नानाजी देशमुख
शख्सियत

गाँधीवादी अन्यतम संघी- नानाजी देशमुख

 

आजाद भारत के असली सितारे -42

 “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आजीवन सदस्य होने के नाते मैं यह कह रहा हूँ क्योंकि 30 जनवरी 1948 को एक हिन्दू धर्मान्ध, जो कि मराठी था, लेकिन जिसका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई भी रिश्ता नहीं था बल्कि संघ का कटु आलोचक था, ने महात्मा गाँधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या की। इस अवसर पर हमने भी दिग्भ्रमित लोगों के अचानक भड़के उन्माद, लूटपाट और यंत्रणाओं को भोगा। हमने स्वयं देखा था कि कैसे स्वार्थी तत्वों, जो कि इसी घटना से वाकिफ थे, ने पूर्व नियोजित ढंग से एक खूनी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बताया और यह अफवाह भी फैलाई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग महात्मा गाँधी की मृत्यु पर देश भर में खुशियाँ मना रहे थे और इस प्रकार गाँधी के लिए लोगों के दिलों में उपजे प्यार और लोगों के किंकर्तव्यविमूढ़ और आघात हुई भावना को गलत रास्ते की ओर उन्मुख करने में सफल रहे। स्वयंसेवकों और उनके परिवारों, विशेषकर महाराष्ट्र में, के विरूद्ध ऐसी भावनाएं फैलाई गई।“ (hindi.sabrangindia.in, ‘हिन्दी सबरंग’ में प्रकाशित शम्सुल इस्लाम के लेख में उद्धृत, 1 नवंबर, 2019)

उक्त कथन नानाजी देशमुख (11.10.1916 – 27.2.2010) के हैं, जिसे उन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों पर हुए हमलों से दुखी होकर 8 नवंबर 1984 को व्यक्त किया था।

नानाजी देशमुख ने प्रख्यात गाँधीवादी विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन में भी हिस्सा लिया था और उनके सहयोगी के रूप में काम किया था। इसी तरह 1975 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने जब संपूर्ण क्रान्ति का नारा दिया तो नाना देशमुख उनके साथ हो गये और जब लोकनायक के ऊपर लाठियाँ पड़ रहीं थीं तो लाठियों के प्रहार से बचाने के लिए वे लोकनायक के ऊपर लेट गए जिससे उनके ऊपर कई लाठियाँ पड़ गईं और उनके हाथ की हड्डी टूट गई।

नानाजी ने चित्रकूट नें जिस ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की और गाँवों के विकास की जो परिकल्पना की उसके पीछे महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा तो थी ही, उस विश्वविद्यालय का नाम भी महात्मा गाँधी के नाम पर रखा, ‘महात्मा गाँधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय’।

नानाजी देशमुख की प्रकृति, आचरण और कार्य को देखते हुए उन्हें गाँधीवादी समझने की भूल हो सकती है। गाँधीजी से नानाजी देशमुख की भेंट की किसी घटना का जिक्र मैंने नहीं सुना है। आजादी की लड़ाई के लिए वे कभी जेल नहीं गए और न कभी लाठियाँ खायीं। फिर भी उनके जीवन और कार्यों पर गाँधी के विचारों की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है।

दरअसल, चेतना का विकास समाज में ही होता है। बचपन में जैसा परिवेश मिलता है उसी के अनुरूप हमारी चेतना निर्मित होने लगती है। बाद में जैसे-जैसे सामाजिक दायरा बढ़ता है, परिस्थितियों से हमारा संघर्ष होता है, विभिन्न विचारों, अवधारणाओं से हम परिचित होते हैं, उसी के अनुरूप हमारी चेतना विकसित और परिवर्तित होती रहती है।

नानाजी देशमुख संघ के ऐसे निष्ठावान कार्यकर्ता थे जिनका संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से पारिवारिक संबंध था। डॉ. हेडगेवार ने बचपन में ही उनकी प्रतिभा पहचान ली थी और नानाजी देशमुख को उन्होंने 1928 में ही संघ का सदस्य बना लिया था। उल्लेखनीय है कि डॉ. हेडगेवार ने मात्र तीन वर्ष पहले अर्थात् 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी थी। उस समय नानाजी की उम्र सिर्फ 12 वर्ष थी। नानाजी को डॉ. हेडगेवार इतना स्नेह करते थे कि पढ़ाई करने के लिए पिलानी जाने के इच्छुक नानाजी को उन्होंने आर्थिक सहयोग देने की भी पेशकश की थी जिसे स्वाभिमानी नानाजी ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया था।

नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के ‘कडोली’ नामक छोटे से कस्बे में हुआ था। इनके पिता का नाम अमृतराव देशमुख और माता का नाम राजाबाई था। नानाजी के बचपन का नाम चंडिकादास अमृतराव देशमुख था। उनके दो भाई और तीन बहनें थीं। राज्यसभा की वेबसाइट के अनुसार नानाजी विवाहित थे किन्तु उनकी पत्नी अथवा सन्तान के बारे में कोई सूचना नहीं है।

नानाजी का बचपन संघर्ष से भरा हुआ था। उन्होंने छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया। उनके मामा ने उनका पालन पोषण किया। बचपन अभावों में बीता। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने तक के लिए पैसे नहीं होते थे। किन्तु उनके भीतर पढ़ने की ललक थी। पढ़ाई के खर्च के लिए उन्हें सब्जियाँ तक बेंचनी पड़ी थीं। मैट्रिक की पढाई पूरी होने के बाद डॉ. हेडगेवार के परामर्श से वे आगे की पढ़ाई के लिए 1937 में पिलानी गए और वहाँ के बिरला इंस्टीट्यूट से उन्होंने डिग्री हासिल की।

डॉ केशव बलिराम हेडगेवार

1940 में जब डॉ. हेडगेवार का निधन हो गया तो संघ की काफी जिम्मेदारी नानाजी के ऊपर भी आ गई। माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने उन्हें संघ के प्रचारक के तौर पर उत्तर प्रदेश भेजा। वे सबसे पहले आगरा आए। यहीं उनकी पहली मुलाकात पं. दीनदयाल उपाध्याय से हुई। उन्होंने आगरा और मथुरा को संघ के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में विकसित किया। 1947 में ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’ का प्रकाशन शुरू हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी  उसके संपादक बने, दीनदयाल उपाध्याय मार्गदर्शक बने और नानाजी प्रबंध निदेशक। 1948 में  महात्मा गाँधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, जिससे इन पत्रिकाओं के प्रकाशन पर प्रतिकूल असर पड़ा। फिर भी भूमिगत होकर इनका प्रकाशन कार्य जारी रहा। 18 महीने तक प्रतिबंध लगने के बाद 11 जुलाई 1949 को तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने पं. नेहरू की सलाह पर कुछ शर्तों के साथ प्रतिबंध हटा लिया। संघ प्रमुख माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने गृहमंत्री की सभी शर्तें मान लीं। इन शर्तों में कहा गया कि संघ अपना संविधान बनाए और उसे प्रकाशित करे, जिसमें लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव हों। साथ ही यह भी कहा गया कि आरएसएस राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहेगा और केवल सांस्कृतिक गतिविधियों में ही हिस्सा लेगा। शर्त के अनुसार संघ हिंसा और गोपनीयता का त्याग करे और भारत के ध्वज और संविधान के प्रति वफादार रहने की शपथ ले।

 संघ से प्रतिबंध हटने के बाद नानाजी देशमुख को और भी बड़ा दायित्व सौंपा गया और वे उत्तरप्रदेश के प्रान्त प्रचारक बने। अब वे गोरखपुर आ गए। गोरखपुर में उनका संपर्क बाबा राघवदास से हुआ। बाबा राघवदास के साथ रहते हुए वे उनका भोजन बनाने का कार्य भी करते थे। तीन साल के भीतर ही उनकी मेहनत रंग लायी और गोरखपुर के आसपास संघ की ढाई सौ शाखायें खुल गयीं। नानाजी ने शिक्षा पर बहुत जोर दिया। उन्होंने 1950 में गोरखपुर में सरस्वती शिशु मन्दिर नाम से पहली शिक्षण संस्था की स्थापना की। बाद में देशभर में सरस्वती शिशु मंदिरों का जाल बिछ गया जहाँ से बड़ी संख्या में संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक तैयार होने लगे।

