साहित्य

मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती

रविभूषण

हिन्दी के अकाद‌मिक तथा तथा वैचारिक जगत में जिन तीन विमर्शों – दलित, स्त्री, आदिवासी की इस समय केन्द्रीय उपस्थिति है, उन पर प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक वीर भारत तलवार की सद्य: प्रकाशित पुस्तक ‘उत्पीड़ितों के विमर्श’ (राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2025) नये सिरे से सोचने विचारने के लिए हमें बाध्य करती है। इन तीन विमर्शों में दलित विमर्श सबसे पुराना और प्रभावशाली है। प्रेमचन्द के कथा-साहित्य और निराला की कविताओं में दलित चिन्ता और उनकी  उपस्थिति थी , पर हिन्दी में सत्तर के दशक में कमलेश्वर ने सारिका-सम्पादक के रूप में मराठी के दलित- साहित्य से हिन्दी लेखकों और पाठकों को परिचित कराया। 19वीं और 20वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले (11.4.1827- 28.11.1890) स्वामी अछूतानन्द (6.5.1879-20.7.1933 और आम्बेडकर (14.4.1891-6.12.1956) के बाद हिन्दी  प्रदेश में जिस दलित-जागरण और लेखन की शुरु‌आत हुई , उसने बाद में एक तूफान सा ला दिया। दलित- चिन्तन और दलित विमर्श को पहली बार व्यवस्थित रूप से दलित पैन्थर आन्दोलन से जुड़े महाराष्ट्र में दलित चेतना और अभिव्यक्ति के अग्रदूत राजा ढाले (30.9.1940-16.7.2019), नामदेव ढसाल (15.2.1949-15.1.2014) और जे. वी. पवार (14.7.1943) ने सामने रखा। दलित पैन्थर आन्दोलन जातिगत भेदभाव के खिलाफ 1970 के दशक के आरम्भ में, एक क्रान्तिकारी संगठन के रूप में जन्मा था। यह संगठन अमेरिका के ब्लैक पैन्थर आन्दोलन से प्रेरित-प्रभावित था । संयुक्त राज्य अमेरिका के  कैलिफोर्निया के ऑकलैंड में 15 अक्टूबर 1966 को दो अश्वेत अफ्रीकी-अमेरिकी क्रान्तिकारी छात्रों- बॉबी सील (22.10.1936) और ह्यु.  पी. न्यूटन (17.2.1942-22.8.1983) ने एक मार्क्सवादी-लेनिन‌वादी अश्वेत शक्ति विरोधी राजनीतिक संगठन ‘ब्लैक पैन्थर पार्टी’ की स्थापना की थी। ज्योतिबा फुले ने 24 सितम्बर 1873 में, पुणे में ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना शूद्र, दलित और स्त्री को सामाजिक-आर्थिक शोषण से मुक्त करने के लिए की थी।
वीर भारत तलवार ने अपनी पुस्तक ‘उत्पीडितों के विमर्श’ में दलित विमर्श को ‘सबसे कारगर और प्रभावशाली विमर्श’ कहा है, ‘जिसकी एक वास्तविक सत्ता बन चुकी है’। वे ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले  और डॉक्टर आम्बेडकर को जाति के सवाल को कारगर ढंग से सामने रखने का श्रेय देते हैं। दलित-विमर्श ने पहली बार जाति के सवाल को प्रमुख माना, उसे अपने विचार-केन्द्र में रखा। आम्बेडकर की चिन्ता में ‘जाति-प्रथा का विनाश’ प्रमुख था। उनकी पुस्तक ‘द ऐनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ 1936 में प्रकाशित हुई थी। तलवार ने जाति के सवाल को ‘एक निराधार अवधारणा’  कहा है, “जिसके पीछे कोई विवेक सम्मत तर्क नहीं है। एक अहंकारपूर्ण मिथ्या चेतना है यह।“ वे ‘जाति के सवाल’ को ‘देशज आधुनिकता की कसौटी’ के रूप में देखते हैं। “जाति-प्रथा में विश्वास करते हुए कोई आधुनिक नहीं हो सकता।“ ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई को उन्होंने ‘हिन्दुस्तान के पहले आधुनिक स्त्री-पुरुष’ कहा है। आज पूरा देश धर्म और जाति में बुरी तरह फँसा हुआ है। दलित- विमर्श का इस अर्थ में अधिक महत्त्व है कि उसने जाति और धर्म के सवाल पर प्रश्न किये। डॉ. आम्बेडकर ने ‘नैतिक‌ता और विवेक की कसौटी’ पर धर्म की विस्तार से आलोचना की है। तलवार जाति- भेद को मजबूत करने वाली दक्षिणपन्थी शक्तियों का उल्लेख करते हैं, पर इन शक्तियों पर, इन्हें बढ़‌ावा देनेवाले राजनीतिक दलों पर विस्तार से विचार नहीं करते। कोई भी विमर्श केवल साहित्य में, विचार में सीमित रह कर समाज के लिए उपयोगी नहीं हो सकता। हिन्दी लेखकों और आलोचकों ने ब्राह्मणवादी परम्परा, संस्कार, पूर्वाग्रह आदि पर कम सवाल खड़े किये हैं, जबकि दलित लेखकों ने “ये सवाल ऐसी भाषा में खड़े किये कि लोग तिलमिला उठे और उसका जवाब देते हुए बना नहीं तो खीझ गये।“ दलित लेखकों ने कबीर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, तुलसीदास, प्रेमचन्द और निराला को लेकर जो सवाल किये हैं, वे न तो पूरी तरह स्वीकार किये जा सकते हैं और न उन्हें अस्वीकारा जा सकता है।

