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श्याम सिंह रॉय
सिनेमा

श्याम सिंह रॉय : ‘स्त्री किसी की दासी नहीं; भगवान की भी नहीं’

 

तेलगु मूल की फिल्म ‘श्याम सिंह रॉय’ का यह संवाद आपको फ़िल्म देखने के लिए आकर्षित कर सकता है। अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ फिल्म को हिन्दी पट्टी में भी खूब पसन्द किया जा रहा है कारण इसका रहस्य और रोमांच से भरा इसका विषय है ‘पुनर्जन्म’। विज्ञान और तकनीक के इतने विकास के बाद भी ‘पुनर्जन्म’ की संकल्पना अनसुलझी पहेली है, अत: पुराना विषय होते हुए भी रहस्य और जिज्ञासा फिल्म का आकर्षण है।

‘पुनर्जन्म’ के ताने-बाने और देवदासी पृष्ठभूमि पर बनी यह रोमांटिक फिल्म अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। वासु जो कि एक संघर्षरत फ़िल्म लेखक व निर्देशक है अपने कैरियर का आरम्भ एक सफल लघु फिल्म से करता है, उसकी सफलता उसे मुख्य सिनेमा में भी पहचान दिलवाती है, बहुत धीमी गति से प्रारम्भ फिल्म में रोचकता तब आती है जब वासु पर प्लैज़िरिज्म यानी साहित्यिक चोरी का आरोप लगता है, दर्शक को लगता है कि फ़िल्म बिलकुल नये विषय के साथ कहानी को आगे बढ़ाएगी क्योंकि डिजिटल युग में साहित्यिक चोरी यानी प्लैज़िरिज्म जैसा मुद्दा महत्त्वपूर्ण और चिंता का विषय है जिस पर अंकुश लगाना लगभग असंभव है, फिर फ़िल्मी दुनिया में तो यह आम बात है जिसका ज्यादातर पता भी नहीं चलने दिया जाता।

खैर यह तथ्य मूल कहानी के सिरे को जोड़ने के लिए अनिवार्य था, इसलिए निराशा नहीं होती। प्लैज़िरिज्म के आरोप में उसे प्रेस कॉफ्रेंस से ही गिरफ्तार कर लिया जाता है, कोर्ट के दृश्य जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं कि अब क्या होगा?

बंगाल के प्रसिद्ध एस. आर. पब्लिकेशन का फिल्म लेखक और निर्देशक वासु पर आरोप है कि उसने 70 के दशक के प्रसिद्ध लेखक एस. आर. पब्लिकेशन के संस्थापक श्याम सिंह रॉय की कहानी की हूबहू नकल की है, पात्रों के नाम तक बिलकुल वही हैं। उसकी कथा पढ़कर खुद वासु भी हैरान है कि यह कैसे हो सकता है? तो क्या वास्तव में उसने नकल की है? वासु इस आरोप से बार-बार इनकार करता है ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ भी यही स्पष्ट करता है कि उसने कहानी नहीं चुराई फिर सत्य क्या है?

सत्य के कुछ बिंदु हमें एक मनोचिकित्सक द्वारा वासु को हिप्नोटाइज करने के दौरान पता चलते हैं। कहानी रहस्य से पर्दा हटाने के स्थान पर और रहस्यमयी हो जाती है जब हिप्नोटाइज के दौरान वासु कहता है यह 1969 है, और फिर बंगाल का एक गाँव जहाँ से एक नई कथा का आरम्भ होता है लेकिन इतना तो समझ आता है कि यह पुनर्जन्म का कोई खेल है। इस खेल को समझने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी। रहस्य और रोमांच के बीच रोमांस और उनका ख़ूबसूरत दृश्यांकन और फिल्म का उद्देश्य आपको निराश नहीं करेगा, जिसमें स्त्री के सम्मान और गौरव को ‘स्त्री किसी की दासी नहीं; भगवान की भी नहीं’ संवाद के माध्यम से रेखांकित किया जा सकता है।

दूसरे भाग में बंगाल का सांस्कृतिक, सामाजिक और सामन्तवादी परिवेश फिल्म में जीवंत हो उठा है जो फिल्म की सफलता का महत्वपूर्ण कारण है। श्याम सिंह रॉय सामन्तवादी वर्ण व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाता है जिसमें निम्न मानी जाने वाली जाति के लोगों को कुँए से पानी नहीं लेने दिया जा रहा तो श्याम उस आदमी को ही कुँए में फेंक देता है और सामन्ती सवर्णों को धमकी देता है कि ‘अब या तो यही पानी पियो या इनकी तरह प्यासे रहो’ दर्शकों को लगता है कहानी आजकल के दक्षिणी सिनेमा में लोकप्रिय लेकिन ज्वलंत मुद्दे जातिप्रथा, वर्ण व्यवस्था पर आगे बढ़ेगी लेकिन यहाँ भी दर्शक पुन: धोखा खा जाता है बल्कि थोड़ा आगे बढ़ने पर लगता कि फ़िल्म नक्सलवादी जंगलों में लेकर जायेगी लेकिन कहानी का मूल बिंदु देवदासी नायिका मैत्रयी और श्याम सिंह रॉय की प्रेम कहानी है जो अत्यंत रोचकता से आगे बढ़ती है।

