Tag: sonia rahul priyanka

चर्चा मेंराजनीति

दिशाहीनता काँग्रेस को ले डूबेगी

 

     वर्तमान काँग्रेस में न आदर्श की प्रेरणा बची है, न संघर्ष की क्षमता। केंद्र में सत्ता-वापसी दूर खिसकती जा रही है और राज्यों में जनाधार सिकुड़ता जा रहा है। परिणामस्वरूप संगठन पर नेतृत्व का प्रभाव घट रहा है और अनुशासन शिथिल हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों में ‘नेतृत्व’ बनाम ‘असंतुष्ट’ का अंतर्द्वंद्व विघटन के स्तर पर पहुँच गया है। ऐसे में जब संक्रमण के मौके आते हैं तब असंतुष्टों द्वारा नेतृत्व पर दबाव की गतिविधि तेज़ हो जाती है। समस्या यह है कि नेतृत्व अनेक कारणों से अक्षम हो चुका है और संगठन को जनतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए खोलने को तैयार नहीं है। याद रखें कि यह वही काँग्रेस है जिसमें गाँधी की इच्छा के विरुद्ध नेहरू तक ने सुभाषचंद्र बोस को अध्यक्ष निर्वाचित कराया था। आज उसी नेहरू के परिजन काँग्रेस में नेतृत्व का पर्याय हैं और बिना जनतान्त्रिक चुनाव के लगातार चुन लिए जाते हैं।

     नतीजा यह कि वफ़ादारों को अवसर मिलते हैं और असंतुष्टों को उपेक्षा। साधारण कार्यकर्ता से नेतृत्व का फासला बढ़ता है। उपेक्षा के कारण बहुत-से नेता दूर चले जाते हैं और असम की तरह काँग्रेस को सत्ता से दूर करने का कारण बन जाते हैं। स्वभावतः नेतृत्व की प्रभाव क्षमता कमतर होती जाती है। इस अक्षमता का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि मोदी शासन से उपजे असंतोष, मोहभंग और निराशा को समझने या उसे विकल्प देने में काँग्रेस असफल हो गयी है। बहुत-से नेता केंद्र या राज्यों में सत्ता मिलती न देखकर संघटन के भीतर ही लाभ की स्थितियाँ पाने के उपाय में लगे हैं। हाल में इसके दो बड़े उदाहरण देखे गए। गुलाम नबी आज़ाद ने राज्यसभा से अवकाश के बाद जम्मू-कश्मीर काँग्रेस की प्रचार समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और अब आनंद शर्मा ने हिमाचल प्रदेश चुनाव की संचालन समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। दोनों नेताओं को काँग्रेस में अपनी उपेक्षा से शिकायत है।

गुलाम नबी आजाद आनंद शर्मा

    यह अद्भुत उपेक्षा थी कि दोनों नेता अपने-अपने प्रदेश में पार्टी की प्रचार समिति और संचालन समिति के अध्यक्ष बनाए गए थे! उपेक्षा का अर्थ है कि उन्हें राज्यसभा में फिर नहीं भेजा गया। सत्ता से बाहर पार्टी के पद वैसे लाभकर नहीं हैं जैसे राज्यसभा की सदस्यता। मतलब साफ है। ये नेता अपनी ऊँची पहुँच के कारण निरंतर लाभ के दावेदार बनकर पार्टी में रह सकते हैं, संघर्ष करने की योग्यता प्रदर्शित करके नहीं। जिस काँग्रेस ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया था, जिसके लाखों कार्यकर्ता जेल गए थे, जिसने करोड़ों भारतवासियों को प्रेरित किया था, वह इतिहास में खो गयी है।

     संघर्ष बिना आदर्श के नहीं होता। काँग्रेस को अन्तिम बार आदर्श की प्रेरणा इन्दिरा गाँधी ने दी थी। साठोत्तरी दौर में जब नेहरू-युग से मोहभंग और पूँजीवादी विकासनीति से असंतोष ने आठ राज्यों में काँग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था, तब स्वतन्त्रता आन्दोलन की विरासत और नेहरू के स्वप्निल समाजवाद की चमक के साथ इन्दिरा गाँधी ने भारतीय राजनीति को ही नहीं, काँग्रेस की संभावनाओं को भी पुनर्जीवन दिया था। याद रखना चाहिए कि इन्दिरा गाँधी के लोकव्यापी प्रभाव का स्रोत जिन बातों में है, उनका सम्बन्ध संघर्ष के इतिहास और वामपंथी झुकाव से है। काँग्रेस के दक्षिणपंथ से इन्दिरा गाँधी का संघर्ष अविस्मरणीय है। राजाओं के प्रिवीपर्स का समापन उनके सामंत-विरोधी कार्य का प्रतीक है, बैंकों का राष्ट्रीयकरण ‘समाजवाद’ (वास्तव में राजकीय पूँजीवाद) का द्योतक है और अमरीका की शह पर पाकिस्तान द्वारा भारत से बारंबार उलझाव को बांग्लादेश युद्ध में अन्तिम निर्णय तक पहुँचा देना—स्वयं पाकिस्तान को विखंडित करके एक नए बंगाली राष्ट्र को जन्म देना उनका साम्राज्य-विरोधी कार्य था। इस प्रकार उन्होंने नेहरू की ‘मिश्रित’ अर्थव्यवस्था को वामपंथी रुझान दिया और ‘गुटनिरपेक्षता’ को साम्राज्यवाद विरोधी अंतर्वस्तु प्रदान किया।