दलित-साहित्य, दलित-चिन्तन एवं दलित राजनीति पर गम्भीरता पूर्वक विचार आवश्यक है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जाति की संख्या 16.6 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर लगभग 19-20 करोड़ हो चुकी है। आंध्रप्रदेश के दूसरे मुख्यमन्त्री दामोदरम संजीवय्या (11.2.1921-7.5.1972) भारत के पहले दलित मुख्यमन्त्री थे। बाद में पहली दलित महिला  मुख्यमन्त्री मायावती बनीं, जो उत्तर प्रदेश की 18वीं मुख्यमन्त्री थीं। कुछ समय तक पहले दलित उपप्रधानमन्त्री जगजीवन राम (5.4.1908-6.7.1986) थे। भारत के पहले दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन (27.10.1920-9.11.2005) थे। 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002 तक।  सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वी . आर. गवई (24.11.1960) भारत के दूसरे दलित मुख्य न्यायाधीश हैं। प्रमुख पदों पर दलितों के रहने के बाद भी दलितों की हालत नहीं सुधरी है। दलित लेखकों की आज अच्छी स्थिति है, उनके अपने प्रशंसक, संगठन आदि भी हैं, पर तलवार हिन्दी के दलित साहित्य को तमिल, तेलुगू, मराठी की तुलना में, ‘अभी भी सीमित दायरे’ में देखते हैं, जबकि उनके अपने कई प्लेटफॉर्म भी हैं। उन्होंने केवल ‘द‌लित साहित्य की अवधारणा’ पर ही विचार नहीं किया है। हिन्दी में ‘दलित आलोचना का उभार’ वे ‘कबीर पर कब्जे की लड़ाई’ में देखते हैं। दलित साहित्य, दलित कविता और दलित पत्रकारिता पर भी उन्होंने विचार किया है।  गाँधी और आंबेडकर पर उन्होंने दलित प्रश्नों के संदर्भ में विचार किया है । वे पहले इसके समर्थन में थे कि दलित साहित्य दलित लेखक ही लिख सकता है, पर बाद में उन्होंने अपनी यह धारणा बदली। मुल्कराज आनन्द का उपन्यास ‘अनटचेबल’ 1935 में प्रकाशित हुआ था और वे दलित लेखक नहीं थे। तलवार ने एक बड़ा सवाल ‘दलित साहित्य के वस्तुनिष्ठ मानदण्ड’ (ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया) का रखा है। कौन-सा साहित्य दलित है या गैरदलित, उसकी कुछ अपनी वस्तुगत कसौटियाँ अवश्य होनी चाहिए। बिना किसी निर्धारित मानदण्ड के हम कैसे किसी भी दलित लेखक के साहित्य को दलित साहित्य कहेंगे? तलवार की चिन्ता यह है कि दलित लेखकों ने दलित साहित्य के सैद्धान्तीकरण पर ध्यान नहीं दिया है। इसके पीछे वे दो कारण देखते हैं- दलित साहित्य पर  उनका वर्चस्व और विचारधारात्मक। उनका बल ‘दलित साहित्य की वस्तुगत कसौटी’ के निर्धारण पर है। इसी कारण एक ब्राह्मण लेखक – मदन दीक्षित द्वारा सफाईकर्मियों के समाज पर लिखित उपन्यास ‘मोरी की ईंट’ की चर्चा तक नहीं होती। दलित-विमर्श के अन्तर्गत केवल दलित साहित्य नहीं आता, दलित विचार, चिन्तन आदि भी आते हैं। तलवार ने दलित-विमर्श की सीमाएँ बतायी हैं। दलित लेखक देश की परिस्थितियों, होने वाले विविध आन्दोलनों, भूमण्डलीकरण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, बाजारवाद के सम्बन्ध में क्या सोचते-विचारते हैं, पता नहीं चलता। दलित-विमर्श में जाति का प्रश्न प्रमुख है, पर इस प्रश्न को दलित जीवन के आर्थिक प्रश्न से जोड़ा नहीं जाता। तलवार दलित-विमर्श में गरीबी से अधिक सामाजिक बेइज्जती और प्रतिष्ठा के प्रश्न को प्रमुख मानते हैं। “सामाजिक बेइज्जती अखरती है, गरीबी नहीं।“ इसके लिए तलवार दलित पार्टियों और उनके नेताओं पर अधिक बात नहीं करते। दलित राजनीति में ‘सामाजिक न्याय’ (सोशल जस्टिस) की अधिक बात की गयी, ‘आर्थिक न्याय’ की नहीं। दलित लेखकों ने प्रेमचन्द पर कई सवाल और आक्रमण किये, पर प्रेमचन्द ने ‘सामाजिक न्याय’ के साथ-साथ ‘आर्थिक न्याय’ की भी बात की है।

