शोध आलेख

मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यासों में स्त्री संघर्ष के विविध आयाम

 

शोध सार

यह शोध आलेख कुलश्रेष्ठ के प्रमुख उपन्यासों के माध्यम से स्त्री जीवन के संघर्ष की जांच करता है। हम देखेंगे कि कैसे उनके लेखन में स्त्री का संघर्ष सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और मिथकीय आयामों से जुड़ा है। जो उनके कार्यों को गहराई से रेखांकित करते हैं। इस आलेख का उद्देश्य यह दिखाना है कि कुलश्रेष्ठ का लेखन स्त्री-संघर्ष को न केवल चित्रित करता है, बल्कि उसे चुनौती भी देता है, जिससे हिंदी साहित्य में एक नई दृष्टि विकसित होती है। कुलश्रेष्ठ की कहानियां और उपन्यास आधुनिक संदर्भों से भरे हैं, जहां स्त्री की स्थिति को सामाजिक आर्थिक, मानसिक एवं राजनैतिक शोषण के रूप में दर्शाया गया है।

बीज शब्द- मनोवैज्ञानिक, संघर्ष, विस्थापन, पितृसत्ता, मिथकीय पुनर्विश्लेषण, स्किजोफ्रेनिया, इकोलॉजी

परिचय

समकालीन हिंदी साहित्य में मनीषा कुलश्रेष्ठ एक प्रमुख नाम हैं, जिनका लेखन स्त्री-विमर्श, मनोवैज्ञानिक गहराइयों, सामाजिक संघर्षों और मिथकीय पुनर्विश्लेषणों से समृद्ध है। 26 अगस्त 1967 को जोधपुर, राजस्थान में जन्मीं कुलश्रेष्ठ ने विज्ञान में स्नातक और हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है। उनके लेखन की शुरुआत 1990 के दशक के अंत में हुई, और उन्होंने अब तक कई कहानी संग्रह और उपन्यास रचे हैं, जिनमें ‘शिगाफ’ (2010), ‘शालभंजिका’ (2012), ‘पंचकन्या’ (2014), ‘स्वप्नपाश’ (2016 ), ‘मल्लिका’ (2019), ‘सोफ़िया’(2021)  और ‘त्रिमाया’ (2025) प्रमुख हैं। मनीषा जी का लेखन स्त्री जीवन की जटिलताओं को उजागर करता है, जहां स्त्री न केवल सामाजिक बंधनों से जूझती है, बल्कि आंतरिक मनोवैज्ञानिक संघर्षों, विस्थापन की पीड़ा और पितृसत्तात्मक संरचनाओं से भी लड़ती है।

मूल आलेख

उनके उपन्यासों में स्त्री जीवन का संघर्ष एक केंद्रीय विषय है, जो विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। यह संघर्ष केवल बाहरी सामाजिक दबावों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्त्री की पहचान, स्वतंत्रता, कामुकता और सृजनशीलता से जुड़ा है। कुलश्रेष्ठ की नायिकाएं अक्सर पितृसत्ता की जंजीरों में बंधी होती हैं, लेकिन वे अपनी आवाज उठाती हैं, चाहे वह मनोवैज्ञानिक बीमारी से लड़कर हो या मिथकों को नए सिरे से व्याख्यायित करके। उदाहरण के लिए, ‘स्वप्नपाश’ में स्किजोफ्रेनिया से पीड़ित स्त्री का संघर्ष मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को सामने लाता है, जबकि ‘पंचकन्या’ में मिथकीय स्त्रियों के माध्यम से सतीत्व और मातृत्व से मुक्ति की बात की जाती है। कुलश्रेष्ठ का लेखन स्त्री-विमर्श की नई व्याख्या प्रस्तुत करता है, जहां स्त्री न केवल पीड़ित है, बल्कि सशक्त और विद्रोही भी।

