दिवस

प्रेम का शून्यकाल

 

बसंत ऋतु के आते ही प्रकृति हर किसी के दिल को प्रेममय कर देती है। एक खुशनुमा एहसास दिलों पर राज करने लगता है। प्रेम पर न जाने कितने आख्यान और मिथक देश-दुनिया के इतिहास में निहित है। इसे लोगों ने अपने-अपने तरीके से परिभाषित किया है। एक बार एक वेश्या से उसके ग्राहक ने पूछा कि “तुम्हारी नजर में प्रेम क्या है? उसने कहा- “आज के युग में प्रेम, मुफ्त में देह पाने का सबसे आसान और सस्ता तरीका।” ‘वैलेंटाइन डे’ के नाम पर पनपता तथाकथित प्रेम दिवस, ऐसे ही प्रेम का एक रूप प्रतीत होने लगा है, जहां प्रेमी युगल अपने प्रेम का तमाम फूहड़ प्रदर्शन और दिखावा करते हैं। यह दिन संत वैलेंटाइन की याद में मनाया जाता है, जो त्याग और समर्पण के प्रतीक हैं, लेकिन उनका आदर्श इस पूरे प्रदर्शन में कहीं भी नहीं दिखता है। इस दिवस ने प्रेम के नाम पर जो बाज़ार पैदा किया है, वह देश के युवक-युवतियों के भविष्य को बहुत हद तक अंधकार की ओर धकेलने का भी काम कर रहा है। इस बाज़ार की मांग के हिसाब से अपने-आप को ढालने के चक्कर में युगल चोरी और अन्य गलत कामों को करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं।

प्रेम का जो रूप हम वर्तमान में देख रहे हैं, वह कहीं-न-कहीं उस वेश्या के कथनों से मिलता-जुलता प्रतीत होने लगा है। इस तथाकथित प्रेम में देह पाने की लालसा जिस तीव्रता के साथ बढ़ रही है उसने इस प्रेम को एक बड़े बाजार में तब्दील कर दिया है। कुछ जगहों पर यह भी देखने को मिलता है कि कई होटलों में प्रेमी युगलों को घंटे के हिसाब से कमरा मुहैया कराया जा रहा है और यही वर्ग उनके आय का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। दुख की बात ये है कि इसमें अधिकांश विद्यार्थी हैं, जो दूर-दराज अथवा ग्रामीण क्षेत्रों से पढ़ने आते हैं और यहां प्रेम के भ्रमजाल में फंस कर रह जाते हैं। प्रेमचंद के कथनानुसार “जहाँ स्वार्थ समाप्त होता है, वहीं से प्रेम आरंभ होता है। उनका यह भी मानना था कि प्रेम त्याग की परीक्षा है, भोग की नहीं और जिस प्रेम में कर्तव्य और मर्यादा न हो, वह प्रेम नहीं, केवल आकर्षण है।” आज के प्रेम में प्रेम जैसा कुछ प्रतीत ही नहीं होता, न तो इसमें त्याग दिखता है न समर्पण न कर्त्तव्य और न ही मर्यादा। इस तथाकथित प्रेम ने लिव-इन रिलेशन की संस्कृति को तेजी से आगे बढ़ाया है। समाज भोगवादी संस्कृति से संक्रमित होता जा रहा है। ‘वैलेंटाइन डे’ जिसमें वैलेंटाइन वीक और एंटी वैलेंटाइन वीक शामिल है, को मनाने वाले युगलों को यह भी समझना पड़ेगा कि इसकी शुरूआत तो ‘रोज डे’ से होती है लेकिन अंत ‘ब्रेकअप डे’ से। फिर इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार भी रहना चाहिए न कि ब्रेकअप होते ही आत्महत्या जैसे कदम उठा लेना चाहिए।

