संस्मरण

वडनगर में बीता एक सप्ताह और कितना कुछ बदल गया मेरे अन्दर

 

प्रेरणा कार्यक्रम में चयनित होने पर मुझे गुजरात जाने का अवसर मिला। हम गुजरात में कई जगह गये। वहाँ हमने बहुत-सी नयी चीजें सीखीं और अनेक नयी जानकारियाँ प्राप्त कीं। गाँधीनगर, अहमदाबाद और वडनगर हमलोग घूमे। ये शहर कई मायनों में अलग हैं—बहुत ही खूबसूरत। ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, उनके किनारे सुन्दर, हरे-भरे पेड़, आकर्षक कलाकृतियाँ और दीवारों पर बनी वारली कला। इन सबके साथ सबसे अच्छी बात है यहाँ की साफ-सफाई।

यह इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण है कि अकेले सरकार कुछ नहीं कर सकती। आम लोगों का जागरूक होना, अपनी जिम्मेदारी को समझना और निभाना समाज के विकास के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना सरकार का जिम्मेदार होना। यहाँ आकर मैंने अनुभव किया कि यहाँ के नागरिक अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह समझते हैं। यही कारण है कि वे अपने शहरों की स्वच्छता बनाए रखने में सक्रिय सहयोग करते हैं। वे कहीं भी आते-जाते थूकते नहीं हैं और न ही बेवजह सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं।
यहाँ पशु-पक्षी भी स्वयं को इतना सुरक्षित महसूस करते हैं कि इंसान के पास आने पर भी डरकर भागते नहीं हैं। यदि हम कहीं बैठ जाएँ, तो गिलहरी हाथ के पास आकर बैठ जाती है। मोर घर की बालकनी तक आ जाते हैं। इसका अर्थ है कि यहाँ के लोग जीव-जन्तुओं को परेशान नहीं करते, बल्कि उन्हें सुरक्षित वातावरण देते हैं।

शिविर में हमें बताया गया कि हम एक महान देश के नागरिक हैं। यहाँ हमें अभिव्यक्ति सहित अनेक प्रकार की स्वतन्त्रताएँ और अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन साथ ही यह भी समझाया गया कि स्वतन्त्रता और कर्तव्य चिड़िया के दो पंखों की तरह हैं। केवल एक पंख के सहारे उड़ान सम्भव नहीं होती। इसलिए हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए, अन्यथा हमारी उड़ान अधूरी रह जाएगी।

एक दिन वडनगर में प्रेरणा उत्सव में पहले भाग ले चुके छात्र-छात्राओं के साथ ऑनलाइन एलुमनी मीट आयोजित की गयी। कई प्रतिभागियों ने अपने सामाजिक कार्यों और स्वयं में आए सकारात्मक बदलावों के बारे में बताया। बातचीत के दौरान कई बच्चों ने कहा—”ज्यादा तो नहीं किया…”, “बस छोटा-सा काम…” आदि। इसी दौरान मुझे शिक्षकों से एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात सीखने को मिली। उन्होंने कहा—”कोई काम छोटा नहीं होता, कोई शुरुआत छोटी नहीं होती।”

हम अपने समाज के हित में जो भी छोटा-से-छोटा कदम उठाते हैं, वह उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना कोई बड़ा प्रयास। आखिर बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता है। जरा सोचिए, यदि हर भारतीय समाज के लिए एक-एक छोटा कदम उठाए, तो मिलकर कितना बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। इसलिए हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरे अकेले के करने या न करने से क्या फर्क पड़ेगा। क्योंकि ऐसा सोचने वाले हम अकेले नहीं होंगे। एक-एक व्यक्ति की सोच बदलने से ही भारत की सोच बदलेगी।

एक बार हम सब कीर्ति तोरण देखने जा रहे थे। वहाँ एक बड़े बच्चे ने एक छोटे बच्चे से उसका पुराना टायर छीन लिया था और उसे रोता छोड़कर स्वयं उससे खेल रहा था। हम सभी ने यह देखा, पर कुछ नहीं किया। थोड़ा आगे जाने पर शिक्षक ने हमसे कहा, “आप सभी को पता था कि वह बच्चा गलत कर रहा है। इसका मतलब है कि सही और गलत की पहचान सभी को है। क्या किसी ने भी पहल करने की कोशिश की?”