दलित-विमर्श में दलित राजनीति की आलोचना कम है। तलवार धर्म, संस्कृति और समाज के आधार पर खड़ी की गयी ‘शोषण की देशज प्रणाली’ की बात करते हैं, जो भारतीय मार्क्सवादियों के विचार-चिन्तन में दिखाई नहीं देता। “मार्क्सवाद की इस कमी को आम्बेडकर के बिना पूरा कर नहीं सकते।“ उन्होंने ज्योतिबा फुले के नाटक ‘तृतीय रत्न’ (1855) और उनकी किताब ‘गुलामगिरी’ (1871) का उल्लेख किया है, जिसमें जाति के आधार (ब्राह्मणवादी) पर शोषण की प्रणाली पर विचार है। ‘तृतीय रत्न’ ज्योतिबा फुले का एक नाटक है, जिसमें शिक्षा पर जोर दिया गया है और उसके अभाव में होने वाले शोषण की बात कही गयी है। नाटक में ब्राह्मणों द्वारा किये जाने वाले शोषण का चित्रण है। फुले मनुष्य के लिए शिक्षा को तीसरा रत्न (तीसरी आँख) मानते हैं, जिसके अभाव में लोग शोषण का शिकार होते हैं। ‘गुलाम गिरी’ समाज के दलित वर्ग के लिए लिखी गयी पुस्तक है, जो ‘गुलामों को मुक्त करने के अमेरिकी आन्दोलनों  को’ समर्पित है। दलित-चिन्तन में ज्योतिबा फुले के बाद आम्बेडकर दूसरे सबसे बड़े व्यक्ति हैं। तलवार ‘भारतीय परिस्थितियों में ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर को मार्क्स-एँगेल्स’ जैसा मानते हैं। दलित साहित्य और विमर्श में ‘सामाजिक बेइज्जती’ मुख्य विषय है। तलवार ने इसके ‘आर्थिक स्रोत  को सामने रखा है। भौतिक असमानता का प्रश्न टाला नहीं जा सकता। तलवार की यह विशेषता है कि वे इन दोनों- ‘जातिगत उत्पीड़न’ और ‘आर्थिक शोषण’ को एक-दूसरे से अलग न कर ‘एक-दूसरे से घनिष्ट रूप से जुड़े’ देखते हैं। दलित विमर्श में दलित स्त्री का प्रश्न प्रमुख रुप से दिखाई नहीं देता। दलित स्त्री एक साथ दलित और स्त्री होने के कारण उत्पीड़ित है। स्त्रियों के सवाल पर फुले, पेरियार, आम्बेडकर, शाहू महाराज सबने लिखा है, पर दलित लेखकों और विमर्शकारों के यहाँ यह सवाल गौण है।  “दलित समाज, दलित विमर्श अगर दलित स्त्री की मुक्ति के सवाल पर नहीं सोचेगा, उस सवाल को मान्यता नहीं देगा, तो वह अपनी भी मुक्ति नहीं कर सकता।“