मनीषा कुलश्रेष्ठ का पहला प्रमुख उपन्यास ‘शिगाफ’  कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहां नायिका अमिता के माध्यम से स्त्री जीवन का संघर्ष प्रमुखता से उभरता है। उपन्यास में विस्थापन का दर्द केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और पहचान से जुड़ा है। अमिता अपने ब्लॉग में इस उजड़ने की पीड़ा को बड़े मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करते हुए लिखती है- “कश्मीरी हिन्दुओं का उजड़ना … एक पूरी कौम का इस जमीन से उखड़ना किसी इकोलॉजी सिस्टम के बिगड़ने जैसा है ”।1 कुलश्रेष्ठ यहां दिखाती हैं कि विस्थापन स्त्री के लिए दोहरा संघर्ष है एक तो घर-परिवार से अलगाव, दूसरा पितृसत्तात्मक समाज में अपनी पहचान की खोज। यहाँ स्त्री का अपने जड़ से कटने के संघर्ष का मार्मिक चित्रण हुआ है।   

‘स्वप्नपाश’ मनीषा जी का दूसरा उपन्यास है, जो स्किजोफ्रेनिया से पीड़ित नायिका गुलनाज फरीबा के जीवन पर केंद्रित है। यहां स्त्री जीवन का संघर्ष मनोवैज्ञानिक आयाम में प्रकट होता है, जहां अतीत की चोटें वर्तमान को बंधक बना लेती हैं। गुलनाज का संघर्ष केवल बीमारी से नहीं, बल्कि समाज की स्त्री से अपेक्षाओं से है।। प्राक्कथन में लेखिका  ई.एल डॉक्टरों की राय को रेखांकित करते हुए लिखती हैं- “किसी भी फॉर्म में स्किजोफ्रेनिया पीड़ादायी है।”2  उपन्यास लिखने के पीछे की मंशा को स्पष्ट करते हुए  लिखती है- “ स्किजोफ्रेनिक पागल नहीं होते उन्हें सहानुभूति की जरुरत होती है, स्किजोफ्रेनिक हिंसक होते नहीं हैं, लेकिन उनके साथ की गई उपेक्षा, डांट या मार, शराब और गलत दवाएं उन्हें हिंसक बनाती है। सच तो यह है कि इस उपेक्षा और सामाजिक अलगाव के चलते स्किजोफ्रेनिक आत्मघाती होते चले जाते हैं। हमें उन्हें अपने साथ लेना होगा, उनके मति भ्रमों के साथ, उनकी हताशाओं के बावजूद।”3    लेखिका दिखाती हैं कि स्त्री का मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य अक्सर अनदेखा रहता है, और वह अकेले ही अपनी लड़ाई लड़ती है। यह उपन्यास साबित करता है कि स्त्री का संघर्ष आंतरिक है, जहां समाज की अनदेखी उसे और अकेला कर देती है।

‘पंचकन्या’ कुलश्रेष्ठ का महत्वपूर्ण उपन्यास है, जहां मिथकीय कन्याओं-अहल्या, द्रौपदी, कुंती, तारा, मंदोदरी- के जीवन को आधुनिक संदर्भ में व्याख्यायित किया गया है। यहां स्त्री जीवन का संघर्ष मिथकों में निहित पितृसत्ता से है, जहां कुलश्रेष्ठ सतीत्व और मातृत्व से मुक्त स्त्री की सृजनशीलता पर जोर देती हैं। उपन्यास में प्रत्येक कन्या का संघर्ष अलग है: अहल्या का पत्थर बनना स्त्री की दमन की प्रतीक है, द्रौपदी का द्यूतक्रीड़ा में अपमान पितृसत्ता की क्रूरता दर्शाता है। कुलश्रेष्ठ इन मिथकों को तोड़ती हैं, और स्त्री को सशक्त बनाती जहां स्त्री का संघर्ष मिथकों से मुक्ति का है। प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-विमर्श की नई व्याख्या करता है, जहां लेखिका स्त्री को विद्रोही बनाती हैं। पंचकन्या में संघर्ष सृजन का है, जहां स्त्री अपनी कहानी खुद लिखती है।

