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बाढ़, विकास और बिहार

 

हाल में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में कई नए और महत्वपूर्ण रुझान देखने को मिले. मसलन 6 नवम्बर को हुए चुनाव में अब तक बिहार में हुए सर्वाधिक मतदान की बात सामने आई तो दूसरी ओर महिला मतदाताओं की प्रतिशतता पुरुषों से अधिक देखी गयी. गौरतलब है कि इन दोनों ही बातों को राजनीतिक जागरूकता में आई बढ़ोतरी के तौर पर देखा जा रहा है. इसी तरह कई राजनीतिक विशेषज्ञ स्त्रियों की बढ़ी हुई भागीदारी को नीतीश सरकार द्वारा महिलाओं के हित में किये गए कामों से जोड़ रहे हैं. बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के तौर में उभरी है और उम्मीद है कि यह आने वाले दिनों में बिहार में विकास कार्यों में तेजी लाने में सहायक कारक हो. हालाँकि, विकास की परिभाषा क्या हो और इसे किस तरह से न केवल अर्थव्यवस्था केन्द्रित बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी अनुकूल बनाया जाए, यह एक अहम् राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है.

इस लेख में हमलोग बिहार में ‘पानी की अधिकता’ (अर्थात बाढ़) और ‘पानी की कमी’ (सूखती छोटी नदियाँ और गिरता भूजल स्तर) के द्वंद्व को समझने का प्रयास करेंगे. और साथ ही इससे निकलने के लिए उपायों पर भी चर्चा करेंगे. इस बार चुनाव में बाढ़ भी एक प्रमुख मुद्दा रहा और बिहार को बाढ़मुक्त बनाने का सपना एकबार फिर से दोहराया गया. हालाँकि ऐसे वादे पहले भी होते रहे हैं पर इस दिशा में कारगर कदम नहीं के बराबर ही लिए गए हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो जो क़दम उठाए गए हैं वे ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1950 के दशक से लेकर अबतक बिहार में 3700 किलोमीटर लम्बे तटबंध का निर्माण किया गया है. किन्तु दुर्भाग्य से बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में घटोतरी होने की बजाय साल दर साल इसमें बढ़ोतरी ही जारी दिखती है.

दुनिया भर में बिहार के पहचान की एक ख़ास वजह यहाँ लगभग हर साल आने वाली बाढ़ है. इतना ही नहीं राज्य के आर्थिक पिछड़ेपन की एक मुख्य वजह भी बाढ़ को माना जाता है. यह एक लम्बे समय से चली आ रही ऐसी समस्या है जो प्राकृतिक और मानव-जनित आपदा का मिला जुला स्वरूप है. बिहार में बाढ़ आने के दो तरीके हैं – एक, गंगा नदी में पानी बढ़ने से और दूसरा कोसी नदी में पानी बढ़ने से. जहाँ गंगा में पानी बढ़ने से पटना, मुंगेर, और भागलपुर जैसे क्षेत्र प्रभावित होते हैं वहीं कोसी में पानी बढ़ने पर सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और पश्चिमी चंपारण जैसे जिलों में बाढ़ आती है. अधिक वर्षा के साथ साथ बिहार में कोसी नदी में पानी बढ़ने का दूसरा प्रमुख कारण नेपाल द्वारा पानी छोड़े जाने को बताया जाता रहा है. जबकि गंगा में पानी के ज़रूरत से अधिक होने का कारण पहाड़ी क्षेत्रों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, आदि) से तराई क्षेत्रों में बहकर आना होता है.

अनुपम मिश्र (प्रसिद्ध गाँधीवादी पर्यावरणविद) ने 2008 में बिहार में आई भयानक बाढ़ के बाद लिखे लेख ‘तैरने वाला समाज डूब रहा है’ में बाढ़ को आपदा के तौर पर देखने को लेकर आपत्ति जताई थी. वे लिखते हैं कि बिहार में बाढ़ एक लम्बे समय से चली आ रही प्राकृतिक घटना है और वहाँ के समाज ने इसके साथ जीने की कला सीख रखी थी पर अब आधुनिकता के साथ लोगों में प्रकृति के प्रति सामंजस्य का भाव घटा है और लोग इसे आपदा समझने लगे हैं. दूसरी तरफ़ बाढ़ मुक्ति अभियान के संयोजक दिनेश मिश्र जी कहते हैं कि बिहार में कोसी के कारण आनेवाली बाढ़ के समय केवल नेपाल द्वारा पानी छोड़ने को एक बड़ा कारण बताना इस समस्या के दीर्घकालिक उपाय ढूँढने से पीछा छुड़ाने जैसा है. यह तो तय है कि अगर बिहार को विकास के मार्ग पर अग्रसर होना है तो हमें बाढ़ से निबटने की तैयारी करनी ही होगी.

