
सिनेमा सामाजिक परिवर्तन के लिए काम करने वालों के लिए एक सशक्त माध्यम है। समाज में जो चल रहा है और जिस तरह की आकांक्षाएं उस समय के लोगों के मन में पल रही हैं इसकी समझ के लिए सिनेमा की समझ होनी चाहिए । बौद्धिक समूह में इस बात को लेकर मतभेद रहा है कि किस तरह के सिनेमा को गंभीरता से लिया जाए । प्रायः बौद्धिक गंभीर सिनेमा को तो गंभीरता से लेते हैं लेकिन लोकप्रिय सिनेमा और इसकी अपील को लेकर उनमें उपेक्षा का भाव ही रहता है । इसी कारण से जब सिनेमा का इतिहास लिखा जाता है लोकप्रिय सिनेमा को कम महत्त्व दिया जाता है । यह दृष्टि ठीक नहीं ।
भारत में लोकप्रिय सिनेमा की कई श्रेणियाँ रही हैं। कुछ विशुद्ध रूप से व्यवसाय के लिए बनाई जाती हैं और उनका समाज पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन लोकप्रिय सिनेमा में समाज और समाज के लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति भी होती है। समाज लोकप्रिय सिनेमा के गाने और अभिनेता अभिनेत्रियों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और उनको एक मॉडल के रूप में लेते हैं। दर्शक जिस तरह से अपने सिने अभिनेताओं के प्रति सम्मान रखते हैं इसकी अभिव्यक्ति समय समय पर होती रहती है। दिलीप कुमार, देव आनंद और मनोज कुमार जैसे लोग अपने लोकप्रिय दौर के पीछे छूट जाने के बाद भी लोगों की स्मृति में बने रहते हैं। कोलकाता में उत्तम कुमार को लेकर, कर्नाटक में राजकुमार को लेकर, आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और चेन्नई में रजनीकांत को लेकर जो लोकप्रियता रही है उसको कैसे भुलाया जा सकता है! असंख्य उदाहरण और भी गिनाए जा सकते हैं । राजेश खन्ना की मृत्यु के बाद जितनी बड़ी संख्या में लोग सड़क पर निकल कर आए वह इस बात का प्रमाण है कि लोक स्मृति में सिनेमा जगत के सितारों की उपस्थिति बनी रहती है।
पिछले दिनों धर्मेंद्र को लेकर एक वाक़या हुआ। कुछ प्रमुख चैनलों और अख़बार के सूत्रों ने बीमार धर्मेंद्र की मृत्यु की ख़बर प्रसारित कर दी और लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि देनी भी शुरू कर दी। पर बाद में पता चला कि वे जीवित थे और उनका इलाज चल रहा था । इस समय धर्मेंद्र की चर्चा बहुत हो रही है। लोग उनकी फ़िल्मों को याद कर रहे हैं और उनके सिनेमाई व्यक्तित्व की खूबियों की चर्चा खूब कर रहे हैं।
कौन हैं धर्मेंद्र और क्यों भारत में लोगों में उनके प्रति इतना प्रेम अब भी बना हुआ है?
धर्मेंद्र ने दिसंबर में 90 के हो जाते, लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। उनका जन्म 1935 की दिसम्बर में हुआ था। आर्यसमाज का उनके परिवार पर प्रभाव था । पिता एक स्कूल के हेडमास्टर थे और अपने बेटे को वे प्रोफेसर के रूप में देखने की हसरत रखते थे। लेकिन पुत्र धर्मेंद्र ने किशोर वय में दिलीप कुमार की एक फ़िल्म देखी शहीद और उनके मन में सिनेमा में हीरो बनने की तमन्ना पलने लगी। घर से एक बार बंबई भी चले गए और दिलीप कुमार के घर में भी घुस गए। बेडरूम में भी दाखिल हो गए। अचानक इस तरह घुस आए नौजवान को देखकर दिलीप कुमार चिल्लाए और युवा धर्मेंद्र जान बचाकर भागे!