जैसा कि छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से 18 जनवरी 2026 की एक घटना सामने आयी थी, जहां एक छात्र ने ब्रेकअप होने की वजह से अपने-आप को आग के हवाले कर दिया और एक-दो दिन बाद अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। ऐसे कई किस्से आये दिन सामने आते रहते हैं। इस चक्कर में न जाने कितने युवक-युवतियों की जान चली जाती है। इसकी एक और वजह यह भी है कि भारतीय समाज में अधिकांश लोग प्रेम और सेक्स जैसे मुद्दों पर आज भी बात करने से कतराते हैं और जो करते हैं, उन्हें प्रायः संस्कारहीन अथवा चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है।

कुछ दिनों पहले एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा की एक खबर वायरल हुई थी जिसमें लिखा था कि ‘एमिटी यूनिवर्सिटी’ बनी ‘रोमांस का अड्डा’। इस खबर के साथ एक युवक-युवती की आपत्तिजनक तस्वीर भी लगी थी। इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन सब कुछ देखकर भी अनदेखा करता रहा जो प्रायः किया जाता है, खासतौर पर ज्यादातर प्राइवेट विश्वविद्यालयों में। वहीं, पंजाब के तरनतारन के लॉ कॉलेज से ‘प्रपोज डे’ के दिन की एक घटना सामने आयी जहां प्रेम प्रस्ताव नहीं मानने पर, लड़के ने पहले लड़की को गोली मार दी और फिर खुद को। मैं अब तक लगभग 6 विश्वविद्यालयों में समय बिता चुकी हूँ, अधिकांश में प्रेम के नाम पर स्वार्थपूर्ति ही दिखी। कुछ लोगों का प्रेम तो छात्रवृति और बाइक पर निर्भर था, जिसके पास ये दोनों नहीं होता था वह अकेला ही रह जाता था। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जब से मेरा प्रवेश हुआ, अधिकांश प्रेम का विकृत रूप ही सामने आया। युवक-युवतियां स्वार्थ से जुड़ रहे हैं और स्वार्थ पूरा न होने पर रिश्ते ख़त्म हो जा रहे हैं। यह संवेदना शून्य तथाकथित प्रेम है। इसमें जिसके अंदर संवेदना पैदा हो रही है वह प्रायः दुख के समंदर में गोते लगाते हैं और जो मजे लेने के लिए जुड़ते हैं वो खुश रहते हैं। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ को ध्यान में रखते हुए एक काउंसलिंग प्रकोष्ठ का प्रावधान भी किया गया है जिसमें अधिकांश मामले ऐसे देखने को मिलते हैं, जहां छात्र-छात्राएं ब्रेकअप के बाद पूरी तरह से डिप्रेशन में घिरते जा रहे हैं या फिर आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। उनके लिए गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।

एक समय था जब प्रेम में डूबे लोग चट्टान की तरह अपने प्रेम के साथ खड़े रहते थे। किंतु, आज एक ऐसा दौर है जहां प्रेम, रेत की दीवार की तरह हो गया है जो हवा के हल्के झोंके से भी ढह जा रहा है। पहले प्रेम में डूबे युगल एक- दूसरे के लिए मरने को तैयार रहते थे, लेकिन आज के युगल एक-दूसरे को मारने के लिए तैयार रहते हैं। इसकी मुख्य वजह है – प्रेम के नाम पर सिर्फ पाने की लालसा और स्वार्थपरक प्रेम। जबकि प्रेम तो त्याग का रूप होता है, जिसमें लेने की नहीं सिर्फ देने की लालसा होती है। प्रेम के नाम पर बढ़ती हत्याएं और हिंसक घटनायें प्रेम के पवित्र रिश्ते को कलंकित करने से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। यह सिर्फ लोगों की एक विकृत मानसिकता और क्रूरतापूर्ण रूप है, जो वासना और लालच के मकड़जाल में फंसा हुआ है। आज के रिश्ते देह से शुरू हो रहे हैं और देह पर ही ख़त्म हो जा रहे हैं, जिसके कारण रिश्तों में स्थायित्व बचा ही नहीं। वे आज यहाँ तो कल वहां होते हैं। परिस्थितियां देखकर ऐसा लगने लगा है कि यदि देह मुक्त प्रेम की बात की जाये, तो बड़े-बड़े दावे करने वाले अधिकांश प्रेमी समाज में विलुप्तप्राय हो जाएंगे। देश-दुनिया में खुलेआम देह व्यापार चल रहा है, फिर भी पता नहीं क्यों लोग क्षणिक सुख के लिए दूसरों की जिंदगियों,  भावनाओं, संवेदनाओं और विश्वास से खेलते हैं और जिम्मेदारियां आने और रिश्ते निभाने की बारी आते ही पीछे हट जाते हैं या मौत के घाट उतार देते हैं। अगर समाज में वेश्यावृति नहीं होती, तो पता नहीं देह के लिए और कितनी जिंदगियां बर्बाद की जाती। यदि सही ढंग  से खंगाला जाये तो न जाने प्रेम के नाम पर भी दफ्न कितनी ‘एप्सटिन फाइलें’ जैसी फाइलें मिल जाएंगी।

