
देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता
किसी देश को जानना क्या होता है? क्या उसकी सीमाओं को जान लेना ही उसे जान लेना है? क्या उसके पर्वत, नदियाँ, जंगल, नगर और समुद्र उसकी पूरी पहचान हैं? या फिर किसी देश की असली पहचान उन असंख्य मनुष्यों में बसती है, जो उसके भूगोल को जीवन देते हैं, उसके इतिहास को रCountryने का एक परिचित चश्मा उतारकर दूसरा चश्मा पहनाती है। ऐसा चश्मा, जिसमें भारत केवल गौरव, परम्परा और प्राचीनता का नाम नहीं, बल्कि प्रश्नों, अन्तर्विरोधों, विसंगतियों और सम्भावनाओं से बना हुआ एक जीवन्त संसार है। लेखक की दृष्टि में भारत कोई स्थिर उपलब्धि नहीं, बल्कि निरन्तर बनने वाली प्रक्रिया है। इसलिए ‘भारत एक स्वप्न’ का स्वप्न किसी अतीत की ओर लौटने का स्वप्न नहीं, बल्कि एक ऐसे भविष्य की तलाश है जिसमें मनुष्य अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ उपस्थित हो सके।
पुस्तक के आरम्भ में ही लेखक भारत को राजनीतिक नक्शे से बाहर निकालकर पृथ्वी के व्यापक सन्दर्भ में देखने का आग्रह करते हैं। ‘पृथ्वी का भारतवर्ष’ शीर्षक के अन्तर्गत भारतीय भूखण्ड की यात्रा को करोड़ों वर्षों के भूगर्भीय इतिहास से जोड़ना इसी दृष्टि का परिणाम है। भारत की कहानी किसी राजवंश से नहीं, पृथ्वी की उस दीर्घ यात्रा से शुरू होती है जिसमें भूखण्ड बने, टूटे, खिसके और नये भूगोल का निर्माण हुआ। यह आरम्भ महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि लेखक भारत को मनुष्य की सत्ता से पहले प्रकृति की सत्ता के भीतर स्थापित करते हैं। भारत पहले पृथ्वी का हिस्सा है, फिर राष्ट्र है। इस एक बिन्दु में पुस्तक की मानवीय और पर्यावरणीय चेतना के बीज देखे जा सकते हैं।
लेकिन इस पृथ्वीमय भारत से लेखक बहुत जल्दी उस भारत की ओर आते हैं जिसे मनुष्य ने बनाया और बिगाड़ा है। यहाँ से पुस्तक इतिहास के गलियारों में प्रवेश करती है और ‘भारत की गुलामी के चक्रव्यूह’ की पड़ताल शुरू होती है। लेखक के लिए गुलामी केवल विदेशी शासन की देन नहीं है। उससे कहीं अधिक गहरी और पीड़ादायक वे सामाजिक संरचनाएँ हैं, जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य से छोटा-बड़ा बनाया। जाति-व्यवस्था को वे इसी सामाजिक गुलामी का सबसे मजबूत दुर्ग मानते हैं। उनके अनुसार राजनीतिक दासता बाहर से आती है, लेकिन सामाजिक दासता भीतर से मनुष्य को तोड़ती है। वह आत्मसम्मान को रोज-रोज घायल करती है और व्यक्ति को उसके मनुष्य होने के बोध से दूर ले जाती है।
यहीं से ‘भारत एक स्वप्न’ एक असुविधाजनक पुस्तक बन जाती है—और शायद इसकी सार्थकता भी यहीं से शुरू होती है। लेखक उस भारत की प्रशंसा में सहज नहीं हैं जिसकी चमक के पीछे सदियों की असमानता छिपी हुई है। वे उस सामाजिक अँधेरे में उतरते हैं जहाँ जन्म किसी व्यक्ति की योग्यता, सम्मान और सामाजिक स्थिति का निर्धारक बना दिया गया। उनके लिए भारत की महानता तभी सार्थक है, जब उसका अन्तिम मनुष्य भी अपने होने की गरिमा के साथ जी सके।
पुस्तक का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आयाम तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना का प्रश्न है। भारत ने दर्शन के क्षेत्र में असाधारण ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं—सांख्य से लेकर लोकायत और आजीवक जैसी धाराओं तक भारतीय चिन्तन में प्रश्न करने और संसार को समझने की अनेक परम्पराएँ मौजूद रही हैं। फिर ऐसा क्या हुआ कि यथार्थवादी और भौतिकवादी चिन्तन की धाराएँ समाज की केन्द्रीय चेतना नहीं बन सकीं? लेखक इस प्रश्न को धर्म और अध्यात्म के प्रभाव के सन्दर्भ में देखते हैं।