‘शालभंजिका’ चेहरे की तलाश की कथा है। नायक चेतन अपनी पुरानी प्रेमिका पदमा को आधार बनाकर फिल्म बनाना चाहता है।  इसके जरिय उसे अपना खालीपन भरना है। पदमा के किरदार के लिए उसने ग्रेशल को चुना है। जो न केवल किरदार को बल्कि चेतन के मन में भी पदमा को जिन्दा कर देती है। उपन्यास में पदमा-चेतन-ग्रेशल के रिश्ते स्त्री-पुरुष के बदलते रिश्तों की कहानी कहते हैं। प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के जटिल संबंधों को एक नये नजरिय से परखते हुए मन और देह दोनों की बातों को सामने रखती है। इसमें स्त्री-पुरुष जिस सम्बन्ध की मांग से पैदा हुए हैं, उसमें जटिलता है। भविष्य के खुशनुमा तार उलझे हैं, जिन्हें दोनों सुलझाते हैं, झल्लाते हैं और बीच में छोड़कर उठ जाते हैं। यह मन और देह दोनों की जरुरत का सम्बन्ध हैं। वे संबंधों में भावुकता के खिलाफ है। फिर भी पुरुष चाहता है कि स्त्री की देह उसके सामने बिसात की तरह बिछी रहे और वह रोचकता के साथ यह मज़ेदार खेल खेले।  उपन्यास के अंत में जब फिल्म बनकर तैयार हो जाती है तो सबसे ज्यादा ग्रेशल के जीवन में बदलाव आता है। पूरे शूटिंग के दौरान चेतन ग्रेशल में पदमा की छवि तलाश कर रहा होता है जबकि ग्रेशल खुद पदमा की छवि को निभाते हुए स्वयं को खो देती है – “ एक अजनबी औरत का किरदार जिसे मैं ठीक से कभी नहीं जान पाऊँगी, मगर जिसकी हर हरकत मैं अपने जिस्म में ले चुकी थी। जिसकी हर जुम्बिश मेरे भीतर थी। वह औरत पदमा मेरे भीतर छूट गई थी, कैक्टस की काँटों की तरह। मैं एक-एक कर उन्हें निकाल रही थी।”4 उपन्यास के अंत तक आते-आते वह खुद को खो बैठती है। यहाँ लेखिका ने स्त्री जीवन की विडम्बना को चित्रित किया है जो पूरी कथा में संघर्षरत दिखाई पड़ती है जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं बचता है।

‘सोफ़िया’ उपन्यास एक ऐसी प्रेम कथा है जो समाज के असहिष्णु चेहरे को बेनकाब करती है। नायिका सोफ़िया प्रगतिशील परिवार में जन्मी आधुनिक लड़की है। जिसे हिन्दू लड़के से प्रेम हो जाता है। परिवार के लोगों को जब इस प्रेम सम्बन्ध के बारे में जब पता चलता है तो उस प्रेमी की हत्या करवा दी जाती है। सोफ़िया आजीवन अकेलापन और प्रेम से उपजे पीड़ा को सहती है। लेकिन प्रेम है कि हमेशा अपने साथ नई उम्मीदें, नई चाह लेकर फिर उठ खड़ी होती है संसार के किसी कोने में –“ जर्द पतों की मंजिल बस ख़ाक होती है? उसके बाद पाँव से रौद्र दिया जाना…मगर इसी खाक से तो फिर नई जिंदगी फूटती है।” 5  समाज में सोफ़िया जैसे न जाने कितने जोड़े बनेगें, जो अपने युवाकाल का मलंग समय, खूबसूरत शौक  और अलमस्तियों  के बीच अगाध प्रेम की अविस्मरणीय अनुभूतियाँ को जीना चाहेगी।

