
सादगी, ज्ञान और लोकतान्त्रिक जीवन की जीवित मिसाल
सच्चिदाजी से मेरी पहली मुलाक़ात 1982 में दिल्ली में हुई। कुछ दिन पहले ही मैं एम.ए. की पढ़ाई के लिए जे.एन.यू. पहुँचा था। मेरे दोस्तों का समूह ज़्यादातर समाजवादी युवजन सभा (एस.वाई.एस.) से जुड़ा था। धीरे-धीरे जसवीर सिंह, सुनीलजी, चेंगल रेड्डी और अरविन्द मोहन से मेरी निकटता बढ़ी। बातचीत में वे लोग अक्सर सच्चिदाजी का नाम लेते थे। उन दिनों वे लाइब्रेरी के कुछ काम के सिलसिले में दिल्ली में रह रहे थे।
इससे पहले मैंने उनका नाम अपने पिता हेमचन्द्र आचार्य से सुना था, जो कवि थे, ओडिशा में किशन पटनायक के निकट सहयोगी थे और 1967 में एस.एस.पी. से ओडिशा विधानसभा का चुनाव लड़े थे। बाद में जब अनेक समाजवादी नेता जनता पार्टी और अन्य दलों में चले गये, तब भी वे किशनजी के साथ रहे। गाँव में खेती करते रहे और लिखते रहे। मेरे पिता शायद ही कभी सच्चिदाजी से मिले थे, पर उनके लेखों के जरिये उनसे परिचित थे, जो ‘सामयिक वार्ता’ में छपते थे। वे उनकी वैचारिक क्षमता और अकादमिक गम्भीरता का बहुत सम्मान करते थे, जैसे किशनजी का करते थे।
जे.एन.यू. और समाजवादी विचारों का मुझ पर गहरा असर पड़ा। मैंने सच्चिदाजी को समाजवादी विचारक मान लिया, यह जाने बिना कि उनके विचार वास्तव में क्या थे। यद्यपि मेरे पिता समाजवादी थे, फिर भी मैं इन विचारों से लगभग अनजान था। इसके बावजूद मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि ने मुझे समाजवादी परिमण्डल में एक स्वाभाविक जगह दिला दी थी, जिसके योग्य शायद मैं पूरी तरह नहीं था।
उन दिनों हर शनिवार शाम एस.वाई.एस. के हमारे कई साथी रफी मार्ग स्थित यू.एन.आई. के लॉन में अनौपचारिक रूप से इकट्ठा होते थे। दिल्ली में रहने वाले और बाहर से आने वाले समान सोच के लोग चाय पीते हुए सामान्य बातचीत और गपशप करते थे। सबसे बढ़कर, सच्चिदाजी इस बिना किसी तामझाम वाली बैठक में नियमित रूप से आते थे।
जब सुनीलजी ने मुझे उस बैठक में चलने को कहा, तो मैं तुरन्त तैयार हो गया। तब से लगभग हर शनिवार वहाँ जाने लगा और बहुत कम ऐसा हुआ कि किसी जरूरी काम के कारण न जा सका हो। बैठक का समय शाम 5.30 बजे होता था। सुनीलजी समय के बहुत पाबन्द थे। आमतौर पर वहाँ दस–पन्द्रह लोग होते। हम मुनिरका से बस लेकर समय पर पहुँचते थे।
जब भी हम पहुँचते, सच्चिदाजी लॉन में बैठे किसी किताब में डूबे मिलते। मानो शनिवार को पढ़ना और इस गोष्ठी में शामिल होना उनके लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हो। हमें देखते ही वे किताब एक ओर रख देते और बातचीत शुरू हो जाती। अक्सर चर्चा उसी पुस्तक से निकलती, जिसे वे उस समय पढ़ रहे होते थे।
