राजनीति

बिहार की बदलती राजनीति की नयी आवाज

मणीन्द्र नाथ ठाकुर

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 केवल सीटों और प्रतिशतों का मामला नहीं है; यह बिहार के भीतर परिपक्व परिवर्तनों, जद्दोजहद करती आकांक्षाओं और ठिठकी हुई अर्थव्यवस्था का आयीना है। तीन दशकों से अधिक समय तक जाति, धर्म, क्षेत्र, अस्मिता, सामाजिक न्याय और विकास की मिली जुली संरचना ने   जिस राजनीति को निदेशित उसका सिर्फ  एक  नया और विशिष्ट  संस्करण इस चुनाव में  स्पष्ट नहीं  दिखा, बल्कि  इस बार एक नयी राजनीतिक आवाज भी   सुनाई पड़ी।  पुराने समीकरणों की पकड़ ढीली हुई, नयी कहानी की बेचैनी उभरी, और जनता ने नारे से आगे व्यवस्था, विमर्श से आगे संस्थान, और प्रतिनिधित्व से आगे परिणाम की माँग की। इस क्षण को समझने के लिए चुनावी-आँकड़ों  से अधिक सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं की धीमी चाल पर एक गहन दृष्टि चाहिए। बिहार का राजनीतिक इतिहास  सामन्तवाद से पूंजीवाद के रास्ते  ‘जमी हुई संक्रमण-अवस्था’ में फँसा हुआ है। अर्धसामन्ती समाज से आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण आरम्भ तो हुआ, पर परिपक्व नहीं हुआ। बाहर से सड़कें, पुल, बिजली, मोबाइल और बैंक खाते दिखते हैं; भीतर विश्वसनीय संस्थाएँ, उद्यम-अनुकूल माहौल, पूँजी निर्माण, और भरोसेमन्द सार्वजनिक सेवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं। राजनीति में चेहरों और गठबन्धनों का का बनना  होता रहता है, पर संरचनात्मक सुधार अक्सर आधे रास्ते में अटक जाते हैं। नतीजा यह कि सत्ता बदलती है, पर राज्य की सामर्थ्य को मुक्त करने वाली मशीनरी ठीक-ठाक नहीं चल पाती। इसी संक्रमण का एक राजनीतिक परिणाम यह है कि नागरिक और राज्य के बीच टिकाऊ संस्थान पर्याप्त मजबूती से खड़े नहीं हो पाते हैं। कुशल नगरपालिका, पेशेवर पुलिस-प्रशासन, जवाबदेह स्कूल-स्वास्थ्य प्रणाली, नियमन का निष्पक्ष क्रियान्वयन में चूक हो जाती है। इस खाली जगह में दलाली की एक संस्कृति पैदा हो जाती है। आरम्भ में एक समुदाय-आधारित नेतृत्व बनता है लेकिन समय के साथ यही दलाली, सिफारिश, रेंट-सीकिंग और शक्ति-प्रदर्शन के गठजोड़ में बदलता है। लाभार्थी योजनाएँ, ठेके, स्थानान्तरण, केस-डायरी जैसी साधारण सुविधाएँ भी  ‘सेवा’ से ‘सुविधा-शुल्क’ की भाषा में बदल जाता है। लोगों का भरोसा क्षीण होता है और उसके स्थान पर भय, एहसान और लेन-देन की राजनीति आकर बैठ जाती है। अर्थव्यवस्था भी इसी तर्ज पर बोलती है।  