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लोक और तन्त्र
सामयिक

आपदा की कसौटी पर लोक और तन्त्र

 

  • आशीष कुमार शुक्ल

 

विश्व के लिए यह कोरोना काल भले ही एक मानवीय त्रासदी की तरह हो, परन्तु यह लेख इसे भारत जैसे उदार-लोकतन्त्र में एक राजनीतिक त्रासदी के रूप में देखता है। एक ऐसी त्रासदी जिसमें ‘हम, भारत के लोग’ भारत के विभिन्न राज्यों के प्रवासी बना दिए गए हैं। संविधान की प्रस्तावना में दिए गए स्वतन्त्रता, समानता और न्याय जैसे मूल्य व्यक्ति से दूर होते प्रतीत हो रहे हैं।

ये वही मूल्य हैं जिनकी बात जॉन रस्किन, महात्मा गाँधी तथा जॉन रॉल्स जैसे विचारक करते थे। इस संकट काल में  नागरिकता और नागरिक अधिकारों की मरीचिका दूर से अपने होने का आभास तो देती है। परन्तु उसे प्राप्त करने की दौड़ व्यक्ति की अन्तिम सांस पर भी खत्म होती नहीं दिखाई दे रही। उधर सत्ता में बैठे अभिभावक व्यक्ति पर अपनी राजनीतिक दावेदारियों के बीच इसके अधिकारों के विषय में उदासीन रहते दीखते हैं।

प्रत्येक पाँच वर्ष में एक बार यह व्यक्ति ‘नागरिक’ के रूप में राज्य को समस्त शक्तियाँ इस आशा के साथ प्रदान करता है कि राज्य पूरी ईमानदारी के साथ उसके अधिकारों को बनाए रखने का कार्य करेगा। इन अधिकारों की परिधि में भारतीय संविधान में वर्णित वे सभी मौलिक अधिकार भी आ जाते हैं जो यहाँ एक व्यक्ति को उसके नागरिक होने की एवज में दिये जाते हैं। अतः इसमें राज्य द्वारा व्यक्ति के साथ नागरिकतुल्य व्यवहार करना भी सम्मिलित है। परन्तु इस महामारी के काल में सत्ता और नागरिक के मध्य सम्बन्धों को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता दिखाई दे रही है। इसमें व्यक्ति यह निर्धारित करें की राज्य को कितनी शक्ति देनी हैं तथा स्वयं कितने अधिकार रखने हैं? अब प्रश्न यह है कि यह व्यक्ति कौन है? इसकी पहचान क्या है? विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र में इसकी भूमिका क्या है?

          यह व्यक्ति वह श्रमिक है जो सम्भवतः प्रत्येक आपदा में उस शहर से बाहर निकाल दिया जाता है जिसे बनाने में वह स्वयं टूटता रहता है। इस व्यक्ति की पहचान कतार में खड़े उस अन्तिम व्यक्ति के रूप में की जा सकती है, जिसके लिए जॉन रस्किन, महात्मा गाँधी, जॉन रॉल्स जैसे दार्शनिक, विद्वान चिन्तित दिखाई दे रहे थे तथा इन्होंने उस अन्तिम व्यक्ति के लिए राज्य से कुछ अपेक्षाएँ की थीं। ये अपेक्षाएँ उसके हित, उसके कल्याण के विषय में थीं। ये अपेक्षाएँ समाज के निम्नवर्गीय समूहों के प्रति राज्य के व्यवहार को लेकर थीं।

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रस्किन अपनी पुस्तक अन्टू दिस लास्ट  में इस विचार का खंडन करते हैं कि समाज में कुछ व्यक्तियों को ही भौतिक सुख तथा आर्थिक समृद्धता प्राप्त हो। इसके विपरीत वह सम्पूर्ण समाज के हित पर बल देते हैं। वह ऐसी सामाजिक अर्थ-नीति को लागू करने के पक्ष में हैं जिसके द्वारा समाज के निम्नतम व्यक्ति को भी लाभ प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त वह सम्पत्ति को गौण बताते हुए कहते हैं देयर इज नो वेल्थ बट लाइफ। रस्किन के विचारों का सार यदि देखा जाए तो उनकी चिन्ता समाज के उन व्यक्तियों के लिए है जो राजनीतिक तथा वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था में निम्नतर स्थिति में रह गया है। जिसके श्रम का प्रयोग करके कुछ व्यक्ति तो संपत्तिशाली बनते हैं, परन्तु स्वयं उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आता। इसके समाधान के रूप में वह राज्य की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। 

