
मोहभंग की गाथा बनाम श्रीकांत वर्मा की कविताएँ
31 दिसंबर, 1984 को लिखी अपनी डायरी में कवि श्रीकांत वर्मा ने कहा “कांग्रेस को 400 सीटें मिलीं पर तुम्हें क्या मिला?1980 में भी तुम्हें कहा गया था, तुम्हें मंत्री-परिषद में शामिल किया जाएगा। ——छले जाने की अनुभूति तो होती ही है। इसलिए नहीं कि मुझे काम का पुरस्कार नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि निकम्मों को निकम्मेपन का पुरस्कार मिला। —हम संसार को बदल सकते हैं, अपनी नियति को नहीं। हम अन्याय की एक व्यवस्था को बदल कर, उसकी जगह अन्याय की दूसरी व्यवस्था को कायम करते है । हम इसी भ्रम में जीते चले जाते हैं कि स्वप्न हकीकत में बदलेगा, मगर ऐसा होता कभी नहीं। मेरा अनुभव सिर्फ इतना है स्वप्न देखा, स्वप्रसंग भी देखा। ’ मेरी कविताएँ भी तो स्वप्न और स्वप्रसंग का एक अजीबो-गरीब, एक नारकीय, एक जादुई मिलन है। एक ऐसा होता नहीं, पर है। क्या कहूँ? यह पार्टी की जीत का वर्ष है और मेरी पराजय का।”[1] वर्तमान सन्दर्भ में जब राजनीति सर्वव्यापी और सर्वभक्षक हो गयी है ऐसे में श्रीकांत वर्मा जैसे कवि और रचनाकार प्रासंगिक हो उठते हैं, जिनका अपना क्षेत्र साहित्य और संवेदना था, परंतु महत्वाकाँक्षा के कारण राजनीति से जुड़े और अन्त में मोहभंग का शिकार हुए। श्रीकांत वर्मा की पंक्तियाँ हैं –
‘चाहता तो बच सकता था/मगर कैसे बच सकता था
जो बचेगा कैसे रचेगा। /पहले मैं झुलसा
फिर धधका/ चटखने लगा
कराह सकता था/मगर कैसे कराह सकता था
जो कराहेगा/ कैसे निबाहेगा/”[2]
बीसवीं शताब्दी में आए मानवीय सम्बन्धों के विघटन को श्रीकांत वर्मा ने भोगा, जाना और परखा है और अपने जीवन एवम चिंतन में भारतीय इतिहास से उत्पन्न समस्याओं से जूझने की कोशिश की है।
महत्वाकाँक्षा की क्रूर परिणति – मोहभंग के शिकार श्रीकांत वर्मा ने अंतिम दो काव्य-संग्रहों की रचना मोहभंग के बाद की। निरन्तर आक्रोश और विद्रोह को वहन करने वाले श्रीकांत वर्मा अन्तत: अवसाद के स्वर में कविताएँ रचते हैं। श्रीकांत वर्मा का कहना है “ हर अनुभव आदमी को बदल देता है। प्रत्येक अनुभव से गुजरता हुआ आदमी लगातार नया होता रहता है।”[3] काव्य या साहित्य में यही अनुभव साहित्य का विषय बनते हैं। अनुभवों की जडें बाहरी परिवेश अथवा परिस्थितियों में होती हैं।इन्हीं को आत्मसात कर कृतिकार अपने साहित्य के संवेदनात्मक धरातल का निर्माण करता है। श्रीकांत वर्मा की महत्वाकाँक्षा ने ही उन्हें शासक दल का प्रवक्ता बनाया। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि श्रीकांत वर्मा शासक दल के प्रवक्ता थे। महत्वपूर्ण है उनकी ईमानदार बने रहने की नाकाम कोशिश। राजनीतिक दुष्चक्र में घिरकर भी श्रीकंत वर्मा ने अपनी कलम को बचाकर रखने का प्रयत्न किया।