निवेश करने में लोग झिझकते हैं,  उद्योगों का लगना मुश्किल होता है। कर्ज  से ही सही पूँजी आती तो है लेकिन उत्पादन में लगने के बदले अनावश्यक खर्चें में लग जाता है। एक छोटा सा वर्ग इसका ज्यादा से ज्यादा हिस्सा समेट लेता है और उसका उपयोग राज्य की जगह दिल्ली  और मुम्बई में करता है। यह ‘ब्लैक होल’ जैसा चक्र गढ़ता है—धन भीतर आता तो है, पर स्थानीय उत्पादकता को नहीं बढ़ा पाता है। जितना भी पैसा अर्थव्यवस्था में लगाया जाता है सब उस ब्लैक होल में खो जाता है।  समाज में यह ठहराव एक दूसरी बेचैनी पैदा करता है। सूक्ष्म स्तर पर गतिशीलता दिखती है। पहली पीढ़ी को पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति, पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी, ई-गवर्नेंस के छोटे-छोटे सुधार, प्रवास की कमाई का घर-परिवार पर असर से विकास होता दिखता तो है लेकिन इसकी एक सीमा होती है। इसमें विस्तार नहीं पाने से समाज में एक बैचैनी भी होती है। आधी बनी-आधुनिकता की असुरक्षा में समुदाय-आश्रित पहचानों के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है।  वे एकरूपता का आश्वासन देती हैं, पर समाज को परिवर्तन की राह पर जाने से रोकती भी हैं। परिणाम यह कि रोजगार, स्कूल, अस्पताल, औद्योगिक फीडर, और सस्ती वित्त-व्यवस्था जैसे आवश्यक मुद्दे जातीय आक्रामक प्रतीकों के शोर में खो  जाते हैं।   यही वह पृष्ठभूमि है जिस पर चुनाव 2025 की राजनीतिक रचना उभरती है। सबसे बड़ी कहानी एक नये सामाजिक-जातीय गठबन्धन की स्थिरता है जिसमें ऊँची जातियाँ, अति पिछड़ा समूह, दलित-वंचित समूहों का एक हिस्सा और हिन्दुत्व-प्रेरित युवा-विमर्श एक साथ आते हैं। यह गठबन्धन केवल अंकगणित नहीं, भौगोलिक फैलाव और संगठनात्मक अनुशासन के कारण निर्णायक बनता है। दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल का आधार, जो मुख्यतः यादवों और मुसलमानों के एक हिस्से में सिमटे रहने के कारण सीटों में रूपान्तरित होने में पिछड़ जाता है। वोट प्रतिशत स्थिर रह सकता है लेकिन  विपक्षी खेमे के पास अधिक व्यापक, परतदार और समन्वित गठबन्धन होने के कारण सीटों में गिरावट आयी है। यादव-प्रधान नेतृत्व की सीमा स्पष्ट होकर उभरी है। गैर-यादव पिछड़ों, अति पिछड़ों और दलित समूहों के भीतर यादव वर्चस्व के विरुद्ध असन्तोष राजनीतिक रूप लेकर सामने आता है। अनेक सीटों पर राजद की हार कम अन्तर से होती है, यानी सामाजिक गठबन्धन तो बचा है लेकिन उससे ही निर्णायक बढ़त नहीं मिल पाती है।   