वे कनार्ट प्लेस के पास स्थित यू.एस. इन्फॉर्मेशन सेंटर की लाइब्रेरी जाया करते थे, जो यू.एन.आई. से अधिक दूर नहीं थी। लाइब्रेरी से वे पैदल ही लॉन तक आते थे। मैं सुनीलजी की समय-पाबन्दी की सराहना करता था, पर सच्चिदाजी को देखकर लगता था कि इस मामले में वे उनके भी गुरु रहे होंगे।
सच्चिदाजी हमेशा धीमी आवाज में बात करते थे। उनका मुस्कुराता चेहरा और मिलनसार स्वभाव उनके व्यक्तित्व की पहचान था। वहाँ किसी तरह का छोटा-बड़ा भेद नहीं था। पहले ही दिन, सुनीलजी ने मेरे पिता के समाजवादी विचारों का उल्लेख करते हुए मेरा परिचय कराया। सबने मेरा स्वागत किया और मुझसे कुछ बोलने को कहा।
ओडिशा (सम्बलपुर) से बाहर पहली बार आने के कारण उन दिनों मेरे लिए हिन्दी या अँग्रेजी में बोलना कठिन था। फिर भी मैंने बात की, क्योंकि वहाँ का माहौल डराने वाला नहीं, अपनापन देने वाला था। सबसे अच्छा यह लगा कि सच्चिदाजी मेरी बात बहुत ध्यान से सुन रहे थे।
वे हममें से किसी को ‘तुम’ कहकर नहीं बुलाते थे, हमेशा ‘आप’ कहते थे। उनकी विनम्रता कभी बनावटी नहीं लगती थी। उनके व्यवहार में एक सुंदर संतुलन था—न आक्रामकता, न संकोच। यदि वे वहाँ होते, तो सभी को बोलने का अवसर मिलता। उनकी मौजूदगी पूरे समूह के लिए सुकून देने वाली होती थी और माहौल को लोकतान्त्रिक बना देती थी। लोकतंत्र और भाईचारे की यही भावना हमें हर शनिवार वहाँ आने के लिए प्रेरित करती थी।
उन दिनों सच्चिदाजी लोधी रोड पर एक सरकारी क्वार्टर की एक कमरे वाली बरसाती में रहते थे। 1982 में उसका मासिक किराया दो सौ रुपये था। सुनीलजी और जसवीरजी के साथ मैं कई बार उनके घर गया। कुछ किताबों, मिट्टी के तेल के स्टोव, कुछ एल्युमिनियम के बर्तनों और कपड़ों के अलावा वहाँ लगभग कुछ नहीं था। यदि ठीक से याद करूँ, तो लेटने के लिए चारपाई भी नहीं थी। न कुर्सी थी, न मेज।
एक दिन मुस्कराते हुए उन्होंने शनिवार की बैठक में बताया कि दिन में उनकी अनुपस्थिति में कुछ छोटे-मोटे चोर बरसाती का ताला तोड़कर अंदर घुस आए थे। किताबें फर्श पर बिखरी थीं, जिससे उन्हें उनके आने का पता चला। चुराने लायक कुछ था ही नहीं, इसलिए वे कुछ ले नहीं गये। केवल ताला ही उनके काम आ सकता था, पर उसे भी उन्होंने तोड़कर बेकार कर दिया था।
पूरी घटना सुनाते समय सच्चिदाजी उन ‘बेचारे’ चोरों के लिए दुखी थे, जिनकी मेहनत व्यर्थ चली गई और जिन्हें उस दिन दिहाड़ी भी नहीं मिली। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यह घटना उन्हें मज़ेदार नहीं लगी। जब किसी ने पूछा, “आप कैसे मान लेते हैं कि वे गरीब थे?” तो उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“चोरी करने एक बरसाती में और कौन आएगा?”
