
स्वरूप, संकट और विडम्बना
वर्तमान सदी का लगभग चौथाई भाग बीत चुका है। आज शायद विश्व में केवल कुछ ही देश ऐसे बचे हैं जो स्वयं को लोकतान्त्रिक नहीं कहते। भारत स्वयं को लोकतन्त्र की जननी बताता है, संयुक्त राज्य अमेरिका अपने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश मानता है और इजराइल भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र होने का दावा करता है। रूस, चीन और उत्तर कोरिया भी अपनी राजनीतिक व्यवस्था को लोकतान्त्रिक बताने का प्रयास करते हैं।
इस प्रकार लोकतन्त्र आज विश्व राजनीति की सबसे व्यापक वैधता का आधार बन चुका है। किन्तु आधुनिक लोकतन्त्र का सबसे बड़ा संकट चुनावों का अभाव नहीं, बल्कि लोकतान्त्रिक संस्थाओं, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक स्वतन्त्रताओं का भीतर से होता क्षरण है। लगभग हर शासक लोकतन्त्र की भाषा बोलता है, पर उसकी कार्यशैली अनेक बार लोकतान्त्रिक मर्यादाओं से दूर चली जाती है। इसलिए आज लोकतन्त्र के वास्तविक स्वरूप, उसके संकट और उसकी विडम्बनाओं पर नये सिरे से विचार की आवश्यकता है।
अधिकांश नेतृत्व वर्ग की चिन्ता लोकतन्त्र की वास्तविक कार्यप्रणाली को समझने की नहीं होती। उसकी पहली और अन्तिम चिन्ता चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज होने की रहती है। लोकतन्त्र नागरिक अधिकारों, संवैधानिक मर्यादाओं, संस्थागत सन्तुलन, असहमति के सम्मान और जनभागीदारी की बहुआयामी व्यवस्था है। किन्तु सत्ता प्राप्ति का लक्ष्य सामने आते ही ये सभी मूल्य पीछे छूटने लगते हैं। सामन्तवादी, निर्वाचित, सैन्य अथवा तानाशाह—सभी इतिहास में लोकतान्त्रिक शासक के रूप में दर्ज होना चाहते हैं। इस दृष्टि से चरम दक्षिणपन्थ और चरम वामपन्थ, दोनों अनेक बार समान धरातल पर दिखाई देते हैं। हिटलर और मुसोलिनी स्वयं को जनता का प्रतिनिधि बताते थे। स्टालिन और माओ ने भी स्वयं को कभी अधिनायकवादी घोषित नहीं किया। मुस्लिम देशों के राजशाही शासक भी अपने को तानाशाह कहलाना पसन्द नहीं करते। पाकिस्तान का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ लोकतान्त्रिक सरकारें बनीं, किन्तु पाँचवें दशक के मध्य से ही वास्तविक शक्ति सेना के हाथों में रही। वहाँ निर्वाचित सरकार की भूमिका बार-बार सीमित होती रही है।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के युद्धों पर दृष्टि डालें तो एक विचित्र विडम्बना सामने आती है। दो विश्वयुद्धों सहित खाड़ी, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन और भारत-पाकिस्तान जैसे अनेक संघर्षों के सूत्रधार सामन्ती राजा-महाराजा नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतान्त्रिक या निर्वाचित सरकारें रही हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मध्ययुगीन वंशवादी शासकों और आधुनिक निर्वाचित शासकों की युद्ध-प्रवृत्ति में मूलभूत अन्तर नहीं आया है। अन्तर केवल हथियारों और तकनीक का है।
विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की विदेश नीति को लेकर भी ऐसे प्रश्न उठते रहे हैं। वेनेज़ुएला, इराक, अफगानिस्तान और ईरान जैसे देशों के सन्दर्भ में बार-बार यह बहस सामने आती रही है कि क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र को दूसरे सम्प्रभु देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का नैतिक अधिकार है? इसी प्रकार इजराइल और फिलिस्तीन के बीच जारी संघर्ष ने भी लोकतन्त्र और मानवीय मूल्यों पर गम्भीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। गजा और लेबनान में हुए व्यापक विनाश तथा बड़ी संख्या में नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की मृत्यु ने पूरी दुनिया को विचलित किया है। लोकतान्त्रिक सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे युद्ध के स्थान पर संवाद और अन्तरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करें, किन्तु व्यवहार में अनेक बार शक्ति ही न्याय का आधार बन जाती है।