मुस्लिम–यादव (एमवाई) गठबन्धन, जो मण्डल के बाद संसदीय राजनीति  की  सबसे प्रभावशाली  संरचना था, इस चुनाव में संकटग्रस्त दिखा। मुस्लिम समाज में ‘सिर्फ सुरक्षा नहीं, प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व’ की माँग प्रबल हुई है। सीमांचल जैसे क्षेत्रों में वैकल्पिक मंचों की मौजूदगी ने इस आकांक्षा को भौगोलिक और भाषायी आकार दिया। ऐसा नहीं है कि सभी चुनाव क्षेत्रों में मुस्लिम समुदाय अपना प्रतिनिधित्व खोज रहा हो, लेकिन इस माँग का उभार साफ दिखता है। उन्हें अब प्रतीकात्मकता से आगे, भागीदारी और निर्णय-प्रक्रिया तक पहुँच की इच्छा है। दूसरी ओर यादव समाज में भी गठबन्धन की के प्रति  सन्देह उभरतने लगा है , विशेषकर तब जब स्थानीय हित और जातीय आवेग टकराते हैं। कुल मिलाकर, एमवाई की पुरानी सहजता में कमी आयी है। राजद के लिए यह केवल इस बार के चुनाव का नहीं बल्कि अस्तित्व  का  संकट है।  उसे गैर-यादव पिछड़ों, अति पिछड़ों,  दलितों और महिलाओं को वास्तविक सहभागी बनाते हुए सामाजिक न्याय की व्यापक साझी परियोजना गढ़नी होगी—नहीं तो गठबन्धन का सामाजिक आधार और सिकुड़ेगा। कॉंग्रेस की स्थिति इस चुनाव में ज्यादा दयनीय हुई है। उसकी राजनीतिक उपस्थिति कुछ खास इलाक़ों तक ही  सीमित है और संगठनात्मक रूप से वह अपनी स्वायत्त आधार खो चुकी है। लम्बे समय से वह राजद की छाया में चलती रही; नतीजा यह कि न कोई मजबूत काडर कायम हो पाया, न छात्र-युवा राजनीति की  कोई पहल हो पायी, ना ही  पंचायत-वार्ड स्तर पर जड़ों का पुनर्निर्माण हो पाया। केवल टिकट-वितरण और सीट-समझौतों से पुनर्जीवन नहीं होता; दस-पंद्रह वर्ष के धैर्यपूर्ण संगठन-निर्माण, छोटे जिलों में वैचारिक संवाद, स्थानीय आन्दोलनों में भागीदारी और सामाजिक गठबन्धन के नये सूत्रों की मेहनत चाहिए। बिना इसके ‘स्वायत्तता’ कागज पर रह जाएगी। ऊपर से कॉंग्रेस में सीटों के बँटवारे को लेकर हमेशा ही एक आरोप लगता है जिसका दुष्प्रभाव चुनाव पर भयंकर रूप से पड़ता है।  जदयू और नीतीश कुमार की भूमिका यहाँ केन्द्रीय है। उनके अस्वस्थ होने की खबर या गठबन्धन के अन्दर की दरार की बातें बेबुनियाद  निकलीं या यों कहें कि उसका कोई प्रभाव नहीं रहा।  नीतीश का सबसे बड़ा योगदान अति पिछड़ा वर्ग को  एक संगठित, जागरूक और हित-सचेत राजनीतिक समुदाय के रूप में गढ़ना है। आरक्षण का सूक्ष्म उपयोग, पंचायतों में महिलाओं और अति पिछड़ा वर्गों का प्रतिनिधित्व, साइकिल-छात्रवृत्ति जैसे प्रोत्साहन, शराबबन्दी के जरिए घरेलू हिंसा और नशे पर कठोर संकेत, और प्रशासनिक साधनों से रोजमर्रा की समस्याओं पर हस्तक्षेप—इन सबने मिलकर उनके लिए स्थायी भरोसा पैदा किया। यही भरोसा भाजपा के साथ मिलकर एक व्यापक गठबन्धन में बदला, जिसने ऊँची जातियों और गैर-यादव पिछड़ों को साथ जोड़कर एक प्रकार का बहुमत निर्मित किया। नीतीश के बाद कौन का प्रश्न अब भी प्रासंगिक है: क्या जदयू अपनी आन्तरिक संरचना को इस तरह ढालेगा कि अति पिछड़ा  समुदाय से व्यापक स्वीकृति वाला नेतृत्व उभरे? क्या दलित नेतृत्व, जो एलजेपी और माँझी के हम जैसे दलों के जरिए अधिक मुखर है, अगली