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मुद्दा

#OPS : भारत के लाखों परिवारों का आन्दोलन !

 

जनवरी 2004 में एनडीए सरकार ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेई  के नेतृत्व में सरकारी कर्मचारियों के लिए वर्षों से चली आ रही पुरानी पेंशन योजना अर्थात ओपीएस की जगह शेयर बाजार पर आधारित एक नई पेंशन योजना का अध्यादेश के जरिए शुभारम्भ किया जिसका नामकरण न्यू पेंशन स्कीम अर्थात एनपीएस  रखा गया। 2004 से लेकर 2013 तक अध्यादेश के माध्यम से इस योजना को बनाए रखा गया तत्पश्चात 2013 में यूपीए सरकार द्वारा पीएफआरडीए एक्ट पास कर इस योजना को परमानेंट किया गया।

न्यू पेंशन स्कीम के तहत कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते से 10% हिस्सा काट लिया जाता है और उस हिस्से के बराबर अर्थात 10% रकम सरकार के द्वारा  मिलाकर तीन कम्पनियों में यथा एलआईसी, यूटीआई एवम एसबीआई में बराबर बराबर निवेश कर दिया जाता है, फिर यह कम्पनियाँ इस पैसे को अलग-अलग फण्ड मैनेजर के माध्यम से निवेश करती हैं, जहाँ यह रकम कर्मचारी के रिटायरमेंट तक जमा रहती है।

कर्मचारियों के साथ समस्या यह है कि वे इस सम्पूर्ण 20% रकम को कभी निकाल नहीं सकते , यही नहीं आज 15 साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने कर्मचारियों को इस रकम में से केवल उनके हिस्से का अधिकतम 25% केवल विशेष परिस्थितियों में ही निकालने की छूट दी है, और यह विशेष परिस्थितियाँ भी अत्यन्त अव्यावहारिक हैं। जिसके कारण कर्मचारियों में बेहद रोष है यही नहीं 2004 से पहले सेवा में आए कर्मचारियों की सेवाकाल के दौरान मृत्यु होने पर उसकी फैमिली को फैमिली पेंशन प्राप्त है जबकि 2004 अर्थात एनपीएस लागू होने के बाद सेवा में आए कर्मचारी की सेवाकाल में मृत्यु होने पर उसकी फैमिली को सरकार तभी फैमिली पेंशन देगी जब उसके एनपीएस अकाउंट की समस्त धनराशि सरकार के खाते में जमा कर दी जाएगी।

कर्मचारी इसे हड़प नीति की संज्ञा दे रहे हैं उनका आरोप है कि सरकार कर्मचारी के हिस्से को अनैतिक आधार पर हड़प रही है यही नहीं निवेश की गयी समस्त धनराशि आज ऐसी कम्पनियों में जोखिम उठा रही है जहाँ लगातार घोटाले हो रहे हैं। पिछले वर्ष 15 जनवरी 2019 को आई एल एँड एफ एस नामक कम्पनी में 92000 करोड़ रुपये स्लोडाउन का शिकार हो गये जिसमें 16000 करोड़ रुपये कर्मचारियों के पेंशन फण्ड के थे। जिसकी पुष्टि स्वयं पीएफआरडीए ने की थी। इन समस्याओं के कारण कर्मचारियों की नींद उड़ी हुई है।

उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड के कर्मचारियों का कई हजार करोड़ रुपये जो कि एनपीएस में जमा हुआ था घोटाले का शिकार हो गये। जिसके  विरोध में उत्तर प्रदेश में लाखों कर्मचारी फरवरी 2019 में हड़ताल पर रहे,फलस्वरूप हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।

पीएफआरडीए के तहत सम्पूर्ण राशि का केवल 15% शेयर मार्केट में लगाया जाना था जबकि 85% सरकारी प्रतिभूतियों में, किन्तु आज तक पीएफआरडीए इस बात की पुष्टि नहीं कर सका है कि समस्त धनराशि का 85% कहाँ लगा हुआ है और 15% कहाँ लगाया गया है। पीएफआरडीए न तो इस पर अलग-अलग रिटर्न ही दे पा रहा है। यही नहीं इस रकम पर कोई मिनिमम रिटर्न की गारन्टी नहीं है। कर्मचारियों का कहना है कि इस समस्त धनराशि को कम्पनियाँ शेयर मार्केट में लगा रही हैं जहाँ उनका पैसा सुरक्षित नहीं है। नोटबंदी और कोरोना महमारी के दरमियान कर्मचारियों को हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ।

