स्त्री पुरूष से उतनी ही श्रेष्ठ है
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स्त्रीकाल
स्त्री पुरूष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अंधेरे से – मुंशी प्रेमचन्द
मैं धरा हूँ, मैं जननी, मैं हूँ उर्वरा मेरे आँचल में ममता का सागर भरा मेरी गोदी में सब सुख की नदियाँ भरी मेरे नयनों से स्नेह का सावन झरा दया मैं, क्षमा मैं, हूँ बह्मा सुता मैं हूँ…
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