संघ से प्रतिबन्ध हटने के बाद राजनीतिक संगठन के रूप में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई।नानाजी को उत्तर प्रदेश में भारतीय जनसंघ के महासचिव का दायित्व सौंपा गया। नानाजी के प्रयास से 1957 तक उत्तरप्रदेश के सभी जिलों में जनसंघ की इकाइयाँ खड़ी हो गईं और भारतीय जनसंघ उत्तरप्रदेश की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी बन गयी। नानाजी की कूटनीति और लोकप्रियता के कारण उत्तरप्रदेश के प्रमुख नेताचंद्रभानु गुप्त को तीन बार कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा।

विपक्षी दलों के साथ भी नानाजी के बहुत अच्छे संबंध रहते थे। नानाजी के कारण कई बार चुनाव हारने वाले चंद्रभानु गुप्त भी उनका दिल से सम्मान करते थे और उन्हें प्यार से ‘नाना फड़नवीस’ कहा करते थे। डॉ॰ राम मनोहर लोहिया से भी उनके अच्छे सम्बन्ध थे। एक बार नानाजी ने जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन में भी डॉ. लोहिया को आमंत्रित किया। इसी सम्मेलन में डॉ. लोहिया की भेंट दीनदयाल उपाध्याय से हुई। इस मुलाकात का दूरगामी प्रभाव पड़ा और दोनों के गठबंधन से कांग्रेस को सत्ता से हटाने में कामयाबी हासिल हुई। 1967 के चुनाव में भारतीय जनसंघ, संयुक्त विधायक दल का हिस्सा बन गया और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। चौधरी चरण सिंह और डॉ राम मनोहर लोहिया, दोनों से नानाजी के मधुर संबंध थे। इसलिए गठबन्धन निभाने में नानाजी की मुख्य भूमिका थी।

प्रभाष जोशी

लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर पड़ने वाली लाठियाँ खुद खालेने वाले प्रसंग पर प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी लिखते हैं, “नानाजी का अपना घरोपा जेपी आंदोलन में हुआ। पटना में जब जेपी को लाठी लगी तो उसे पहले अपने पर लेने वाले नानाजी देशमुख ही थे। उस दिन जेपी के सभी फोटुओ में नानाजी कहीं न कहीं दिखते हैं क्योंकि वे जेपी को अकेला छोड़ने को तैयार ही नहीं थे। मैं नहीं कहूँगा कि नानाजी ने जेपी को बचा लिया लेकिन इतना जरूर है कि पहले नानाजी को कुछ होता और फिर जेपी को। जेपी के गाँधी, सर्वोदयी और समाजवादी संगी साथियों को उनका नानाजी देशमुख पर भरोसा करना कोई सुहाता नहीं था।

जेपी भी पहले तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ को शंका और अविश्वास से ही देखते थे। लेकिन संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान उनका रवैया सर्वग्राही हुआ। वे नक्सलवादियों से भी बात करते थे और संघियों और जनसंघियों से भी। वे किसी को भी उस आंदोलन से दूर नहीं रखना चाहते थे। उन कम्युनिस्टों और बुद्धिजीवियों को भी नहीं, जो संपूर्ण क्रांति का मजाक उड़ाया करते थे। देश की एक धारा के दो किनारों को जोड़ने वाले जेपी के एक पुल नानाजी देशमुख थे। जेपी खुद ही नानाजी को बताते थे कि उनके सर्वोदयी और समाजवाद के संगी साथी किस तरह उनसे छिड़कते हैं और नानाजी भी जानते थे कि जेपी से उनके साथ को संघ में किस तरह से देखा जाता है। जनता सरकार बनने के बाद सरकार के बजाय जेपी के साथ रहने वालों में नानाजी भी एक थे।“ (उद्धृत, satyagrah.scroll.in, 27 फरवरी 2021 को पुनर्प्रकाशित, ‘चित्रकूट के घाट पर’ लेख से)