पुनर्जन्म पर भारतीय सिनेमा में कई फ़िल्में बनी होंगी, हिन्दी की मधुमती और नीलकमल पुनर्जन्म पर आधारित फ़िल्में थी। मेरे लिए यह फ़िल्म इसलिए ही ख़ास बन गई क्योंकि फ़िल्म ‘देवदासी’ को देव बने सामंतों-महंतो के चंगुल से बचा कर एक मानवी के रूप में स्थापित करने का प्रयास है। फिल्म के कई दृश्य अप्रत्याशित रूप से चौंकाने वाले हैं एक दृश्य जब देवदासी मैत्रयी एक छोटी बच्ची का हाथ थामकर उसे महंत के पास ले जाने का विरोध करती है तब न केवल उसे पीटा जाता है अपितु महंत उस पर पेशाब कर सभी को चेतावनी देता है कि जो भी हमारा विरोध करेगा उसका यही अंजाम होगा।

महंत की घिनौनी हरकत आपके मन में इस प्रथा के प्रति घृणा और विद्रोह जगाती है, उद्देश्य भी यही है। दूसरा जब श्याम सिंह को उसके भाई की बीमारी का पता चलता है तो वह व्यथित हो तुरंत उनसे मिलने पहुँचता है लेकिन वर्ण व्यवस्था के सामाजिक चंगुल फँसा बड़ा भाई यह कह कर उसको छुरा घोंप देता कि उसने देवदासी प्रथा का विरोध कर समाज में उनका जीना मुश्किल कर दिया। गाँव के लोग उनके साथ अछूतों-सा व्यवहार कर रहें हैं। समाज की रुढ़ परम्पराओं कुप्रथाओं के विपरीत दिशा में जाने वालों को इसी प्रकार ‘शहीद’ होना पड़ता है।

सच कहूँ तो मुझे लगा कि देवदासी कुप्रथा 80-90 के दशक में क़ानून बनने के बाद समाप्त हो गई है लेकिन मेरा अंदाजा गलत था। लगभग छठी सदी से प्रारम्भ देवदासी प्रथा का वर्णन मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कालिदास के मेघदूत आदि में उल्लेख मिलता है। दक्षिण भारत की मशहूर शास्त्रीय गायिका भारत रत्न एम.एस. सुब्बालक्ष्मी भी और पद्म विभूषण प्राप्त बालासरस्वती देवदासी समुदाय से हैं। लता मंगेशकर का सम्बन्ध भी देवदासी परिवार से है।

फिल्म में नायक एम.एस. सुब्बालक्ष्मी का जिक्र करते हुए नायिका को इस दलदल से बाहर आने के लिए प्रोत्साहित करता है। देवदासी यानी ‘सर्वेंट ऑफ़ गॉड’ मंदिरों की देखरेख पूजा पाठ की तैयारी, मंदिरों में नृत्य संगीत के लिए तैयार की जाती थी जो आजीवन कुमारी रहकर ईश्वर को अपनी कला समर्पित करती थीं, देवदासी प्रथा के पीछे यह विश्वास प्रचलित प्रचारित किया गया कि देवदासी होने पर गांव में कोई विपत्ति नहीं आती सुख-शांति बनी रहती, कालांतर में आर्थिक विवशता और कमजोर सामाजिक पृष्ठभूमि ने इस प्रथा को विकसित करने में योगदान दिया क्योंकि परिवार और उनके समुदाय से मान्यता मिलने लगी। और यह प्रथा कुप्रथा के रूप में बदल गई। कई भारतीय और विदेशी विद्वानों ने इस देवदासी प्रथा पर शोध पुस्तकें लिखी हैं।

वस्तुतः देवदासी प्रथा हमारे इतिहास और संस्कृति का एक वीभत्स चेहरा है, और कानून बनने के बावजूद यह बड़े दुख की बात है कि धर्म के नाम पर आज भी यह घिनौनी प्रथा जारी है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र आदि राज्यों में यह प्रथा अपने बदले हुए रूप में आज भी स्त्रियों के लिए अभिशाप है। रितेश शर्मा अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘द होली वाइव्स’ में देवदासियों के कटु यथार्थ को हमारे सामने लेकर आते हैं, यह फिल्म कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्य में प्रचलित देवदासियों पर धर्म के नाम पर यौन दासता पर आधारित है जहाँ भगवान के नाम पर स्त्री का शोषण होता है। फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है।