यहाँ लेखक का तर्कवादी आग्रह कई बार इतना तीखा हो जाता है कि पाठक स्वयं अपने विश्वासों और पूर्वाग्रहों के सामने खड़ा दिखाई देता है। ज्योतिष, भाग्यवाद, चमत्कारवाद और रूढ़ियों के प्रति समाज की निर्भरता को लेखक आधुनिक शिक्षा के साथ मौजूद एक विचित्र अन्तर्विरोध के रूप में देखते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और उच्च शिक्षित व्यक्ति भी यदि अन्धविश्वास की शरण में चले जाएँ तो शिक्षा का अर्थ ही सन्दिग्ध हो जाता है। लेखक के लिए वैज्ञानिकता केवल प्रयोगशाला की उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक मानसिक पद्धति है।
इसीलिए ‘वैज्ञानिक अन्तश्चेतना का विकल्प’ पुस्तक के केन्द्रीय अध्यायों में से एक बन जाता है। लेखक उस चेतना की तलाश करते हैं जिसमें मनुष्य नियति का निष्क्रिय पात्र न होकर अपने जीवन का सक्रिय निर्माता बने। यह आग्रह पुस्तक को महज इतिहास-विमर्श से निकालकर वर्तमान के मनुष्य के बीच ले आता है।
‘भारत के यौवन का शिखर शेष है’ शीर्षक में लेखक का स्वर आलोचना से आशा की ओर मुड़ता है। यह पुस्तक निराशा की पुस्तक नहीं है। उसकी सारी बेचैनी के भीतर भविष्य का विश्वास छिपा हुआ है। लेखक भारतीय समाज की कमियों को इसलिए रेखांकित नहीं करते कि भारत को असफल घोषित किया जा सके, बल्कि इसलिए कि उसकी सम्भावनाओं को जड़ता से मुक्त किया जा सके। इसीलिए युवा भारत के सन्दर्भ में उनका आग्रह आत्मकेन्द्रित सफलता से अधिक सामाजिक उत्तरदायित्व का है। वे उस ‘रैशनल भारतीय मनुष्य’ की कल्पना करते हैं जो अपने स्वार्थ की सीमाओं से बाहर निकलकर समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ आत्मीय सम्बन्ध बना सके।
इस पुस्तक का मानवीय पक्ष यहीं सबसे अधिक चमकता है। लेखक जब श्रमिक, दलित, भंगी, मेहतर, अन्त्यज, उपेक्षित और निराश्रित मनुष्य की बात करते हैं, तब भारत उनके लिए कोई अमूर्त विचार नहीं रह जाता। भारत चेहरों में बदल जाता है। वे लोग, जिनके श्रम पर सभ्यता खड़ी हुई, जिनकी हथेलियों ने सड़कें बनायीं, खेतों में अन्न उगाया, घर बनाए और शहरों को जीवन दिया—वे अक्सर इतिहास के गौरवगान में दिखाई नहीं देते। लेखक इस अदृश्य उपस्थिति को सामने लाते हैं। उनके लिए यही हाशिए का मनुष्य भारतीयता की वास्तविक परीक्षा है।
यही दृष्टि पुस्तक को महज वैचारिक पुस्तक नहीं रहने देती; उसमें एक गहरी मानवीय करुणा का संचार करती है। लेखक का स्वप्न उस भारत का है जिसमें मनुष्य का मूल्य उसकी जाति, पद, धन या प्रतिष्ठा से नहीं, उसके मनुष्य होने से तय हो। यह विचार जितना सरल सुनाई देता है, भारतीय सामाजिक यथार्थ में उतना ही कठिन और क्रान्तिकारी है।
पुस्तक की राजनीति भी इसी मानवीय आग्रह से जुड़ी है। ‘राजनीति मुक्त राजनीति का जनपथ’ में लेखक सत्ता की उस मानसिकता पर प्रश्न उठाते हैं जिसमें राजनीति सेवा की जगह प्रभुत्व का माध्यम बन जाती है। राजनीतिक सोच के भीतर शक्ति और अधिकार का आकर्षण व्यक्ति को अपनी वास्तविकता से दूर कर सकता है—लेखक इस खतरे को बहुत स्पष्ट शब्दों में सामने रखते हैं।
लेखक की चिन्ता यह भी है कि हमारे समाज ने राजनीति को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे दिया है। वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार, संगीतज्ञ, कारीगर, किसान और श्रमिक—वे सभी जिनके श्रम से समाज का वास्तविक जीवन चलता है—राजनीतिक सत्ता के सामने छोटे दिखाई देने लगते हैं। यह प्रश्न लोकतन्त्र के मूल अर्थ तक जाता है। लोकतन्त्र केवल चुनाव नहीं है; वह समाज के प्रत्येक मनुष्य के योगदान और सम्मान को स्वीकार करने की संस्कृति भी है।