अन्तत: वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कलम ही उनका स्वत्व है। खास तौर पर अंतिम काव्य संग्रह ‘ गरुड किसने देखा है ’ में ऐसी अनेक कविताएँ हैं। साथ ही, उनकी डायरी के अंश भी इसमें समाहित हैं, जो इसी बात की पुष्टि करते हैं। 1960 के बाद का समय भारतीय सन्दर्भों में स्वतंत्रता के बाद मोहभंग का काल है। भारत की नीतियों एवम भविष्य के सूर्योदयी विश्वास के प्रति जो आस्था भारतीय जनमानस में बनी थी ,वह टूट चुकी थी। तत्कालीन युवा कविता के कवि ने परिस्थितियों के दबाव को तीव्रता से अनुभव किया।फलत: असंतोष , विद्रोह ,क्षोभ उनके काव्य के स्थायी भाव बन गये।श्रीकांत वर्मा ने इस संवेदनात्मक परिवर्तन को तीव्रता से अनुभव कर अपने काव्य में विद्रोह के प्रखर स्वर को उभारा। साठोत्तरी कविता के विराट कैंनवस पर श्रीकांत वर्मा की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। “रोमांटिक नवोत्थान के रूप में परिभाषित नयी कविता के मुहावरे को छिन्न–भिन्न करते हुए जिस कवि ने कविता के ढाँचे और अन्तर्वस्तु में अराजक या विस्फोटक संगठन चरितार्थ कर दिखाया, वह कवि श्रीकांत वर्मा ही थे।”[4]
मानवीय स्वाधीनता और अस्तित्व के प्रश्न श्रीकांत वर्मा के काव्य के अहम प्रश्न रहे हैं।उनके अनुसार “पश्चिमी साहित्य ‘स्वतंत्रता’ का समारोह है और भारतीय साहित्य ‘मुक्ति’ का प्रयत्न।अपने साहित्य को मैं कुछ हद तक स्वतंत्रता का समारोह, कुछ हद तक मुक्ति का प्रयत्न मानता हूँ।”[5] वर्तमान परिस्थितियों में लुप्त होते मानवीय सार को श्रीकांत वर्मा ने गहराई के साथ अनुभव किया।फलस्वरूप उनके काव्य में गहरे मोहभंग और विक्षोभ के स्वर उभरे हैं।
श्रीकांत वर्मा का कहना है “किसी भी कवि का उसकी समूची संवेदना के साथ तादात्म्य कर पाना असंभव है।” विद्रोह,चीख और गाली के द्वारा अपनी कविता को अभिव्यक्ति देने वाले कवि श्रीकांत वर्मा परवर्ती काव्य- संग्रहों में अपनी अन्तर्वस्तु को सपाट और सहज भाषा में अभिव्यक्त करते हैं। श्रीकांत वर्मा की काव्य संवेदना निरन्तर रूपाँतरित होती रही है।इनका काव्य-विकास एक निर्झर प्रवाह की भाँति नहीं है ,जो परंपरागत काव्य-रूपों एवम संवेदनाओं रूपी प्रस्तर खंडों से टकराकर,उलझ कर आगे बढता है।अपितु इसमें रूढ प्रस्तर खंडों की भाँति शिल्प एवम संवेदना की ‘अभ्यस्तता को तोडने वाले विस्फोट’भी हैं,जो धूल और धुँए के यथार्थ के मध्य एक दहशत पैदा कर वास्तविकता की पहचान कराते हैं।
यही कारण है कि श्रीकांत वर्मा के अनुभव- विधान और शिल्प- संघटन में दो बार परिवर्तन स्पष्ट लक्षित होता है। पहला परिवर्तन ‘मायादर्पण’ की कविताओं में घटित हुआ था। द्वितीय परिवर्तन ‘जलसाघर’ की कविताएँ थीं जहां वैश्विक स्तर पर राजनीति की परिणति दिखाई देती है। 1973 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘जलसाघर’ में मोहभंग अपनी नियति के साथ प्रस्तुत हुआ है।