जनता पार्टी के संस्थापकों में नानाजी का भी महत्वपूर्ण स्थान है। देश में आपातकाल हटने के बाद जब 1977 में चुनाव हुए तो उसमें नानाजी देशमुख बलरामपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गये। उन्हें मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल में बतौर उद्योग मन्त्री शामिल होने का न्योता भी दिया गया जिसे उन्होंने स्वयं को साठ साल से अधिक होने का हवाला देते हुए इनकार कर दिया। बाद में उन्होंने राजनीति से ही सन्यास ले लिया और अपने को सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।

दीनदयाल उपाध्याय की हत्या से नानाजी बहुत आहत हुए और उन्होंने अकेले दम पर दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की आधार शिला रखी। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को आधार बनाकर ग्रामीण भारत के विकास की रूपरेखा बनायी। उन्होंने गरीबी निरोधक व न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम चलाया, जिसके अन्तर्गत कृषि, कुटीर उद्योग, ग्रामीण स्वास्थ्य और ग्रामीण शिक्षा पर विशेष बल दिया। राजनीति से हटने के बाद उन्होंने संस्थान के अध्यक्ष का पद संभाला और संस्थान की बेहतरी में अपना सारा समय अर्पित कर दिया। शुरुआती प्रयोगों के बाद उत्तरप्रदेश के गोंडा और महाराष्ट्र के बीड जिलों में उन्होंने खास तौर पर अपने कार्यक्रम चलाए क्योंकि ये जिले अधिक पिछड़े हुए थे। उनके द्वारा चलायी गयी परियोजना का उद्देश्य था, “हर हाथ को काम और हर खेत को पानी।” उन्होंने संस्थान की ओर से ‘मंथन’ नाम की एक पत्रिका भी निकाली जिसका कई वर्षों तक के. आर. मलकानी ने सम्पादन किया।

1989 में नानाजी पहली बार चित्रकूट आए और फिर यहीं के होकर रह गए। उन्‍होंने चित्रकूट को ही अपने सामाजिक कार्यों का केंद्र भी बनाया। उन्होंने भगवान राम की कर्मभूमि चित्रकूट की दुर्दशा देखी। वे मंदाकिनी के तट पर बैठे और वहीं अपने भविष्य के कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाई। चित्रकूट को उन्होंने बदलने का फैसला किया। अपने वनवास-काल में भगवान राम ने दलित जनों के उत्थान का कार्य यहीं रहकर किया था, उन्हीं से प्रेरणा लेकर नानाजी ने भी चित्रकूट को ही अपने सामाजिक कार्यों का केन्द्र बनाया। वे अक्सर कहा करते थे कि उन्हें राजा राम की तुलना में वनवासी राम अधिक प्रिय लगते हैं। यही वह स्थान है जहाँ राम ने अपने वनवास के चौदह में से बारह साल गरीबों की सेवा करते हुए बिताये थे। नानाजी ने चित्रकूट में महात्मा गाँधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है। प्रभाष जोशी ने लिखा है, “चित्रकूट में बन रहा ग्रामोदय विश्वविद्यालय भी गाँधी के ग्राम स्वराज्य की कल्पना को साकार करने का प्रयोग है। चित्रकूट में ही रामनाथ गोयनका की याद में वे एक संस्थान खड़ा कर रहे हैं जिसमें संचार के आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और कठपुतली से लेकर लोकनृत्य जैसे पारंपरिक माध्यमों से जनसंचार और जनशिक्षण के प्रयोग होंगे। अब गाँधी, जेपी, दीनदयाल उपाध्याय और रामनाथ गोयनका से अपने संबंधों और देश समाज में उनके योगदान को निरंतर रखने के लिए संस्थाएं खड़ी करना और उन्हें स्वतंत्र रूप से चलाना नानाजी के तीसरे पहर का संकल्प है। दीनदयाल उपाध्याय तो संघ और जनसंघ के थे लेकिन गाँधी, जेपी और रामनाथ गोयनका को तो आप संघी नहीं कह सकते ना! या नानाजी के अपना लेने से वे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हो गए हैं?” (उपर्युक्त)

भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा है, “चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और उनके साथियों से मुलाकात की। दीनदयाल शोध संस्थान, ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है। यह प्रारूप भारत के लिये सर्वथा उपयुक्त है। विकास कार्यों से अलग दीनदयाल उपाध्याय संस्थान विवाद-मुक्त समाज की स्थापना में भी मदद करता है। मैं समझता हूँ कि चित्रकूट के आसपास अस्सी गाँव मुकदमेबाजी से मुक्त हैं। इसके अलावा इन गाँवों के लोगों ने सर्वसम्मति से यह फैसला किया है कि किसी भी विवाद का हल करने के लिये वे अदालत नहीं जायेंगे। यह भी तय हुआ है कि सभी विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिये जायेंगे। जैसा नानाजी देशमुख ने हमें बताया कि अगर लोग आपस में ही लड़ते झगड़ते रहेंगे तो विकास के लिये समय कहाँ बचेगा?” ( उद्धृत, sudarshannews.in राहुल पाण्डेय, 11 अक्टूबर 2020) इस तरह “मैं अपने लिए नहीं, अपनों के लिए हूँ”, इस लक्ष्य वाक्य पर चलते हुए महाराष्ट्र के इस समाजसेवी ने भारत के अनेक गाँवों की तस्वीर बदल दी।

1999 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने उन्हें एक बार फिर राज्यसभा का सांसद बनाया था।

प्रभाष जोशी ने लिखा है, “मोहनदास करमचंद गाँधी अगर ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को मान्य होकर महात्मा गाँधी हुए तो इसलिए कि अपने चारों दरवाजे और सभी खिड़कियाँ खुली रखने और दुनियाभर की हवाओं को आने-जाने देकर भी वे अपनी धरती में जड़ें जमाए रहे। उनकी शक्ति का स्रोत उनकी लोक संग्रह वृत्ति में था। जो एक दूसरे को फूटी आँखों न सुहाएं और मौका लगे तो फाड़ खाएं ऐसे अनगिनत लोगों को गाँधी ने अपने से जोड़ा। उनसे योग्यता और क्षमताभर काम लिया और उन्हें आखिर कुछ न कुछ बनाकर ही छोड़ा। देशभर में एक दूसरे को जानने समझने और बरतने वाली शिव जी की एक बारात गाँधी ने बनाई थी। उसके ज्यादा बाराती अब बचे नहीं हैं और सक्रिय तो और भी कम हैं।

नानाजी देशमुख मुझे उसी जमात के बचे-खुचे लोगों में से लगते हैं। मुझे मालूम है कि सब उन्हें संघी मानते हैं और वे खुद भी अपने को एकनिष्ठ स्यवंसेवक ही कहते हैं। नाथूराम गोडसे के सूत्र खोजकर संघ को भी गाँधी की हत्या के प्रेरक संगठनों में माना गया है। और अब हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी स्वदेशी आंदोलन चला रहा है लेकिन गाँधी को मानने वाले संघ में कितने लोग हैं? बुद्ध, महावीर और गाँधी की अहिंसा को हिंदुओं के पराभव के लिए जिम्मेदार मानने वाले प्रतिक्रियावादी, संघ में बजरंग दल से कोई कम नहीं हैं। लेकिन नानाजी देशमुख के मित्र और परिवार गाँधी, मार्क्स, सावरकर, अरविंद और एडम स्मिथ सब को मानने वालों में हैं।” (उद्धृत, satyagrah.scroll.in, 27 फरवरी 2021को पुनर्प्रकाशित, ‘चित्रकूट के घाट पर’ लेख से)

नानाजी का निधन भी चित्रकूट में ही रहते हुए 27 फ़रवरी 2010 को हुआ। वे जब बीमार हुए तो उन्हें इलाज के लिए दिल्ली ले जाने का प्रयास किया गया किन्तु उन्होंने दिल्ली जाने से मना कर दिया। उन्होंने अपना शरीर मेडिकल के छात्रों के शोध हेतु दान कर दिया था।

मुझे बार -बार लगता है कि बचपन में नानाजी यदि डॉ. हेडगेवार की जगह महात्मा गाँधी के संपर्क में आए होते तो आजादी के आन्दोलन के लिए जेल भी गए होते और लाठियाँ भी खाई होतीं। आदमी को निर्मित करने में निश्चित रूप से परिस्थितियों की मुख्य भूमिका होती है।

वर्ष 2019 में नानाजी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।

जन्मदिन के अवसर पर हम राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में नानाजी के महान योगदान का स्मरण करते हैं और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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