हिन्दी में अभी जिन तीन विमर्शों (दलित, स्त्री और आदिवासी) की बहुलता- व्यापकता है, उनमें केवल स्त्री-विमर्श ही वैश्विक विमर्श है। अन्य दो विमर्श भारतीय विमर्श हैं। तलवार हिन्दी के स्त्री-विमर्श को इसकी वैश्विक विचारधारा से कोई सम्बन्ध या मतलब नहीं देख‌ते। उन्होंने स्त्री-विमर्श में चार लेखिकाओं- मैत्रेयी पुष्या, लता शर्मा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और रोहिणी अग्रवाल के नाम गिना कर इनके विमर्श को हिन्दी का ‘दयनीय विमर्श’ कहा है। पश्चिम के स्त्री-विमर्श से हिन्दी और अन्य भाषाओं के स्त्री विमर्श की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि पश्चिम में स्त्रियों ने लड़ाई लड़कर अपने पक्ष में कानून बनाये। यूरोपीय स्त्रियों की तरह भारतीय स्त्रियों में स्त्री अधिकार की चेतना नहीं है। तलवार चेतना के निर्माण में आन्दोलन की बड़ी भूमिका देखते हैं। भारत में स्त्री- आन्दोलन न होने के कारण स्त्री- चेतना का भी निर्माण नहीं हुआ। अगर हुआ होता तो 25 सितम्बर से 28 सितम्बर 2025 तक साहित्य अकादेमी, भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय और बिहार सरकार द्वारा आयोजित ‘अन्तरराष्ट्रीय साहित्योत्सव उन्मेष’ में स्त्री लेखिकाओं की उपस्थिति नहीं होती क्योंकि साहित्य आकादेमी के सचिव पर यौन शोषण का आरोप है। हिन्दी का स्त्री-विमर्श ‘सिर्फ साहित्यिक दायरे’ तक सिमटा हुआ है, जिसे तलवार  सामाजिक-सांस्कृतिक दायरे में लाने की अपेक्षा करते हैं। नारीवादी आन्दालनों का व्यापक रूप हम भारत में नहीं देखते। वैचारिक और सैद्धान्तिक दृष्टि से भी देखें, तो भारत में पश्चिम की तरह किसी स्त्री-सैद्धान्तिकी का विकास नहीं हुआ है । पश्चिम में नारीवाद की दूसरी लहर में हम मुख्य रूप से स्त्री- सैद्धान्तिकी को विकसित होते देखते हैं। तलवार ने ‘उत्पीड़ितों के विमर्श’ के स्त्री-अध्याय में मुख्यत: पश्चिम की दो-तीन पुस्तकों की इस सन्दर्भ में चर्चा की है – ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ और ‘बियाँन्ड द फ्रेगमेंट्स’ की। अमेरिकी नारीवादी लेखिका केट मिलेट (14.9.1934-26.9.2017) की कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस से 2016 में प्रकाशित पुस्तक  ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनके पी-एच डी पर आधारित है, जिसे ‘फेमिनिज्म की दूसरी लहर का घोषणा-पत्र’ कहा जाता है। केट मिलेट ने सेक्सुअल पॉलिटिक्स के सिद्धान्त में मनोविज्ञान, नृविज्ञान, सेक्सुअल क्रान्ति और साहित्यिक समीक्षा का उपयोग किया है ।  भारत में पश्चिम की तरह कोई नारीवादी आन्दोलन नहीं चला। केट मिलेट ने लिंग आधारित उत्पीड़न को ‘राजनीतिक और सांस्कृतिक उत्पीड़न’ माना है। तलवार हिन्दी में इसकी चर्चा कहीं नहीं देखते कि यौन व्यवहार में  हमारा सत्ता-विमर्श क्या है? उन्होंने एक यूरोपियन मार्क्सवादी शेला रोबोथॉम (27.2.1943) की पुस्तक ‘बियाँन्ड द फ्रेगमेंट्स’(1979) का उल्लेख किया है। शेला रोबोथॉम एक  अँग्रेज समाजवादी, नारीवादी सिद्धान्तकार और इतिहासकार हैं, जिन्हें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ‘नारीवाद और क्रान्तिकारी सामाजिक आन्दोलनों की इतिहासकार’ के रूप में ख्याति प्राप्त है। ‘बियाँन्ड द फ्रेगमेंट्स: फेमिनिज्म एण्ड द मेकिंग ऑफ सोशिएलिज्म’ (1979) से पहले उनकी पुस्तक ‘वूमन रेजिस्टेंस एण्ड रेवोल्यूशन’ (1972) प्रकाशित हुई थी। भारतीय मार्क्सवादियों ने यूरोपीय मार्क्सवादियों की तरह नारीवाद सम्बन्धी सैद्धान्तिकी का विकास नहीं किया। सम्भवत: तलवार उन गिने चुने मार्क्सवादियों में हैं, जिन्होंने इधर ध्यान दिलाया है। तलवार ने थोड़ी चर्चा यूरोपीय मार्क्सवादियों के ‘प्रारूप आन्दोलन’( फिगरेटिव मूवमेन्ट) की की है। इस मुहावरे का आरम्भ इतालवी मूर्तिकार, चित्रकार, वास्तुकार माइकल एँजेलो (6.3.1475-18.2.1564) और स्पैनिश चित्रकार पाब्लो पिकासो (25.10.1881-8.4.1973) से माना गया है, जिसे बाद में 1950 के दशक में अमेरिकी चित्रकार रिचर्ड डाइबेन कोर्न (22.4.1922-30.3.1993) और दूसरे अमेरिकी चित्रकार डेविड पार्क (17.3.1911-20.9.1960) ने ‘बे एरिया फिगरेटिव मूवमेंट’ की स्थापना कर आगे बढ़ाया। मुख्यत: यह आन्दोलन एक कला-आन्दोलन था, जिसे सेन फ्रांसिस्को खाड़ी क्षेत्र के कलाकारों के एक समूह ने अमूर्त अभिव्यक्तिवाद की शैली में काम करना छोड़ कर पचास-साठ के दशक में चित्रकला में प्रमुखता दी। बाद में अमेरिकी कला-इतिहासकार कैरोलीन ए जोन्स ने इस पर एक पुस्तक लिखी ‘बे एरिया फिगरेटिव आर्ट 1950-1965’ (1989)।

