
शिक्षक दिवस: सम्मान के पीछे का सच
आज संपूर्ण देश में ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जा रहा है। इसके मद्देनजर भव्य मंच सजते हैं, भाषण दिए जाते हैं, शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है और उन्हें ‘राष्ट्र-निर्माता’, ‘समाज का मार्गदर्शक’ तथा ‘भविष्य की पीढ़ी का शिल्पकार’ आदि जैसे शब्दों से नवाजा जाता है। हर साल की तरह इस वर्ष भी उच्च शिक्षा और पॉलीटेक्निक के 21 शिक्षकों को तथा स्कूली शिक्षा के 48 शिक्षकों को ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाना है। लेकिन शिक्षक दिवस के इस औपचारिक उत्सव के बीच एक असहज सवाल पूछना आवश्यक है—क्या वास्तव में हमारे देश में शिक्षक का सम्मान बचा है? क्या समाज शिक्षकों को वह गरिमा दे रहा है जिसके वे हकदार हैं, या फिर यह सब केवल एक छलावा है? क्या आज के शिक्षक, शिक्षकीय मूल्यों को आत्मसात कर रहे हैं?
एक बार मुझे एक कुलपति महोदय द्वारा यह संदेश भिजवाया गया कि “उन्हें कह दीजिए कि वह घोर वामपंथी हैं और उसे निलंबित करने के लिए मैं सही मौके की तलाश कर रहा हूँ।” यह बात बिल्कुल अचंभित करने वाला था कि इतने बड़े पद पर बैठा व्यक्ति ऐसा कैसे सोच सकता है? स्थिति तब और भी चिंताजनक लगती है, जब सार्वजनिक आचरण को लेकर गंभीर आरोपों और विवादों से घिरे शिक्षकों की खुलेआम प्रशंसा की जाती है। ऐसे कुलपति अक्सर ऐसे लोगों की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं जो दुराचारी, भ्रष्टाचारी और उनके दरबार के ‘जी हुजूर’ वाले दरबारी होते हैं। यह उस विकृत मानसिकता का प्रतीक है जिसमें किसी शिक्षक के विचार, उसकी राजनीतिक या वैचारिक स्वतंत्रता और उसकी असहमति के अधिकार को ही उसके प्रशासनिक, शैक्षणिक मूल्यांकन का आधार बना लिया जाता है। विश्वविद्यालय का अस्तित्व ही इसलिए है कि वहां विचारों की विविधता हो, सवाल पूछे जायें, तर्क-वितर्क हो, और सत्ता, समाज तथा व्यवस्था के निर्णयों पर प्रश्न उठाने की स्वतंत्रता हो। यदि किसी शिक्षक को केवल इसलिए निशाना बनाया जाए कि उसकी विचारधारा प्रशासन से मेल नहीं खाती, तो यह केवल एक शिक्षक का दमन नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की ‘बौद्धिक आत्मा’ पर सीधा प्रहार है। शिक्षक का काम किसी विचारधारा या व्यक्ति की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को स्वतंत्र रूप से सोचना सिखाना है, उनके चरित्र का निर्माण करना है। यदि शिक्षक के पास अपने स्वतंत्र विचार नहीं होंगे, वह अपने छात्रों को स्वतंत्र सोच कैसे दे पाएगा?
यह केवल किसी एक कुलपति या शैक्षणिक संस्थान की कहानी नहीं है, बल्कि कमोवेश हर जगह यही हो रहा है। यदि कोई शिक्षक कुलपति की विचारधारा से नहीं जुड़ता, उनकी ‘जी-हुजूरी’ नहीं करता और अपनी स्वतंत्र सोच रखता है, तो उसे दबाने और डराने का हर संभव प्रयास किया जाता है; उसकी योग्यता को किनारे कर दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि संस्थानों को अब सोचने-समझने वाले शिक्षक नहीं, बल्कि ऐसे पालतू प्राणी चाहिए जो अपना दिमाग न चला सकें—या फिर सेना में तैनात जवानों की तरह केवल आदेशों का पालन करे। आज शिक्षक अध्ययन-अध्यापन कम और अन्य कामों में ज्यादा समय देने को बाध्य हैं। जनगणना का कार्य हो या चुनाव ड्यूटी, ऐसे अनेकों काम में शिक्षकों को झोंक दिया जाता है। उत्तराखंड राज्य तो एक कदम आगे निकल गया था, जहाँ शिक्षकों को आवारा कुत्तों की गणना के काम में तैनात कर दिया गया था, जिसे कड़े विरोध के बाद उस आदेश को वापस लेना पड़ा था। विश्वविद्यालयों को आज सिर्फ सरकारी योजनाओं के महिमामंडन का मंच बना दिया गया है, जहां सिर्फ सरकार की जय-जयकार किया जाता है।
दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में शिक्षक का स्थान सर्वोपरि है। हर पेशे से जुड़े लोग उनके सामने नतमस्तक होते हैं, जैसा कि प्राचीन भारत में भी होता था। लेकिन आज के भारत में एक दरोगा का रुतबा भी शिक्षक से अधिक दिखता है। कोई विधायक या मंत्री आ जाए तो उनके स्वागत में कुलपतियों की लंबी लाइन लग जाती है। बड़े-बड़े प्रोफेसर हाथों में फूल-माला की थाली लेकर नेताओं की जी-हुजूरी में पीछे-पीछे घूमते दिखाई देते हैं।