मेघ पाइन अभियान नामक एक संस्था बिहार और झारखण्ड में जल संरक्षण के परंपरागत तरीकों को बढ़ावा देने और बाढ़ की बदलती प्रकृति को समझने के लिए लगभग तीन दशक से शोध और जागरुकता लाने का काम कर रही है. इसके संयोजक एकलव्य प्रसाद अपने हाल में लिखे एक लेख में कहते हैं कि 2020 से 2025 के बीच बिहार के 38 में से 31 जिले एक या अधिक बार बाढ़ का सामना करते रहे हैं. किशनगंज से लेकर पश्चिमी चंपारण जैसे कई जिले तो बाढ़ की गिरफ़्त में क़रीब क़रीब हर साल ही आते हैं. वे बताते हैं कि वर्ल्ड बैंक के सहयोग से बिहार कोसी बेसिन विकास प्रोजेक्ट के तहत सुपौल जिले के बीरपुर नामक स्थान पर फ़िजिकल मॉनिटरिंग सेंटर की स्थापना होने वाली है. यह जल संसाधन विभाग के तहत उत्कृष्टता के केंद्र (सेंटर ऑफ़ एक्सलेंस) के तौर पर काम करने वाली संस्था होगी. इसका काम नदियों की प्रणाली, संरचना, आदि को समझने के साथ साथ बाढ़ के व्यव्हार का अध्धयन भी है ताकि समय पर लोगों को आनेवाली बाढ़ की सूचना दी सके. यह संस्था बाढ़  से बचाव के उपायों पर भी काम करने वाली है. उम्मीद है कि नयी सरकार इस दिशा में शीघ्र क़दम उठाए.

बाढ़ आने पर समाज के अलग अलग तबक़े अलग अलग ढंग से प्रभावित होते हैं. पिछले छः वर्षों से भागलपुर में रहने के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकती हूँ कि एक ही शहर में जहाँ कुछ इलाके बाढ़ से बेहद प्रभावित होते हैं वहीं कुछ अन्य इलाकों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. इसी तरह शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों में से भी गंगा नदी और इसकी सहायक नदियों के किनारे बसे गाँवों के लोग लगभग दो महीने के लिए खेती किसानी गँवा बैठते हैं. विगत वर्षों में नदी शोध के क्रम में  ज़िले के भिन्न हिस्सों में हुई बातचीत के दौरान मुझे अनेकों बार ग्रामीण लोगों ने कहा कि पहले दो से तीन साल में एक बार बाढ़ आती थी पर अब लगभग हर साल बाढ़ आती है और कभी कभी एक ही साल में दो से तीन बार बाढ़ आती है. जैसे इस वर्ष भी यहाँ तीन बार अलग अलग तीव्रता की बाढ़ आई. ऐसी परिस्थिति में लोग दो से तीन महीने विस्थापित रहने को बाध्य होते हैं. एक अन्य परिणाम यह भी है कि जहाँ पहले किसान एक साल में दो से तीन फसलें उगा पाते थे वहीं अब अमूमन भयानक बाढ़ के सालों में वे महज़ एक ही फ़सल उगा पाते हैं. इसी तरह कहलगांव और नाथनगर (भागलपुर के दो ब्लॉक) के मछुआरों ने नदियों में लगातार कम हो रही मछलियों की संख्या और बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति को फ़रक्का बाँध के निर्माण से जुड़ा हुआ बताया.

बिहार में पर्यावरण के स्वास्थ्य को सुधारने के लिए 2019 में ‘जल जीवन हरियाली’ नामक कार्यक्रम की शुरुआत की गयी थी और इसके परिणाम काफ़ी सकारात्मक रहे हैं. इसके तहत जल संरक्षण को बढ़ावा देने के साथ साथ वन क्षेत्र का विस्तार और जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में मनरेगा योजना के साथ जोड़कर  अच्छा काम हो रहा है. हालाँकि, दूसरी तरफ़ कई जिलों में हर घर नल जल योजना के तहत कई गाँवों और कुछ शहरी क्षेत्रों में भी नल तो लग गए हैं पर उनमें जल का आना बाकी है. कुछ जगहों पर लोगों ने दो से तीन दिन में एक बार नल में पानी आने की समस्या बताई. कई जगहों में भूजल का स्तर बहुत नीचे गिर जाने के कारण चापाकलों में पानी नहीं आता है. ऐसे में लोगों को पीने के पानी की बहुत दिक्क़त होती है.

आज के दौर में जहाँ बिहार में विकास के दर को बढ़ाने के लिए पूँजी निवेश और बड़े उद्योगों की स्थापना ज़रूरी है वहीं दूसरी तरफ़ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी प्रयास तेज करने होंगे. मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि बिहार में बनी नई सरकार बाढ़ को एक अल्पकालिक समस्या के तौर पर देखने की बजाय इस पर एक दीर्घकालिक समाधान की ओर काम करना शुरू करे. इस दिशा में तालाबों को बचाने, लोकज्ञान को समुचित महत्त्व देने, छोटी नदियों को संरक्षित करने, लोगों को साफ़ पेयजल मुहैया कराने और हवा में बढ़ते प्रदूषण को कम करने जैसे कई काम एक साथ करने होंगे. यह तभी संभव होगा जब समाज और राज्य साथ मिलकर काम करे और ये प्रयास समाज के सबसे निचले स्तर से शुरू किये जाएँ अर्थात् हर व्यक्ति और छोटी से छोटी संस्था (मसलन स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, इत्यादि) भी आगे बढ़कर साथ आये. आख़िरकार, किसी भी समाज के लिए अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी के बीच सही संतुलन से ही पर्यावरणीय नैतिकता सुनिश्चित करना संभव है.

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रुचि श्री

लेखिका तिलका माझी भागलपुर विश्वविद्यालय (बिहार) के स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्राध्यापिका हैं।  सम्पर्क +919818766821, jnuruchi@gmail.com
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