तलवार प्रचलित विमर्शों से भिन्न नये सिरे से ‘उत्पीडितों के विमर्श’ पर बात करते हैं। वे हिन्दी के स्त्री-विमर्श को बड़े दायरे में लाकर विचार करते हैं। स्त्रियों के नाम पर चलनेवाले एनजीओ में वे किसी भी नारीवादी आन्दोलन को नहीं देखते। नारीवादी विमर्श सामाजिक आन्दोलनों से जुड़कर ही सार्थक और व्यापक होता है। तलवार ने 16 दिसम्बर 2012 के दिल्ली सामू‌हिक बलात्कार (निर्भया काण्ड) का उदाहरण दिया है, जो माले पार्टी के स्त्री-संगठन ऐपवा और जेएनयू के छात्र संगठन आइसा के कारण ही एक बड़ा जनान्दोलन बन सका। उस समय आइसा ने स्त्री-आन्दोलन पर ‘बेखौफ आजादी’ का एक नारा दिया था। तलवार ने 1972 में मुम्बई के वडाला में स्थापित ‘कॉलेज ऑफ कॉमर्स एण्ड इकॉनोमिक्स’ की उप-प्राचार्य द्वारा लैंगिक समानता को ध्यान में रखकर निर्मित कैलेंडर की चर्चा की है, पर ‘स्त्री का अधिकार मनुष्य का अधिकार है’ (वीमेंस राइट इज ह्यूमन राइट) मुहावरे को 1993 में वियना में आयोजित विश्व मानवाधिकार सम्मेलन में अन्तरराष्टीय नारीवादी आन्दोलन द्वारा सबसे पहले उठाये जाने की चर्चा नहीं की है। दो वर्ष बाद संयुक्त राज्य अमेरिका की पूर्व राज्य सचिव और अमेरिका के 42वें राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी रोडम क्लिंटन (26.10.1947) ने 1995 के संयुक्त राष्ट्र के चौथे विश्व महिला सम्मेलन (बीजिंग सम्मेलन) में अपने प्रसिद्ध भाषण से इसे लोकप्रिय बनाया।

