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शख्सियत

 बंगाल में प्रेमचन्द जैसा लेखक क्यों नहीं हुआ?

 

 मैं प्रगतिशील लेखक संघ की लक्खीसराय ईकाई को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। हम सभी जानते हैं कि 1936 में जिस प्रलेस की स्थापना हुई उसकी सदारत, प्रेमचन्द ने की थी। इस महत्वपूर्ण मौके पर प्रेमचन्द ने जो वक्तव्य दिया ‘साहित्य का उद्देश्य ‘ वो आज भी बार-बार पढ़ा जाता है। सिर्फ साहित्य ही नहीं बल्कि रंगमंच सहित कला के सभी माध्यमों उसका महत्व आज भी बरकारार है। इस भाषण में उन्होंने पूछा कि ‘साहित्य किसे कहेंगे?’ प्रेमचन्द ने कहा साहित्य की बहुत सी परिभाषाएँ हैं लेकिन मेरे विचार से सर्वोत्तम परिभाषा है ‘जीवन की ओलाचना’।

 लेखक किसी देकी सीमा से बड़ा होता है

‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के स्थापना सम्मेलन में सज्जाद जहीर और उनके साथी शामिल थे। उसके पूर्व 1935 में जब पूरी दुनिया पर फासीवाद का खतरा मॅंडरा रहा था, स्पेन में फ्रैंको की तानाशाही स्थापित हो चुकी थी। मैक्सिम गोर्की ने दुनिया भर के लेखकों से पूछा ‘ तय करो किस ओर हो तुम’। ‘इस तरफ या उस तरफ’ यानी फासीवादी शक्तियों के साथ हैं कि जनपक्षधर ताकतों के साथ?

 1936 बड़ा महत्वपूर्ण वर्ष है। इसी साल दुनिया के तीन बड़े लेखकों की मृत्यु हो जाती है। चीन के लुून, रूस के मैक्सिम गोर्की और भारत के प्रेमचन्द। इन तीनों देशों को मिला दिया जाए तो आधी मानवता पूरी हो जाती है। जब मैक्सिम गोर्की की मृत्यु हुई तो उस समय प्रेमचन्द की तबीयत अच्छी नहीं थी। इसका जिक्र उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने अपनी किताब ‘प्रेमचन्द घर में’ में कहा है। जब प्रेमचन्द ने गोर्की की मौत की बात सुनी तो वहाँ जाने के लिए बचैन हो गये। शिवरानी देवी ने कहा एक तो आपकी स्थिति ठीक नहीं है और दूसरे वो तो एक विदेशी लेखक है, भारतीय नहीं है। प्रेमचन्द ने कहा कि मैक्सिम गोर्की जैसा लेखक देश की सीमा से बड़ा होता है।

30 साल में इन्टर 39 साल में ग्रेजुएट हुए प्रेमचन्द

शिवरानी देवी की उसी किताब में एक और दिलचस्प तथ्य है। हम सभी जानते हैं कि प्रेमचन्द का जन्म 1880 में हुआ था। प्रेमचन्द की पत्नी शिव रानी देवी ने ‘प्रेमचन्द घर मे’ बताया है कि प्रेमचन्द ने 1910 ई. में इन्टर की परीक्षा पास किया जब वे 30 वर्ष के थे और ग्रेज्युएट पास किया 1919 में यानी जब वे 39 साल के थे। हैरत होती है हिन्दी का इतना बड़ा लेखक प्रेमचन्द उनचालीस साल की उम्र में बी.ए की परीक्षा पास करते हैं। क्योंकि गणित में प्रेमचन्द काफी कमजोर थे। ग्रेजुएट करने के लिए गणित की परीक्षा में उत्तीर्ण होना बहुत आवश्यक होता था। जब गणित की अनिवार्यता जी बंदिश समाप्त हो गयी तब जाकर जाकर प्रेमचन्द ग्रेजुएट कर पाए।