पंक्ति में जगह बनाएगा? या भाजपा अपने भीतर अति पिछड़ा और दलित चेहरों को समाहित करते हुए एक पार्टी के वर्चस्व का ढाँचा स्थापित करेगी? बिहार की बहुस्तरीय सामाजिक संरचना को देखते हुए एक-दलीय प्रभुत्व कठिन है, पर एक प्रभावशाली स्थायी गठबन्धन का बनना  सम्भव दिखता है। एक बात साफ है। राज्य के प्रयासों से लड़कियों की पढ़ाई बढ़ी, कुपोषण घटा, प्रवासी परिवारों को राहत मिली, छोटे उपभोग में बढ़ोतरी हुई और महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति भी बढ़ी। यही आधार है, इसलिए बिहार में आकांक्षा की आवाज ऊँची है। पर यह आधार है, इंजन नहीं। तेज विकास के लिए नयी मूल्य-सृजन जरूरी है जिसमें मिड-टेक/मिड-स्किल सप्लाई चेन, स्थानीय उद्योग, सहकारी उद्यम, कृषि प्रसंस्करण, छोटे इंजीनियरिंग सामान और कोल्ड-चेन को बनाया जाना शामिल है। अगर यह नहीं बना, तो कर्ज़ बढ़ेगा, नए वादे पुराने दायित्वों से टकराएँगे और रिसाव पैसा-भरोसा दोनों खोएगा। तब नागरिक सोचते हैं कि राज्य कुछ कर पाएगा? धीरे-धीरे मानने लगते हैं—शायद नहीं, जब तक किसी संरक्षक से न जुड़ें। यही ढलान “मोरल इकॉनमी” को “मोरल पैनिक” में बदल देती है, कल्याण पर प्रतिक्रिया बढ़ती है, कमजोरों पर शक गहराता है और ध्रुवीकरण तेज होता है। इसी पृष्ठभूमि में  प्रशान्त किशोर की राजनीति को समझा जा सकता है। उनकी विशेषता है असाधारण फील्ड-स्टैमिना और बातों में स्पष्टता। उसकी सभाएँ किसी कॉलेज की कक्षा जैसी होती थीं जिसमें चार्ट और  तर्क से  रोजमर्रा के जीवन में  सुधारों की ठोस भाषा होती थी। इस बदलाव के परिदृश्य में वे शान्त उभार का दृश्य चेहरा हैं। प्रवासी परिवारों, छोटे व्यापारियों, अनुबन्ध शिक्षकों, आशा-आंगनवाड़ी कर्मियों और कॉलेज-युवाओं में व्यवस्था-केन्द्रित राजनीति की चाहत को समेटने का प्रयास के प्रतिनिधि हैं। लेकिन उनके चुनाव प्रबन्धक होने के  अतीत की छाया, ‘क्लासरूम’ टोन का दंभ, और संगठन की प्रबन्धकीय-केन्द्रियता के कारण लोगों का विश्वास उन पर जमा नहीं। उनके समर्थक कहते हैं कि दशकों की परफ़ॉर्मेटिव राजनीति को तोड़ने के लिए इसी किस्म की जिद और अनुशासन चाहिए। दोनों बातें अंशतः सही हैं। प्रशान्त किशोर ने विमर्श को विस्तृत तो किया है, पर उसे जड़ तक उतारने के लिए संगठन, नीति और संस्थागत शुचिता की दूसरी मंज़िल अभी बाक़ी है। गाँधी का नाम तो लेते हैं लेकिन गाँधी जैसा जीवन, वैसी संवाद क्षमता और उतनी शुद्धता लानी अभी बाँकी है।  