हत्यारी और तड़ीपार संभावनाओं के समानांतर
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सामयिक
हत्यारी और तड़ीपार संभावनाओं के समानांतर
अरसे से सोच रहा हूँ कि कुछ न सोचूँ; लेकिन ऐसा किसी भी तरह हो नहीं पा रहा है कुछ भी न सोचूँ। ससुरा दिमाग़ है कि मानता ही नहीं, सोचता ही है। संभावनाएँ तो आख़िर संभावनाएँ ही हैं।…
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