यह नुकसान ना केवल कर्मचारियों का है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी यह अच्छा नही है। आज तकरीबन हर साल कर्मचारियों के हिस्से से एनपीएस के तहत 35000 करोड़ रुपये की कटौती की जाती है और उसमें सरकारी अनुदान लगभग 35000 करोड़ रुपये मिलाकर समस्त 70000 करोड़ रुपये को इन कम्पनियों में जोखिम के तहत निवेश किया जा रहा है। कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के पश्चात इसी एनपीएस में जमा हुई रकम के 40% हिस्से से कर्मचारी को पेंशन दी जानी है जबकि 60% रकम सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी को दे दी जाएगी किन्तु इस बात की पुष्टि नहीं हो पा रही है कि जिस तरह पुरानी पेंशन योजना अर्थात ओपीएस के तहत रिटायर्ड कर्मचारी को उसकी अन्तिम सैलरी का 50% पेंशन के तौर पर महंगाई भत्ते के साथ मिला कर दिया जाता है और हर 6 माह में उसकी पेंशन में महंगाई भत्ते की बढ़ोतरी होती रहती है साथ ही साथ हर साल तीन परसेंट का इंक्रीमेंट भी मिलता रहता था। किन्तु एनपीएस के तहत सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी को अन्तिम बेसिक सैलरी का कितने प्रतिशत पेंशन प्राप्त होगी यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, यही नहीं इसमें ना तो महंगाई भत्ते का प्रावधान है और ना ही किसी तरह के इंक्रीमेंट का या फिर पे रिवीजन का। एनपीएस में एक बार जो पेंशन तय हो जाती है उसमें कभी कोई वृद्धि नही होती है।

भारत जैसे देश में हर साल 70000 करोड़ से अधिक का पेंशन के नाम पर इन्वेस्टमेंट और रिटर्न की गारन्टी ना होना बेहद निराशाजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है। यही नहीं इस व्यवस्था में कर्मचारियों को मिनिमम पेंशन की गारन्टी भी नहीं है, जबकि पुरानी पेंशन व्यवस्था (ओपीएस) में ₹9000 की सेवानिवृत्ति के पश्चात मिनिमम की गारन्टी होती थी। आज एनपीएस के तहत रिटायर होने वाले कर्मचारियों को कहीं 1000 रुपये तो कहीं ₹2000 की पेंशन प्राप्त हो रही है जिसके कारण कर्मचारी हर राज्य में लगातार विरोध प्रदर्शन करते चले आ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहाँ 13 लाख से अधिक कर्मचारी एनपीएस के दायरे में आते हैं वहाँ 14 साल बीत जाने के बाद भी आज तक एनपीएसभी ठीक तरह से लागू नहीं हो सकी है जिसके कारण ना तो उनके एनपीएसअकाउंट में 10% कर्मचारियों के वेतन से काटकर जमा की जा सकी है और ना ही सरकार ने उसमें अपना हिस्सा मिलाया और ना ही कोई रिटर्न प्राप्त हुआ। जबकि अधिकांश कर्मचारी सेवानिवृत्ति के करीब भी पहुँच गये और कई कर्मचारी तो सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। ऐसे कर्मचारियों को कोई पेंशन नहीं मिल रही है जिसके कारण उनकी सामाजिक सुरक्षा, उनका बुढ़ापा, उनका सम्मान, उनका स्वाभिमान सब खतरे में है। जिन कर्मचारियों के एनपीएस अकाउंट में थोड़ा बहुत कार्पस जमा भी हो पाया उन्हें दो दो-चार सौ रुपयों की पेंशन मिल रही है जिसकी वजह से आज 18 राज्यों से अधिक जगह एनपीएस के खिलाफ एनएमओपीएस अर्थात नेशनल मूवमेंट फ़ॉर ओल्ड पेंशन स्कीम नामक संगठन के माध्यम से कर्मचारी लामबन्द होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

कोरोना बीमारी के दरम्यान लाखों कर्मचारी लगतार सोशल मीडिया पर #ओपीएस लिखकर सरकार का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर रहे हैं। ट्विटर पर कई वर्षों से #OPS को कर्मचारियों के द्वारा ट्रेंड कराया जा रहा है। 26 जून 2020 को भी #ओपीएस के 5 लाख से अधिक  ट्वीट कर कई घंटों तक भारत में टॉप ट्रेंड कराया गया। फेसबुक एवम अन्य सोशल मीडिया पर हर रोज हजारों कर्मचारी #ओपीएस या #रिस्टोरओपीएस जैसे हैशटैग वाइरल कर रहे हैं। रक्षाबंधन पर सोशल मीडिया के माध्यम से लाखों महिला कर्मचारियों ने सरकार को #पेंशनराखी भेजी। जो इस आन्दोलन को आजादी के बाद कर्मचारियों का  सबसे विशाल आन्दोलन तय करति हैं जिसमें आज लगभग 70 लाख कर्मचारी परिवार जुड़े हैं।

हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश के विधानसभा चुनावों में वहाँ की विपक्षी पार्टियों ने एनपीएस को खत्म कर पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की बातें अपने चुनावी मेनिफेस्टो में भी रखी। 30 अप्रैल 2018 को रामलीला मैदान, दिल्ली में लाखों कर्मचारी एनएमओपीएस बैनर के तले इकट्ठे होकर एनपीएस गो बैक के नारे लगाते देखे गये।

इसके बाद 26 नवम्बर 2018 को रामलीला मैदान दिल्ली में पुनः एनपीएस के खिलाफ लाखों कर्मचारी इकट्ठे हुए। दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविंद केजरीवाल ने भी कर्मचारियों की मांगों का समर्थन किया। दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनजीत सिंह पटेल के अनुरोध पर दिल्ली विधानसभा से पुरानी पेंशन योजना का प्रस्ताव पास कर कर्मचारियों के समर्थन में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी।

पटेल के अनुसार आज लगभग चार लाख करोड़ रुपये एनपीएस के तहत अलग-अलग कम्पनियों में निवेश किए जा चुके हैं। 9 नवम्बर 2019 से लगातार पेंशन सत्याग्रह पर बैठे हजारों कर्मचारियों को सरकार से उम्मीद थी कि दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले केन्द्र सरकार उनकी मांगों पर निश्चित रूप से अमल करेगी और एनपीएस जैसी शोषणकारी व्यवस्था को खत्म करेगी या फिर उनके हिस्से को कम से कम जीपीएफ यानी जनरल प्रोविडेंट फण्ड का दर्जा प्रदान करेगी और बीस साल की सेवा के पश्चात अन्तिम बेसिक सैलेरी पर मिनिमम पेंशन की गारन्टी की सुविधा का हक प्रदान करेगी और महंगाई भत्ते की फैसिलिटी और पे रिवीजन की सुविधा प्रदान करेगी।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि आज भी सभी इलेक्टेड मेंबर चाहे विधायक हो या सांसद हो या मिनिस्टर हो सभी पुरानी पेंशन ही ले रहे हैं यही नहीं यदि कोई विधायक, सांसद बन जाए और फिर मन्त्री तो वह तीन तीन पेंशन का हकदार हो जाता है। आज भी हाईकोर्ट के जज, सुप्रीम कोर्ट के जज, डिस्ट्रिक्ट जज और आयोग के सदस्य साथ ही तीनों सेनाओं के कर्मचारियों को पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस) ही प्रदान की जा रही है

कर्मचारियों का कहना है कि एक देश में एक पेंशन नीति होनी चाहिए जबकि उन्हें असंवैधानिक ढंग से दो अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया गया है, उनके साथ पेंशन के मामले में सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। पटेल का कहना था कि एनपीएस न केवल कर्मचारियों के लिए नुकसानदेह है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक है क्योंकि अभी हाल ही में सरकार ने अपना हिस्सा 10% से बढ़ाकर 14% कर दिया है जो कि 35000 करोड़ रुपये से बढ़कर 49000 करोड़ रुपये सालाना बैठता है। इस समस्त रकम का बिना गारन्टी के ऐसी कम्पनियों में निवेश करना जिन पर सरकार की लगाम ना हो निश्चित रूप से देश की अर्थव्यवस्था को एक दिन गर्त में ले जाएगा।

यदि सरकार कर्मचारियों के हिस्से को जीपीएफ में कन्वर्ट कर दें तो सरकार के खाते में कम से कम दो लाख करोड़ रुपये आएँगे इससे ना केवल सरकार की लिक्विडिटी बढ़ेगी बल्कि सरकारी कर्मचारियों का पैसा भी सुरक्षित हो सकेगा। यही नहीं कर्मचारी जीपीएफ में अपनी कटौती को भी बढ़ा देते हैं जिससे प्रतिवर्ष सरकार के खाते में ₹35000 से ज्यादा आने शुरू हो जाएँगे। राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी, एनएमओपीएस मनजीत सिंह पटेल का इससे जुड़ा एक रिजोल्यूशन भारत सरकार को प्राप्त हुआ है, जिस पर सरकार विचार कर रही है। इस बाबत संगठन लगातार सरकार के साथ वार्ताएँ भी करता चला आ रहा है देखना यह है #ओपीएस कब बहाल होती है?

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