कर्पूरी ठाकुर

संरचनात्मक परिवर्तन का राजनीतिक योद्धा

 

भारतीय राजनीति को समझने के लिए यह सवाल पूछना ज़रूरी है कि इस समाज में राजनैतिक दलों की तुलना में व्यक्ति का महत्त्व क्यों है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो भारत की मौजूदा संसदीय राजनीति में अधिकांश दल व्यक्तिगत और पारिवारिक संपत्ति बन जाते हैं। कुछ ही ऐसे नेता हैं जिनके बच्चे राजनीति में नहीं आते हैं। इसलिए परिवारवाद के स्थापित मूल्य के विश्लेषण के लिए ऐसे राजनीतिज्ञों को भी समझना होगा जिन्होंने न परिवार को बढ़ावा दिया ना ही परिवारवाद को। इन नामों में बिहार के प्रसिद्ध समाजवादी राजनीतिज्ञ कर्पूरी ठाकुर प्रमुख हैं। बिहार सामन्तवाद से पूंजीवाद के बदलाव के बीच फँसा हुआ समाज है। यहां न तो सामंतवादी सामाजिक मूल्य पूरी तरह से समाप्त हुए हैं न ही पूंजीवादी नैतिकता पूरी तरह से स्थापित ही हो पाई है। अमूमन कोई समाज इस तरह के संक्रमण में थोड़े समय तक ही रहता है। लेकिन बिहार में यह प्रक्रिया कुछ ज्यादा ही लंबी हो गयी है। इस समाज की सामूहिक चेतना, प्रतीकात्मकता की अवधारणा, नेतृत्व और सामाजिक सुधार के गहरे मनोवैज्ञानिक आयामों को समझने के लिए कर्पूरी ठाकुर की राजनीति और उनका जीवन बहुत सहायक हो सकता है। केवल बिहार ही नहीं बल्कि भारतीय समाज में जाति और वर्ग की समानताओं को संबोधित करने में कर्पूरी ठाकुर का नेतृत्व विशेष रूप से प्रासंगिक है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाबा साहेब अंबेडकर ने दलित समुदाय की पीड़ा को समझा और उनके लिए संवैधानिक प्रावधानों का निर्माण किया। जिसका बड़ा फ़ायदा समाज को मिला। लेकिन भारतीय समाज की असमानता के कई और स्तर हैं। इसलिए उसकी सिर्फ गहरी जाँच पड़ताल पर्याप्त नहीं बल्कि एक ऐसी नीति की ज़रूरत है जो अस्मिता की राजनीति से ऊपर जा कर सामाजिक न्याय की परिकल्पना कर सके। इस बात का मंथन बिहार में पहले से ही चल रहा था। कांग्रेस के दलित नेता मुंगेरीलाल के नेतृत्व में जातीय असमानताओं को आधार बना कर 1971 में एक कमीशन बनाया गया था। इस कमीशन ने अपना रिपोर्ट 1975 में दिया। आपातकाल के बाद कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्य मंत्री बने और उन्होंने इस रिपोर्ट को आंशिक रूप से लागू किया। यह एक क्रांतिकारी कदम था और बिहार के समाज में बदलाव का एक आगाज था। एक तरह से सामूहिक चेतना में चल रहे मंथन का परिणाम भी।

जिस तरह के सामंती मूल्यों का यह समाज था उसमें इस नयी व्यवस्था को लागू करना कोई आसान काम नहीं था। एक तरफ़ तो बिहार की उच्च जाति के लिए यह अस्वीकार्य था दूसरी ओर उभरते प्रभुत्वशाली मध्यम जाति जिसे अब ओ बी सी कहा जाता है, उन्हें भी यह बात बहुत पसंद नहीं आयी। इन दोनों जातीय समूहों के बीच एक तीसरा जातीय समूह था जिसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब थी। कर्पूरी ठाकुर इसी तीसरी जाति समूह से आते थे और उनके लिए यह लाज़िमी था कि उस समूह के लिए भी न्याय की बात हो। इस नये समूह के लिए न्याय की बात करने में बड़ी समस्या थी। उनकी राजनैतिक चेतना इतनी प्रबुद्ध नहीं थी कि संगठित ताक़त के रूप में उनका उभार हो सके। बिना राजनैतिक एकता के उनके लिए कोई काम कर पाना आसान भी नहीं था। इसके सबसे बड़े विरोधी वही लोग थे जो अपने को समाजवादी भी बतलाते थे और सामाजिक न्याय की बात करते थे। सारे विरोधों के बावजूद कर्पूरी जी ने आंशिक रूप से ही सही मुंगेरीलाल कमीशन के कुछ रिफारिशों को लागू कर दिया।