यहां श्रीकांत वर्मा का कवि-कर्म भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण करता हुआ व्यापक परिदृश्य में घटित होता है। एक ओर इसमें भारत की मिट्टी से जुडे हुए प्रश्न हैं, तो दूसरी ओर वियतनाम पर अमरीकी हमले,रंगभेद, सूदूर चेकोस्लाविया पर रूसी सेनाओं द्वारा ढाए जाने वाले अत्याचारों का प्रतिरोध है। तदन्तर मिथकों और प्रतीकों के माध्यम से मानवीय महत्वाकाँक्षा और मोहभंग का कोलाज लेकर 1984 में ‘मगध’ की कविताएँ प्रकाशित होती हैं। राजनीति और रचनात्मकता के द्वंद्व की अंतिम परिणति ‘गरूड किसने देखा है’ काव्य-संग्रह की कविताओं में हुई।
विश्व की बदलती हुई राजनीति,बढ़ता हुआ तनाव और अन्याय ‘जलसाघर’ काव्य संग्रह का मूल हेतु है। विश्व के वे सभी स्थान जो युद्ध-स्थल बन गये हैं या बन चुके हैं, ‘जलसाघर’ की पृष्ठभूमि का निर्माण करते हैं। युद्धों के संचालक,इतिहास पुरुष भी इन्हीं युद्धभूमियों से जुड़कर इन कविताओं में आये हैं। अल्जीरिया,वियतनाम,चेकोस्लोवाकिया,हंगरी के माध्यम से कवि ने बीसवीं शताब्दी में मानव की स्वतन्त्रता का हनन करने वाली शक्तियों के विरूद्ध विरोध व्यक्त किया है। घटनाओं के प्रति सीधी संवेदनाओं को भी व्यक्त किया गया है यही कारण है कि कुछ कविताएँ सीधे-सीधे रिपोर्ताज शैली में रची गईं हैं। यहाँ पर ‘कौआ रोर’ है, ‘पृथ्वी का हिसाब हो रहा है’ और ‘फौज के अंधेरे में लूटी हुई बीसवीं शताब्दी’ है। अस्तित्व का प्रश्न ‘जलसाघर’ की कविताओं में अधिक तीव्र हो उठता है यही कारण है कि कवि संवेदना को विस्तृत बनाने के प्रयत्न में वर्तमान सदी के मनुष्य को इतिहास के समकक्ष रखकर देखने की कोशिश करता हैं। श्रीकांत वर्मा के परवर्ती काव्य संग्रह की पृष्ठभूमि इसी संग्रह में बनकर तैयार हो गयी है। प्रस्तुत संग्रह की अंतिम कविता ‘कलिंग’ में वे कहते हैं –“ केवल अशोक लौट रहा है / और सब कलिंग का पता पूछ रहे हैं
केवल अशोक सिर झुकाए हुए है/और सब विजेता की तरह चल रहे हैं
केवल अशोक के कानों में चीख/ गूंज रही है/और सब हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं
केवल अशोक ने शस्त्र रख दिए हैं/ केवल अशोक लड़ रहा था।”[6]
एक बुद्धिजीवी की व्यथा को अभिव्यक्त करता हुआ सिर झुकाए अशोक यहाँ उपस्थित है। ‘जलसाघर’ की अंतिम कविता का नायक अशोक अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भों में भारत का भी प्रवक्ता है।