मध्ययुग में शक्तिशाली राजा कमजोर राज्यों पर आक्रमण कर उनकी सम्पदा पर अधिकार कर लेते थे, शासकों को बन्दी बनाते थे और मनमाना कर वसूलते थे। आधुनिक युग में भी जब शक्तिशाली राष्ट्र अपने सैन्य और आर्थिक प्रभाव का उपयोग कर दूसरे देशों पर दबाव बनाते हैं, तब अनेक लोगों को इतिहास की वही प्रवृत्ति नये रूप में दिखाई देती है। यही कारण है कि लोकतन्त्र के नाम पर संचालित अन्तरराष्ट्रीय राजनीति पर बार-बार प्रश्न उठते हैं। यदि लोकतन्त्र का अर्थ केवल शक्तिशाली राष्ट्रों के हितों की रक्षा रह जाए, तो उसकी नैतिक विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है।
राजनीतिक भाषा भी लोकतन्त्र की गुणवत्ता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक होती है। जब किसी लोकतान्त्रिक देश का सर्वोच्च निर्वाचित नेता दूसरे राष्ट्र को ‘नेस्तनाबूद’ कर देने या उसे ‘पाषाण युग’ में पहुँचा देने जैसी भाषा का प्रयोग करता है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या ऐसी भाषा आधुनिक लोकतान्त्रिक संवेदनशीलता के अनुकूल है?
आधुनिक युग के लोकतान्त्रिक देशों के बीच जितने भी बड़े युद्ध हुए हैं, उनमें जनता की प्रत्यक्ष सहमति प्रायः अनुपस्थित रही है। वियतनाम युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण है। अमेरिकी जनता के व्यापक विरोध और वियतनामी जनता के दृढ़ प्रतिरोध के कारण अन्ततः अमेरिका को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। इसी प्रकार आज भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या किसी देश की जनता वास्तव में युद्ध चाहती है, अथवा युद्ध सत्ता-प्रतिस्पर्धा, सामरिक हितों और भू-राजनीतिक महत्वाकाँक्षाओं का परिणाम होता है? तिब्बत पर चीन का नियन्त्रण, रूस-यूक्रेन युद्ध अथवा पश्चिम एशिया के संघर्ष—इन सभी घटनाओं के सन्दर्भ में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि लोकतन्त्र में जनता की वास्तविक इच्छा का स्थान कहाँ है? यदि लोकतन्त्र अन्ततः ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ या ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’ की नीति पर उतर आए, तो उसका नैतिक आधार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
इक्कीसवीं सदी में लोकतन्त्र के सामने सबसे बड़ा संकट केवल सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि सत्ता के केन्द्रीकरण का है। आधुनिक शासक संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग करते हुए लोकतन्त्र का गला धीरे-धीरे घोंटने की कला में अधिक दक्ष होते जा रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इसका प्रमुख उदाहरण हैं। 31 दिसम्बर 1999 से वे किसी न किसी रूप में सत्ता के केन्द्र में बने हुए हैं। कुछ वर्षों तक प्रधानमन्त्री रहने के बाद वे पुनः राष्ट्रपति बने और लगातार चुनाव जीतते रहे। उनके प्रमुख राजनीतिक विरोधियों का क्रमशः कमजोर पड़ना या राजनीतिक परिदृश्य से हट जाना इस बात का संकेत माना जाता है कि लोकतान्त्रिक संस्थाएँ तभी सार्थक रहती हैं, जब विपक्ष स्वतन्त्र और प्रभावी बना रहे।
चीन में राष्ट्रपति शी चिनफिंग की स्थिति भी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है। 2013 से वे राष्ट्रपति हैं और संवैधानिक संशोधनों के बाद उनके कार्यकाल की सीमा भी समाप्त हो चुकी है। वे राष्ट्रपति के साथ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव भी हैं तथा पार्टी, शासन और सेना पर उनकी मजबूत पकड़ है।
