
एक ऐसा रोग जो केवल जैविक नहीं, सामाजिक भी है
ब्रिक्स देशों के विशेष संदर्भ में एड्स पर चर्चा
विश्व एड्स दिवस (1 दिसम्बर) पर विशेष आलेख
डॉ. संजय कुमार द्विवेदी, प्रो. (डॉ.) राहुल पटेल और डॉ. रमेश कुमार
एचआईवी/एड्स केवल एक वायरस जनित बीमारी नहीं अपितु मानव सभ्यता के स्वास्थ्य, नैतिकता, लैंगिक संबंधों, गरीबी, विकास और वैश्विक असमानताओं पर गंभीर प्रश्न उठाने वाली सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौती है। विश्व स्तर पर करोड़ों लोग एचआईवी के साथ जीवन जी रहे हैं। हर वर्ष लाखों नए संक्रमण और एड्स-सम्बन्धी मृत्यु दर्ज होती हैं। यह महामारी हमें यह याद दिलाती है कि किसी भी रोग की जड़ें केवल शरीर में नहीं समाज की संरचनाओं गरीबी, लैंगिक असमानता, शिक्षा की कमी, नशे की संस्कृति, हिंसा और भेदभाव में भी गहराई से धँसी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों पर गौर करें तो दुनिया भर में वर्ष 2024 में 40.8 मिलियन लोग एचआईवी संक्रमित रहे और 6.30 लाख लोग इससे सम्बंधित कारणों से काल कवलित हुए। वर्ष 2024 में 1.3 मिलियन नए लोग इसकी चपेट में आये। विश्व स्वास्थ्य संगठन, ग्लोबल फण्ड तथा यूएनएड ने अपनी वैश्विक नीतियों और सतत विकास लक्ष्यों के साथ तय किया था की वर्ष 2030 तक वैश्विक एचआईवी महामारी को समाप्त कर लेंगे। 2025 बीतने को है और इस लक्ष्य को प्राप्त करना नामुमकिन तो नहीं अपितु अत्यंत कठिन प्रण नज़र आ रहा है। 2025 तक लक्ष्य था कि संक्रमित आबादी के 95% का डायग्नोसिस हो सके, इनमें से जो एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी ले रहे उसके 95% का वायरल लोड इतना घटा सकें कि इस संक्रमण का आगे प्रसार न हो सके और यह कड़ी यहीं टूट जाए। एचआईवी के संक्रमण की रोकथाम की विधियां तो उपलब्ध हैं लेकिन कोई फूलप्रूफ़ ईलाज नहीं है। जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया भर के देशों में बड़े स्तर पर निवेश हुए हैं लेकिन अभी भी अनेक देशों में इस रोग को सही समय पर डायग्नोस कर पाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस बीमारी के सन्दर्भ में सामजिक स्टिग्मा भी एक गंभीर जटिलता को जन्म देता है। एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी की अपनी सीमायें हैं। इसका शरीर के उन उतकों में जहां यह वायरस छद्म रूप में रहता है, सीमित अवशोषण ही हो पाता है। छद्म भंडार जो रेस्टिंग CD4+T कोशिकाओं तथा पूरे शरीर में फ़ैली माएलॉईड कोशिकाओं में रहता है उसको एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी से समूल नष्ट करना अत्यंत दुष्कर प्रक्रिया है और इस थेरेपी के रुकते ही कुछ दिनों में या कुछ महीनों में वायरस पुनः रेप्लिकेट होने लगता है। इसका रोग प्रतिरोधक क्षमता पर दुष्प्रभाव एक अलग ही जटिल बाधा है। CD4+T कोशिकाओं को रेस्टोर करना, CD8+cytotoxic T कोशिकाओं की कार्यक्षमता को पुनर्जीवित करना भी अलग चुनौती है।
1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है जिसका उद्देश्य केवल संवेदना प्रकट करना ही नहीं बल्कि विज्ञान-आधारित जानकारी, सामाजिक संवेदनशीलता और समानता के आधार पर एक संगठित संघर्ष की दिशा दिखाना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2025 के विश्व एड्स दिवस का मुख्य विमर्श “ओवरकमिंग डिसरप्शन ट्रांस्फोर्मिंग द एड्स रेस्पोंस” है। भारत सरकार भी इस हेतु कमर कस चुकी है की कैसे इस महामारी को 2030 तक हरा कर एक समर्थ और मज़बूत-नीरोगी समाज का निर्माण किया जा सके।