मेनस्ट्रीम सिनेमा में इस विषय पर बात नहीं होता। लेकिन श्याम सिंह रॉय फ़िल्म देवदासी प्रथा पर बंगाल की पृष्ठभूमि पर बात कर रही हैं संभवत: वे जान रहें होंगे कि यदि दक्षिण भारतीय फलक पर इस कुप्रथा को चित्रित किया तो धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर इसे न स्वीकार जाए, इसलिए बंगाल में भी इसे 70 के दशक से जोड़कर पुनर्जन्म की संकल्पना का लाभ लेते हुए प्रस्तुत किया गया है जबकि वास्तविकता है कि 2018 में एक विदेशी गैर सरकारी संस्था और कर्नाटक राज्य महिला विश्वविद्यालय की ओर से की गई स्टडी में कर्नाटक में देवदासियों की संख्या 90,000 पाई गई।

इसी प्रकार 25 अगस्त 2021 की दैनिक भास्कर की एक खबर के अनुसार नेशनल लॉ स्कूल आफ इंडिया यूनिवर्सिटी ऑफ टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के सह लेखक बिनसी विल्सन ने लिखा कि देवदासी प्रथा ‘खुले राज’ जैसी है, पूरे समाज को लड़की के बारे में पता है लेकिन वह इसे अपराध के रूप में नहीं बल्कि इससे सामाजिक संस्था के रूप में देखते हैं, संस्कृति का पूरा हिस्सा इसको स्वीकार किए हुए हैं और जो कानून बने हैं वह लागू नहीं किए।

फ़िल्म ने इस विषय पर न केवल बात की अपितु क्रांतिकारी ढंग से प्रस्तुतिकरण भी दिया लेकिन अफ़सोस जहाँ पुष्पा जैसी मसाला फिल्मों को अति लोकप्रिय बनाया जा रहा है जिसमें नायक ही नायिका का चुम्बन और मुस्कान ख़रीदने की बात कर रहा है, विडंबना ये कि इस कृत्य को नायक की मासूमियत से जोड़ा जा रहा है, स्त्री की विवशता से नहीं। दूसरी ओर स्त्री के सम्मान और स्वातंत्र्य पर बनी श्याम सिंह रॉय जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्म पर बहुत कम बात हो रही है। फिल्म में कई कमियाँ हो सकती हैं जैसे पुनर्जन्म की अवैज्ञानिकता, बावजूद इसके महत्वपूर्ण विषय केंद्र में लाने में फिल्म में बेहतरीन पहल की है, फ़िल्में समाज पर त्वरित प्रभाव डालती है देवदासी जैसी सामाजिक समस्या पर ध्यान केंद्रित करने के लिए फिल्म की प्रशंसा होनी चाहिए।

फिल्मांकन की बात करें तो देवदासी के रूप में साईं पल्लवी आपको मोहित कर देती है अपने नैसर्गिक सौन्दर्य या मधुर मुस्कान के कारण ही नहीं अपितु शानदार अभिनय और नृत्य के बलबूते। उनका सौम्य और स्वाभाविक अभिनय कहानी को विश्वसनीय बनाता है और साथ में नानी का शानदार अभिनय फिल्म में प्राण फूंकने का काम करता है। उस पर कोलकाता का काली मंदिर, उसके भीतर देवदासियों के अंतरमहल उनके आभूषण, वस्त्र, महंत आदि देखकर एक पल को आपको लगेगा कि बंगला फिल्म देख रहें हैं बल्कि नायक नानी ने कुछ संवाद जिस खूबसूरती से बंगला में बोले आप रोमांचित हुए बिना नहीं रह सकते।

श्याम सिंह के मरने के बाद मैत्रयी यानी रोज़ी  एक आश्रम का निर्माण करती है जिसे देवदासी प्रथा के समाधान के रूप में लेना चाहिए। रोज़ी श्याम से प्रश्न करती है कि आपने मुझे तो उस दलदल से निकाल दिया लेकिन बाकी लड़कियों का क्या? श्याम सिंह के दूसरे जन्म के रूप में क्या वासु रोज़ी से मिल पाता है? वह कोर्ट से कैसे बरी होता है? ये सब फिल्म देखकर ही पता चलेगा। खैर यह फिल्म आपको अंत तक बाँधे रखतीं हैं, और स्त्री सम्मान और शक्ति और स्वातंत्र्य को महत्व देने वाली इस फिल्म को देखना एक अच्छा अनुभव रहेगा।

प्लेटफार्म – नेटफ्लिक्स
निर्देशक – राहुल सांकृत्यायन
कहानी लेखक- जंगा सत्यदेव
नानी डबल रोल में हैं उनके साथ साईं पल्लवी व कृती शेट्टी हैं

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