हिन्दी सिनेमा और समाज
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सिनेमा
वीर-ज़ारा: प्रेम, करुणा और मानवता का सिनेमाई महाकाव्य
आज के समय में जब समाज और राजनीति के हर मोर्चे पर धर्म, जाति और राष्ट्रवाद की आवाजें पहले से अधिक मुखर हैं, जब मनुष्य की पहचान उसके विचारों से अधिक उसकी आस्थाओं से तय की जा रही है—ऐसे में…
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सिनेमा
शोले के पचास साल: सिनेमा, समाज और स्मृति की आग
‘शोले’ का हर प्रसंग ऐसा कि आँखों के सामने नाच उठे। शोले के संवाद ऐसे कि बच्चे से बूढ़े तक की जबान पर आज भी दिनकर की ‘रश्मिरथी’ जैसे। ‘शोले’ हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ की तरह। हर वर्ग, हर…
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