समाज के दो बड़े हिस्सों में विरोध के बावजूद यदि कर्पूरी जी का एक राजनीतिज्ञ के रूप में सम्मान बना रह पाया तो उसका बड़ा कारण था उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी और समाजवादी चेतना के प्रति उनकी प्रतिबद्धता। जिस समाज में राजनैतिक आदर्शों की दुहाई तो सभी देते हैं लेकिन उनके प्रति प्रतिबद्ध कम लोग रह पाते हैं वहाँ कर्पूरी जी इस बात के एक बड़े उदाहरण हैं कि आर्थिक रूप से विपन्न रहने के बाद भी ईमानदार कैसे रहा जाए। एक तरह से समाजवादी राजनीति के ‘आइडियल टाइप’ थे। कभी भी और किसी भी परिस्थति में उन्होंने  परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया और न ही परिवार के किसी सदस्य को अपने प्रशासनिक दायित्वों के निर्वाह में कोई हस्तक्षेप करने दिया। उनकी ईमानदारी के क़िस्सों ने जनश्रुतियों का रूप ले लिया था। मसलन, अपनी बेटी की शादी उन्होंने बहुत ही साधारण तरीक़े से की।

समाजवादी जननायक कर्पूरी ठाकुर

मुख्यमंत्री रहने के बावजूद किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को विवाह में आमंत्रित ही नहीं किया। एक नज़दीकी रिश्तेदार ने कोई नौकरी दिला देने की मांग की तो उसे कुछ पैसे देकर उन सामानों को ख़रीदने को कहा जिससे पारिवारिक पेशे से कमा खा सकें। इमरजेंसी के दौरान उनके समीप रहे एक युवा छात्र नेता ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद किसी की पैरवी लेकर उनके पास जाना हुआ था। उन्होंने प्यार भरी एक झिड़की लगायी और कहा आपसे यह उम्मीद नहीं थी, मुझे तो लगता था कि आप किसी सामाजिक काम को लेकर मेरे पास आयेंगे। उनकी यही ईमानदारी और सादा जीवन उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी। बिहार जैसे समाज में जहां नैतिक मूल्य ही संक्रमण में फँसा हो, कर्पूरी ठाकुर राजनीति में नये मूल्य की कामना करते थे। ठाकुर ने एक परिवर्तनकारी नेता या ‘ज्ञानी पुरुष’ के प्रतीक का प्रतिनिधित्व किया, जो समाज को न्याय और प्रकाश की ओर ले जाता है। उनकी नीतियों और भाषणों में अक्सर एकता, न्याय, और नैतिक कर्तव्य के विषयों का समावेश होता था, जो सामूहिक मनोविज्ञान में गहरा प्रभाव डालने वाले प्रभावशाली प्रतीकात्मक चित्र हैं।

कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व ने उन गहरे बैठी सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी, जिससे समाज की सामूहिक अचेतन में समतावादी बदलाव की दिशा में परिवर्तन हो।ठाकुर के जाति आधारित बाधाओं को तोड़ने और वर्ग समानता को बढ़ावा देने में किए गए प्रयास न केवल राजनीतिक कार्य थे बल्कि महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप भी थे। उन्होंने स्थिति को चुनौती देते हुए सामूहिक व्यक्तित्व के परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू की। समाज के संदर्भ में, यह प्रक्रिया गहरे बैठी पूर्वाग्रहों और बाधाओं को उभरते समानता और सामाजिक न्याय के आदर्शों के साथ सुलझाने का प्रयास था। यह प्रयास भारतीय जनतंत्र के लिए आवश्यक था। इसने एक बहुत बड़े वर्ग को जनतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल किया। सामान्य लोगों को एक नया सपना मिला जिसने जनतंत्र को मज़बूत किया।