तलवार के यहाँ ‘विचारधारात्मक संघर्ष’ का सर्वाधिक महत्त्व है। स्त्री- विमर्श से यह लगभग गायब है। “एक विचारधारात्मक संघर्ष को आगे ले जाने के लिए पचासों तरीके होते हैं। वे तरीके हिन्दी क्षेत्र के नारी विमर्श में कहाँ हैं? हम कितनी उथली और सीमित जमीन पर खड़े होकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं? ” तलवार स्त्री-विमर्श और चिन्तन को ‘संस्कृति’ से जोड़ कर यह मानते हैं कि संस्कृति की ‘सबसे बड़ी समस्या स्त्री के बारे में नजरिया’ है। हिन्दी के स्त्री विमर्श में इस नजरिये के बारे में कोई चेतना नहीं है। “हिन्दी का स्त्री विमर्श कुछ स्त्रियों के अपने पूर्वग्रहों, विश्वासों और माँगों का एक विस्फोट बनकर रह गया है।” वे मैत्रेयी पुष्पा के लेखों में किसी भी साहित्यिक कृति को नारीवादी कहलाने में कोई ‘वस्तुगत मापद‌ण्ड’ नहीं देखते। हिन्दी के नारीवादी विमर्श में स्त्री की सामाजिक स्थिति को नियन्त्रित, निर्धारित करने के तरीकों पर सवाल नहीं उठाए जाते हैं। समाज में स्त्री को स्त्री-परिवार, शिक्षा-प्रणाली, राज्य, कानून, धर्म, कलाएँ, मीडिया इत्यादि ये सारी संस्थाएँ मादा बनाती हैं, पर हिन्दी स्त्री लेखिकाएँ इन सब पर लगभग खामोश हैं। जो संस्थाएँ वैचारिक दृष्टि से ‘स्त्री’ बनाती है, उन सब पर और स्त्री- विमर्शकारों की खामोशी पर तलवार ने सवाल किया है। वे ‘मर्दवाद के सवाल’ को ‘स्त्री-विमर्श का एक बड़ा सवाल’ मानते हैं, जिसकी हिन्दी में कहीं कोई आलोचना नहीं है और “अच्छे-अच्छे नारीवादियों ने मर्दवाद को आत्मसात कर रखा है।” तलवार ने बारह वर्ष पहले, 2013 में एक लेख लिखा था- ‘मर्दवाद से छुटकारा पाना एक बड़ी सांस्कृतिक लड़ाई है’। उन्होंने नारीवादी आलोचक रोहिणी अग्रवाल द्वारा तस्लीमा नसरीन की एक कविता पर किये गये विचार के हवाले यह लिखा है कि- “स्त्री-शोषण के सवाल पर यह एक तात्कालिक आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया, एक उग्र प्रतिक्रिया होने के अलावा और क्या है?”  रोहिणी अग्रवाल अपनी उग्र प्रतिक्रिया में “उस मर्दवादी अवधाराण को आत्मसात कर ले रही हैं, जो मर्दवादी धारणा शरीर का इस प्रकार उपभोग कर के लात मारके उस‌को भगा देती है।” मर्दवाद तलवार की दृष्टि में, ‘घृणित चीज’ है। “मर्द को मुक्त समझना और मर्द के जैसा बनने की कोशिश करना नारीवाद नहीं है।” तलवार ने सवालों को बड़े परिप्रेक्ष्य में रखा है। स्त्रीत्व और पुरुषत्व के विभाजन को उन्होंने ‘झूठा और मिथ्या विभाजन’ कहा है। स्त्री-प्रश्न न तो केवल लैंगिक प्रश्न है, न केवल स्त्री प्रश्न। वह एक सामाजिक प्रश्न होने के साथ ही एक सांस्कृतिक प्रश्न भी है। तलवार केवल मर्दवाद की अवधारणा पर ही प्रहार नहीं करते, स्त्रीत्व की अवधारणा को भी ‘गलत और बेबुनियाद अवधारणा’ के रूप में देखते हैं। स्त्रीत्व और पुरु‌षत्व का विभाजन करने वाली संस्कृति मनुष्यता की संस्कृति के विरुद्ध है। तलवार स्त्री की लड़ाई को एक बड़ी लड़ाई में बदल डालते हैं। यह लड़ाई संस्कृति को बदलने की है। “स्त्री विमर्श पूरे समाज के लोकतान्त्रिक रुपान्तरण की एक बुनियादी लड़ाई है।” तलवार ने स्त्री विमर्श पर लिखते, सोचते-विचारते हुए उन बड़े सवालों को सामने रखा है, जिधर स्त्री विमर्शकारों का ध्यान नहीं जाता।

