
आज शिक्षक दिवस है, गुरु पूर्णिमा नहीं है। शिक्षक न तो ब्रह्मा है, न ही विष्णु है और न ही महेश है। जिन शिक्षकों को अपने त्रिदेव होने का भ्रम है, उनके बारे में कुछ भी कहना ओछी बात होगी। शिक्षक को शिक्षक ही रहना चाहिए। शिक्षक रहने का अर्थ है, एक चेतनासंपन्न साधारण मनुष्य, जो अपनी अगली पीढ़ी में सोचने-समझने, नया ज्ञान हासिल करने की रुचि पैदा करता है, सवाल पूछने और सवाल करने को बढ़ावा देता है और अपने स्टूडेंट की एक उम्र के बाद यह कहना भी सीखता है कि मुझे सब कुछ नहीं आता, जितना आता है उतना बताता हूं। इसके बाद जानना हो तो मेरे साथ-साथ सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनते जाओ।
शिक्षक ने जब से गुरु होने का चोला ओढ़ना शुरू कर दिया है, उसका सिर छोटा और पांव (चरण) लंबे होते गए हैं। सब जगह ऐसा लग रहा है जैसे हम ज्ञान मार्ग की बजाय भक्ति मार्ग की राह पर बढ़ चले हैं, जबकि शिक्षक का संबंध भक्ति से दूर-दूर तक नहीं है। उसका एकमात्र संबंध ज्ञान से है। यह जरूरी नहीं कि कोई शिक्षक विद्वान ही हो। जरूरी यह है कि वह ज्ञान का वाहक हो। यह समझता हो कि कोई ज्ञान अंतिम नहीं है। निरंतर ज्ञान में अभिवृद्धि हो रही है। पुराने ज्ञान की नई व्याख्या, नए संदर्भ में प्रस्तुति और परिशोधन-परिमार्जन की प्रक्रिया भी साथ-साथ चल रही है।
शिक्षक ऐसा व्यक्ति भी नहीं है, जिसे किसी एक खास दिन पर ही याद किया जाए। वह ऐसा नहीं है, जैसे बीमार पड़ने पर डॉक्टर को, पुलिस केस होने पर वकील को याद किया जाना जरूरी जान पड़ता है। शिक्षक के जीवन में विद्यार्थी और विद्यार्थी के जीवन में शिक्षक सतत रूप से मौजूद रहने वाली एक ऐसी साझा अनुभूति और प्रक्रिया है, जिसका कोई दूसरा विकल्प संभव ही नहीं है।
शिक्षक और स्टूडेंट का रिश्ता किसी एक दिन मिलने वाले उपहार, संदेशों या सोशल मीडिया पर लगाए जाने वाले स्टेटस तक सीमित क्यों हो, हो भी नहीं सकता! क्योंकि जो सदैव आपके जीवन में मौजूद है, उसका उपहार उसके छात्र का एक बेहतरीन इंसान बन जाना है। फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह छात्र या छात्रा दिन में कितनी बार आपके पैर छूते हैं, या आपके कितने व्यक्तिगत काम निपटाते हैं।
शिक्षक के संबंध में कुछ वर्गीकरण जरूरी है, जैसे किसी बड़े नामी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाने वाला व्यक्ति, घर पर ट्यूशन देने वाला व्यक्ति, सरकारी या प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने वाला व्यक्ति। इनमें कौन शिक्षक है और कौन नहीं, यह आप खुद तय करें। घर के भीतर मां-पिता और कई मामलों में दादा-दादी या बड़े भाई-बहन भी परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप से शिक्षक की भूमिका निभाते रहते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं कि किसी विद्यार्थी के लिए पूरा संसार ही शिक्षक बन जाए। समय के साथ जैसे-जैसे विद्यार्थी की समझ, अनुभव, जागरूकता और चेतना का स्तर बढ़ता है, वह समझता जाता है कि उसके जीवन में कौन व्यक्ति प्रेरक के रूप में मौजूद है, कौन व्यक्ति उसकी समस्या को ठीक उसी प्रकार सुनता है और समझने की कोशिश करता है जैसा कि उस समस्या का स्वरूप है। और वह शिक्षक कभी सुझाव देता है, कभी रास्ता बताता है, कभी कमियों और गलतियों की तरफ इशारा करता है और साथ में यह स्पष्ट भी करता है कि जब तुम्हारे साथ कोई नहीं होगा, तब भी मैं मौजूद रहूंगा।
आप पौराणिक दृष्टि से देखें तो शिक्षक वैसे ही हो जैसे कि अर्जुन के जीवन में कृष्ण। वह दोस्त है, प्रेरक-मार्गदर्शक है, कठिन वक्त में सही सलाह देने वाला समर्थ अग्रज मित्र है और तथ्यों को उनकी पूर्ण पवित्रता के साथ सामने रखकर उद्देश्य की तरफ आगे बढ़ने को भी प्रेरित करने वाला भी है। लेकिन शिक्षक यदि भगवान बनने की जिद पाल लेता है तो फिर उसके हिस्से में शिक्षक दिवस पर कोई एक दिया-बाती, अगर-धूपबत्ती और भोग-प्रसाद की कुछ सामग्री ही आ सकती है। इससे ज्यादा की उम्मीद न हमारे देवता करते हैं और हम भी अपने देवताओं से बस इतनी उम्मीद करते हैं कि वे एक आभासी संरक्षण बनाए रखें। क्या हम शिक्षक से भी इसी तरह के आभासी संरक्षण की उम्मीद करते हैं अथवा ये उम्मीद करते हैं कि वह भौतिक रूप से भी हमारे साथ होगा!
