पूर्वोत्तर

शिलांग का गुस्सा और बंगाली प्रभुत्व की पुरानी स्मृति

मेघालय की राजधानी शिलांग में 19 अगस्त, 2026 को खासी स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) की ब्लैक-फ्लैग बाइक रैली के दौरान हिंसा भड़क गयी थी। इस दौरान स्वामी विवेकानन्द और सुभाषचन्द्र बोस की प्रतिमाओं को नुकसान पहुँचाया गया। बोस की प्रतिमा को गिरा दिया गया। विवेकानन्द की प्रतिमा के चारों ओर लगे काँच को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। कई वाहनों में तोड़फोड़ हुई और लोगों पर हमले के आरोप भी लगे।

केएसयू की माँग रही है कि मेघालय की नौकरियों, जमीन और संसाधनों पर स्थानीय आदिवासी आबादी का अधिकार सुनिश्चित किया जाए और बाहर से आने वाली आबादी तथा पूँजी के बढ़ते प्रभाव को नियन्त्रित किया जाए। सरकारी भर्ती और नियुक्तियों में स्थानीय युवाओं के हितों की रक्षा उसके प्रमुख मुद्दों में है। इन्हीं माँगों के लिए रैली निकाली गयी थी।

केएसयू के नाम में ‘स्टूडेंट यूनियन’ जरूर है, लेकिन यह उत्तर भारतीय छात्रसंघों की तरह केवल छात्रों की माँगों तक सीमित रहने वाला संगठन नहीं है। वास्तव में, पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में अलग-अलग आदिवासी समुदायों के अपनी-अपनी स्टूडेंट यूनियन हैं, जो प्रायः अपने क्षेत्रों की एक प्रमुख राजनीतिक-सामाजिक शक्ति हैं। इसी तरह, केएसयू मेघालय की खासी जनजाति का एक प्रभावशाली संगठन है।

यह संगठन कई दशकों से जमीन, रोजगार, प्रवासन, आदिवासी अधिकार और स्थानीय स्वायत्तता के सवाल उठाता रहा है। इनर लाइन परमिट, सरकारी भर्ती और बाहरी लोगों की जाँच जैसे मुद्दे उसके आन्दोलनों का हिस्सा रहे हैं। जिस आन्दोलन के दौरान विवेकानन्द और सुभाष की मूर्तियाँ तोड़ी गयीं, उसका मूल स्वर पहले से स्पष्ट था—स्थानीय आदिवासी अधिकार बनाम बाहरी प्रभुत्व।

यहीं से मूर्तियों को तोड़े जाने का अर्थ समझने की शुरुआत होती है।

भारत में अम्बेडकर की मूर्तियाँ तोड़े जाने की खबरें अक्सर आती हैं। ऐसी घटनाओं का अर्थ समझना कठिन नहीं होता। प्रतिमा पर हमला पत्थर या धातु पर हमला भर नहीं होता। वह उस राजनीति और सामाजिक स्मृति पर हमला होता है जिसका वह व्यक्ति प्रतीक बन चुका है। अम्बेडकर सामाजिक वर्चस्व को तोड़ने के प्रतीक हैं, इसलिए उनकी मूर्तियों को वे तोड़ते हैं, जो इस वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं।

लेकिन विवेकानन्द और सुभाषचन्द्र बोस की मूर्तियों पर हमला उत्तर भारत के लोगों को कुछ अटपटा लग सकता है। सवाल उठ सकता है कि भला विवेकानन्द और सुभाष से खासी युवाओं का क्या विवाद हो सकता है? इसका जवाब किताबों में नहीं मिलेगा। इसके लिए यह देखना होगा कि ये मूर्तियाँ कहाँ लगी थीं?

प्रतिमाओं के पीछे छिपी एक बस्ती की कहानी

वे शिलांग की आर एण्ड आर कॉलोनी में थीं। आर एण्ड आर का अर्थ है रिलीफ एण्ड रिहैबिलिटेशन कॉलोनी। यह बस्ती उन बंगाली परिवारों के पुनर्वास के लिए बनी थी जो पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर यहाँ आये थे। कॉलोनी के लोगों ने अपने पार्क में सुभाषचन्द्र बोस और स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमाएँ स्थापित की थीं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रतिमा लगाने की भी योजना थी। पास के स्कूल का नाम भी टैगोर मेमोरियल एल.पी. स्कूल है।