बिहार जिस जातीय राजनीति और पिछड़ेपन के चक्रव्यूह में फँसा है, उसे तोड़ने के लिए तीन बड़ी शर्तों को साफ-साफ समझना होगा। पहली शर्त है संगठन का लोकतान्त्रिक पुनर्निर्माण। इसका मतलब है—जिला और ब्लॉक इकाइयों को वास्तविक स्वायत्तता मिले, आन्तरिक चुनाव समय पर और निष्पक्ष हों, पैसों का पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक रहे, फैसले खुली और पारदर्शी प्रक्रिया से हों, और नेतृत्व समय-समय पर बदलता रहे ताकि एक ही समूह की जकड़न न बने। ‘सलाहकार-नियन्त्रित’ पार्टियों की जगह ऐसे जीवन्त मंच खड़े किए जाएँ जो लोगों को सीखने और भागीदारी का अवसर दें—जैसे ‘राजनीति के विद्यालय’, ‘सहकारी उद्यम-प्रयोगशाला’ और ‘नागरिक मंच’—क्योंकि यही संरचनाएँ भरोसा लौटाती हैं और संगठन को जनता के निकट लाती हैं।  दूसरी शर्त है कार्यक्रमों में सटीकता और नाप-तौल। केवल ‘रोजगार’ कहना नारा है, पर ठोस योजना यह है कि फीडर-24 बिजली की गारंटी के साथ छह गारमेंट क्लस्टर बनाए जाएँ, कौशल से जुड़ी सिंगल-विंडो व्यवस्था दी जाए, अधिक रोजगार उत्पन्न करने वाले उद्यमों को स्पष्ट प्रोत्साहन मिले और गुणवत्ता-प्रमाणन में सरकारी सहयोग सुनिश्चित हो। ‘महिला सशक्तिकरण’ केवल नारा न हो बल्कि  डेयरी, मत्स्य, मसाला-प्रोसेसिंग और ईको-ब्रिक जैसे क्षेत्रों में महिला उत्पादक-कम्पनियाँ बनाई जाएँ, उनके लिए ₹1000 करोड़ का समर्पित फण्ड रखा जाए और पोषण योजनाओं से गारंटीड ऑफ-टेक दिया जाए ताकि बाजार का जोखिम घटे। “उद्योग” कहना एक जुमला मात्र है, पर नीति यह है कि स्थानीय खरीद को स्पष्ट प्रोत्साहन मिले और कर-वापसी पारदर्शी तथा समय-बद्ध तरीके से हो। तीसरी शर्त है भ्रष्टाचार-विरोध को घटना नहीं, तन्त्र का विषय बनाना। सभी सरकारी खरीद ई-प्रोक्योरमेंट से हो और उसका रीयल-टाइम डैशबोर्ड सार्वजनिक रहे; सतर्कता इकाइयाँ स्वतन्त्र हों और समय-सीमा में कार्रवाई करें; हित-संघर्ष का खुलासा अनिवार्य हो; हर ब्लॉक में नागरिक-ऑडिट दिवस तय हो; लोकायुक्त इतना मजबूत हो कि उसे हटाने के लिए विशेष बहुमत चाहिए। और एक सीमित ‘अमनेस्टी विंडो’ चलाई जाए, जिसके तहत पहले से जमा किए हुए काले धन को राज्य  के भीतर और उत्पादक निवेशों में लगाया जाये तो  टैक्स तो लगे लेकिन दण्डित नहीं किया जाये। इससे मरी पड़ी पूँजी को जीवित रोजगार में बदलना सम्भव हो पाएगा।  ध्रुवीकरण की राजनीति को कमजोर करने के लिए साझा-लाभ वाली परियोजनाएँ आवश्यक हैं, क्योंकि जब राजनीति ‘नॉन-ज़ीरो गेम’ दिखाती है। इसमें  सबके हिस्से में कुछ सकारात्मक आता है तो पहचान-आधारित उद्यमियों की जमीन स्वतः कमजोर पड़ती है। बिहार के लिए सबसे आशाजनक साझा-लाभ वही मध्य-स्तरीय टेक–स्किल–कैपिटल आपूर्ति-शृंखलाएँ हैं जो रिश्तेदारी से परे भर्ती करती हैं, स्थिर बिजली और भरोसेमन्द लॉजिस्टिक्स पर टिकती हैं, और नियम-पालन का तुरन्त प्रतिफल देती हैं। इसके साथ ‘बिहार डायस्पोरा बॉन्ड’ और जिला-स्तरीय एसपीवी बनाए जा सकते