मुझे एक और प्रसंग स्पष्ट रूप से याद है। जे.एन.यू. में हमारे शिक्षक ने ‘जाति व्यवस्था’ विषय पर एक ट्यूटोरियल असाइनमेंट दिया था और रीडिंग लिस्ट में सच्चिदानन्द सिन्हा की ‘कास्ट सिस्टम : मिथ्स,रिअलिटी,चैलेंज’ तथा लुई द्यूमों की ‘होमो हाइरार्किकस’ पढ़ने को कहा था।
तब तक मुझे सच्चिदाजी की बौद्धिक हैसियत का ठीक अनुमान नहीं था। रीडिंग लिस्ट में उनकी पुस्तक देखकर अचानक उनका अकादमिक कद मेरे सामने उभर आया। जिनसे मैं हर शनिवार मिलता था, उनकी किताब एम.ए. के पाठ्यक्रम में शामिल थी। मेरे सहपाठी, जिनका समाजवादी विचारधारा से कोई संबंध नहीं था, भारत की जाति-व्यवस्था समझने के लिए उनकी पुस्तक पढ़ रहे थे। जिन लोगों को मेरी सच्चिदाजी से निकटता का पता था, वे मुझसे इस विषय पर बातचीत करना चाहते थे। मुझे अपना कद कुछ ऊँचा-सा लगने लगा।
अगले शनिवार मैंने सच्चिदाजी को यह बात बतायी। मैंने कहा कि मेरे सहपाठी उनसे मिलना चाहते हैं। मुझे आश्चर्य हुआ कि उन्हें इस बात में कोई विशेष रुचि नहीं थी कि लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। इसके बजाय उन्होंने बहुत सहज ढंग से जाति व्यवस्था पर अपनी समझ बतायी और मुस्कुराते रहे।
तब मुझे धीरे-धीरे समझ में आया कि वे डॉ. लोहिया के विचारों को केवल दोहराने वाले चिन्तक नहीं थे। इस विषय पर उनकी अपनी मौलिक दृष्टि थी। व्यक्तिगत प्रशंसा उन्हें न उत्साहित करती थी, न विचलित। वे न बहुत खुश होते थे, न बहुत दुखी। आज के समय में वे एक सच्चे तपस्वी जैसे थे।
एक बार हम एस.वाई.एस. के पन्द्रह–बीस साथी जे.एन.यू. से करोल बाग तक पैदल पर्चे बाँटते हुए गये। पर्चों में साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय सद्भाव की बात थी। यह 1983 की घटना है। हम सुबह निकले और लगभग दस बजे करोल बाग पहुँचे। हमारा ठिकाना जसवीरजी का घर था, जहाँ उनकी माँ और बहन ने हमारे लिए भोजन बनाया था।
इस पैदल यात्रा का समय अत्यंत रोचक था, क्योंकि सच्चिदाजी हमारे साथ थे। वे किसी भी विषय पर बात कर सकते थे—धौला कुआँ का इतिहास, बंगाली मार्केट, सड़क किनारे के पौधे, चिड़ियाघर के जानवर, अन्तरराष्ट्रीय राजनीति, लोक साहित्य और न जाने क्या-क्या। मैं सोचता था, क्या कोई ऐसा विषय है जिसके बारे में उन्हें जानकारी न हो? वे ज्ञान का चलता-फिरता भंडार थे। यह मेरे लिए किसी कक्षा से कहीं अधिक शिक्षाप्रद अनुभव था।
हम लोग सुनीलजी और स्मिताजी की शादी के अवसर पर वाराणसी गये थे। सच्चिदाजी वहाँ उपस्थित नहीं थे। अशोक सेकसरिया, जसवीरजी, सोमनाथ त्रिपाठी, उनकी पत्नी निर्मला भाभी और मैं एक साथ सारनाथ घूमने गये। वहाँ सड़क किनारे खड़े एक बड़े पेड़ के बारे में अशोकजी ने कुछ जानना चाहा, पर हममें से किसी के पास उसका उत्तर नहीं था। कुछ क्षण की चुप्पी के बाद उन्होंने सहज स्वर में कहा, “अगर सच्चिदाजी आज यहाँ होते, तो इसके बारे में विस्तार से बताते।” यह वाक्य उनकी अनुपस्थिति में भी उन्हें ज्ञान के एक बड़े स्रोत के रूप में स्वीकार किए जाने का प्रमाण था।