उन्होंने आगे कहा, “साहस होने के बाद भी आपमें शौर्य की कमी है। साहस एक सोच है और शौर्य उस सोच की प्रतिक्रिया। बिना शौर्य के साहस का कोई अर्थ नहीं है। शौर्य केवल बड़े कामों में ही दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है। अपनी गलती स्वीकार कर लेना, स्वयं में बदलाव करना और जो सही है, उसके लिए हर परिस्थिति में खड़े रहना भी शौर्य ही है।”

प्रेरणा उत्सव में आकर मुझे अपने गौरवशाली अतीत के बारे में जानने और स्वयं पर तथा अपने देश पर गर्व करने का एक बड़ा अवसर मिला। मुझे बहुत अफसोस हुआ कि मैं और मेरे जैसे न जाने कितने लोग अपने ही देश के बारे में कितना कम और एकतरफा जानते हैं। जब हमें अपने बारे में अच्छी बातें ही नहीं पता होंगी, तो हम स्वयं पर गर्व कैसे कर पाएँगे? इससे हमारा आत्मविश्वास कम होगा और हम भीतर से कमजोर होते जाएँगे।

यदि हम भारत के प्राचीन मन्दिरों के बारे में जानेंगे, तो पता चलेगा कि उनका निर्माण कितने वैज्ञानिक ढंग से हुआ है और उन्हें बनाना कितना कठिन रहा होगा। इतनी बारीकी से किया गया निर्माण आज भी कई मामलों में नामुमकिन-सा लगता है। हमारे अतीत की अनेक धरोहरें विश्वस्तरीय और अद्वितीय हैं। हमारे पूर्वज मनीषी, भाषाविद् और अनेक विषयों के विद्वान थे। वे अपने-अपने क्षेत्रों के विशिष्ट विशेषज्ञ थे और विश्व स्तर पर उनका कोई मुकाबला नहीं था।

कोणार्क सूर्य मन्दिर की धूप घड़ी, वृहदेश्वर मन्दिर के शिखर पर रखा लगभग 80 टन का विशाल शिलाखण्ड, वीरभद्र मन्दिर का झूलता स्तम्भ, पद्मनाभस्वामी मन्दिर के रहस्यमय तहखाने, एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया कैलाश मन्दिर तथा एक ही देशान्तर पर स्थित आठ शिव मन्दिर जैसे अनेक अद्भुत उदाहरण हमारे पास हैं। ये सभी हमारे गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं। केवल मन्दिर ही नहीं, ऐसी और भी अनेक धरोहरें हमारे पास हैं। जैसे—दुनिया की सबसे समृद्ध भाषाओं में से एक संस्कृत। इन सभी विषयों के बारे में हमें केवल बताया ही नहीं गया, बल्कि मोढेरा सूर्य मन्दिर और कई ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण भी कराया गया, ताकि सुनने के साथ-साथ हम उन्हें महसूस भी कर सकें और अपने गौरव का अनुभव कर सकें।

जितने दिन हम वहाँ रहे, उतने दिन हम भारत की विविध संस्कृतियों को जानने और उन्हें जीने का अनुभव करते रहे। हर दिन अलग-अलग राज्यों का भोजन मिलता था। हर शाम हम अलग-अलग खेल खेलते थे। ये खेल भी बहुत अलग थे और उनमें संस्कृत के शब्दों का प्रयोग होता था। शिक्षक हमसे अक्सर विभिन्न वस्तुओं के हिन्दी नाम पूछा करते थे, लेकिन हम कई बार नहीं बता पाते थे। जैसे ‘रिंग’ का हिन्दी शब्द किसी को नहीं पता था। तब एहसास हुआ कि हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं जानते।