इस संरचनात्मक परिवर्तन ने दो प्रकियाओं को जन्म दिया। एक तो आम लोगों को मतदान का महत्त्व बतलाया और जनतंत्र के लिए संगठन बनाने का महत्त्व बताया। लेकिन इस प्रक्रिया का दूसरा नकारात्मक आयाम भी था। इस संगठन का सामाजिक आधार केवल जाति रह गई। भारतीय जनतंत्र जाति आधारित जनतंत्र बन गया। जब आप कहते हैं ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ या ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ तो फिर आप जनतंत्र के मूल सिद्धांत को दरकिनार कर रहे हैं। इन नारों से बहुलवादी राजनीति की शुरुआत होती है। फिर संख्या जाति के आधार पर हो या धर्म के आधार पर क्या फ़र्क़ पड़ता है। कर्पूरी जी जिस राजनीति के जनक थे उसका एक रास्ता तो मुक्तिकामी संघर्ष की ओर जाता था लेकिन दूसरा नये समन्तवादी दौर की ओर। इस से जाति की समाप्ति तो नहीं हुई बल्कि सामन्तवादी समाज की यह संरचना और भी मज़बूत हो गई। शायद कर्पूरी जी भी इस दुविधा को समझ रहे थे। प्रारंभिक दौर में उन्होंने पिछड़ा और अति पिछड़ा दोनों को साथ लेकर मोर्चा साधा लेकिन जल्द ही पिछड़ों ने ही उन्हें पीछे छोड़ दिया और सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उनकी ईमानदारी और कर्तव्य परायणता भी उनकी रक्षा नहीं कर पाई। उसके बाद बिहार पिछड़ों की राजनीति का एक केन्द्र तो रहा लेकिन कर्पूरी जी समाजवादी राजनीति के प्रतीक भर रह गये। उनके सिद्धांतों और उनके व्यगितगत आदर्शों की बलि चढ़ा दी गयी। 

किसी समय कर्पूरी फ़ार्मूले से वामपंथी राजनीति को साधने की बात की जाती थी। वानपंथ के बढ़ते प्रभाव को जातिवादी राजनीति ने बहुत बड़ा धक्का दिया था। और फिर यह भी कहा जाने लगा कि इस फ़ार्मूले से दक्षिणपंथी राजनीति को भी ठिकाने लगाया जा सकता है। लेकिन जल्दी ही इसकी सीमा नज़र आने लगी। राम मनोहर लैहिया और कर्पूरी जी के समाजवादी सपनों ने दूसरा रास्ता तय किया और बिहार में अस्मितावादी राजनीति ने अपनी जड़ जमा ली। बहुत से रानीतिक विश्लेषण यह सवाल उठाते हैं कि बिहार का कोई सबनेशनलिज़्म या बिहारी अस्मिता क्यों नहीं पनपता है या विकास का मुद्दा कभी महत्वपूर्ण क्यों नहीं होता है। उसकी जड़ में शायद सामंतवादी  संरचनाओं को समाप्त करने का यही तरीक़ा है जिसने न तो समाजवाद को आगे बढ़ाया न ही पूंजीवाद को। न तो गुजरात की तरह यहाँ पूँजीवाद के विकासात्मक तत्व ही पनप पाये न ही पश्चिम बंगाल की तरह वामपंथी सुधार ही जड़ पकड़ पाया। जिसका नतीजा आज तक बिहार की राजनीति भुगत रही है। चाहे प्रति व्यक्ति आय हो या कुल घरेलू उपत्पाद का मापदंड हो, राज्य सबसे पीछे रह गया। हर छोटे बड़े काम के लिए लोगों को राज्य छोड़ कर बाहर भागना पड़ता है। ऐसा नहीं लगता है कि आने वाले समय में भी तथाकथित समाजवादी पार्टियों के पास विकास का कोई नया मॉडल हो।