‘उत्पीड़ितों के विमर्श’ पुस्तक का अध्ययन दलित, स्त्री, आदिवासी सभी लेखकों, लेखिकाओं के लिए आवश्यक है, जिससे ये तीनों विमर्श सही दिशा में जा सकें। दलित और स्त्री विमर्श की तुलना में हिन्दी में आदिवासी विमर्श एक नया विमर्श है, जो मुख्यत: इक्कीसवीं सदी का है। ‘आदिवासी विमर्श’ को तलवार ने ‘सबसे नया’, ‘सबसे कमजोर’ और ‘थोड़ा-सा मुश्किल’ विमर्श माना है। वीर भारत तलवार से किसी भी आदिवासी लेखक, विमर्शकार से कहीं अधिक यह अपेक्षा की जाती है कि वे आदिवासी प्रश्नों और आदिवासी विमर्श पर विस्तार से विचार करें। भूमिका में उन्होंने लिखा है- “आदिवासी विमर्श पर विस्तार से कहना अभी सम्भव नहीं।” अभी न सही, बाद में ही सही। आदिवासी विमर्श के लिए वे आदिवासियों के बारे में जानना ‘बहुत जरूरी’ मानते हैं, जो उनके बीच जाने और रहने के बगैर सम्भव नहीं है। “बड़े-बड़े लेखक हैं, जिन्होंने आदिवासियों पर कुछ लिख मारा है, बिना आदिवासी समाज को गहराई से समझे।” तलवार ने इस पुस्तक के अलावा अन्य कई स्थलों पर भी महाश्वेता देवी की आलोचना की है और उनके लेखन को आदिवासियों के बारे में ‘सतही लेखन’ कहा है, जिससे सहमत नहीं हुआ जा सकता । वे आदिवासियों के ‘आर्थिक शोषण’ से जुड़े लेखन में ‘आदिवासी समाज की आत्मा’ और ‘उसका अन्त:करण’ नहीं देखते। तलवार जिस आदिवासी भाषा और संस्कृति का सवाल उठाते हैं, वह सीधे आदिवासियों के शोषण, विस्थापन आदि से जुड़ा है, जो आज आदिवासियों का सबसे बड़ा सवाल है। गैर आदिवासियों द्वारा लिखे गये उपन्यास पिछले कुछ वर्षों में जितने चर्चित-प्रशंसित हुए, (रणेंद्र का ‘ग्लोबल गाँव का देवता’ और महुआ माजी का ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’) उतने आदिवासियों द्वारा लिखे गये उपन्यास नहीं। हरिराम मीणा का उपन्यास ‘धूणी तपे तीर’ की अधिक चर्चा हुई पर पीटर पॉल एक्का (17.6.1953-12.3.2018) के उपन्यास ‘जंगल का गीत’ (1999) का नाम भी कम लोग जानते हैं, जो आदिवासी जीवन और संस्कृति पर लिखा गया उपन्यास है। इस उपन्यास के बाद उनके तीन और उपन्यास ‘सोन पहाड़ी’ (2012), ‘पलास के फूल’ (2012) और ‘मौनघाटी’ (2013) प्रकाशित हुए हैं। मंगल सिंह मुण्डा के उपन्यास के बारे में भी जब हम नहीं जानते, तो मलयाली लेखक नारायण (26.9.1940-16.8.2022) के ‘कोच्चिरती’ उपन्यास (1998) को कैसे जानेंगे, जो केरल के मलयार यार आदिवासी समुदाय के इतिहास, परम्परा और कष्टों को लेकर लिखा गया है। उड़िया उपन्यासकार गोपीनाथ मोहन्ती (20.4.1914-20.8.1991) के उपन्यास ‘अमृत संतान’ (1949) और ‘परजा’ (1945) का तलवार ने जिक्र किया है। वीर भारत तलवार का स्पष्ट मत है कि “हिन्दी में आदिवासी-विमर्श हिन्दी के साहित्यकार नहीं चला सकते, क्योंकि उनको आदिवासी समाज का कोई ज्ञान नहीं है।” इस विचार से सहमत होना कठिन है। अनुज लुगुन और जसिन्ता केरकेट्टा का महत्त्व इस अर्थ में अधिक है कि इन दोनों कवियों ने अपनी कविताओं में आदिवासी विमर्श को सभ्यता विमर्श से जोड़ दिया है।
तलवार ने आदिवासी विमर्श के उन कई मुद्दों को सामने रखा है जिन पर अभी ठीक से विचार नहीं हुआ है। आदिवासी संस्कृति, आदिवासी धर्म और आदिवासी भाषाओं के सवाल अधिक प्रमुख हैं। तलवार प्रश्न करते हैं कि संविधान में जो धर्म का अधिकार है, वह आदिवासी को है या नहीं?