 प्रेमचन्द जन्मशताब्दी वर्ष पर पहला आयोजन अहिन्दी भाषी पं बंगाल ने किया।

1980 में जब प्रेमचन्द की जन्माताब्दी मनायी जा रही थी तो किसी हिन्दी क्षेत्र की सरकार ने उनकी जयंती पर आयोजन नहीं किया था। पहला राजकीय आयोजन अहिन्दी भाषी राज्य पं बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने किया। कलकत्ते और पूरे पं बंगाल में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित हुए। किसान-मजदूरों के सबसे बड़े रचनाकार के रूप में प्रेमचन्द को याद किया गया था। करते इसके बाद बिहार और अन्य राज्यों की सरकारों ने जनशताब्दी मनाना शुरू किया। बिहार में नाटक के लिए बने राजकीय रंगाला का नामकरण ‘प्रेमचन्द रंगाला’ पर किया गया। प्रेमचन्द जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर कम्युनिस्ट आन्दोलन के बड़े नेता बी.टी.रणदिवे ने प्रेमचन्द पर अपने लेख एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही जो कई दशकों पूर्व फैज अहमद फैज की राय से बहुत मिलती जुलती थी। कि प्रेमचन्द दूर से देखने वाले रचनाकार नहीं बल्कि अपने साहित्य के सामाजिक यथार्थ के हिस्सा और खुद उसमें शामिल से नजर आते हैं।  

   बंकिमचन्द्र थे, रतचन्द्र और प्रेमचन्द्र

जब पचिम बंगाल में प्रेमचन्द जयंती मनाया जा रहा था कि कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक और बड़े नेता ई.एम.एस नंबूदिरीपाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल बंगाल के लेखकों से किया था। आपके यहाँ एक से बढ़कर एक रचनाकार हुए हैं बंकिमचन्द्र, शरतचन्द्र आदि। लेकिन कोई प्रेमचन्द क्यों नहीं पैदा हुआ? शरतरचन्द जैसा नारी मन की जटिलता को समझने वाला अप्रतिम रचनाकार बंगाल में हुए लेकिन प्रेमचन्द जैसा कोई क्यों नहीं है? इसका जवाब भी नंबूदिरीपाद खुद ही देते हैं कि बंगाल के अधिकांश बड़े लेखक खुद जमींदार थे। कलकत्ता शहर में निवास था उनका। और उनका जीवन-यापन गांव जी जमींदारी पर टिका था। किसानों के लगान से वे अपना खर्च चलाते थे।

वे अपनी रचनाओं में कलात्मक कौशल लाते हैं, मनःस्थितियों को सूक्ष्म पकड़ तो थी उन्हें पर किसान जीवन से इन लेखकों का कोई सीधा सरोकार नहीं था। लिहाजा वे प्रेमचन्द की तरह साहित्य नहीं रच सके। नंबूदिरीपाद ये भी बताते हैं कि उनके अपने राज्य केरल में जब तक जमींदारविरोधी वामपंथी आन्दोलन नहीं हुआ था तब तक केरल का साहित्य, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि बहुत पीछे था। इन आन्दोलनों ने इस तरह नये तरह का साहित्य पैदा किया। प्रेमचन्द किसानों के बारे लिख सके कोई स्वतःस्फूर्त ढंग से नहीं। वे खुद तो स्कूल इंस्पेक्टर थे। किसान जीवन को उन्होंने प्रयत्न करके जाना, समझा इस कारण ऐसी कहानियाँ वे लिख पाए।

 सुंदरता की कसौटी बदलने की बात की प्रेमचन्द ने

 प्रेमचन्द कहते हैं कि जो लोग समय की प्रतिकूलता का रोना रोते हैं, जिंदगी के बड़े मसायल, सवाल हैं उससे भागते हैं इसका मतलब है देश व समाज का बौद्धिक व वैचारिक पतन हो गया है। एक और महत्वपूर्ण बात उन्होंने की कि हमें ‘सुंदरता की कसौटी’ बदलनी होगी। लोग कहते हैं वहीं स्त्री सुंदर है जिसके गाल गुलाबी हों, होठ लाल हों। वैसी स्त्री क्यों नहीं खूबसूरत मानी जाती है? खेत की मेड़ पर जो अपने बच्चों को सुला रही है, पसीना बहा रही है वो सुंदर क्यों नहीं मानी जाती? उसका प्यार, उसका संघर्ष, उसकी ममता ये क्यों नहीं सुंदर हो सकता?