एचआईवी (Human Immunodeficiency Virus) ऐसा वायरस है जो मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की महत्वपूर्ण कोशिकाओं विशेषकर CD4 टी-कोशिकाओं पर हमला करता है। धीरे-धीरे यह प्रतिरक्षा को इतना कमजोर कर देता है कि सामान्य संक्रमण भी गंभीर रूप ले सकते हैं। एड्स (Acquired Immune Deficiency Syndrome) एचआईवी संक्रमण की उन्नत या अंतिम अवस्था है जब CD4 कोशिकाओं की संख्या अत्यंत कम हो जाती है और टी.बी., न्यूमोनिया, फंगल संक्रमण और कुछ विशेष कैंसर (कपोसी सारकोमा, कुछ लिम्फोमा आदि) बार-बार और गंभीर रूप से होने लगते हैं, व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधक क्षमता सामान्य स्तर से बहुत नीचे चली जाती है।
आज एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) के कारण एचआईवी संक्रमण को नियंत्रित तथा दीर्घकालिक रोग के रूप में बदला जा सकता है। समय पर जांच, नियमित दवा और परामर्श के साथ व्यक्ति लंबा सक्रिय और लगभग सामान्य जीवन जी सकता है तथा दूसरों को संक्रमण का खतरा भी बहुत कम हो जाता है।
वैसे ऐतिहासिक रूप से एड्स की स्थिति को संक्षिप्त रूप में निम्न क्रोनोलॉजी से समझा जा सकता है-
– 1981 में अमेरिका में कुछ मरीजों में असामान्य प्रकार के न्यूमोनिया और कैंसर देखे गए। बाद में इन्हें एड्स के प्रारंभिक मामलों के रूप में पहचाना गया।
– 1983 में फ्रांस के वैज्ञानिकों ने उस वायरस की पहचान की जो आगे चलकर एचआईवी के नाम से जाना गया।
– 1980–90 का दशक में अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप में महामारी का तेज प्रसार हुआ जिससे करोड़ों लोग संक्रमित हुए। इस समय भय, अज्ञान, कलंक और अफवाहें भी व्यापक रूप से वैश्विक पटल पर छा गई थीं।
– 1996 के बाद में संयोजित एंटीरेट्रोवायरल दवाओं (कंबिनेशन ART) के आने से मृत्यु दर में भारी कमी आई और एचआईवी को घातक से नियंत्रित दीर्घकालिक रोग में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
– वर्तमान समय में एचआईवी/एड्स को केवल चिकित्सकीय समस्या न मानकर मानवाधिकार, लैंगिक न्याय, यौनता, माइग्रेशन, गरीबी, नीति-निर्माण एवं सांस्कृतिक संरचनाओं से जुड़ा समग्र प्रश्न माना जाता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और ब्रिक्स देशों की विशेष स्थिति
विश्व स्तर पर करोड़ों लोग एचआईवी के साथ जीवन जी रहे हैं। नए संक्रमणों और एड्स सम्बन्धी मृत्यु में पहले की तुलना में कमी आई है, परंतु महामारी अभी समाप्त नहीं हुई है।
ब्रिक्स (BRICS) समूह के अंतर्गत ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका आते हैं जो विश्व की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा अपने भीतर समेटे हुए हैं। एचआईवी महामारी का एक बड़ा हिस्सा भी इन्हीं देशों में केंद्रित है। इन देशों की विशेषता यह है कि ये तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाएँ हैं जहां तेज शहरीकरण, प्रवसन, आर्थिक असमानता और यौन व्यवहार में बदलाव यहाँ तीव्र गति से हो रहे हैं और एचआईवी/एड्स कार्यक्रमों का आर्थिक बोझ भी ये देश बड़े पैमाने पर स्वयं वहन कर रहे हैं।
