उपभोक्तावाद
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पर्यावरण
इकोसोफी : संकीर्ण आत्म-बोध बनाम विस्तीर्ण आत्म-बोध
संपूर्ण विश्व पर्यावरणीय समस्याओं के उपर गंभीर एवं अतिसुव्यवस्थित बौद्धिक विमर्श कर रहा है और अपने जीवन-मूल्यों, जीवन-पद्धतियों, जीवन- दर्शन आदि को नए सिरे से सूत्रबद्ध करने की कोशिश कर रहा है। फ्रांसीसी दार्शनिक एवं मनोविश्लेषक फेलिक्स गुआटरी एवं…
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आर्थिकी
वर्चस्व की अवधारणा ही बाजार का मेकानिजम है
बाजार दरअसल जरूरतों और वस्तुओं के बीच की एक जगह का नाम है। वास्तव में जरूरत की चीजों की आपूर्ति के लिए ही बाजार अस्तित्व में आया होगा। बाजार की वास्तविक धुरी लाभ नहीं; बल्कि लेन-देन, परस्पर सहयोग और…
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