 पराधीन भारत में स्वाधीनता की आकांक्षा को जन्म देने वाले रचनाकार

‘ प्रगतिशील लेखक संघ ’ एक विराट साहित्यिक- सांस्कृतिक आन्दोलन था। मध्य काल में संतों व कवियों के भक्ति काल के पश्चात इतना बड़ा कोई सांस्कृतिक आन्दोलन नहीं भारत में पैदा हुआ। इन्हीं वजहों से प्रगतिशील लेखक संघ’ खड़ा हुआ तो उसपर दोतरफा हमला हुआ। अॅंग्रेज कहा करते थे कि ये आन्दोलन मास्को से प्रेरित है जबकि हिन्दू पुनरूत्थानवादी इसे भारतीय संस्कृति को तोड़ने वाला संघ बताया करते थे।

प्रगतिशील लेखक संघ से ब्रिटिश सरकार कितना भयभीत रहा करती थी। उसके दस्तावेजी सबूत प्रलेस, लक्खीसराय से निकलने वाली पत्रिका में आपने प्रकाशित किया है।

 प्रेमचन्द पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने पराधीन भारत में स्वाधीनता की चेतना पैदा किया। गुलाम भारत में आजादी की आकांक्षा जो जन्म दिया।। प्रेमचन्द इस कारण आज भी लोकप्रिय हैं कि उन्होंने किसानों को अपने लेखन का, सृजन का, रचनात्मक जीवन का केन्द्र बनाया। प्रेमचन्द की मशहूर कहानी ‘सोजे वतन’, जिसे हम सब बचपन में पढ़ चुके हैं। जिसमें पूछा जाता है कि ‘दुनिया की सबसे कीमती चीज क्या है?’ कहानी कहती है ‘‘ खून का वो आखिरी कतरा, जो वतन की हिफाजत में गिरे, दुनिया की सबसे कीमती चीज है’’ इस कहानी को ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त कर लिया जाता है।

 प्रेमचन्द के रचनात्मक जीवन में टर्निंग प्वांयट, महत्वपूर्ण मोड़ क्या है? वो है 1917 का साल। इसी वर्ष उनकी पहली कहानी ‘ उपदेश’’ आती है जिसमें राष्ट्रीय सवाल आते हैं। 1917 महात्मा गाँधी के चंपारण सत्याग्रह का साल था, साथ ही साथ अन्तराष्ट्रीय स्तर पर लेनिन के नेतृत्व वाला बोलेविक क्रान्ति का भी साल था। इन दोनों घटनाओं का प्रेमचन्द के लेखन पर ये निर्णायक प्रभाव बना रहता है।

  इकहरे अर्थों में साम्राज्यवादविरोधी नहीं थे प्रेमचन्द

 उनकी एक कहानी याद आती है ‘आहुति’ जिसकी चर्चा थोड़ी कम होती है। विश्वम्भर उसका नायक है। शहरों में शराब की दुकानों पर पिकेटिंग करता है, विदेशी कपड़ों की होली जलाता है लेकिन अंत में गाड़ी पकड़ कर जाने लगता है, किसानों के बीच। रूक्मिणी उसकी नायिका है, जो उसे स्टेशन पर मिलती है। नायक कहाँ जा रहा है? किसानों के बीच। वे गाँधी से अलग हट कर सोचने की कोशिश करने लगते हैं। प्रेमचन्द एक समय खुद को ‘गाँधी का कुदरती चेला कहा करते थे’। अब महात्मा गाँधी से प्रेमचन्द के अन्तर्विरोध भी उभरने लगते हैं। और ये अन्तर्विरोध उभरता है किसानों के प्रश्न के लेकर।

गाँधी जी मानते थे कि हमलोगों को अॅंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होना चाहिए। प्रेमचन्द ये सवाल उठाते हैं कि ठीक है हमें अॅंग्रेजों के उपनिवेशवाद के विरूद्ध लड़ना है, वो बहुत खराब है लेकिन इसे टिकाए हुए कौन है? उसके देशी आधार क्या हैं? अंग्रेजों की सेना हिन्दुस्तान में कभी भी तीस हजार से अधिक नहीं थी। फिर कैसे इतने बड़े देश पर वो लोग शासन कर पाए? पूरा अॅंग्रेजी राज किस पर टिका हुआ था? स्वदेशी जड़ें को कौन लोग सहारा दे रहे थे। प्रेमचन्द इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि वह थे जमींदार, समान्त। किसानों का निर्मम शोषण ये जमींदार किया करते हैं। इन्हीं वजहों से प्रेमचन्द ने किसानों के परिप्रेक्ष्य से सवालों को उठाना शुरू किया। प्रेमचन्द से पूर्व किसी साहित्यकार ने किसानों के नजरिए से समझने की कोशिश नहीं की थी। इस अर्थ में देखें तो प्रेमचन्द इकहरे अर्थों में साम्राज्यवादी नहीं थे की सिर्फ अंग्रेजों का तो विरोध करते रहे लेकिन उसके भारतीय दोस्तों पर चुप्पी साधे रहें।