लेकिन धर्मेंद्र ने अपने सपने को मरने नहीं दिया और फ़िल्मफ़ेयर कांटेस्ट के सहारे वे फिर 1960 में बंबई में इस उम्मीद में थे ताकि कहीं कोई चांस उन्हें मिल जाए। पंजाब से आकर बंबई में संघर्ष करने वालों में उन दिनों एक और नौजवान था जिसका नाम मनोज कुमार था। दोनों दोस्त एक दूसरे से सहारा पाते रहे ।
धर्मेंद्र के बारे में हर कोई एक बात कहता है कि उनके भीतर किसान परिवार से आए व्यक्ति की सरलता और आदर्श आजीवन बने रहे। पैसे के प्रति उनके मन में बहुत लोभ नहीं था। बड़ों के प्रति उनके मन में हमेशा बहुत आदर रहा। मनोज कुमार बताते हैं कि एक फ़िल्म में दोनों को एक साथ काम मिला लेकिन मनोज कुमार ने किसी कारण से फ़िल्म छोड़ दी।

दोस्त ने छोड़ दी तो धर्मेंद्र ने भी मना कर दिया। मनोज कुमार से धर्मेंद्र ने कहा कि पैसे की चिंता वे न करें, वे धर्मेंद्र के पैसे में से पैसे ले सकते हैं । इस उदारता को मनोज कुमार कभी भूल नहीं सके ।उनको फिल्में बहुत कठिनाई से मिली और मिली भी तो सहायक अभिनेता के रोल ही मिले। और उनको फ़िल्म जगत में अपनी जगह बनाने में पाँच बरस लग गए।
1966 से धर्मेंद्र बहुत बड़े हीरो माने जाने लगे। जिस फ़िल्म ने उन्हें सुपरस्टार बनाया वह थी फूल और पत्थर और आँखें। इसके बाद 1977 तक वे हिंदी फ़िल्म के सबसे बड़े हीरो रहे। बीच में दो साल राजेश खन्ना का तूफानी दौर आया पर वह ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सका । 1977से 1987 तक धर्मेंद्र की फ़िल्में सफल होती रहीं लेकिन उनका वह सुनहरा दौर ख़त्म हो चुका था।
उसके बाद वे उतने सफल नहीं रहे। उनके पुत्र सनी देवल तब तक स्थापित हीरो बन चुके थे।
यानि पिछले चार दशकों से वे बड़े हीरो नहीं थे। कायदे से उनको भुला दिया जाना चाहिए था। लेकिन धर्मेंद्र लोगों की स्मृति में इस कदर कैसे बने रहे इसको समझने के लिए हिंदी सिनेमा के साथ लोगों के आंतरिक जुड़ाव को समझना जरूरी है।
हिंदी फ़िल्मों पर सितारों का उतना असर शायद नहीं है जितना कि दक्षिण के सितारों का है। दक्षिण में तो हीरो हीरोइन के मंदिर भी हैं और उनकी मृत्यु पर आत्मदाह जैसी घटनाएँ भी होती हैं। लेकिन हिंदी जगत में भी फिल्मी सितारों का गहरा असर रहा है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
हिंदी सिनेमा के समाजशास्त्र पर कुछ गम्भीरता से 70 के दशक में लिखने की शुरुआत हुई थी लेकिन बाद में उसे जारी नहीं रखा जा सका। देखा जाए तो फ़िल्म अध्ययन को ही भारतीय अकादमिक क्षेत्र में एक विशेष रूप से ही रखा गया जिसमें पाश्चात्य दृष्टि का प्रभाव अधिक है। इस दृष्टि ने भारत की उन फ़िल्मों को तो अध्ययन का विषय माना जिसे कलात्मक फ़िल्म माना गया लेकिन लोकप्रिय फ़िल्मों को अध्ययन का विषय कम ही माना गया। आज भी शोले की चर्चा होती है लेकिन गंभीरता से नहीं। यह फ़िल्म इतनी हिट कैसे हुई और आज भी इसके डायलॉग और पात्र लोगों को याद कैसे है इसकी समीक्षा नहीं हुई। उसी के आसपास जय संतोषी माँ की सफलता की व्याख्या नहीं हुई।