हैं, जिनमें प्रवासी सुरक्षित रूप से सामूहिक निवेश कर सकें—इससे रिमिटेंस को पूँजी निर्माण की धारा में मोड़ा जा सकेगा और स्थानीय उद्यमों को दीर्घकालीन सहारा मिलेगा। अन्ततः व्यवस्थित  प्रशासन ही लोकतन्त्र की रोजमर्रा की आस्था बनाता है। सब-रजिस्ट्रार दफ्तर में आधे घंटे में दख़ल-खारिज हो, थाने में बिना दलाली ई-एफआईआर  दर्ज हो, पीएचसी का दवा-स्टॉक ऑनलाइन दिखे, आयीटीआयी का प्लेसमेंट डैशबोर्ड सार्वजनिक हो, ग्रामसभाओं की बैठकें लाइव-स्ट्रीम हों। ये सब ‘एड-ऑन’ नहीं, वही रोजमर्रा के रूटीन हैं जिनसे राज्य नागरिक के समय और सम्मान का असली आदर सीखता है और भरोसा कमाता है। इस व्यापक विमर्श के बीच चुनाव-विश्लेषण का सूक्ष्म पक्ष भी उतना ही स्पष्ट रहना चाहिए। बिहार में जिस तरह का बहुमत उभरा है उसकी क्या सम्भावनाएँ हैं? ऊँची जातियों, अति-पिछड़ों और दलित–वंचित समूहों के एक हिस्से के समन्वय से बनता है, और उसमें हिन्दुत्व-प्रेरित युवा-विमर्श भावनात्मक गोंद जो सरकार बनी है क्या उसमें बिहार के विकास की सम्भावनाएँ हैं? अन्ततः स्वीकार करना होगा कि बिहार की तात्कालिक जीत–हार से बड़ी कहानी उसकी संस्थागत अर्थव्यवस्था और नागरिक गरिमा की है। यदि शासन-संरचना इस क्षण को अवसर मानकर संस्थागत सुधार, ईमानदार प्रशासन, स्थानीय उद्यमिता, महिला-उत्पादक कम्पनियों, क्लस्टर-आधारित औद्योगिकीकरण, प्रवासी निवेश और पारदर्शी वित्त-शासन में बदल देती है, तो बिहार सचमुच ‘टेक-ऑफ’ से ‘उड़ान’ में प्रवेश करेगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो भारी बहुमत भी केवल शासन-प्रबन्धन का आवरण बनकर रह जाएगा, जिसके भीतर आर्थिक ठहराव, पूँजी-पलायन और सामाजिक असन्तोष क्रमशः गहराते जाएँगे। जनता ने स्थिर, अनुशासित और बहुस्तरीय गठबन्धन को प्राथमिकता दी है; यह प्राथमिकता तभी लोकतान्त्रिक गहराई में बदलेगी जब राज्य रोजमर्रा में विश्वास अर्जित करेगा—स्कूल में समय पर अध्यापक, अस्पताल में औषधि, थाने में ई-एफआईआर , बैंक में सस्ता ऋण, पंचायत में लाइव ग्रामसभाएँ, और नागरिक के मन में यह भरोसा कि लोकतन्त्र केवल भाषण नहीं, बल्कि व्यवस्था है। यदि यह हुआ, तो ‘जमी हुई संक्रमण-अवस्था’ पिघलेगी; यदि नहीं, तो इतिहास फिर किसी अगली पीढ़ी से वही धैर्य माँगेगा जो आज हमसे माँग रहा है—इच्छा बिना डिजाइन, जुनून बिना पाइपलाइन, भूमिका-गीत बिना नाटक। यही बिहार 2025 का सबसे मौलिक अर्थ है और यही वह चुनौती भी, जिसे अब स्वीकार करना होगा।

Show More

मणीन्द्र नाथ ठाकुर

लेखक समाजशास्त्री और जे.एन.यू. में प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919968406430, manindrat@gmail.com
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x