गुरु होने का अर्थ ही है कि शिक्षक इतने ऊंचे पायदान पर मौजूद है, जिस तक किसी सामान्य विद्यार्थी की पहुंच संभव ही नहीं है। गुरु उपदेश करता है, शास्त्रों की व्याख्या और निर्वचन करता है, नैतिकता के मूल्यों को और ऊंचाई पर ले जाता है, लेकिन शिक्षक का काम उपदेश देना नहीं है। वह केवल नैतिकता का वाहक नहीं है, वह व्यावहारिकता का पाठ भी पढ़ाता है। जिंदगी के भौतिक स्वरूप के लिए भी तैयार करता है। समाज की कड़वी-कठोर सच्चाइयों से रूबरू कराते हुए मजबूती से पांव टिकने का साहस देता है। वह ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तरह पूर्ण तत्व नहीं है, न ही वह पूर्ण तत्व होने का दावा कर सकता है।
यह भी सच्चाई है कि इस पेशे में उसकी उपस्थिति आजीविका के कारण भी है। यदि प्रतिमाह मिलने वाले वेतन अथवा मानदेय को किनारे कर दें तो कितने लोग होंगे, जो सच में शिक्षक बने रह पाएंगे? ऐसे लोगों की संख्या लगभग शून्य ही रह जाएगी। मेरी दृष्टि में यदि किसी शिक्षक का मूल्यांकन करना हो तो उसका एक ही पैमाना है। वो, ये कि क्या संबंधित शिक्षक ने अपनी चेतना, संवेदना और मानसिक स्तर को इतना ऊंचा कर लिया है कि वह अपने घर के भीतर मौजूद जैविक संतानों और कक्षा में मौजूद मानस संतानों में कोई भेद न करता हो। अपने स्टूडेंट की उपलब्धियों को भी वैसे ही अनुभूत करता हो जैसे कि अपने वास्तविक बच्चों के मामले में करता है! हमेशा वेतन-भत्तों की बात करते रहना, सुविधाओं का रोना रोते रहना, छुट्टियों के लिए प्लान बनाते रहना और अपने दायित्व को यथासंभव बाकी साथियों-सहयोगियों पर टालते रहने की कोशिश करते रहने वाला व्यक्ति पद की दृष्टि से तो शिक्षक हो सकता है, लेकिन शिक्षक होने की दृष्टि से वह संदिग्ध ही है।
शिक्षा के पेशे में दो ही समूह सबसे केंद्रीय महत्व के हैं। एक समूह शिक्षक हैं और दूसरा विद्यार्थी। इस पेशे में होना, इसका हिस्सा होना कई दृष्टियों से अद्भुत है। शिक्षक अपने जीवन काल में कभी बूढ़ा नहीं होता (दैहिक-कायिक परिवर्तन तो जरूर होंगे), क्योंकि जिस दिन से वह पढ़ाना शुरू करता है और जिस दिन तकनीकी दृष्टि से सेवानिवृत्ति को प्राप्त होता है, उस तिथि तक उसके सामने मौजूद विद्यार्थी समूह की आयु में कोई फर्क नहीं आता। उसे सबसे ऊर्जावान समूह मिलता है। वैसा समूह किसी चिकित्सक, किसी अधिवक्ता, किसी प्रशासनिक अधिकारी या अन्य पेशे के व्यक्ति को शायद ही कभी मिल पाता हो। आज, शिक्षक दिवस की सार्थकता केवल इस बात में हो सकती है कि सभी शिक्षक थोड़ा आत्ममंथन करें कि हम अपने परिवेश से, अपने समाज से, अपने दायरे से, अपनी भौतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों के साथ किस दृष्टि के साथ जुड़े हुए हैं और उस दृष्टि को कितना अगली पीढ़ी तक संप्रेषित करने में सक्षम हो पा रहे हैं। और कितना अपने विद्यार्थियों को बता पा रहे हैं कि मेरी दृष्टि ही अंतिम नहीं है।
जंतर-मंतर पर जेन-जी आंदोलन में नई पीढ़ी की भाषा को लेकर सवाल खड़े हुए, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या इनके साथ उनके स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में जो व्यक्ति शिक्षक के रूप में मौजूद हैं, उन्होंने इनकी संप्रेषणीयता को प्रभावपूर्ण बनाने में कितनी भूमिका निभाई है? यदि भूमिका निभाने वाले ही पीछे हो गए हैं तो फिर जेन-जी पीढ़ी को उसकी भाषा के लिए दोष देना अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा ही है। यह भी ठीक है कि अकेला शिक्षक किसी पूरी पीढ़ी को बदलने और उसे बेहतरीन इंसान बनाने की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता, लेकिन फिर भी उसकी जिम्मेदारी अन्य प्रोफेशन के लोगों की तुलना में बहुत बड़ी है। यदि आज के दिन छात्र-छात्राओं से मिलने वाले संदेशों, फोन कॉल्स और उपहारों के बीच में खुद की कारगुजारियों पर निगाह भी डाल ली जाए तो शायद यह शिक्षक दिवस एक बेहतर दिन हो सकता है। अन्यथा तो जिन्हें सम्मान की शील्ड लेनी है, रंग-बिरंगे गमछे पहनने हैं, पैर छुआने हैं, लड्डू समोसा-खाना है, उन्हें भला, ब्रह्मा-विष्णु-महेश होने से कौन रोक सकता है।