भारतीय समाज में युवाओं की आकांक्षाएं किन किन रूपों में अभिव्यक्त हुई हैं इसपर ध्यान केंद्रित करने पर लगता है कि युवाओं के लिए फ़िल्म के हीरो और हीरोइन उनकी एक दूसरी दुनिया से कनेक्ट करते हैं। धर्मेंद्र जब फूल और पत्थर में विधवा को पनाह देते हैं और उसके प्रति सदय होते हैं तो वह पात्र लोगों को अपने से जुड़ा लगता है। अनुपमा का वह संवेदनशील पात्र या फिर आज़ादी के बाद की परिस्थितियों से जूझता आदर्शवादी सत्यकाम अपने युग के लोगों की दमित आकांक्षाओं का प्रतीक बन जाता है। आँखें फ़िल्म में एक प्राइवेट जासूस के रूप में आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाही द्वारा देश की रक्षा के लिए चलाए गए ग्रुप मेंबर के रूप में धर्मेन्द्र की भूमिका लोगों को अपने से जोड़ देती हैं। हक़ीक़त फ़िल्म में कुछ सिपाहियों के साथ जीवन की आख़िरी साँस तक लड़ने वाला धर्मेंद्र मेजर शैतान सिंह की कहानी को पर्दे पर उतार देती है।
धर्मेंद्र की चुपके चुपके और मेरा गाँव मेरा देश आज भी भारतीय दर्शकों को बाँध लेते हैं। समाधि का डाकू और पत्थर और पायल का सुधर जाने वाले सहृदय व्यक्ति की भूमिका को लोगों ने याद रखा।
धर्मेंद्र एक मजबूत और सच्चे आदमी की छवि को पर्दे पर उतारते रहे और उस छवि में एक कोमल हृदय प्रेमी का वास था। इन सारे रूपों में धर्मेंद्र लोगों को इतने भाए कि वे आम आदमी के अपने हीरो बने रहे। वो जो भी करते लोगों को पसंद आते।
कोई कैसे भूल सकता है प्रतिज्ञा फ़िल्म का वह ड्राइवर का किरदार जो लिखना पढ़ना नहीं जानता लेकिन परिस्थितिवश एक इलाके में पुलिस थाना चलाता है और लोगों को डाकुओं से लड़ने की ट्रेनिंग देता है । वह किरदार जब प्रेम में डूबा हुआ मतवाला होकर गाता है — मैं जट यमला पगला दीवाना तो देश के नौजवान लोग झूम उठे थे ।
अक्सर हम इस बात का ध्यान नहीं रखते कि किसी सफल किरदार की एक फ़िल्म से दूसरी फ़िल्म के बीच का भी एक रिश्ता होता है जो दर्शक को याद रहते हैं । धर्मेन्द्र की ही मैन की छवि लोगों को इतनी पसंद थी कि एक फ़िल्म को कलकत्ता में देखते हुए मैं चौंक गया था । फ़िल्म थी बेताब और उसमें धर्मेंद्र ने अपने बेटे को लांच किया था । सनी देवल के डायलॉग को सुनकर पीछे से कोई बोला : जो भी बोलो है तो यह धर्मेंद्र का बेटा !
तुरंत कई लोगों ने स्वीकृति सूचक हामी भरी । सनी देवल में धर्मेंद्र की छवि देखकर लोगों को बेताब बहुत पसंद आई ।
धर्मेंद्र ने पब्लिसिटी पर ध्यान नहीं दिया । अगर दिया होता तो शायद उनको और ख्याति मिलती । वे मस्त किस्म के इंसान रहे हमेशा । जंजीर फ़िल्म छोड़ दी जो कि उन्हीं को ध्यान में रखकर लिखी गई थी । अमर अकबर एंथनी में एंथनी का रोल उनको दिया जा रहा था लेकिन उन्होंने छोड़ दी । मनमोहन देसाई ने जोर भी लगाया लेकिन वे राजी नहीं हुए । उससे देसाई जिनकी वे पसंद थे थोड़े आहत हुए और फिर कभी उनको अपनी फ़िल्म में नहीं लिया । उनकी जगह अमिताभ आ गए और दोनों ने बहुत सारी सफल फ़िल्में की । हृषीकेश मुखर्जी के भी वे पसंदीदा हीरो थे और वे ही आनंद फ़िल्म के हीरो के रूप में उनकी पसंद थे। कल्पना करें कि ज़ंजीर, अमर अकबर एंथनी और आनंद धर्मेंद्र ने की होती !