अँग्रेजी भाषा, संस्कृति, खेल, कपड़े और खान-पान की एक बेहतर छवि हमारे मन में बनी हुई है, जो हमें अपनी समृद्ध संस्कृति को अपनाने और बढ़ावा देने से रोकती है। यही गुलामी की मानसिकता है। अँग्रेज चले गये, लेकिन हमारी यह मानसिकता पूरी तरह नहीं बदली। इससे मुक्त होने के लिए हमें अपनी संस्कृति पर गर्व करना होगा और अपनी भाषाओं को महत्त्व देना होगा। तभी हमारे देश का वास्तविक विकास होगा।

हमारे शिक्षक ने एक बच्चे की कहानी सुनायी। वह बच्चा हर क्षेत्र में आगे था—पढ़ाई में, खेल में और प्रतियोगिताओं में। धीरे-धीरे यही उसकी उपलब्धियाँ उसके घमण्ड का कारण बन गयीं। स्वाभाविक था कि उसे स्कूल का कैप्टन चुना गया। उसके नाम के साथ एक और उपलब्धि जुड़ गयी, लेकिन उसका कोई मित्र नहीं था। पूरे स्कूल में उससे सभी डरते थे। जूनियर बच्चे तो कभी-कभी उसके साथ बैठने पर भी घबरा जाते थे। उसके घमण्ड के कारण कोई उसे पसन्द नहीं करता था।

वह बच्चा भी इसी कार्यक्रम में चयनित होकर आया था। ‘स्वाभिमान और विनय’ की कक्षा में उसने स्वाभिमान और घमण्ड के बीच का अन्तर समझा। उसने स्वयं में बदलाव लाने का प्रयास किया। कार्यक्रम से लौटने के बाद उसने अनेक सामाजिक कार्य किये, लोगों से मित्रता की और घमण्ड करना छोड़ दिया।

ऐसे ही हम सभी के साथ भी होता है। कब स्वाभिमान घमण्ड में बदल जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। दोनों के बीच बहुत बारीक अन्तर है। यह अन्तर ‘मैं भी कर सकता/सकती हूँ’ और ‘मैं ही कर सकता/सकती हूँ’ के भाव का है। हमें हमेशा स्वाभिमान के साथ विनय बनाए रखनी चाहिए। क्योंकि सफलता केवल सम्मान और खुशी पाने का नाम नहीं है। इन्हें पाने के लिए सही दिशा में कड़ी मेहनत के साथ विनम्रता भी उतनी ही आवश्यक है।

मैम ने एक बार कक्षा में बहुत अच्छी बात बतायी। यह बात पहले से पता थी, लेकिन मैंने कभी इस दृष्टि से नहीं सोचा था। उन्होंने कहा, “दस बातें ऐसी हैं, जिनमें आप मुझसे बेहतर हैं। आप साइकिल चला सकते हैं, लेकिन मुझे साइकिल चलानी नहीं आती। आप अपने क्षेत्र के पारम्परिक पकवान बना सकते हैं, लेकिन मैं नहीं बना सकती। आपमें से कई बच्चे अपनी स्थानीय भाषा जानते हैं, जबकि मैं उन्हें नहीं जानती। इसलिए मैं आपका सम्मान करती हूँ।”

उन्होंने आगे कहा, “ऐसी ही दस बातें ऐसी हैं, जो मुझे आती हैं, लेकिन आपको नहीं आतीं। मुझे भरतनाट्यम आता है, जबकि आपमें से अधिकांश को नहीं आता। मुझे तमिल भाषा आती है, जबकि आप लोगों को नहीं आती। इसलिए आपको मेरा सम्मान करना चाहिए।”
इससे मैंने सीखा कि हम सभी को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति किसी-न-किसी बात में दूसरे से बेहतर होता है। साथ ही, हर उम्र के लोगों का सम्मान करना चाहिए। भोजन, प्रकृति और वह हर चीज, जो हमारी या किसी और की है, उसका भी सम्मान करना चाहिए।