प्रेमचन्द ओर सहजानन्द : साम्राज्यवाद का देशी आधार

जो बात साहित्य में प्रेमचन्द उठा रहे थे उस सवाल को भारतीय राजनीति में क्रान्तिकारी किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती लगभग उसी समय उठा रहे थे, जिनकी कर्मभूमि बिहार थी। स्वामी सहजानन्द सरस्वती कह रहे थे कि अॅंग्रेजों के उपनिवेशवाद को खत्म करना है तो उनके सामाजिक आधार, जमींदारों, पर चोट करिए। ये जमींदार ही उपनिवेशवाद की स्थानीय सहयोगी हैं। यही बात प्रेमचन्द भी उठा रहे थे। 1936 में ही ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के साथ साथ अखिल भारतीय किसान सभा का गठन किया गया। सहजानन्द इसके पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

 प्रेमचन्द धीरे-धीरे गाँधीवाद से मार्क्सवाद की ओर बढ़ रहे थे। अपनी पत्नी शिवरानी देवी से तो यहाँ तक कहा ‘‘मुझे तो लगता है कि भारत की मुक्ति का रास्ता वही है जो बोल्शेविकों का रास्ता है, लेनिन का रास्ता है।’’ 1933 के लगभग बगल के देश चीन में माओत्से तुंग आगे बढ़ने लगे। हुनान प्रांत की रिपोर्ट आने लगी। तब बहुत सारे नेताओं को भी उस रिपोर्ट के युगांतकारी महत्व के सम्बन्ध में नहीं पता था। प्रेमचन्द पहले आदमी थे जिन्होंने उसके महत्व का समझकर अपनी पत्रिका में उसे प्रकाशित किया और कहा ‘‘हमारे पड़ोसी मुलक ने किसानों की शक्ति किसानों की ताकत को पहचान लिया है लेकिन हिन्दुस्तान के नेताओं ने आज तक किसानों के महत्व को नहीं पहचाना है ’’।

 हिन्दुस्तान बंटवारे के पीछे जमींदारों की भूमिका

 प्रेमचन्द की इस बात का हिन्दुस्तान के इतिहास के लिहाज से भी बेहद महत्व रहा है। हिन्दुस्तान का जो बॅंटवारा हुआ उसके पीछे बड़ी मुस्लिम लीग का दो राष्ट्रवाद का सिद्धांत है। मुस्लिम लीग किसका संगठन था? मुस्लिम लीग जमींदारों का संगठन था, बिहार व उत्तरपदेश के एलीट यानी जमींदार मुसलमानों का संगठन। स्वामी सहजानन्द सरस्वती की सोच थी यदि जमींदारों विरोधी आन्दोलन को अंजाम तक पहुँचाया गया होता, किसानों के सवाल को राष्ट्रीय एजेंडा बनाया गया होता तो मुहम्मद अली जिन्ना को इतनी ताकत नहीं मिलती और पाकिस्तान की माँग भी न उठती।

दलितों का सवाल बड़े सवालों से जोड़ा प्रेमचन्द ने

 एक कहानी है प्रेमचन्द का ‘दूध का दाम’। आज प्रेमचन्द पर दलितों की मसले पर उपेक्षा का आरोप लगाया जाता है। प्रेमचन्द की कहानी में दलित ‘निगेटिव’ चरित्र के रूप में सामने आते हैं। दूध का दाम’ कहानी में एक छोटा बच्चा है। मंगल नाम है उसका। दोनों बच्चे घोड़ा बनने का खेल खेलते हैं। सवर्ण बच्चा दलित बच्चे को घोड़ा बनने को कहता है। तब वो दलित बच्चा कहता है कि ‘‘हमलोग तो आजतक हमेशा घोड़ा ही बनते आए हैं। आप सवारी करते आए हैं। लेकिन ये भी तय होना चाहिए कि हम भी सवारी कर सकते हैं। सिर्फ आप ही नहीं सवारी करेंगे।’’ ये नया चिन्तन आ रहा था प्रेमचन्द की कहानियों में। दलितों के सवाल को प्रेमचन्द सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं बल्कि बड़े सवालों से जोड़ने का प्रयास करते रहे।

