इतनी जल्द मोह-माया के बंधन तोड़ दिये
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स्त्रीकाल
कफ़न को तरसती बुधिया के नाम
बुधिया! … सम्बोधन में सिर्फ तुम्हारा नाम, बिना किसी विशेषण के, प्रेमचंद जी ने तो तुम्हें माधव की बीवी बुधिया कहकर कहानी आरम्भ की और ‘बैकुंठ की रानी’ बनाकर कहानी समाप्त कर दी मानो सचमुच तुम्हें मुक्ति मिल गयी।…
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