सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का नाटक ‘बकरी’
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तीसरी घंटी
‘बकरी’ केवल घास नहीं खाती
जो लोग सत्ता के इर्द-गिर्द होते हैं, वे नहीं चाहते हैं कि उनके आस-पास ऐसी कोई आवाज़ सुनाई दे जो उनके विरुद्ध हो। किसी राजनीतिक-सामाजिक आन्दोलन में अगर व्यवस्था परिवर्तन का कोई स्वर सुनाई देता है तो वे सतर्क…
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