इस बात को याद दिलाने पर धर्मेंद्र को कोई अफ़सोस नहीं होता था । जब उनसे पूछा गया तो बोले मिल भी जाती ये फ़िल्में तो क्या होता !
उनके लिए लोगों का प्रेम ही असली चीज़ थी और लोगों ने उनको बेपनाह मोहब्बत दी । एक बार वे एम पी के चुनाव में खड़े हुए तो लोगों ने उनको जीत भी दिला दी !
उनके जीवन का एक प्रसंग ऐसा है जो बतलाता है कि उनसे लोगों की मोहब्बत कितनी अधिक थी । फिल्मी हस्तियों में कोई अपनी गृहस्थी को तोड़कर जब दूसरा विवाह करता है तो लोग उसे पसंद नहीं करते । धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी के साथ दूसरा विवाह किया । फिर भी लोगों ने उनको माफ कर दिया । और तो और उनके पहले के परिवार ने भी इसको स्वीकार कर लिया ।
धर्मेंद्र की एक ही ढंग की जीवनी लिखी गई है । उसको पढ़ने से पता चलता है कि वे कितने सच्चे, विनम्र और ईमानदार व्यक्ति थे । वे अपने सीनियर हीरो के प्रति बहुत सम्मान रखते थे । दिलीप कुमार तो उनकी जान थे । फ़िल्म इंडस्ट्री का कोई भी व्यक्ति उनके बारे में निंदा करने वाला नहीं मिलेगा।
इस तरह के इंसान को अगर हिंदी फ़िल्म के दर्शक आज भी इतना प्रेम करते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
हिंदी फ़िल्म का इतिहास लिखने वाले फ़िल्मी इमेज के लोगों पर प्रभाव की जब भी चर्चा करेंगे वे धर्मेंद्र के निभाए किरदार को ज़रूर महत्त्व देंगे । उनके शिक्षक पिता उन्हें प्रोफ़ेसर बनाना चाहते थे। वे फ़िल्म में कई बार प्रोफ़ेसर बने और एक बार अपने पिता से बोले भी। पिता ने कहा — असली वाला तो नहीं बने !
मुझे धर्मेंद्र का एक किरदार बेहद पसंद है। सबसे ज़्यादा तो सत्यकाम का किरदार है और उसके बाद मेरा गाँव मेरा देश का और प्रतिज्ञा का लेकिन एक किरदार अलग से पसंद है। वह फ़िल्म है दिल्लगी जिसमें उन्होंने संस्कृत के प्रोफ़ेसर का रोल किया है। आप भूल नहीं सकेंगे। जिस समय उनकी ही मैन की छवि की देश में धूम थी उस समय संस्कृत के चश्मधारी प्रोफ़ेसर का चश्मे के बिना नहीं देख पाने का दृश्य भुलाए नहीं भूलता। क्या कोई ब्लैकमेल के साइंटिस्ट के चरित्र का गया गाना — पल पल दिल के पास भूल सकता है!
अभी धर्मेंद्र जीवित हैं और देश के लाखों लोग प्रार्थना कर रहे हैं कि वे बच जाएँ । यह भी याद रखा जाना चाहिए कि धर्मेंद्र एक कवि भी हैं और वे साहित्य के लोगों से मिलना बहुत पसंद भी करते हैं । बंगाल से भी उनका एक ख़ास क़िस्म का लगाव है ।
लोकप्रिय फ़िल्मी सितारों में लोगों ने हमेशा अपनी प्रेरणा और आकांक्षा को तलाशा है । लोग जिनसे प्रेम करते हैं उनको भूलते नहीं। पढ़े लिखे मिडिल क्लास के लोगों का मतलबीपन आम लोगों में नहीं होता। वे अपने हृदय में धर्मेंद्र जैसे हीरो को हमेशा याद रखते हैं। इस बात को हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि फ़िल्म एक सशक्त माध्यम है। समाज को समझने के लिए लोकप्रिय फ़िल्मों का अध्ययन भी होना चाहिए।