‘मगध’ की कविताएँ ऐतिहासिक घटनाओं ,पात्रों,स्थलों के सन्दर्भ में आधुनिक संवेदना को उभारती हैं। सत्ता की क्रूरकर्मा शक्तियाँ ,सत्ता की निस्सारता, बड़े बड़े नगरों का भविष्य,हिंसा का सहारा लेकर अपने आपको स्थापित करने वाले राजनयिक ऐतिहासिक प्रतीकों द्वारा यहाँ उपस्थित हो गये हैं। ‘अश्वारोही’ ,‘तीसरा रास्ता’, ‘अवन्ती में अनाम’ ‘उज्जयिनी का रास्ता’ आदि इसी तरह की कविताएँ हैं। ‘मगध’ के प्रकाशन के अवसर पर श्रीकांत वर्मा ने कहा था -_ “मेरी पिछली ज़ुबान में चटकारापन था, नयी ज़ुबान में मितव्ययता और सादगी होनी चाहिए ,मेरी पिछली कविताओं में भूगोल था, मेरी कविताओं में काल होना चाहिए और कालातीत भी, मगर यह इतिहास का काल या कालखंड नहीं; यह वह काल है, जो कृति को जन्म देता है और लील लेता है।”[7] इस संग्रह की कई कविताएँ उस दौर की हैं जब कवि मृत्यु के संत्रास से गुजर रहा था। मृत्यु से मुठभेड़ जीवन के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन ला देती है। ’मगध’ में कवि इतिहास प्रसिद्ध नामों का स्मरण करते हुए उनकी नश्वरता की ओर इंगित करता है। सत्ता के केंद्र के रूप में यहाँ मगध है, जो अपने वैभव और बल में अपूर्व था परंतु आज वह कहीं भी नहीं है। उज्जयिनी, श्रावस्ती, कौशल, काशी या यों कहिए की सभी जनपद जो पद और प्रतिष्ठा में उन्न्त ग्रीवा थे अन्त में धूलि-धूसरित हो गये। गहरे मृत्युबोध से उपजी,जीवन की निस्सारता का विश्लेषण करती अनेक कविताएँ यहाँ हैं। “मगध के लोग मृतकों की हड्डियाँ चुन रहे हैं”, “काशी में शव आते हैं और जाते हैं”, “कपिलवस्तु चिल्ला रहा है” , “बुद्धकालीन गणिका का स्वप्नभंग” आदि कविताएँ इतिहास तथा भूगोल की सीमाओं का अतिक्रमण कर नवीन प्रतीकों का संयोजन करती हैं, जो गहरे आंतरिक संगठन और युग-सन्दर्भ की दृष्टि से व्यापक संवेदना को सार्थक करते हैं। कविताओं में पंक्तियों के भीतर “तुक और आवृति निरी सजावट नहीं, यह कवि के तर्क की एक शैली है।”[8]
“मगध हो चुका/ मगध को होना है
मगध था ही नहीं/ मगध कैसे होगा।”
यहाँ पर प्रस्तुत पंक्तियाँ एक-दूसरे को काटती हुई प्रतीत होती हैं। किन्तु यह एक दूसरे को काटती नहीं अपितु काल के दो खंडों के मध्य का अन्तराल और साम्य रेखांकित करती हैं।
‘गरुड़ किसने देखा है’ काव्य संग्रह के दो भाग हैं-प्रथम भाग में काल-क्रम के साथ 40 कविताएँ हैं। जो 1984 से 1986 के बीच रची गयी हैं। संग्रह का दूसरा भाग श्रीकांत वर्मा की डायरी है। डायरी के द्वारा श्रीकांत वर्मा के भीतरी उद्वेलन,अनुताप, अन्त:संघर्ष और उसके काव्य में प्रकट होने की प्रक्रिया को समझा जा सकता है। कहीं-कहीं डायरी के पृष्ठ ही कविता बन गये हैं। डायरी काव्य-संग्रह की मूल संवेदना को परिभाषित करती है। ‘गरुड़ किसने देखा है’ काव्य संग्रह की कविताएँ राजनीतिक दबाव में पिसते व्यक्ति की छटपटाहट, उसकी चीत्कार को ऐतिहासिक सम्बन्धों में सार्थक करती है। मानवीय यातना का सघन-बोध कवि को समकालीन मनुष्य की स्थिति और नियति से गहरे आत्मिक स्तर पर जोड़ता है। श्रीकांत वर्मा का निज व्यक्तित्व बाहरी यथार्थ के प्रसंगों से आवृत्त होकर कविताओं में इस तरह प्रकट हुआ है कि वैयक्तिकता और सामाजिकता में कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती।