 प्रेमचन्द के सभी बहुत कामों को अभी ठीक से नहीं देखा गया है। जैसे बच्चों के साहित्य को आज भी दोयम दर्ज का काम, कमतर काम माना जाता है। कुत्तों की कहानियाँ, जंगल की कहानियाँ कुत्तों के बीच इस बात पर चर्चा होती है कि हमारे बीच जातिवाद कहाँ से आया? फिर बात निकलकर आती है कि चूँकि हम मनुष्यों के मध्य रहते हैं इस कारण वहीं से ये दुर्गण आया है।interesting or unknown facts about Pandit Jawaharlal

जवाहर लाल नेहरू का जो मशहूर पत्र है अपनी बेटी इंदिरा के नाम। ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ जवाहर लाल नेहरू ने इसका अनुवाद प्रेमचन्द से कराया था। बाल साहित्य पर भी उनका बहुत काम है। प्रेमचन्द ने बहुत सारे विषयों पर लिखा। 1910 में ‘नया जमाना’ में चित्रकला पर लेख लिखा। इस लेख से उनके इस विषय पर उनकी गहरी पकड़ का अंदाजा लगता है। उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया है कि विदेश का आदमी यदि एक हफ्ते के लिए भी आता है तो वो अजंता-अलोरा की गुफाएँ देखने जाता है लेकिन हिंदुस्तानियों को जैसे इस महान कला की विरासत के बारे में केई जिज्ञासा, कोई उत्सुकता ही नहीं है। प्रेमचन्द की नजर समूची दुनिया पर थी।

ये पंडे-पुजारी हैं, टकेपंथी हैं हिन्दू जाति के कलंक हैं 

 पिछली बार जब भाजपा की केन्द्र में सरकार थी उसने तो प्रेमचन्द को पाठ्क्रमों से ही हटा दिया और मृदुला सिन्हा, जो अभी राज्यपाल हैं, जैसे दोयम दर्जे की लेखिका को शामिल कर दिया। आज दीनानाथ बत्रा भी उसी राह पर चलकर प्रेमचन्द, टैगोर आदि सबको हटा देने की सिफारिश करने लगे हैं। आखिर प्रेमचन्द से क्यों डर लगता है? क्योंकि वे संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, गणतांत्रिक व समाजवादी भारत की परिकल्पना करते थे। इन्हीं वजहों से प्रेमचन्द को अपने समय के प्रतिक्रियावादी लेखकों का केपभाजन बनना पड़ता था।

 प्रेमचन्द के जमाने में ज्योति प्रसाद निर्मल जैसे लोग तो कहते थे कि प्रेमचन्द ब्राहणों को हमेशा काले रंग से चित्रित करते हैं, उनके तमाम कहानियों- उपन्यास में ब्राह्रण पाखण्डी, अन्धविश्वासी व दुचरित्र क्यों आता है? जब ‘सद्गति’ कहानी छप कर आयी। ठाकुर सिद्धनाथ सिंह ने तो उन्हें ‘घृणा का प्रचारक’ कहा

प्रेमचन्द कहा करते थे कि ये जो पंडे-पुजारी हैं, टकेपंथी हैं ये हिन्दू जाति के कलंक हैं। जब तक इन पर हमला नहीं होगा हिन्दू धर्म का भला न होगा। इन वजहों से उनके समय के प्रतिक्रियावादी, हिन्दू पुनरूत्थानवादी सभी उनको भारतीय संस्कृति पर हमला करने वाला बताते थे। प्रेमचन्द आज ही उतने ही रैडिकल हैं, उनको फिर से ठीक से पढ़ा जाए, बातचीत की जाए।

 (प्रेमचन्द जयंती पर, प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के 80 वें वर्ष 2017 लक्खसीराय और 2018 में हाजीपुर में अनी अंकुर द्वारा दिये गये वक्तव्य पर आधारित)

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