
जननायक कर्पूरी ठाकुर: सामाजिक न्याय के अप्रतिम योद्धा
38वीं पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि
17 फरवरी। यह तारीख बिहार की राजनीति और भारतीय समाजवादी आंदोलन के इतिहास में एक विशेष स्थान रखती है। 1988 में आज ही के दिन एक ऐसा नेता हमेशा के लिए लोगों के बीच से चला गया, जिसने सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए भी कभी सत्ता को भोग नहीं बनाया, बल्कि उसे वंचितों के उत्थान का हथियार बनाया। हम बात कर रहे हैं ‘जननायक’ कर्पूरी ठाकुर की, जिनकी 38वीं पुण्यतिथि पर पूरा बिहार उन्हें नमन कर रहा है।
समस्तीपुर जिले के एक छोटे से गांव पितौंझिया (अब कर्पूरीग्राम) में 24 जनवरी 1924 को एक नाई (हज्जाम) परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था, लेकिन इन्हीं संघर्षों ने उन्हें ‘जननायक’ बनाया। उनके पिता गोकुल ठाकुर अशिक्षित थे, लेकिन उन्होंने बेटे की पढ़ाई पर जोर दिया। कर्पूरी बचपन से ही मेधावी थे। सात किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना और फिर मैट्रिक में प्रथम श्रेणी आना, यह उनकी लगन को दर्शाता है।
उनके जीवन का एक किस्सा बेहद मार्मिक है। मैट्रिक में प्रथम श्रेणी आने पर उनके पिता उन्हें एक स्थानीय सामंत के पास ले गए और गर्व से बताया कि उनके बेटे ने यह उपलब्धि हासिल की है। इस पर उस सामंत ने तुरंत अपना पैर टेबल पर रखते हुए कहा, “अच्छा, फर्स्ट डिविजन से पास किए हो, चलो मेरा पैर दबाओ। पढ़-लिखकर कर ही क्या लोगे? आखिर में उस्तरा ही तो पकड़ना है”। यह वह कटु सत्य था, जो उस समय के सामाजिक ताने-बाने की पीड़ा बयां करता है। इस अपमान ने कर्पूरी को तोड़ा नहीं, बल्कि उनके मन में यह बीज बो दिया कि राजनीति सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम है।
स्वतंत्रता सेनानी से मुख्यमंत्री तक का सफर
कर्पूरी ठाकुर पर डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े और जेल गए। आजादी के बाद उन्होंने समाजवाद की राह पकड़ी और 1952 में वे पहली बार विधायक चुने गए। इसके बाद वे कभी चुनाव नहीं हारे। वे दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने – पहली बार दिसंबर 1970 से जून 1971 तक और दूसरी बार जून 1977 से अप्रैल 1979 तक।

उनका कार्यकाल भले ही लंबा नहीं रहा, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्यों ने बिहार की राजनीति और समाज की दिशा ही बदल दी। वे बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे।
वो ऐतिहासिक फैसले जो बने मील का पत्थर
कर्पूरी ठाकुर ने हमेशा शिक्षा को सामाजिक बदलाव की कुंजी माना। 1967 में जब वे उपमुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री थे, तो उन्होंने अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। उस दौर में इस फैसले की कटु आलोचना हुई और लोग ‘कर्पूरी डिविजन’ जैसे शब्दों से उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि गरीब और पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खुल गए। वे देश के पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने मैट्रिक तक की शिक्षा मुफ्त करने की घोषणा की। उन्होंने उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा दिया और मिशनरी स्कूलों में हिंदी में पढ़ाई शुरू करवाई।

उनकी सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि थी- पिछड़ों में अति-पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था। 1978 में उन्होंने मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए सरकारी नौकरियों में पिछड़ों को 26 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया। सबसे क्रांतिकारी पहल यह थी कि इस 26 प्रतिशत में भी उन्होंने ‘कोटा के अंदर कोटा’ की व्यवस्था कर अति-पिछड़ों को एक अलग हिस्सा दिया। यह फैसला इतना तूफानी था कि इसके खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया और अंततः उनकी सरकार गिर गई। उन्होंने सत्ता की कुर्बानी दी, लेकिन सामाजिक न्याय से समझौता नहीं किया।
सादगी और ईमानदारी की मूर्ति
कर्पूरी ठाकुर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार थे। उनकी सादगी के किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं। जब वे मुख्यमंत्री थे, तो उनका अपना पटना में एक मकान तक नहीं था। उनके बहनोई ने नौकरी के लिए सिफारिश मांगी, तो उन्होंने जेब से 50 रुपये निकालकर कहा, “जाइए, उस्तरा खरीदिए और अपना पुश्तैनी काम कीजिए”। उनके बेटे रामनाथ ठाकुर को लिखे एक पत्र में वे हमेशा तीन बातें लिखते थे- “तुम इससे प्रभावित नहीं होना। कोई लोभ लालच देगा, तो उस लोभ में मत आना। मेरी बदनामी होगी”।

जब उनके पिता के साथ किसी सवर्ण ने मारपीट की, तो डीएम ने केस दर्ज करना चाहा। कर्पूरी ठाकुर ने रोकते हुए कहा, “डीएम साहब, आप मुख्यमंत्री के पिता को तो बचा सकते हैं, लेकिन उन हज़ारों पिताओं का क्या जो हर दिन पिटते हैं और प्रशासन को पता तक नहीं चलता?”। 1977 में जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन पर वे फटे कुर्ते में शामिल हुए। तब नेता चंद्रशेखर ने उनके लिए दान मांगा, लेकिन कर्पूरी जी ने वह राशि मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा दी।
आज की प्रासंगिकता और भारत रत्न
कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व इतना विराट था कि आज हर राजनीतिक दल उनकी विरासत को अपने साथ जोड़ना चाहता है। चाहे वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, जिन्होंने 2024 में उनके जन्म शताब्दी वर्ष पर उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, या फिर विपक्ष के नेता हों, सभी उनके सामाजिक न्याय के मॉडल को अपना प्रेरणास्रोत बताते हैं।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि राजनीति सत्ता पाने का नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचाने का माध्यम है। 17 फरवरी 1988 को जब वे इस दुनिया से विदा हुए, तो उनके पास अपना एक मकान भी नहीं था, लेकिन उन्होंने हमें एक ऐसी राजनीतिक चेतना और सामाजिक न्याय की ऐसी विरासत दी, जो आने वाली सदियों तक भारतीय लोकतंत्र का मार्गदर्शन करती रहेगी। ‘जननायक’ वास्तव में सदियों में एक बार जन्म लेते हैं। उनकी 38वीं पुण्यतिथि पर उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
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