सच्चिदाजी की सबसे बड़ी विशेषता उनका शांत स्वभाव था। उन्होंने कभी ‘सब कुछ जानने वाला’ रवैया नहीं अपनाया और न ही उनकी जिज्ञासा कभी कम हुई, चाहे सामने वाला व्यक्ति अनुभवहीन ही क्यों न हो। वे हर प्रश्न को गम्भीरता से लेते थे और उत्तर देने में उतना ही संयम रखते थे, जितना सुनने में। उनके लिए ज्ञान प्रदर्शन की वस्तु नहीं था, बल्कि साझा करने की प्रक्रिया थी।
फिर एक समय ऐसा आया जब सच्चिदाजी दिल्ली छोड़कर मुजफ्फरपुर से कुछ दूर अपने पैतृक गाँव मणिका चले गये। यह लगभग 1985–86 की बात होगी। उन्होंने दिल्ली में बढ़ते खर्च को इसका कारण बताया। गाँव चले जाने के बाद उनसे मिलना-जुलना लगभग बंद हो गया। उनसे संपर्क करना भी आसान नहीं था, क्योंकि उनके पास न लैंडलाइन फोन था और न मोबाइल।
जब मैं भुवनेश्वर में पढ़ा रहा था, तब मेरा एक छात्र मुजफ्फरपुर का था। छुट्टियों में जब वह अपने गाँव जाता, तो मेरे अनुरोध पर मणिका जाकर अपने फोन से सच्चिदाजी से मेरी बात करवा देता था। इस तरह कुछ वर्षों तक उनसे बीच-बीच में संवाद बना रहा। काफी बाद में उन्होंने मोबाइल फोन रखना शुरू किया।
2017 में बेगूसराय इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम के सिलसिले में जाना हुआ। तब पता चला कि मुजफ्फरपुर वहाँ से केवल सौ किलोमीटर दूर है। मैंने एक छात्र की सहायता ली और हम एक सुबह पब्लिक ट्रांसपोर्ट से मणिका निकल पड़े। उस समय मणिका पहुँचना आसान नहीं था। सड़क किनारे बस से उतरकर ट्रैक्टर से जाना पड़ा और फिर लगभग डेढ़ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
सच्चिदाजी के पड़ोसी और किसान कार्यकर्ता जगत नारायण और उनकी पत्नी उनके भोजन की व्यवस्था करते थे। उस दिन हमारे लिए भी उन्होंने ही भोजन बनाया—सादा चावल, दाल और सीताफल की सब्ज़ी। घर में बिजली का कनेक्शन नहीं था। सच्चिदाजी ने बताया कि गाँव में बिजली बहुत अनियमित रहती थी, इसलिए उन्होंने कुछ वर्ष पहले विभाग को लिखकर उसे स्थायी रूप से कटवा दिया था। अब उन्हें हर महीने बिजली का बिल नहीं भरना पड़ता था। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “तब से शांति है।”
मैंने पूछा, “बिजली के बिना रहने में कठिनाई तो होती होगी?”
उन्होंने अपने सामान्य बेफिक्र अंदाज में कहा, “आमतौर पर रात में ही जरूरत पड़ती है। जब बिजली होती भी थी, तो पढ़ने लायक नहीं रहती थी। मैं जल्दी खाना खाकर सो जाता हूँ। इमरजेंसी के लिए एक सोलर टॉर्च है।” उन्होंने बाहर धूप में रखी एक टॉर्च की ओर इशारा किया। घर में पंखे की भी कोई व्यवस्था नहीं थी।
वास्तव में मनुष्य हज़ारों वर्षों तक बिजली के बिना रहा है। आज भी हज़ारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास बिजली नहीं है और फिर भी उनका जीवन चलता है। बिजली का उपयोग करना और उसका गुलाम बन जाना—दो अलग बातें हैं। सच्चिदाजी ने स्वयं को उसकी गुलामी से मुक्त किया और अपने जीवन से इसका उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे कभी त्याग या तपस्या के रूप में नहीं देखा, बल्कि सहज जीवन-शैली के रूप में स्वीकार किया।