एक ऐसा राज्य जो संपत्ति के न्यायपूर्ण अर्जन तथा वितरण को सुनिश्चित कर सके। इसी प्रकार महात्मा गाँधी हिन्द स्वराज में कहते हैं कि “मैं तो चाहता हूँ कि मजदूरों की हालत में कुछ सुधार हो। उन्हें सिर्फ अच्छी रोजी मिलना ही काफी नहीं हैं बल्कि उन्हें ऐसा काम रोज मिलना चाहिए जो उनसे हो सके।” रस्किन से प्रभावित होकर सर्वोदय के दर्शन में भी वे समाज के निम्न वर्ग के रूप में मजदूर, किसान के जीवन को ही उत्तम जीवन मानते हैं। उनके अनुसार समाज में एक नाई और एक वकील के कार्य का मूल्य बराबर ही है, दोनों का समान महत्व है।

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रॉल्स  भी अपनी पुस्तक थ्योरी ऑफ जस्टिस में समाज के उस वर्ग के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हैं जो सबसे खराब स्थिति में है। रॉल्स के अनुसार यह वह वर्ग है जो अज्ञानता से घिरा हुआ है। इस वर्ग को अपने हित की चिन्ता तो है परन्तु उसके पास कोई ऐसी योजना नहीं है जिससे वह अपने हितों की पूर्ति कर सके। वह राज्य द्वारा सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को इस प्रकार से व्यवस्थित करने की सलाह देते हैं जिससे समाज में निम्नतम अवस्था में रह रहे व्यक्ति को अधिकतम लाभ हो सके।

उपरोक्त विचारों को देखते हुए यदि भारतीय समाज का अवलोकन किया जाए तो समझ आता है कि हम इन परिकल्पनाओं से कोसो दूर हैं। यद्यपि भारतीय संविधान लोकतांत्रिक व समाजवादी मूल्यों को अपनी प्रस्तावना की पहली पंक्ति में स्थान देता है। यह प्रस्तावना न्याय, स्वतन्त्रता व समानता की प्राप्ति का लक्ष्य निर्धारित करती है। परन्तु किसी संकट काल में पहली पंक्ति के ये मूल्य तथा लक्ष्य समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति की पहुँच से बाहर होते दिखाई देते हैं। यह व्यक्ति भारत के नागरिक के रूप में उन सभी सुविधाओं का अधिकारी है जो संविधान द्वारा उसे प्रदान की गयी हैं। परन्तु वास्तव में यह एक भ्रम ही जान पड़ता है। राज्य द्वारा व्यक्ति को राजनीतिक समानता के रूप में ‘एक व्यक्ति, एक मत’ का प्रावधान किया गया है। परन्तु समान मताधिकार ‘नागरिकों’ के मध्य व्याप्त सामाजिक व आर्थिक समानता को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

यह एक प्रकार की ‘भ्रमित नागरिकता’(इल्यूज़्नरी सिटिज़नशिप) है। इसमें व्यक्ति समान नागरिक होने के भ्रम में यह समझता है कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों में उसकी बराबर की हिस्सेदारी है।

परन्तु वास्तव में राज्य द्वारा किए जा रहे कार्यों में यह बराबरी नहीं दिखाई देती। वर्तमान संकट काल में राज्य द्वारा व्यक्तियों के साथ उनकी हैसियत के अनुसार व्यवहार किया जा रहा है। एक तरफ देश से बाहर रहने वाले अप्रवासियों को वापस लाने के लिए युद्धस्तर पर ‘ऑपरेशन’ व ‘मिशन’ चलाये जाते हैं। वहीं, देश के भीतर रहने वाले नागरिक को ‘प्रवासी श्रमिक’ बनाकर उसे उसके सामान्य नागरिक अधिकार भी नहीं दिए जा रहे हैं। राज्यों की सीमाओं पर ताले जड़ दिए गए। राज्यों के मध्य एक प्रकार का विभाजन कर दिया गया, जिससे ये ‘बाहर’ के लोग भीतर ना आ सकें। संविधान की प्रस्तावना और उसमें निहित आदर्श राज्यों के विभाजनकारी नियमों के बीच कहीं नहीं है। प्रत्येक राज्य अपनी ही प्रस्तावना लिए घूमता दिखाई दे रहा है।

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इन सब के बीच वह ‘प्रवासी’ श्रमिक व्यवस्थाजन्य (अ)सुविधाओं की गठरी का बोझ लिए अपने व अपने परिवार की सुरक्षा की खातिर राज्य-दर-राज्य मीलों पैदल चलता है। परन्तु उसकी इस अथक यात्रा में किसी राज्य के किसी नुमाइंदे की नजर उस पर नहीं पड़ती। वैसे ऐसा नहीं है कि यह स्थिति आज की है। देश का गरीब तबका उस समय भी ऐसा ही था जब सरकारों द्वारा लोकतन्त्र की दीवारों पर ‘गरीबी हटाओ’ का नारा चस्पा किया जाता था।