    जनता में संघर्ष की प्रेरणा तब आती है जब नेतृत्व में आदर्श और बलिदान की झलक मिले। 1977 में आपातकाल के बाद सत्ता से बाहर होने पर इन्दिरा गाँधी ने जीवट का परिचय दिया और अपने संघर्ष से फिर लोकप्रियता अर्जित की। लेकिन आज़ादी के तीस साल बाद केंद्र में सत्ता सँभालने वाले विपक्ष में तात्कालिक एकता ज़रूर हो गयी थी, कोई नीतिगत एकता नहीं थी। जनता पार्टी के घटक दलों में लोहिया के अनुयाई समाजवादी थे, सांप्रदायिक दक्षिणपंथ की प्रतिनिधि जनसंघ भी थी; धनी किसानों की प्रतिनिधि लोकदल थी, राजाओं की हितकारी स्वतंत्र पार्टी भी थी। इन विविध हितों के बीच सामंजस्य नहीं था। स्वभावतः नीतिगत मसलों पर जनता पार्टी का विघटन हुआ। जॉर्ज फर्नांडीज़ और हेमवती नन्दन बहुगुणा ने आरएसएस और जनता पार्टी की “दोहरी सदस्यता” का प्रश्न उठाकर वैचारिक टकराहट तेज़ कर दी थी। सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी ने देश के विकास का नक्शा बनाने पर नहीं, काँग्रेस को नेस्तनाबूद करने पर सारा ध्यान केन्द्रित किया। तब तक चुनाव हारने के बावजूद काँग्रेस का न जनाधार खत्म हुआ था, न उसके नेताओं का लोक-प्रभाव।

    स्वभावतः 1980 में इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में काँग्रेस की सत्ता में वापसी हुई। यह वापसी प्रतिशोध की राजनीति और दिशाहीन कार्यक्रम की प्रतिक्रिया का नतीजा थी। लेकिन इन्दिरा गाँधी ने इस बार 1967-68 की तरह कोई प्रगतिशील कार्यक्रम नहीं दिया था। रुद्राक्ष की माला पहने मंदिरों की यात्रा से हिन्दुत्व की तरल छटा का उपयोग पहली बार इन्दिरा गाँधी ने ही किया। नीतिगत स्तर पर वामपंथी रुझान को वे तिलांजलि दे चुकी थीं। विडम्बना यह थी कि अपने ‘समाजवादी’ दौर में भी इन्दिरा गाँधी की काँग्रेस पूँजीवादी नीतियों पर ही चल रही थी जिनके कारण भारतीय समाज और राजनीति पर संकट में बादल घिरे। खुद आपातकाल की घोषणा दोनों प्रकार के संकटों का परिणाम था। इसीलिए आपातकाल में एक ओर नागरिक अधिकारों का दमन हुआ, दूसरी ओर राष्ट्रवादी भावनाओं का उपयोग हुआ; (बी इंडियन बाई इंडियन), उस राष्ट्रवाद को इन्दिरा गाँधी में मूर्तिमान किया गया (इन्दिरा इज़ इंडिया); एक ओर सामंत विरोधी 20-सूत्री कार्यक्रम घोषित हुआ, दूसरी ओर पूँजीपतियों को प्रोत्साहन देते हुए बोनस कटौती अध्यादेश जारी हुआ।

    सत्ता में वापसी के बाद 1980 में काँग्रेस इसी रास्ते पर चली। आर्थिक नीतियों में एकाधिकारी पूँजीवाद के हित साधते हुए उसे यह ध्यान नहीं रहा कि राजनीतिक एकाधिकार का युग बीत गया है। इसमें संदेह नहीं कि स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास से जुड़ी सौ साल पुरानी पार्टी का जनाधार एकाएक खत्म नहीं हो सकता था। लेकिन एकाधिकारी पूँजीवाद के विकास ने आर्थिक परिदृश्य ही नहीं बदला था, सामाजिक आकांक्षाएँ भी बदल दी थीं। 1984 में खालिस्तानी आतंकवादी साजिश में सिख सुरक्षाकर्मी के हाथों इन्दिरा गाँधी की शहादत ने राजनीतिक गतिविधियों में आकस्मिक परिवर्तन ला दिया। जनता में यह धारणा बद्धमूल थी कि खालिस्तानी आतंकवाद को अमरीका संरक्षण दे रहा है, उसका उपयोग करके भारत को विखंडित करना चाहता है। इन्दिरा गाँधी की हत्या अमरीका की इसी योजना का अंग था। लेकिन इन्दिरा गाँधी के परिदृश्य से हट जाने के बाद साम्राज्यवाद विरोधी भावधारा काँग्रेस में शिथिल पड़ने लगी।