संक्षिप्त रूप में ब्रिक्स देशों की स्थिति पर विचार करें तो निम्न तथ्य प्रकाश में आते है जिसे क्रमबद्ध तरीके से व्यक्त किया जा सकता है-
- दक्षिण अफ्रीकाविश्व के सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक जिसकी वयस्क आबादी (15–49 वर्ष) में एचआईवी प्रचलन लगभग पाँच में से एक वयस्क के स्तर तक पहुँचा गया है यहाँ उपनिवेशवाद, नस्लीय भेदभाव (अपार्थाइड), अत्यधिक गरीबी और लैंगिक हिंसा जैसी ऐतिहासिक–सामाजिक शक्तियों ने महामारी को गहराई दी है।
- ब्राज़ील में एचआईवी के साथ रहने वाले लोगों की संख्या लाखों में है। सामान्य वयस्क प्रचलन अपेक्षाकृत कम है लेकिन समलैंगिक पुरुष, ट्रांसजेंडर समुदाय, इंजेक्टिंग ड्रग यूज़र्स और जेल आबादी जैसे समूहों में संक्रमण का अनुपात अत्यधिक है। ब्राज़ील ने अधिकार-आधारित स्वास्थ्य नीति, मुफ्त ART और समुदाय-आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रगति की है।
- भारत में एचआईवी के साथ रहने वाले लोगों की अनुमानित संख्या 20 लाख से अधिक है। वयस्क प्रचलन लगभग 22–0.24 प्रतिशत के आसपास माना जाता है जो वैश्विक औसत से कम है परंतु विशाल आबादी के कारण कुल संख्या बड़ी है। कुछ राज्यों में विशेषकर पूर्वोत्तर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु आदि संक्रमण का बोझ अपेक्षाकृत अधिक रहा है।
- रूस में सामान्य वयस्क आबादी में प्रचलन कम है किंतु इंजेक्टिंग ड्रग यूज़र्स, यौन अल्पसंख्यकों और जेलों में संक्रमण दर अधिक पाई जाती है। नशीली दवाओं की नीति, सिविल सोसाइटी पर नियंत्रण तथा स्टिग्मा/कलंक के कारण नुकसान-न्यूनन (harm reduction) कार्यक्रमों को कई चुनौतियाँ झेलनी पड़ती हैं।
- चीन की बात करें तो यहाँ भी आम आबादी में प्रचलन कम है परंतु प्रवासी श्रमिकों, यौन अल्पसंख्यकों, सेक्स वर्कर्स और कुछ प्रांतीय क्षेत्रों में संक्रमण के क्लस्टर स्पष्ट दिखाई देते हैं।
इस प्रकार मानवविज्ञान की दृष्टि से ब्रिक्स देशों का तुलनात्मक अध्ययन यह दिखाता है कि जहाँ राजनीतिक इच्छाशक्ति, समुदाय की भागीदारी, मानवाधिकार दृष्टिकोण और वैज्ञानिक यौन शिक्षा को महत्व दिया गया वहाँ एचआईवी कार्यक्रम अधिक सफल रहे जबकि जहाँ कलंक, दमन, भय और “नैतिकता” के नाम पर चुप्पी रही वहाँ महामारी ने गहरी जड़ें जमाईं हैं।
भारत में एचआईवी/एड्स की स्थिति
भारत में एचआईवी के साथ रहने वाले लोगों की अनुमानित संख्या 20 लाख से अधिक है, वयस्क प्रचलन लगभग 0.22–0.24% के बीच है और पिछले दो दशकों में नए संक्रमणों में उल्लेखनीय कमी आई है जो नीतिगत प्रयासों और सामाजिक जागरूकता का परिणाम है। परंतु यह औसत तस्वीर भौगोलिक, सामाजिक और लैंगिक असमानताओं को छिपा देती है। एचआईवी संक्रमण अधिकतर उन समूहों में केंद्रित है जो पहले से ही समाज के हाशिए पर हैं जैसे –महिला और पुरुष सेक्स वर्कर्स, पुरुष-से-पुरुष यौन संबंध रखने वाले पुरुष, ट्रांसजेंडर समुदाय, इंजेक्टिंग ड्रग यूज़र्स, प्रवासी मज़दूर और ट्रक ड्राइवर, शहरी झुग्गी बस्तियों और अत्यधिक गरीब क्षेत्रों की आबादी।
जाति, वर्ग, लिंग और यौनता की संरचनाएँ यहाँ गहरे रूप से काम करती हैं। उदाहरण के लिए कई महिलाओं के लिए कंडोम के प्रयोग पर निर्णय स्वयं लेना संभव नहीं होता यौन अल्पसंख्यक समुदायों को सामाजिक स्वीकृति न मिलने से वे छिपी हुई जिंदगी जीते हैं जिससे सही जानकारी और सेवाओं तक उनकी पहुँच बाधित होती है।