          इसके बावजूद वह व्यक्ति राज्य को समस्त शक्तियाँ देने में ही अपना हित समझता है। परन्तु शक्तियों को प्रदत्त करने के उत्साह में वह यह भूल जाता है कि कुछ अधिकार हैं जो उसे नागरिक होने के नाते मिलते हैं। राज्य उन अधिकारों को उसे प्रदान करने के लिए बाध्य है। इस प्रकार एक अज्ञानता के पर्दे की उपस्थिति आज भी समाज में देखी जा सकती है। ऐसे में उस नागरिक की चिंता कौन करे जिसे सरकारों ने केवल ‘प्रवासी श्रमिक’ बना दिया गया है?

          उधर राज्यसत्ता और उसके अभिकरण श्रमिकों के इस अनियोजित व दुःसाध्य प्रवासन को गाँवों के लिए एक अवसर बताकर उन्मादित हुए जा रहे हैं। इनके लिए गाँव भारत की रीढ़ हैं, जिसे निरंतर मजबूत किया जाना चाहिए। वह संभवतः इस तथ्य को नहीं देखना चाहते कि यह रीढ़ राजनीतिक अकर्मण्यता के बोझ से हमेशा झुकी रही है। गाँव की आर्थिक व सामाजिक अक्षमता ने ही इन श्रमिकों को शहरों में भेजा था। और बीते वर्षों में भारत का गाँव इतना सक्षम नहीं हो गया है कि वह अपनी ओर बढ़ने वाले कदमों को एक बार फिर लौटने से रोक सके। इसके अतिरिक्त गाँव की अपनी एक सामाजिक संरचना है जो बाहर से आए प्रत्येक व्यक्ति को उतनी सहजता से उसका भाग नहीं बनने देती। भले ही वह व्यक्ति पूर्व में उस संरचना का हिस्सा रहा हो।

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सामाजिक ताने-बाने से परे होकर भी देखें तो गाँव की राजनीतिक व आर्थिक संरचना भी इस प्रवासन को स्वीकार करने के लिए तैयार होगी इसमें भी संदेह है। इस प्रकार यदि व्यवहार में देखा जाए तो इस प्रवासन को अवसर बताना जल्दबाजी है। वास्तव में यह एक कल्याणकारी राज्य के रूप में अपनी असफलताएँ छिपाने की व्यवस्थागत लीपापोती भर लगती है। त्रासदी को अवसर बताती यह प्राक्कल्पना सरकारों द्वारा अपने राजनीतिक अवसरों को बनाए रखने का माध्यम भर जान पड़ती है। धृतराष्ट्र बन चुकी सत्ताएँ ‘विश्व भारत की ओर देख रहा है’ तथा ‘यह आपदा नहीं अवसर है’ जैसे आह्वान कर रही हैं। परन्तु इस आपदकाल में हाशिये पर खड़े व्यक्ति और उसकी दुर्दशा के स्याह पक्ष को अनदेखा किए जा रही हैं।

जब स्थितियाँ अपेक्षित ना हों तथा व्यवस्था विफल होने लगे तो शब्दजाल की सघन बुनावट से उस विफलता को ढकने की राजनीति की पुरानी रीत रही है। परन्तु ऐसी स्थितियाँ देश को अस्थिर करने वाले बड़े आंदोलनों की तरफ धकेलती हैं। यही प्रवासी श्रमिक एक उचित नेतृत्व मिलते ही एक बार फिर सड़कों पर होंगे। परन्तु इस बार कारण व परिस्थितियाँ अलग होंगी। अधिकारों व सत्ता के संघर्ष में ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ एक दूसरे के आमने-सामने खड़े होंगे।

यह स्थिति ना आए इसके लिए जबरन ही सही सरकारों को रस्किन, गाँधी तथा रॉल्स के उस अन्तिम व्यक्ति को देखना ही होगा। नीतियों का निर्माण इस प्रकार करना होगा कि यदि कभी स्वयं नीति निर्माता उस अन्तिम व्यक्ति की स्थिति में खड़ा हो तो उसे किसी प्रकार की असहजता का सामना ना करना पड़े। यदि सरकारें ऐसा कर पाने में सफल होती हैं तो संभव है कि व्यक्ति उन नागरिक अधिकारों को भोगने योग्य हो सके जो उसे वास्तव में नागरिकता का बोध कराते हैं।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में शोधार्थी हैं तथा आईसीएसएसआर, नयी दिल्ली में डॉक्टोरलफ़ेलो हैं।
सम्पर्क- politicswitha.kumar@gmail.com

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