नीतिशतक

  • साहित्य

    भर्तृहरि; आँतरिकता की तहें

      “वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरै: सह।  न मूर्खजनसम्पर्क: सुरेन्द्रभवनेष्वपि।।” —भर्तृहरि (नीतिशतकम्)           अर्थात् वनचारी जंतुओं के साथ दुर्गम पर्वतीय स्थानों और जंगलों में रहना अच्छा है; किंतु इंद्रभवन में भी मूर्खों के साथ रहना कल्याणप्रद नहीं है।        भर्तृहरि बहुत अनुभवी और…

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