झारखण्ड के अलावा महाराष्ट्र में आदिवासी शक्तिशाली हैं। वहाँ नौ ‘आदिवासी साहित्य सम्मेलन’  हो चुके हैं और वहाँ के आदिवासी मराठी में ही अधिक लिखते हैं। तलवार ने दलित, स्त्री, आदिवासी विमर्शकारों को सोचने के लिए कई मुद्दे दिये हैं। उनके पहले इतने अधिक मुद्दे हमारे सामने सुचिन्तित रूप से नहीं रखे गये थे। उन्होंने  ‘आदिवासी समाज की एक बड़ी समस्या’ की ओर ह‌मारा ध्यान दिलाया है। यह समस्या है- “शिक्षित लोगों की अपने समाज और अपनी संस्कृति के प्रति हीन-भावना।” आदिवासियों में अभी तक ‘आत्मसम्मान का आन्दोलन’ नहीं है।

हिन्दी के तीन विमर्शों में आपस में किसी प्रकार का संवाद नहीं है। अपने-अपने इलाके में सक्रिय कवि, लेखक, चिन्तक-विचारक, विमर्शकार के यहाँ मुक्ति का सवाल प्रमुख है, पर मुक्ति अकेले में नहीं होती। “सिर्फ अपनी मुक्ति की सोच से उत्पीड़ित समुदायों की मुक्ति नहीं हो सकती।” यह पुस्तक इस दिशा में सोचने को  प्रेरित करती है। “दलित, आदिवासी और स्त्री- तीनों उत्पीड़ित समुदाय हैं। क्या ये कभी आपस में संवाद करते हैं? क्या ये एक-दूसरे के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं? क्या ये कभी एक-दूसरे के आन्दोलनों में भाग लेते हैं? क्या ये कभी मिलकर संयुक्त रूप से कोई कार्यक्रम करते हैं? क्या ये एक-दूसरे से अलग-थलग रहकर ही चलते रहेंगे?” वीर भारत तलवार की यह चिन्ता सभी दलित, स्त्री, आदिवासी लेखकों, विमर्शकारों की चिन्ता बनानी चाहिए। ‘उत्पीड़ितों के विमर्श’ इस दृष्टि से सबके लिए एक अनिवार्य पुस्तक है।

 

Show More

रविभूषण

लेखक वरिष्ठ आलोचक और जन संस्कृति मंच के पूर्व अध्यक्ष हैं। सम्पर्क +919431103960, ravibhushan1408@gmail.com
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x