विवेकानन्द और सुभाष की प्रतिमाएँ वहाँ केवल दो “राष्ट्रीय महापुरुषों” की प्रतिमाएँ नहीं हैं। वे एक बंगाली बस्ती के बीच खड़ी हैं। वे उस समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति और उसकी सार्वजनिक उपस्थिति के चिह्न हैं और वास्तव में बंगाली सांस्कृतिक प्रभुत्व के प्रतीक हैं। इसलिए उन पर हमला बंगाली सांस्कृतिक प्रभुत्व के प्रतीकों पर हमला है।

पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समुदाय द्वारा बंगाली प्रतीकों के प्रतिरोध की यह पहली घटना भी नहीं है। बंगाली साम्राज्यवाद का विरोध पहले भी होता रहा है। त्रिपुरा और मेघालय के आदिवासी बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता इस लेखक से आपसी बातचीत में बंगाली संस्कृति के सबसे ऊँचे प्रतीक रवीन्द्रनाथ टैगोर का भी मुखर विरोध करते रहे हैं।

शिलांग के इतिहास में बाहर से आये प्रभुत्व की जड़ें

शिलांग खासी भूभाग में बसा शहर है। लेकिन आधुनिक शिलांग का निर्माण ब्रिटिश शासन ने किया। 1874 में अँग्रेजों ने इसे असम की राजधानी बनाया। राजधानी बनी तो सरकारी दफ्तर खुले। अदालतें बनीं। स्कूल और दूसरे संस्थान आये। इन सबके लिए पढ़े-लिखे कर्मचारियों की जरूरत थी।

यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ था। ब्रिटिश प्रशासन ने असम पर अपना नियन्त्रण स्थापित करने के शुरुआती दशकों से ही बंगाल से आए अमलों और क्लर्कों पर भरोसा किया था। पुलिस, अदालत, राजस्व और शिक्षा से जुड़े कामों में बंगाली कर्मचारियों की बड़ी भूमिका थी। 1873 तक बंगाली भाषा भी असम के प्रशासन और स्कूलों में प्रभावशाली बनी रही। इसलिए 1874 में जब अलग असम प्रान्त बना और शिलांग उसकी राजधानी बना, तब बंगाली शिक्षित मध्यवर्ग की प्रशासनिक उपस्थिति पहले से स्थापित थी।

राजधानी बनने के बाद यह प्रक्रिया तेज हुई। बंगाली सरकारी कर्मचारी, व्यापारी और दूसरे पेशेवर यहाँ बड़ी संख्या में बसने लगे। औपनिवेशिक शिलांग केवल खासी भूभाग पर बना एक नया शहर नहीं था; वह एक ऐसा नौकरशाही केन्द्र बन रहा था, जहाँ स्थानीय समाज के ऊपर ब्रिटिश सत्ता और उसके साथ बाहर से आए शिक्षित मध्यवर्ग की दृश्य उपस्थिति लगातार बढ़ती गयी।

उस समय बंगाल में अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त मध्यवर्ग पहले से तैयार था। इसलिए बंगाली कर्मचारी, शिक्षक, डॉक्टर और दूसरे पेशेवर बड़ी संख्या में शिलांग आये। धीरे-धीरे शहर के प्रशासन और आधुनिक शिक्षा से जुड़े कामों में हर जगह बंगाली समुदाय के लोग ही दिखने लगे। जगह-जगह समृद्ध बंगालियों के बंगले खड़े हो गये।

इस स्थिति को स्थानीय खासी समाज की नजर से समझना चाहिए।

जमीन खासी लोगों की थी। राजनीतिक सत्ता अँग्रेजों के हाथ में थी। लेकिन रोजमर्रा के प्रशासन में बंगाली मध्यवर्ग हर जगह दिखाई देता था। दफ्तर का बाबू बंगाली हो सकता था। शिक्षक बंगाली था। डॉक्टर और दूसरे पेशेवर भी बड़ी संख्या में बंगाली थे। इस तरह स्थानीय लोगों के अनुभव में अँग्रेजी सत्ता और बंगाली मध्यवर्ग एक ही व्यवस्था के दो हिस्से बन गये। यहीं उस चीज की जड़ है जिसे ‘बंगाली साम्राज्यवाद’ कहा जा सकता है।

राजनीतिक साम्राज्य अँग्रेजों का था। लेकिन अँग्रेजों ने बंगाली शिक्षित वर्ग को ऐसी बढ़त दी कि वह स्थानीय आदिवासी समाज से बहुत अधिक प्रभावशाली हो गया।