‘मल्लिका’ उपन्यास भारतेंदु हरिश्चन्द्र की प्रेमिका मल्लिका के जीवन पर आधारित है। एक ऐसी स्त्री जिसे साहित्य और इतिहास में हमेशा हाशिए पर रखा गया। इसमें स्त्री की अंतर्वेदना, आत्म संघर्ष, सामाजिक रूढ़ियों से संघर्ष और आत्म स्वीकृति की तलाशा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास में मल्लिका का बचपन बड़ी शान शौकत में बिता लेकिन विधाता के बचपन में ही उसका सुहाग छीन लिया जिसकी वजह से मल्लिका बाल विधवा हो गयी। पिता घर में रहते हुए जब मल्लिका के दुबले शरीर में करवट लेता यौवन लोगों को चुभने लगा था। मशहूर सज्जन विदुर जिला अधिकारी रंजन मजूमदार जैसे लोगों की आंखों में नागफनी उग आए थे। मल्लिका चाचा कह कर बुलाती थी लेकिन मजूमदार की नियत कुछ और थी- “चाचा जी क्यों कहती हो मल्लिका? मैं थोड़ा ही तो बड़ा हूं तुमसे। दुर्भाग्य ने मुझे ऐसा बना दिया है। मैं पागल हूं तुम्हारे लिए, एक साल से तपस्या कर रहा हूं। दिन-रात चेष्टा में रहता हूं कि मेरा प्रेम तुम पर असर करें लेकिन तुम्हारे मन में कोई बीज जमता नहीं। अब तो मिताई बाबू भी चाहते हैं कि तुम मुझसे विवाह कर लो।”6 राजा राममोहन राय के अनुसार विधवा विवाह अधर्म नहीं है लेकिन अधर्म है किसी की व्यवस्था का लाभ उठाना। यहाँ लेखिका ने स्त्री के बाल विधवा के बाद उत्पन्न संकट को अभिव्यक्त किया है। जिसे गिद्ध की भांति लोग अवसर पाते ही नोच देना चाहते हैं।

निष्कर्ष

मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यासों को पढ़ते हुए एक बात स्पष्ट हो जाती है कि उनके लिए स्त्री-संघर्ष कोई एकाकी मुद्दा नहीं है। वह विस्थापन में भी है, मानसिक बीमारी में भी, कामुकता में भी, मिथक में भी, इतिहास में भी है। उनकी नायिकाएँ कभी पूरी तरह विजयी नहीं होतीं, पर वे हार भी नहीं मानतीं। वे अपनी पीड़ा को भाषा बनाती हैं, कला बनाती हैं, विद्रोह बनाती हैं। लेखिका के सभी उपन्यासों में स्त्री पात्रों के संघर्ष भले ही अलग अलग है परन्तु उनकी स्त्रियाँ पितृसत्ता के नियमों के खिलाफ लड़ती नजर आती है। इसीलिए मनीषा कुलश्रेष्ठ समकालीन हिन्दी साहित्य की सबसे महत्त्वपूर्ण नारीवादी लेखिका है जो न केवल स्त्री की पीड़ा लिखती हैं, बल्कि उस पीड़ा के भीतर से नई स्त्री की संभावना को जन्म देती हैं

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

  1. मनीषा कुलश्रेष्ठ, शिगाफ़, राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2010, पृष्ठ सं 29
  2. मनीषा कुलश्रेष्ठ, स्वप्नपाश, सामयिक पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2022, पृष्ठ सं 7
  3. वही पृष्ठ सं 143
  4. मनीषा कुलश्रेष्ठ, शालभंजिका, सामयिक पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2022, पृष्ठ सं 144
  5. मनीषा कुलश्रेष्ठ, सोफ़िया, सामयिक पेपरबैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2021, पृष्ठ सं 143
  6. मनीषा कुलश्रेष्ठ, मल्लिका, राजपाल एंड संस, नई दिल्ली, संस्करण 2023, पृष्ठ सं 51

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किशोर कुमार

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं। सम्पर्क +919097577002, kishore.bhu95@gmail.com
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