नशा-उपयोग और इंजेक्टिंग ड्रग्स का प्रश्न भी अक्सर अपराध और नैतिकता के ढाँचे में देखा जाता है जिससे स्वास्थ्य-आधारित दृष्टिकोण कमजोर पड़ जाता है।
भारत सरकार के संस्थागत प्रयास
राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (NACP)
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) देश भर में एचआईवी/एड्स की रोकथाम, जांच, उपचार और देखभाल का समन्वय करता है। इसके अंतर्गत चलने वाला राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (NACP) कई चरणों में संचालित है जिनके प्रमुख लक्ष्य हैं –नए संक्रमणों में कमी, उच्च जोखिम समूहों पर केंद्रित रोकथाम, सुरक्षित यौन व्यवहार को बढ़ावा देना, संक्रमणमुक्त रक्त सुनिश्चित करना, व्यापक परीक्षण एवं परामर्श सेवाएँ प्रदान करना तथा एचआईवी के साथ रहने वाले लोगों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना।
एआरटी (ART) तथा परीक्षण केंद्र
देश भर में स्थित ART केंद्र और लिंक ART केंद्रों पर एचआईवी-पॉज़िटिव लोगों को मुफ़्त एंटीरेट्रोवायरल दवाएँ दी जाती हैं। यहाँ दवा के साथ-साथ पोषण, मनोसामाजिक परामर्श और दवा नियमित लेने में सहायता भी प्रदान की जाती है। आई सी टी सी/एच टी सी (Integrated Counselling and Testing Centres) पर एचआईवी की गोपनीय और स्वैच्छिक जांच तथा पूर्व और पश्च-परामर्श की सुविधा उपलब्ध है।
रक्त-सुरक्षा और रक्त बैंक नियमन
सभी मान्यता प्राप्त रक्त बैंकों में एचआईवी, हेपेटाइटिस, सिफिलिस आदि की अनिवार्य जाँच की व्यवस्था ने रक्त-चढ़ाने से होने वाले संक्रमण की संभावना को बहुत कम किया है।
माँ से शिशु में संक्रमण रोकथाम (PPTCT)
गर्भवती महिलाओं की एचआईवी जांच, पॉज़िटिव होने पर ART, सुरक्षित प्रसव और नवजात शिशु को दवा इन सबके संयोजन से माँ से बच्चे में संक्रमण की संभावना न्यूनतम की जा सकती है।
गैर-सरकारी एवं सामुदायिक प्रयास
स्वैच्छिक संगठन और सामुदायिक नेटवर्क
अनेक गैर-सरकारी संगठन सेक्स वर्कर्स, समलैंगिक एवं ट्रांसजेंडर समुदाय, इंजेक्टिंग ड्रग यूज़र्स, जेलों की आबादी आदि के बीच काम करते हैं। ये संगठन कंडोम वितरण, सुरक्षित सुई कार्यक्रम, काउंसलिंग, कानूनी सहायता और भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाते हैं। “पीपुल लिविंग विद एचआईवी (PLHIV) नेटवर्क” एचआईवी पॉज़िटिव लोगों के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के लिए सक्रिय हैं।
शैक्षिक संस्थान और रेड रिबन क्लब
विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में रेड रिबन क्लब, एनएसएस और अन्य युवा मंच पोस्टर प्रतियोगिता, निबंध, वाद-विवाद, नुक्कड़ नाटक, रैली और रक्तदान शिविर जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं में वैज्ञानिक जानकारी का प्रसार करते हैं।
मीडिया और लोक-संस्कृति
टीवी, रेडियो, फिल्म, सोशल मीडिया, लोकगीत, नाटक और अन्य लोक-कलाएँ एचआईवी/एड्स के विषय पर समाज के भीतर संवाद रचने का प्रभावी माध्यम बनी हैं।
मानवशास्त्रीय दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण है कि संदेश स्थानीय भाषा, प्रतीकों, धार्मिक–सांस्कृतिक मान्यताओं और लैंगिक संबंधों की वास्तविकता के अनुरूप हों तभी वे लोगों की जीवन-शैली में व्यवहारिक परिवर्तन ला सकते हैं।
व्यक्ति स्तर पर बचाव के लिए सुझाव
सुरक्षित यौन व्यवहार अपनाएँ