परिस्थिति के प्रति अपनी संवेदना को आक्रोश और चीख में अभिव्यक्त करना श्रीकांत वर्मा की विशेष मुद्रा थी, किन्तु यहाँ पहुँचकर कवि का स्वर बदल जाता है। ‘कुछ लोग मूर्तियाँ बनाकर बेचेंगे क्रांति की’, ‘कोई नहीं मरता अपने पाप से’ ,’झूठे हैं समस्त कवि,गायक, चित्रकार’ कहने वाले कवि श्रीकांत वर्मा व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं के कारण उन्हीं ताकतों का साथ देने लगे जिनका मानव के शोषण में प्रमुख हाथ है। परंतु सत्ता की राजनीति में सक्रिय योगदान देते हुए भी श्रीकांत वर्मा को सन्देह का पात्र समझा गया और उनका सत्ता से मोहभंग हुआ। सत्ता के केंद्र में बने रहना श्रीकांत वर्मा की महत्वाकाँक्षा थी। किन्तु परिस्थितिवश वे केंद्र से हाशिये पर आ गये।
श्रीकांत वर्मा को दो बार मृत्यु से जूझना पड़ा जिसने इनके काल-संबंधी चिंतन को विशेष धार दी। जिसके फलस्वरूप कवि ने जरा, मरण,नियति,माया आदि पर विचार किया। विविध समझौतों और राजनीतिक नारों का निर्माण करने के बाद भी श्रीकांत वर्मा को कुछ विशेष हासिल नहीं हुआ। अपने अस्तित्व की खोज और अपूर्णता को सन्दर्भित करने के लिए श्रीकांत वर्मा ने पुन: रचनात्मकता को अपनाया। अशोक वाजपेयी के अनुसार “शायद ही किसी हिन्दी कवि ने विफलता को अपने साहित्य का मुख्य थीम बनाया जैसा कि श्रीकांत वर्मा ने किया। प्रेम की विफलता, राजनीति और सत्ता की विफलता और अन्तत: इतिहास की विफलता, ईमानदार और खरे विक्षोभ से वे गहरे और उदास विवेक पर पहुंचे। ”[9] सत्ता का प्रवक्ता होने का गहरा अपराध-बोध भी उन्हें रहा। उन्होंने लिखा
“इन तमाम वर्षों में मैंने क्या किया
मिथ्या,चाटुकारिता, अहं, दर्प
छल, आत्मछल, आकाँक्षा,लोभ
वैभव,प्रदर्शन,आत्म-प्रदर्शन,प्रतिद्वंद्विता, शत्रुता,आत्मरति
नाटकीय जीवन जिया। /?”[10]
श्रीकांत वर्मा ने अपनी स्थिति को पूरी तौर पर सही-सही परिभाषित करने की चेष्टा की। उनकी आत्मसाक्षात्कार से सम्बन्धित कविताएँ इसी मन: स्थिति की देन हैं।
श्रीकांत वर्मा का मोहभंग उनके ‘स्व’ तक ही सीमित नहीं है,मोहभंग को उन्होने विराट परिप्रेक्ष्य में देखा है, ‘छीना-झपटी’, ‘पितामह’,’गांधार’, ‘मगध में सन्नाटा’,’मणिकर्णिका के नीचे मणिकर्णिका मिलेगी,’आदि कविताएँ विविध सन्दर्भों,प्रतीकों,ऐतिहासिक पात्रों द्वारा मोहभंग की पूरी दुनिया का पता देती हैं। जिसमें अपने ही जीवन की थकान, हताशा ,प्रश्नाकुलता, भय और सन्देह ,समय और परिवेश की व्यंग्यात्मक स्थितियों, विपर्ययों, विसंगतियों पर बार-बार टिप्पणी की गयी है। ”[11]