आज देश में सरकारी स्कूलों की स्थिति जर्जर है और विश्वविद्यालय भी दयनीय अवस्था में हैं। छात्र-शिक्षक अनुपात का पालन कागजों तक सीमित है। अधिकांश विश्वविद्यालय विवादों के केंद्र बने हुए हैं। स्थायी शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए ‘अतिथि’ और ‘अनुबंध’ शिक्षकों की भर्ती की जाती है, जिनकी स्थिति बंधुआ मजदूरों जैसी बन कर रह गयी है। उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर संस्थान और स्थायी अधिकारी उनका शोषण करते हैं। उनसे बेहद कम वेतन में काम करवाया जाता है और “समान काम के बदले समान वेतन” का नारा सिर्फ कागजों में दबा रह जाता है।
इसके विपरीत, जो शिक्षक स्थायी हो जाते हैं, उनमें से कई अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं। ऐसे शिक्षकों द्वारा नौकरी के दम पर मनमाफिक शादियाँ की जाती हैं, भारी-भरकम दहेज लिया जाता है और ऐशो-आराम को प्राथमिकता दी जाती है। हाल ही में मैंने एक मामला देखा जहां एक महिला, जो पहले एक निजी विश्वविद्यालय में अत्यधिक कार्यभार से परेशान थी और कड़ी मशक्कत के बाद एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में नियुक्त हुई। उसके होने वाले पति पहले से उसी विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के तौर पर पदस्थ थे और एक खास विचारधारा के लिए सक्रिय थे। उन्हीं के प्रयासों और राजनीतिक संरक्षण से उस महिला की नियुक्ति हुई। नियुक्ति के तुरंत बाद उस शिक्षिका ने सगाई के लिए लंबी छुट्टी ली, फिर शादी की छुट्टी, उसके बाद रिफ्रेशर कोर्स के नाम पर एक महीने का अवकाश और फिर मातृत्व अवकाश। इसके अलावा अपने दायित्वों के निर्वहन में कामचोरी, छात्रों से अभद्रता और उन्हें डराना-धमकाना आम बात थी। परिवीक्षा अवधि में ही उनके खिलाफ दर्जनों शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन ‘विशेष आशीर्वाद’ के चलते उनकी परिवीक्षा अवधि सफलतापूर्वक पूर्ण के रूप में घोषित कर दी गई। इस महिला के पति का आचरण भी कमोबेश ऐसा ही रहा है। ऐसे भ्रष्ट, कामचोर और कर्तव्यहीन शिक्षकों ने भी समाज में शिक्षकों की गरिमा को गिराने में बड़ी भूमिका निभाई है जिससे विद्यार्थियों को उंगली उठाने का भरपूर मौका मिल जाता है।
आज हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था कमोवेश मृतप्राय हो चुकी है। प्राचीन ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ की जननी भारत भूमि आज केवल कागजों पर ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ का ढिंढोरा पीट रही है, जिसे धरातल पर उतारना लगभग असंभव सा है। नई शिक्षा नीति के नाम पर शिक्षा और शिक्षक—दोनों का हाल बेहाल है। शिक्षकों और अन्य सुविधाओं की कमियों के कारण इसे आज तक सही से लागू नहीं किया जा सका है। 4 साल के स्नातक के बाद पीएच.डी नामांकन के लिए योग्य ठहराना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं हो रहा। इससे पीएच.डी का मान तो कम होगा ही, साथ ही पीएच.डी धारकों की संख्या भी बढ़ेगी। जबकि पहले से मौजूद बेरोजगार नेट, जेआरएफ और पीएच.डी डिग्री धारकों के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। ऐसे लाखों लोग नौकरी के लिए भटक रहे हैं। इन बेरोजगारों के पास नौकरी के आवेदन के लिए लिया जाने वाला भारी-भरकम शुल्क तक नहीं होता है।