रूस और चीन, दोनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि मार्क्सवादी रही है, किन्तु सत्ता के केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति अनेक पर्यवेक्षकों को सामन्ती शासन की याद दिलाती है। उत्तर कोरिया में तो तीन पीढ़ियों से एक ही परिवार का शासन चला आ रहा है। वहाँ चुनाव अवश्य होते हैं, किन्तु वास्तविक सत्ता एक वंश के हाथों में केन्द्रित है। इस प्रकार लोकतन्त्र का बाहरी ढाँचा बना रहता है, जबकि सत्ता की प्रकृति एकतन्त्रीय बनी रहती है।
स्पष्ट है कि आधुनिक लोकतन्त्र का सबसे बड़ा संकट बाहर से नहीं, भीतर से उत्पन्न हो रहा है। चुनाव, संविधान और लोकतान्त्रिक संस्थाएँ तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ नागरिक स्वतन्त्रता, सत्ता का विकेन्द्रीकरण, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और असहमति का सम्मान भी जुड़ा हो। अन्यथा लोकतन्त्र केवल एक राजनीतिक आवरण बनकर रह जाएगा, जिसके भीतर सामन्तवाद, अधिनायकवाद और विस्तारवाद नये रूपों में जीवित रहेंगे। लोकतन्त्र की वास्तविक रक्षा चुनावों से नहीं, बल्कि लोकतान्त्रिक चेतना, संस्थागत स्वायत्तता और जागरूक नागरिक समाज से ही सम्भव है।
पूँजीवादी लोकतान्त्रिक देशों के निर्वाचित शासकों की स्थिति भी बहुत भिन्न नहीं दिखाई देती। भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की शासन-शैली को लेकर भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के सन्दर्भ में गम्भीर प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। बारह वर्षों के मोदी शासन में भारत की लोकतान्त्रिक स्थिति पर अनेक राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं ने चिन्ता व्यक्त की है। चुनावी लोकतन्त्र बने रहने के बावजूद सत्ता के बढ़ते केन्द्रीकरण, संस्थाओं की स्वायत्तता, मीडिया की स्वतन्त्रता तथा विपक्ष की भूमिका को लेकर लगातार बहस चल रही है। 2014 में प्रधानमन्त्री बनने के बाद मोदी ने आज तक कोई खुली प्रेस वार्ता नहीं की। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासक और मीडिया के बीच प्रत्यक्ष संवाद एक महत्त्वपूर्ण सेतु माना जाता है। नेहरू से मनमोहन सिंह तक लगभग सभी प्रधानमन्त्रियों ने प्रेस से संवाद किया, किन्तु मोदी ने इस परम्परा से दूरी बनाए रखी।
नोटबन्दी, चुनावी बॉन्ड, केन्द्रीय जाँच एजेंसियों के उपयोग, राज्यपालों की भूमिका, दल-बदल, राजनीतिक ध्रुवीकरण तथा ‘कॉंग्रेस-मुक्त भारत’ जैसे अभियानों को लेकर भी आलोचकों ने लोकतान्त्रिक संस्थाओं के क्षरण की आशंका व्यक्त की है। संघ परिवार का घोषित वैचारिक लक्ष्य भी संविधान में व्यापक परिवर्तन और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना से जोड़ा जाता रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प ने 2024 के चुनाव में ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का नारा दिया था, किन्तु उनकी आक्रामक और व्यक्तिकेन्द्रित राजनीति ने अमेरिकी लोकतन्त्र को भी तीखी बहसों के केन्द्र में ला खड़ा किया है। इसी प्रकार इजराइल के प्रधानमन्त्री बेंजामिन नेतन्याहू भी अपने देश में भ्रष्टाचार के आरोपों, जन-विरोध और युद्धनीति को लेकर निरन्तर विवादों में रहे हैं। इस प्रकार मोदी, ट्रम्प और नेतन्याहू की राजनीतिक शैली को अनेक विश्लेषक निर्वाचित किन्तु अत्यधिक केन्द्रीकृत सत्ता की प्रवृत्ति के उदाहरण के रूप में देखते हैं।
लोकतन्त्र का वास्तविक अर्थ व्यक्ति, समाज और राज्य—तीनों के व्यवहार का लोकतान्त्रिक होना है। किसी राष्ट्र की महानता उसकी सैन्य शक्ति या आर्थिक सामर्थ्य से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के प्रति उसके व्यवहार, संवैधानिक प्रतिबद्धता और न्यायपूर्ण शासन से निर्धारित होती है। इसलिए लोकतन्त्र को केवल ‘वोटतन्त्र’ तक सीमित न रहने दें। उसे व्यक्तिकेन्द्रित, एकतन्त्रीय और कुलीनतन्त्रीय प्रवृत्तियों से बचाते हुए वास्तविक अर्थों में सर्वजन हिताय और जनसहभागिता पर आधारित व्यवस्था बनाया जाना चाहिए।