वर्चस्व केवल सत्ता से नहीं बनता

बंगाली संस्कृति को अक्सर एक ऐसी सुसंगत और विशिष्ट परम्परा के रूप में पेश किया जाता है, जिसकी जड़ें किसी शुद्ध ‘आर्य’ अतीत में खोजी जा सकती हों। इतिहास इससे कहीं अधिक जटिल है। बंगाल की संस्कृति का निर्माण हजारों वर्षों में ऑस्ट्रो-एशियाटिक, द्रविड़, तिब्बती-बर्मी और दूसरी स्थानीय आबादियों के लम्बे सम्पर्क, संघर्ष और मेल से हुआ है। बंगाल कोई बन्द सांस्कृतिक द्वीप नहीं था। वह पूर्वी भारत, छोटानागपुर, असम, त्रिपुरा और दूसरे पूर्वोत्तरी इलाकों से लगातार जुड़ा रहा। इसलिए बंगाली भाषा, खान-पान, लोकाचार और सामाजिक व्यवहार में उन समुदायों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है, जो इस पूरे भूभाग में बंगाली भद्रलोक के बनने से बहुत पहले से रहते आये थे। बंगाली भद्रलोक ने इन आदिवासियों से बहुत कुछ सीखा है।

यह उनके खान-पान में सबसे आसानी से दिखाई देता है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समाजों में चावल, मछली, बाँस के कोमल अंकुर, किण्वित खाद्य (किण्वन का मतलब है किसी खाद्य पदार्थ को सूक्ष्म जीवों की मदद से कुछ समय तक प्राकृतिक रूप से बदलने देना। अँग्रेजी में इसे फर्मेंटेशन कहते हैं।) स्थानीय साग-सब्जियों और वनस्पतियों के उपयोग की बहुत पुरानी परम्परा है। बंगाली समुदाय ने इसे अपनाया।

बंगाली समाज ने इन आदिवासी खाद्य परम्पराओं से बहुत सारी चीजें ग्रहण कीं, पर वह उनके जीवित आदिवासी रूप को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता। पूर्वोत्तर के किण्वित बाँस, सोयाबीन, मछली या दूसरे खाद्य पदार्थों को उनकी गन्ध के कारण ‘बदबूदार’, ‘गन्दा’, “जंगली” या “असभ्य” कहे जाने के उदाहरण आम हैं। यह केवल स्वाद का सवाल नहीं है। बंगाल और भारत के दूसरे हिस्सों में दही, इडली, डोसा, अचार जैसी किण्वित चीजें सामान्य और सम्मानित भोजन मानी जाती हैं। समस्या किण्वन की तकनीक में नहीं है। समस्या उस सामाजिक नजर में है, जो यह तय करती है कि किस समुदाय का भोजन ‘परम्परा’ कहलाएगा और किसका ‘बदबूदार खाना’।

सूअर का मांस, रक्त से तैयार किए जाने वाले व्यंजन, किण्वित सोयाबीन, बाँस के अंकुर और अनेक स्थानीय वनस्पतियाँ केवल स्वाद का मामला नहीं हैं। वे सामाजिक स्मृति, पर्यावरणीय ज्ञान और सामुदायिक जीवन से जुड़ी हुई हैं। आधुनिक मानवशास्त्रीय अध्ययन इन्हें किसी ‘पिछड़े’ समाज की विचित्र आदतें नहीं, बल्कि एक विकसित ज्ञान-व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान के हिस्से के रूप में देखते हैं।

लेकिन बंगाली व अन्य बाहरी लोगों की नजर इतनी उदार नहीं होती। बंगाली भद्रलोक में लम्बे समय तक अपने को शिक्षित, आधुनिक और सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ मानने की एक मजबूत परम्परा रही है। इसका प्रभाव पूर्वोत्तर के आदिवासी समाजों के प्रति उनकी दृष्टि में भी दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि यह श्रेष्ठता ग्रन्थि केवल बंगालियों में है। बिहार, उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे मैदानी इलाकों से पूर्वोत्तर पहुँचने वाले लोगों में भी स्थानीय खान-पान, पोशाक और जीवन-शैली को अपने से नीचे समझने की प्रवृत्ति मिलती है। फर्क इतना है कि शिलांग के इतिहास में बंगाली मध्यवर्ग की उपस्थिति अधिक पुरानी और अधिक प्रभावशाली रही है, इसलिए स्थानीय स्मृति में उसकी भूमिका भी अलग है।

बंगाली व अन्य मैदानी समुदायों के श्रेष्ठता-बोध की सबसे दिलचस्प बात यह है कि वह अक्सर अपने सांस्कृतिक ऋण को पहचानता ही नहीं।