हर बार, सही तरीके से कंडोम का प्रयोग करें चाहे यौन संबंध विवाह के भीतर हों या बाहर। एक से अधिक यौन साथी रखने पर जोखिम बढ़ता है परस्पर एकनिष्ठ और जिम्मेदार संबंध अपेक्षाकृत सुरक्षित होते हैं जिसको निश्चित रूप से सभी को अपनाना चाहिए और नशे (शराब, ड्रग्स आदि) के प्रभाव में लिए गए निर्णय अक्सर असुरक्षित होते हैं, उनसे बचना चाहिए ।
रक्त और सुई के उपयोग में सावधानी
केवल मान्यता प्राप्त एवं जाँचित रक्त बैंक से लिया गया रक्त ही उपयोग करें। इंजेक्शन, टैटू, कान-नाक छिदवाने, ब्लड शुगर जांच आदि के लिए हमेशा नई या पूरी तरह नसबंदी की गई सुई सीरिंज का ही उपयोग करें।
एचआईवी की स्वैच्छिक और गोपनीय जांच
यदि कभी असुरक्षित यौन संबंध, साझा सुई या अन्य जोखिमपूर्ण परिस्थिति रही हो तो बिना शर्म और भय के निकटतम सरकारी अस्पताल या आई सी टी सी केंद्र पर एचआईवी जांच अवश्य कराएँ। समय पर पता चलने से न केवल उपचार जल्दी शुरू होता है अपितु आप अपने साथी और परिवार को भी सुरक्षित रख सकते हैं।
गर्भावस्था के दौरान विशेष सावधानी
सभी गर्भवती महिलाओं को एचआईवी जांच करानी चाहिए। यदि रिपोर्ट पॉज़िटिव हो तो चिकित्सक के निर्देशानुसार ए आर टी और अन्य उपायों से बच्चे को संक्रमण से बचाया जा सकता है।
भेदभाव नहीं सहानुभूति और समर्थन
एचआईवी हाथ मिलाने, गले लगाने, साथ बैठने, भोजन या बर्तन साझा करने, कपड़े साझा करने, खाँसने या छींकने से नहीं फैलता। स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, परिवार और समाज में एचआईवी-पॉज़िटिव व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव न करें। भेदभाव कम होने पर लोग अधिक सहजता से जांच, उपचार और परामर्श के लिए आगे आते हैं यह भी “रोकथाम” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वैज्ञानिक जानकारी पर भरोसा, अफवाहों से दूरी
चमत्कारी इलाज, तंत्र-मंत्र, अप्रमाणित घरेलू नुस्खों या झूठे प्रचार से बचें। किसी भी शंका की स्थिति में प्रशिक्षित डॉक्टर, सरकारी स्वास्थ्य केंद्र या विश्वसनीय हेल्पलाइन से ही सलाह लें।
अंगोला की निवासी ‘रोसा फ्रांसिस्को पेड्रो’ और एचआईवी/एड्स की महामारी से उनका संघर्ष और जीवन जीने की सदेक्षा तथा मुख्य धारा में पुन: शामिल होना जैसे उदाहरण उन तमाम संक्रमित लोगों और समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत हो सकते हैं।
ब्रिक्स से विश्व के लिए संदेश
एचआईवी/एड्स की महामारी हमें यह सिखाती है कि-
रोग केवल वायरस की देन नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं का प्रतिबिंब भी है। गरीबी, लैंगिक असमानता, नशा, हिंसा, यौन शोषण, प्रवासन, युद्ध और राजनीतिक निर्णय ये सब मिलकर संक्रमण के “सामाजिक पर्यावरण” को बनाते हैं। ब्रिक्स देशों के अनुभव से स्पष्ट है कि जहाँ राजनीतिक इच्छाशक्ति, समुदाय की भागीदारी, मानवाधिकार दृष्टिकोण और वैज्ञानिक यौन शिक्षा को महत्व दिया गया वहाँ एचआईवी नियंत्रण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई।
विगत दो वर्षों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपनी आउटरीच गतिविधियों में एचआईवी/एड्स की महामारी के प्रति जागरूकता फैलाने में अपनी ज़िम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया है जहाँ गोद लिए गए गाँवों के ग्रामीण समुदायों को इस रोग के प्रति निरंतर जागरूक किया जा रहा है। शैक्षणिक संस्थानों द्वारा किये जा रहे इस तरह के प्रयास निश्चित तौर पर समाज में बदलाव की बयार लाने और समाज के प्रति अपने नैतिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करने में सशक्त माध्यम साबित होंगे।