कोरोजीवी कविता और प्रेम

आज समाज में प्रेम के नाम पर जो घटनायें घट रही है, उसे देखकर यह विश्वास नहीं होता कि इस देश में कभी राधा-कृष्ण, लैला-मजनू, हीर-रांझा, सोहिनी-महिवाल, पारो-देवदास आदि जैसे प्रेमियों की अमर प्रेम गाथायें रही होगी। देवदास ने भी पारो को ताउम्र निस्वार्थ भाव से चाहा और अपने अंतिम समय में सिर्फ पारो को देखने के लिए जिंदा रहा और जैसे ही पारो का दीदार हुआ उसने अपने प्राण त्याग दिए । कुछ लोगों ने तो एक प्रेम-पत्र के सहारे ही पूरी जिंदगी गुजार दी तो कुछ ने अपने प्रेम अथवा प्रेमिका की याद में ही अपनी जिंदगी समर्पित कर दी तो कुछ चाँद के दीदार से ही अपनी प्रेमी-प्रेमिका का दीदार करते रहे। प्रेम तो दुनिया के रचना का आधार है जो निराधार हो ही नहीं सकता। लेकिन आज टीवी की दुनिया हो या फिल्म अथवा हकीकत की दुनिया हर तरफ प्यार, सेक्स और धोखा ही दिखता है। अब सच में ऐसा लगने लगा है कि किताबों में मिलेंगे मोहब्बत के किस्से, हकीक़त की दुनिया में मोहब्बत नहीं है। प्रेम में किसी तरह की पाबंदियां नहीं डालनी पड़ती, जिसका प्रेम निस्वार्थ और सच्चा होता है वह आजीवन उस प्रेम के डोर से स्वयं ही बंध जाते हैं जो हर परिस्थिति  में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं, जहां दूरियां-नजदीकियां मायने ही नहीं रखती क्योंकि प्रेम में वह ताकत होती है जिसमें कोई अलग हो ही नहीं सकता। प्रेम में वह ताकत होती है, जिसमें डूबा इंसान खुद की और दुनिया की तस्वीर बदलने का जुनून रखता है। प्रेमी-प्रेमिका उस शून्य की तरह होते हैं, जो एक-दूसरे से जुड़ते ही उसके मूल्य को बढ़ा देते हैं। वास्तव में प्रेम कभी नियोजित हो ही नहीं सकता है, ये तो बस जिससे जितना होना होता है, हो जाता है। 7 दिनों की समय सीमा में बंधकर प्रेम कभी नहीं किया जा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर यदि हम यह कहें कि यह प्रेम का कमोबेश शून्यकाल है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, जहां सिर्फ और सिर्फ नाम का प्रेम रह गया है जो वास्तव में प्रेम नहीं बल्कि वासना का एक रूप है।

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अमिता

लेखिका स्वतंत्र लेखक एवं शिक्षाविद हैं। सम्पर्क +919406009605, amitamasscom@gmail.com
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