जननायक कर्पूरी जी आत्मकथा

जिस बात के लिए कर्पूरी जी की आज भी चर्चा होती है उनमें से एक है उनका अंग्रेज़ी की अनिवार्यता को हटाना। उनके लिए यह भी एक जटिल प्रश्न था। अंग्रेज़ी बिहार के बच्चों के लिए आतंक था। ख़ास कर उनके लिए जिनकी पहली पीढ़ी ही शिक्षा में जा रही थी। ज़ाहिर है ऐसे लोगों में पिछड़ी जाति के बच्चे बड़ी संख्या में थे। यह तो शोध का विषय है कि बिहार में अन्य राज्यों की तुलना में अंग्रेज़ी को लेकर इतना आतंक क्यों था, लेकिन इतना तय है उनके इस निर्णय ने अंग्रेज़ी के विरोध की पूरी मानसिकता को जन्म दिया जिसका नतीजा आज भी राज्य भोग रहा है।

मसला यह नहीं है कि अंग्रेज़ी विदेशी भाषा है और उसका हमें विरोध करना चाहिए। सही सवाल यह है कि अंग्रेज़ी के आधार पर जो नई जाति व्यवस्था बनी हुई थी, या सरकारी नौकरियों को पाने के लिए और अच्छी संस्थाओं में पढ़ने के लिए भारतीय भाषाओं को जानने वाले बच्चों को जो समस्याएँ हो रही थी उसका निदान कैसे किया जाये। इस समस्या की गंभीरता में जाने के बदले उन बच्चों को अंग्रेज़ी के महत्त्व को नकार देने की मानसिकता बना दी गई। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेज़ी का महत्व और भी बढ़ता गया। इसके बदले शायद चीन की तरह बेहतर अंग्रेज़ी शिक्षा के लिए नई व्यवस्था की जानी चाहिए थी ताकि आम लोगों को बहूभाषी बनाया जा सके और उन्हें राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सहजता के साथ बौद्धिक आवागमन की सुविधा मिल सके। उनकी नीति से बिहार का जनमानस अंग्रेज़ीयत के भूत से लड़ने में सक्षम होने के बजाय उससे और भयक्रांत हो गया। बल्कि एक और नई समस्या सामने आ गई कि भाषा के महत्व को ही नकारा जाने लगा और हिन्दी में जो सुविधा बिहार के लोगों को प्राप्त थी उसका भी ह्रास हुआ। स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि उसके बाद बिहार में हिन्दी की रचनाशीलता भी कम हुई है।

आने वाले समय में कर्पूरी ठाकुर के विचारों पर गहन अध्ययन की ज़रूरत है। उनका महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने एक ख़ास मुक़ाम पर मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला बल्कि इसलिए भी है कि जिन सैद्धांतिक सवालों से उन्हें जूझना पड़ा उसका दीर्घकालीन महत्त्व है। आज जब अस्मिता की राजनीति ने भारतीय जनतंत्र के लिए नयी चुनौतियाँ पेश कर दी हैं, उनका महत्त्व और भी बहुत बढ़ गया है। अस्मिता की राजनीति का सहारा लेकर पूंजीवाद भारत में अपना विस्तार कर रहा है और धीरे-धीरे भारतीय जनतंत्र पर ही संकट आता दिख रहा है। जनता इस राजनीति में व्यस्त है और राजनीतिज्ञ और पूँजीपति धन संचय में मस्त हैं। ऐसे में क्या कर्पूरी ठाकुर के मॉडल पर पुनः चिंतन की ज़रूरत है जिसमें अस्मिताओं के अंदर अस्मिताओं को सामाजिक न्याय का प्रयास और घोर सिद्धांतवादी राजनीतिक जीवन इन दो बातों को महत्व दिया जाये?

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मणीन्द्र नाथ ठाकुर

लेखक समाजशास्त्री और जे.एन.यू. में प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919968406430, manindrat@gmail.com
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