विश्व एड्स दिवस हमें यह संदेश देता है कि –“वायरस से लड़ाई प्रयोगशाला में होती है, पर महामारी से लड़ाई समाज में।”
यदि हम विज्ञान-आधारित जानकारी, समानता, लैंगिक न्याय और मानवीय संवेदना को केंद्र में रख सकें तो एचआईवी/एड्स निश्चित ही नियंत्रित और अंततः समाप्त किया जा सकने वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।
संदर्भ सूची
- संयुक्त राष्ट्र एचआईवी/एड्स कार्यक्रम (यूएनएड्स). वैश्विक एचआईवी/एड्स आँकड़े एवं तथ्य पत्रक (विभिन्न वर्ष). यूएनएड्स की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध वैश्विक व क्षेत्रीय आँकड़े।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO). एचआईवी : वैश्विक आँकड़े, तथ्य और मार्गदर्शन (नवीनतम ऑनलाइन दस्तावेज़). विश्व स्वास्थ्य संगठन की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री।
- यूएनएड्स. BRICS देशों में एचआईवी/एड्स की स्थिति और स्वास्थ्य सहयोग (प्रेस विज्ञप्तियाँ एवं रिपोर्टें). इनमें उल्लिखित है कि ब्रिक्स देश विश्व के कुल एचआईवी संक्रमितों और नए संक्रमणों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा अपने भीतर समेटे हुए हैं।
- राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO), भारत सरकार. HIV Estimates – India Fact Sheets (विभिन्न नवीनतम वर्ष). भारत में एचआईवी/एड्स की राष्ट्रीय एवं राज्यवार अनुमानित स्थिति।
- राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO), भारत सरकार. National AIDS Control Programme (NACP) से सम्बन्धित नीतिगत दस्तावेज़ – जिनमें रोकथाम, उपचार, रक्त-सुरक्षा, माँ से शिशु में संक्रमण रोकथाम और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण का विवरण है।
- यूएनएड्स एवं विश्व बैंक. देश-वार एचआईवी प्रोफाइल – दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, भारत, रूस, चीन (Country HIV Profiles). इन प्रोफाइलों में वयस्क प्रचलन, कुल PLHIV, उच्च जोखिम समूहों की स्थिति आदि का विवरण मिलता है।
- HIV.gov (U.S. Department of Health & Human Services). Global HIV & AIDS Statistics – विश्व स्तर पर एचआईवी के साथ जी रहे लोगों की संख्या, नए संक्रमण और मृत्यु से संबंधित संक्षिप्त आँकड़े।
- चयनित शोध लेख (BRICS संदर्भ में) “Progress on HIV and other sexually transmitted infections in BRICS-plus countries, 1992–2021”.
- From antiretrovirals to curative therapies: Current developments in HIV treatment and prevention. European Journal of Medicinal Chemistry. Volume 300, 15 December 2025.
https://doi.org/10.1016/j.ejmech.2025.118190

डॉ. संजय कुमार द्विवेदी
पोस्ट डॉक्टोरल फेलो (आईसीएसएसआर)
मानवविज्ञान विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज

प्रो. (डॉ.) राहुल पटेल
प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, मानवविज्ञान विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज

डॉ. रमेश कुमार
जैवरसायन विभाग, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा, पंजाब