2019 में एक बार फिर मुजफ्फरपुर जाना हुआ। कलकत्ता से संजय भारती रास्ते में मेरे साथ जुड़ गये। मुजफ्फरपुर में हमारे मित्र नवीनजी भी हमारे साथ थे। इस बार ऑटो-रिक्शा से मणिका पहुँचना अपेक्षाकृत आसान हो गया। नवीनजी पहले भी कई बार सच्चिदाजी से मिलने वहाँ जाते रहे थे।
जब सच्चिदाजी अपने छोटे भाई प्रभाकर सिन्हा के पास कुछ दिनों के लिए रुकते थे, तब नवीनजी लगभग रोज उनसे मिलने जाते थे। इस बार महेंद्रजी भी वहाँ थे, जो सच्चिदाजी के साथ रहते थे और उनके लिए भोजन बना देते थे। हमें पता चला कि यह व्यवस्था प्रभाकरजी ने सच्चिदाजी की इच्छा के विरुद्ध करवाई थी।
तब सच्चिदाजी 91 वर्ष के हो चुके थे। उनका शरीर काफ़ी दुबला हो गया था, पर उनकी बातों में जिज्ञासा और फुर्ती की कोई कमी नहीं थी। वे उतने ही रोचक और सजीव थे, जितने 1980 के दशक की शुरुआत में यू.एन.आई. लॉन में हुआ करते थे।
गाँव में उनके पास न टीवी था, न अख़बार और न ही किसी प्रकार का मीडिया साधन, फिर भी उन्हें समकालीन राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं की पूरी जानकारी थी। उन्होंने कई ऐसी घटनाओं को याद किया, जिन्हें हमने दिल्ली में एक साथ देखा और अनुभव किया था। उन्होंने कभी गाँव में कम सुविधाओं वाले जीवन को रोमांटिक बनाकर प्रस्तुत नहीं किया और न ही उस पर कोई अफसोस जताया।
उनसे बात करना पहले की तरह ही आनन्ददायक था। उस दूरदराज गाँव में चिकित्सा सुविधाओं की कमी से न उनकी स्मृति पर असर पड़ा था और न ही उनकी दृष्टि पर। जाते समय मैंने कहा कि अगले वर्ष इसी समय के आसपास उनसे फिर मिलने आऊँगा। उन्होंने चुटीले अंदाज में हँसते हुए कहा,
“इसका मतलब है, आपसे मिलने के लिए मुझे एक साल और जीना होगा।”
उस मुलाक़ात के बाद वे छह वर्ष और जीवित रहे, लेकिन मैं अपना वादा पूरा नहीं कर पाया। 2020–21 में कोरोना महामारी और फिर 2022 में भुवनेश्वर से अजमेर स्थानांतरण—ये सब बाधाएँ बनी रहीं।
नवंबर 2025 में 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी। हम मित्रों के बीच यह आम धारणा थी कि सच्चिदाजी अवश्य सौ वर्ष पूरे करेंगे। बुनियादी सुविधाओं के बिना भी सहज और संतुलित जीवन जीने का उनका उत्साह हमें हमेशा विस्मित करता रहा। उन्होंने कभी उन सुविधाओं की चाह नहीं की।
उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के अपने स्तर पर यह सिद्ध कर दिया कि ‘आराम’ और ‘सुविधाओं’ के बिना जीना न असंभव है, न कष्टदायक और न ही वैचारिक या शैक्षणिक साधना में बाधक। वे अपनी बातचीत में कभी भी उन कठिनाइयों का उल्लेख नहीं करते थे, जो ऐसी जीवन-शैली में आई हों। उनके लिए यह जीवन संघर्ष नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक चयन था।
अपने ज्ञान और अन्तर्दृष्टि से उन्होंने दुनिया को देखने और समझने के हमारे नजरिए में लगातार कुछ न कुछ जोड़ा। वे इस बारे में इतनी सहजता से बात करते थे कि सुनने वाले को लगता था—इस तरह जीना कोई बोझ नहीं, बल्कि आनन्द की बात है। वरना इतनी लगन से, इतनी गहराई से और इतने विविध विषयों पर निरंतर सोचना, विचारना और लिखना संभव नहीं होता।
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