सत्ता की निस्सारता घोषित करते हुए श्रीकांत वर्मा कहते हैं-“मुड़कर देखो चन्द्रगुप्त गुज़र रहा है। बिंबिसार मृत्यु से डर रहा है। प्रियदर्शी शोक में डूबा हुआ है। ”[12] मानवीय अस्तित्व की यातना का एक महत्वपूर्ण प्रसंग राजनीति है। मानवता को पद-दलित करने वाले राजनीति के षडयंत्रों और दबावों को गहराई से महसूस करते हुए श्रीकान्त वर्मा ने राजनीति के सर्वेसर्वाओं के विषय में कहा-
“कुछ लोगों को देखकर मैं हैरत में पड़ जाता हूँ
उनके गिरने की कोई सीमा ही नहीं
वे हत्यारे ही नहीं
चोर,उच्चके,डकैत
—रेपिस्ट हैं”
ये वे लोग हैं “उनके जीवन में सत्य का /पश्चाताप का एक क्षण /नहीं आया /और वे सब-के-सब राजनीति में हैं। –[13]।”
राजनीति द्वारा निर्मित इस अराजक वातावरण में श्रीकांत वर्मा ने जीवन का अर्थ पाने की तथा मूल्यान्वेषण की कोशिश की। वे भली-भांति जानते थे “राजनीति का कोई विकल्प नहीं,राजनीति का स्थानापन्न केवल राजनीति हो सकती है—राजनीति को नष्ट करना संभव नहीं। ”[14] राजनीति से कवि श्रीकांत वर्मा किसी भी रूप से सम्बन्धित रहे हों, किन्तु श्रीकांत वर्मा की कविता के मूल में मानवीय अनुभव और संवेदना की अभिव्यक्ति ही रही है।
[1] गरूड़ किसने देखा है – पृ.9, प्रथम संस्कारण-1997 ,राजकमल प्रकाशन ,दिल्ली |
[2] प्रतिनिधि रचनाएँ-श्रीकांत वर्मा, पृष्ठ – 120,प्रथम संस्कारण 1992, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
[3] जिरह : श्रीकांत वर्मा : पृ 105: प्रथम संस्कारण 1973,संभावना प्रकाशन, हापुड़ |
[4] शब्द और मनुष्य: परमानंद श्रीवास्तव पृ. 139 : प्रथम संस्कारण :1987: राजकमल प्रकाशन ,दिल्ली|
[5] प्रसंग : श्रीकांत वर्मा : भूमिका पृ.2: प्रथम संस्कारण: 1981संभावना प्रकाशन, हापुड़|
[6] जलसाघर : श्रीकांत वर्मा : पृ. 104, तृतीय संस्कारण 1984 , राजकमल प्रकाशन,दिल्ली|
[7] सरहद पर: श्रीकांत वर्मा : 109 पृ:24 :1988: भारत भवन ,भोपाल|
[8] यथार्थ यथास्थिति नहीं : रघुवीर सहाय : पृ: 36: प्रथम संस्कारण 1984 : वाणी प्रकाशन: दिल्ली|
[9] पूर्वाग्रह- जनवरी-जून 88 पृ. 28
[10] गरूड किसने देखा है : श्रीकान्त वर्मा : पृ-10
[11] शब्द और मनुष्य : परमानंद श्रीवास्तव : पृ. 136
[12] गरुड किसने देखा है : श्रीकांत वर्मा : पृ: 20
[13] वही: पृ. 63
[14] बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में – श्रीकांत वर्मा:पृ : 8: द्वितीय संस्कारण 1989: राजकमल प्रकाशन ,दिल्ली|
लेखिका हिन्दी विभाग, मिरान्डा हाउस दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं । nishanagpurohit@gmail.com 9810790680