बुधवार को हम सब सेवाश्रम गये। हम बहुत उत्साहित थे, क्योंकि पहले ही हमें वहाँ के बारे में बहुत-सी बातें बताई गयी थीं। शिक्षक ने बताया कि जब वे सुबह-सुबह वहाँ फूल लेने जाते हैं, तो सभी दादा-दादी तैयार होकर रहते हैं और पूछते हैं, “आज बच्चे आ रहे हैं न?” शाम को वे सभी जल्दी चाय पीकर हम लोगों के आने का इन्तजार करते हैं। उस दिन वहाँ खिचड़ी बनती है, क्योंकि बच्चों के आने के बाद होने वाली उनकी व्यस्तता के कारण दूसरे भोजन के लिए समय नहीं बचता। बच्चों के साथ वे बेहद खुश रहते हैं। वे हम लोगों से ढेर सारी बातें करते हैं और हर सप्ताह बड़ी बेसब्री से हमारे आने का इन्तजार करते हैं।

जब हम वहाँ पहुँचे, तो अन्दर से आवाज आयी, “अरे, जल्दी आओ… जल्दी आओ… बच्चे आ चुके हैं।” हमने अन्दर जाकर उनसे ढेर सारी बातें कीं। उनकी गोद में सिर रखा। उनकी पसन्द का खाना पूछा। यह भी पूछा कि वे कहाँ-कहाँ घूमने गये थे। इन सारी बातों के दौरान उनकी आँखें नम हो गयी थीं। वे बहुत खुश थे। ऐसा लग रहा था मानो वे हमें वहाँ से जाने ही नहीं देना चाहते हों।
अन्त में हम सब उनके साथ बैठकर कुछ खेल खेले, भजन गाये और फिर उन्होंने भीगी आँखों से हमें विदा किया। आज तक हमने केवल सुना था कि सबसे कीमती चीज, जो हम किसी को दे सकते हैं, वह हमारा समय है। लेकिन उस दिन मैंने इस बात को पूरे मन से महसूस किया। उन्हें खुश देखकर मेरे मन को जो सन्तोष मिला, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

उस दिन मैंने सीखा कि छोटी-छोटी बातें भी किसी को कितनी बड़ी खुशी दे सकती हैं। हर बार मदद करने या किसी का सहारा बनने के लिए पैसों की जरूरत नहीं होती। कई बार आप अपना थोड़ा-सा समय देकर भी किसी को असीमित खुशी दे सकते हैं। और उसके बाद जो आत्मिक प्रसन्नता स्वयं को मिलती है, उसका अनुभव भी अद्भुत होता है।

उन बुजुर्गों से मिलने उनके अपने बच्चे नहीं आते थे। वे उन्हें वहाँ छोड़कर चले गये थे। वहाँ एक छोटा-सा पार्क था, जिसमें फल-फूलों के पेड़ लगे थे। शिक्षक ने बताया कि इन्हें इसलिए लगाया गया है कि शायद कोई बच्चा घूमने या फल तोड़ने के बहाने ही वहाँ आ जाए। कम-से-कम उसका चेहरा देखकर ही उन बुजुर्गों को थोड़ी खुशी मिल जाए। दूसरों की खुशी में ही वे अपनी खुशी भी बड़ी बारीकी से तलाश लेते थे।

 

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पिहू पाखी

लेखिका पीएम श्री स्कूल जवाहर नवोदय विद्यालय, नगरपारा, भागलपुर में कक्षा दसवीं की छात्रा हैं। सम्पर्क- nishiranjanthakur@gmail.com
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