आज उलुध्वनि को बंगाली विवाह, दुर्गापूजा और दूसरे माँगलिक अवसरों की विशिष्ट पहचान की तरह देखा जाता है। लेकिन यह केवल बंगाली परम्परा नहीं है। इसी तरह की सामूहिक ऊँची ध्वनि असम और ओडिशा में भी प्रचलित है। त्रिपुरी आदिवासी विवाह-संस्कारों में भी उलुध्वनि का दस्तावेजी उल्लेख मिलता है। यह उस व्यापक पूर्वी और पूर्वोत्तरी सांस्कृतिक क्षेत्र की साझा परम्पराओं में से एक है, जिसके भीतर बंगाली संस्कृति भी विकसित हुई।

बंगाली आधुनिकता का एक हिस्सा इस तरह बना कि उसने आसपास के लोक और आदिवासी संसार से बहुत कुछ लिया, लेकिन आधुनिक शिक्षा और औपनिवेशिक सत्ता से मिली प्रतिष्ठा के कारण स्वयं को ‘सभ्य’ संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में पेश करने लगा।

यहीं से तनाव पैदा होता है।जब संस्कृति बराबरी का रिश्ता नहीं रहने देती। खासी जनजाति मातृवंशीय समुदाय है। उनकी सामाजिक परम्पराएँ देश के अन्य समुदायों से बहुत ही भिन्न हैं। किसी खासी परिवार को यह केवल अपनी परम्परा और भोजन का अपमान नहीं लगता कि उसके खाने की गन्ध पर नाक सिकोड़ दी गयी। उसके लिए यह अनुभव उस बड़े सामाजिक व्यवहार से जुड़ जाता है जिसमें बाहर से आया व्यक्ति उसकी जमीन पर रहता है, स्थानीय संसाधनों से लाभ उठाता है, लेकिन स्थानीय समाज को अपने से कमतर समझता है। वह उसकी भाषा को ‘बोली’, उसके धर्म को ‘आदिम’, उसके भोजन को ‘गन्दा’ और उसके जीवन को ‘पिछड़ा’ कह सकता है।

ऐसी अवमाननाएँ छोटी दिखती हैं, लेकिन राजनीति में उनका संचय होता रहता है। वे रोजमर्रा के जीवन में यह सन्देश देती हैं कि सम्बन्ध बराबरी का नहीं है। एक समुदाय स्वयं को मानक मानता है और दूसरे को उस मानक तक पहुँचने वाला पिछड़ा समाज समझता है।

इसीलिए पूर्वोत्तर में आदिवासी प्रतिरोध को केवल जमीन, नौकरी या प्रवासन के आँकड़ों से नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे सम्मान का प्रश्न भी है। यह इस बात का प्रश्न है कि स्थानीय समाज को अपने ही भूगोल में किस नजर से देखा जा रहा है।

और जब किसी बाहरी समुदाय की आर्थिक या प्रशासनिक उपस्थिति के साथ सांस्कृतिक श्रेष्ठता-बोध भी जुड़ जाता है, तो प्रतिरोध केवल संसाधनों के बँटवारे के खिलाफ नहीं रहता। वह उस पूरे व्यवहार के खिलाफ हो जाता है, जिसमें बाहर से आया समुदाय स्थानीय लोगों को यह सिखाने की मुद्रा में रहता है कि उन्हें कैसे खाना चाहिए, कैसे रहना चाहिए और किस संस्कृति को श्रेष्ठ मानना चाहिए।

शिलांग में बंगाली प्रभुत्व की ऐतिहासिक स्मृति को समझते समय इस रोजमर्रा के सांस्कृतिक अहंकार को भी नजरअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। सम्भव है कि वह किसी सरकारी आँकड़े में दर्ज न हो, लेकिन स्थानीय प्रतिक्रिया को आकार देने में उसकी भूमिका कई बार किसी कानून या नौकरी की नीति से कम नहीं होती।

स्मृति में बचा हुआ पुराना संघर्ष

बहरहाल, बंगाली प्रभुत्व का शिलांग में विरोध का पुराना इतिहास रहा है। 1979 में शिलांग में खासी-बंगाली संघर्ष हुआ था, जिसने शहर का सामाजिक स्वरूप बदल दिया था। बंगाली घर और बस्तियाँ निशाना बनीं। लोग मारे गये और बड़ी संख्या में बंगाली परिवार शहर छोड़ने को मजबूर हुए। उस समय शिलांग में गैर-आदिवासी आबादी बहुत बड़ी थी। बाद के दशकों में उसका अनुपात लगातार कम हुआ। मेघालय में 1979, 1987 और 1992 में गैर-आदिवासी आबादी को निशाना बनाने वाली हिंसा की तीन बड़ी लहरें दर्ज हैं।

