान काम नहीं है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी है। धार्मिक यात्राओं में स्वच्छता, नशामुक्ति, सड़क सुरक्षा का संकल्प, प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा, आम नागरिक के प्रति जवाबदेही आदि भी आवश्यक हैं। तब शायद धार्मिक यात्राएं भगवान तक पहुंचने का रास्ता हों या न हों, इंसानों तक पहुंचने का रास्ता अवश्य बन सकेंगी। तभी धर्म सही मायनों में इन यात्राओं को आत्मसात कर पायेगा, जिसमें सबका कल्याण निहित होगा। गया। कांवर यात्रा के दौरान तो शैक्षणिक संस्थाओं तक को बंद कर दिया गया था, जो यह बताता है कि धर्म ही सर्वोपरि है। यही वहज है की राजनितिक दल धर्म को सबसे बड़ा हथियार बनाये हुए हैं जो अंग्रेजों ने भी किया था। इसीलिए मार्क्स ने धर्मं को अफीम की संज्ञा दी थी, जो एक घातक नशीला पदार्थ है। ऐसी स्थिति में धर्म और आस्था में डूबे अंधभक्तों को यह समझना होगा कि नशा वहीं तक ठीक है, जितने में अपना और दूसरे का कोई नुकसान न हो।
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