सवाल यह है कि इन मुद्दों पर बात कौन करे? अधिकांश शिक्षक अपने छोटे-मोटे निजी फायदों और प्रमोशन के चक्कर में अपने नैतिक दायित्वों को भूल चुके हैं। अनेक संस्थानों में नियुक्तियाँ योग्यता के बजाय लेन-देन के आधार पर हो रही हैं। इस रास्ते से आने वाले शिक्षकों की मानसिकता यही होती है कि “हम इतना पैसा देकर पढ़ाने थोड़े ही आए हैं!” कुलपतियों की नियुक्ति का मार्ग भी अब यही बन चुका है। शायद यही कारण है कि योग्यता के बदले राजनीतिक विचारधारा, चाटुकारिता और धनबल को चयन का मुख्य आधार बनाया जा रहा है। इस वजह से दागी कुलपतियों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है और इनको लेकर विवाद भी बढ़ रहे हैं। अब विश्विद्यालयों में पढाई कम और लड़ाई ज्यादा हो रही है। लेकिन अधिकांश कुलपति इन परिस्थितियों को सुधारने के बजाय सत्ता का सुख भोगने में लगे रहते हैं। सत्ता मिलते ही करोड़ों रूपये नवीनीकरण के नाम पर फूंक देते हैं और बाकी जनसंपर्क और अपने परिवार वालों के लिए सुविधा दिलवाने में।
आज मूल समस्या यह है कि संस्थानों में योग्यता से अधिक ‘निष्ठा’ का मूल्यांकन हो रहा है। सवाल यह नहीं पूछा जाता कि शिक्षक कितना अच्छा पढ़ाता है, कितना गुणवत्तापूर्ण शोध करता है या छात्रों के लिए कितना समर्पित है? बल्कि सवाल यह बन गया है कि—“वह किसके खेमे में है?” और यहीं से एक शिक्षक का पतन शुरू होता है।
जिस शिक्षक से हम लोकतंत्र, संविधान, स्वतंत्रता, समानता और आलोचनात्मक चिंतन की शिक्षा देने की अपेक्षा करते हैं, वही शिक्षक जब अपने संस्थान में सवाल उठाता है तो उसे विद्रोही, असहयोगी या विरोधी घोषित कर दिया जाता है। हम विद्यार्थियों से प्रश्न पूछने की उम्मीद करते हैं, लेकिन शिक्षकों से प्रश्न पूछने का अधिकार छीन लेना चाहते हैं—यह विरोधाभास हमारी शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट है।
यूडीआईएसई (UDISE) 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 14.71 लाख स्कूल, 24.69 करोड़ विद्यार्थी और 1.01 करोड़ से अधिक शिक्षक थे, जिसमें 1.04 लाख स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और उनमें 33.77 लाख विद्यार्थी नामांकित हैं। वर्ष 2025-26 में शिक्षकों की कुल संख्या बढ़कर 1,02,73,020 हो गई । सरकार के अनुसार विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात में सुधार हुआ है। इन आंकड़ों को देखकर यह माना जा सकता है कि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है और कुछ सकारात्मक बदलाव हुए हैं। लेकिन केवल शिक्षकों की थोड़ी सी संख्या बढ़ा देना ही समस्या का समाधान नहीं है।
उच्च शिक्षा का संकट और भी गहरा है। एआईएसएचई (AISHE) 2022-23 और 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार देश में शिक्षकों की संख्या भी बढ़ी है लेकिन अभी भी कम है। उच्च शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता केवल भव्य भवनों, डिजिटल पोर्टलों, एनआईआरएफ रैंकिंग्स और आंकड़ों से तय नहीं होती। बल्कि विश्वविद्यालयों की असली पहचान उसके विचारों की स्वतंत्रता से होती है। जहाँ शिक्षक बिना किसी भय के पढ़ा सके, शोध कर सके, नीतियों पर सवाल उठा सके और विद्यार्थी बिना डर के अपनी बात रख सके—वही वास्तव में विश्वविद्यालय कहलाने का अधिकारी है। यदि शिक्षक को हर पल यह डर सताए कि किसी निर्णय पर सवाल उठाने पर उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होगी, तो विश्वविद्यालय का सबसे अहम् तत्व ‘अकादमिक स्वतंत्रता’ दम तोड़ देता है।
अतः जब तक शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त नहीं किया जाता, अनुबंध और अतिथि शिक्षकों का शोषण बंद करके ‘समान काम का समान वेतन’ लागू नहीं होता, कुलपतियों और प्राध्यापकों की नियुक्ति का आधार विचारधारा के बजाय केवल योग्य अकादमिक क्षमता नहीं बन जाता, तब तक विश्वविद्यालयों की स्थिति ठीक होनी मुश्किल है। भारत में प्राचीन समय से ही शिक्षकों के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की जाती रही है, विश्वविद्यालयों को वैचारिक क्रांति के केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है। इसलिए वास्तव में भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर बढ़ना है तो इन मूल्यों को लागू करना आवश्यक है। तभी शिक्षक दिवस सही मायनों में सार्थक हो सकेगा।
.