1987 का आन्दोलन और भी स्पष्ट था। इसका नेतृत्व भी केएसयू कर रहा था। उस समय हजारों विद्यार्थी शिलांग में प्रदर्शन करते हुए ऐसे बैनर लेकर निकले जिन पर लिखा था— “नॉन ट्राइबल गेट आउट”। उस समय बंगाली अन्य बाहरी व्यापारियों की दुकानें धमकियों और हमलों के कारण बन्द हुईं।

अतीत की छाया और आज की राजनीति

शिलांग में बंगाली प्रभुत्व का पुराना भौतिक आधार अब काफी कमजोर हो चुका है। 1979 और उसके बाद के आन्दोलनों ने शहर का शक्ति-सन्तुलन बदल दिया। आज कम से कम मेघालय में राजनीतिक सत्ता स्थानीय आदिवासी समुदायों के हाथ में है। जमीन और सरकारी नौकरियों में भी उन्हें मजबूत संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।

लेकिन जिस प्रभुत्व का अन्त हो जाता है, जरूरी नहीं कि उसके खिलाफ पैदा हुई स्मृति भी समाप्त हो जाए। वह दूसरे रूप में बची रहती है।

कभी स्थानीय नौकरियों की माँग में। कभी बाहर से आने वाले मजदूरों की जाँच में। कभी जमीन और संसाधनों पर बाहरी कम्पनियों के नियन्त्रण के विरोध में।

और कभी किसी मूर्ति पर पड़े हथौड़े में।

उत्तर भारत की नजर में शिलांग में टूटी हुई ये दो प्रतिमाएँ भारतीय महापुरुषों की प्रतिमाएँ हैं। लेकिन खासी प्रतिरोध के इतिहास में वे केवल इतनी ही नहीं थीं। वे एक पुराने बंगाली प्रभुत्व की सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी थीं। इसीलिए वे निशाना बनीं।

(प्रमोद रंजन पत्रकार और लेखक हैं। इन दिनों पूर्वोत्तर भारत में रहते हैं।)

स्रोत एवं सन्दर्भ सूची

Govindasamy, Kadirvel, et al. “Meat-Based Ethnic Delicacies of Meghalaya State in Eastern Himalaya: Preparation Methods and Significance.” Journal of Ethnic Foods 5, no. 4 (2018): 267–71.

Khasi Students’ Union. “20 Point Charter Demand to the Government of Meghalaya.” July 8, 2026.

Kikon, Dolly. “Bamboo Shoot in Our Blood: Fermenting Flavors and Identities in Northeast India.” Current Anthropology 62, suppl. 24 (2021): S376–S387.

McDuie-Ra, Duncan. “Civil Society Organisations and Human Security: Transcending Constricted Space in Meghalaya.” Contemporary South Asia 15, no. 1 (2006): 35–53.

Menon, Ramesh. “Agitation against Non-Tribal ‘Outsiders’ by Khasi Students Union Shatters Peace in Shillong.” India Today, July 31, 1987.

Misra, Sanghamitra. “Bengali Communities in Colonial Assam.” Oxford Research Encyclopedia of Asian History. Oxford University Press, May 23, 2019.

Mittal, Gaurav. “‘What Is Public Anyway?’: The Politics of Urban Transport in Shillong, India.” Urban Studies, March 20, 2026.

Sohliya, Ibakordor, et al. “Tungrymbai—A Traditional Fermented Soybean Food of the Ethnic Tribes of Meghalaya.” Indian Journal of Traditional Knowledge 8, no. 4 (2009): 559–61.

“Vehicles Torched; Vivekananda, Netaji Statues Vandalised during KSU Bike Rally.” The Meghalayan Express, August 19, 2026.

Varah, Chanshimla. “Meghalaya Students’ Protest Turns Violent; Vehicles, Vivekananda, Netaji Statues Vandalized.” NewsBytes, August 20, 2026.

“Vivekananda Statue Unveiled at R&R Colony.” Meghalaya Monitor, July 20, 2025.

van Schendel, Willem. “Rebuffing Bengali Dominance: Postcolonial India and Bangladesh.” Critical Asian Studies 55, no. 1 (2023): 105–35.

 

Show More

प्रमोद रंजन

लेखक पूर्वोत्तर भारत की एक यूनिवर्सिटी में शिक्षणकार्य व स्वतंत्र लेखन करते हैं। इनकी दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन और तकनीक के समाजशास्त्र में है। सम्पर्क +919811884494, janvikalp@gmail.com
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x