वर्तमान काँग्रेस

     राजीव गाँधी को सहानुभूति का लाभ मिला लेकिन उन्होंने तीन दिनों तक सिखों का कत्लेआम चलने दिया। यह विवेक नहीं रहा कि जनता की देशभक्ति को साम्राज्य-विरोधी रूप देने के बदले धार्मिक द्वेष में परिवर्तित करना आत्मघाती और देशघाती होगा। लेकिन राजनीतिक प्रशिक्षण से दूर रहे राजीव गाँधी को यह समझ नहीं थी। उन्हें भ्रम था कि सिख-विरोधी उन्माद ने विशाल बहुमत दिया है। इसलिए आगे चलकर उन्होंने मुस्लिम और हिन्दू संप्रदायवाद को इस्तेमाल करने की गफलत की। शाहबानो के गुज़ारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायसंगत फैसले को संसद में पलटकर उन्होंने मुल्लाओं-मौलवियों को मुस्लिम समाज का ठेकेदार बना दिया। इससे सेकुलर और आधुनिक चेतना के मुस्लिम अपने समाज में हाशिये पर चले गए। फिर इसे संतुलित करने के लिए अयोध्या में राममन्दिर का ताला खुलवाकर हिंदुत्ववादी राजनीति का द्वार खोल दिया। इससे बहुस्ङ्खयक उन्माद का आरंभ हुआ जिसने न केवल छह सौ साल पुरानी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया बल्कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति को भी गंभीर क्षति पहुँचायी।

    परिणाम सामने है। देश एक अंतहीन सुरंग में जा फँसा है। जब तक गठबंधन राजनीति का दौर चला, तब तक आशा रहती थी कि किसी चुनाव में काँग्रेस को लाभ मिलेगा और नेताओं का भाग्य चमकेगा। लेकिन जैसे-जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभुत्व सत्ता के तंत्र और राजनीतिक-संवैधानिक संस्थाओं पर सुदृढ़ होता जा रहा है, वैसे-वैसे काँग्रेस की आशाएँ धूमिल होती जा रही हैं। राज्यों में नए ढंग की क्षेत्रीय पार्टियाँ जनता को अधिक आकर्षित कर रही हैं। ज़ाहिर है, सत्ता के लाभ उठाने की आदत वाले काँग्रेसी नेता बेचैन हैं। इसलिए उनमें अनुशासन और समर्पण के बजाय ‘महत्व’ की आकांक्षा ज़ोर मारती है। इसी बीच भाजपा की दो निर्णायक समितियों से नितिन गडकरी बाहर किए गए हैं। वे सबसे योग्य मंत्रियों में माने जाते हैं। उन्हें संघ का करीबी भी समझा जाता है। लेकिन उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी। एक डूबते जहाज़ और आगे बढ़ते कारवाँ में यही अंतर है। काँग्रेसियों को लगता है कि कुछ नहीं तो राज्यसभा की सदस्यता ही सही!

   आश्चर्य की बात है कि ये नेता काँग्रेस की विचारधारा में निष्ठा का वचन भी देते हैं। जिन्हें अपने ही स्वाधीनता संघर्ष की विरासत का बोध नहीं है, न अपना जनाधार है, न कोई आदर्श की प्रेरणा और संघर्ष का हौसला है, वे नेतृत्व के उपग्रह बनकर कुछ पाना भी चाहते हैं और नेतृत्व को धौंस भी दिखाना चाहते हैं। उनकी हताशा क्षेत्रीय दलों के आविर्भाव से और बढ़ रही है। ये नए प्रकार के क्षेत्रीय दल जाति-आधारित अस्मिता पर नहीं खड़े हैं, बिजली, पानी, स्वस्थ्य, शिक्षा के जन-हितकारी मुद्दों पर चलते हैं। लेकिन इन दलों की राजनीति अस्पष्ट है। न सांप्रदायिकता पर उनके विचार खुलते हैं, न साम्राज्यवाद पर। इसलिए मोदी उन्हें आसानी से रेवड़ी संस्कृति कहकर बदनाम करते हैं। इसकी काट वामपंथ के अलावा काँग्रेस के पास थी लेकिन वह खुद बिखर रही है

.