‘भारत एक स्वप्न’ की भाषा का एक आकर्षक पक्ष उसकी बेचैनी है। लेखक कई जगह पाठक को ठहरने नहीं देते। वे लगातार प्रश्न उठाते हैं, निष्कर्षों को चुनौती देते हैं और आत्मालोचन की ओर ले जाते हैं। इस अर्थ में यह पुस्तक पाठक से सहमति माँगने के बजाय संवाद चाहती है। वह कहती है कि किसी समाज के लिए सबसे बड़ा संकट आलोचना का होना नहीं, बल्कि आलोचना सुनने की क्षमता का समाप्त हो जाना है। आत्मालोचन यहाँ आत्महीनता नहीं, आत्मनिर्माण का साधन है।
कृति की यही विशेषता उसकी कुछ सीमाओं की ओर भी संकेत करती है। धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं की आलोचना करते हुए लेखक का तर्कवादी स्वर कई स्थानों पर अत्यन्त निर्णायक हो जाता है। कुछ स्थापनाओं को यदि विविध दृष्टियों और वैकल्पिक ऐतिहासिक व्याख्याओं के साथ रखा जाता, तो विमर्श और अधिक बहुआयामी हो सकता था। फिर भी इसे पुस्तक की कमजोरी के बजाय उसके वैचारिक स्वभाव का हिस्सा माना जा सकता है। यह कृति निष्पक्ष इतिहास लिखने की कोशिश से अधिक विचार को झकझोरने वाली पुस्तक है।
दस आधार-बिन्दुओं में विभाजित यह कृति अन्ततः एक ही प्रश्न पर लौटती है—भारत किसके लिए है? केवल सत्ता के लिए? केवल गौरव के लिए? केवल परम्परा के लिए? या उस मनुष्य के लिए भी, जो सबसे नीचे खड़ा है और जिसकी आवाज अक्सर ऊपर तक नहीं पहुँचती? पुस्तक का अन्तिम आधार-बिन्दु—‘हाशिए का भारतीय मानव : महत्तम उपलब्धि’—इस पूरी यात्रा का नैतिक निष्कर्ष है।
इसलिए ‘भारत एक स्वप्न’ को पढ़ते हुए लगता है कि लेखक जिस भारत का स्वप्न देख रहे हैं, वह किसी स्वर्णिम अतीत की पुनरावृत्ति नहीं है। वह भविष्य का भारत है—एक ऐसा भारत जो अपने इतिहास से आँखें मिलाए, अपनी गलतियों को स्वीकार करे, वैज्ञानिक चेतना को जीवन-मूल्य बनाए, राजनीति को सत्ता के मद से मुक्त करे और सबसे बढ़कर अपने हाशिए के मनुष्य को केन्द्र में लाए।
शायद इसी अर्थ में पुस्तक का शीर्षक सबसे अधिक सार्थक हो उठता है। भारत अभी पूरा नहीं हुआ है। वह एक सम्भावना है, एक अधूरा वाक्य है, एक सतत लिखा जा रहा स्वप्न है। लेखक की दृष्टि में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी प्राचीनता नहीं, बल्कि वह सम्भावना है जिसके भीतर एक अधिक न्यायपूर्ण, तर्कशील और मनुष्यता से भरा समाज जन्म ले सकता है।
‘भारत एक स्वप्न’ की असली खूबी यही है कि यह पाठक को भारत पर गर्व करने के लिए नहीं, बल्कि भारत के प्रति जिम्मेदार होने के लिए प्रेरित करती है। यह हमें बताती है कि किसी देश से प्रेम केवल उसके गौरवगान में नहीं, उसकी कमियों को पहचानने और उन्हें बदलने की इच्छा में भी प्रकट होता है।
और अन्ततः पुस्तक की सबसे सुंदर बात यही है कि उसका स्वप्न किसी महल, स्मारक या सत्ता-शिखर का स्वप्न नहीं है। वह उस मनुष्य की आँखों में बसता है जो अब तक इतिहास के किनारे खड़ा रहा है। जब वही मनुष्य भारत की कथा के केन्द्र में आएगा, तभी शायद वह भारत बनेगा जिसका स्वप्न भरत प्रसाद देखते हैं—एक ऐसा भारत, जो केवल महान कहलाने की आकांक्षा न रखे, बल्कि सचमुच मनुष्य होने की गरिमा को अपना सबसे बड़ा मूल्य बनाए।
“भारत : एक स्वप्न”
प्रकाशन वर्ष : 2025
लेखक: भरत प्रसाद
वाणी प्रकाशन,नयी दिल्ली मूल्य : 299/-









