
स्त्री, जेण्डर और लोकतन्त्र
लैंगिक भेद का जेण्डर की संकल्पना में रूपान्तरित होना मानव इतिहास की एक दुर्भाग्यपूर्ण परिघटना रही। इसने मनुष्य की बहुआयामी सम्भावनाओं को संकुचित खाँचों में कैद कर दिया। स्त्री और पुरुष के व्यक्तित्व की वे विशिष्टताएँ—जो किसी भी मनुष्य की स्वतन्त्र पहचान का आधार हो सकती थीं—पूर्वनिर्धारित भूमिकाओं में बाँध दी गयीं। परिणाम अधूरे व्यक्तित्व, कुण्ठाओं और असन्तुलन के रूप में सामने आया।
जेण्डर के साँचे में स्त्री दुनिया को बाँध कर स्त्री व्यक्तित्व को अनुकूलित किया जाना सुनियोजित पितृसत्तात्मक रणनीति थी, जिसने स्त्री की सम्भावनाओं, अधिकारों और सार्वजनिक उपस्थिति पर ताले जड़ दिए। जेण्डर की यह अवधारणा सोच और व्यवहार में इतनी गहराई तक पैठ गयी कि वह अनायास ही हमारे कर्म और विचार दोनों को संचालित करने लगी—और पुरुष भी इससे अछूते नहीं रहे। दिनकर की प्रसिद्ध पंक्ति,“इतिहास पहुँचता जभी निकट नारी के/हो रहता अचल या कि कविता बन जाता है” (उर्वशी) में निहित सदाशयता के पासंग में यह विचार नहीं आया कि कविता बन जाना स्त्री के लिए कितना बड़ा दण्ड बना। कविता बनकर वह इतिहास से ही निष्कासित कर दी गयी—दृश्यता से वंचित, सत्ता से बाहर और सामाजिक निर्णय-प्रक्रिया से अनुपस्थित। लोकतन्त्र के सन्दर्भ में इसका अर्थ यही रहा कि स्त्री को शासन-तन्त्र से बाहर कर दिया गया और उसकी किसी भूमिका या भागीदारी को मान्यता नहीं दी गयी। आजादी के बाद स्त्री को मताधिकार देकर कर्तव्य पूरा होना मान लिया गया, पर समानता की जमीन उपलब्ध कराए बिना इस अधिकार के क्या मायने रह जाते हैं, इसपर विचार किया जाना था। इसके बिना लोकतन्त्र में स्त्री की उपस्थिति नगण्य बनी रही और परिणाम यह हुआ कि उसके सवाल भी व्यवस्था में माकूल जगह नहीं बना सके। शासन व्यवस्था के तमाम दावों के बावजूद पितृसत्ता की दृष्टि में यह नहीं रहा कि आधी आबादी को शासन तन्त्र वंचित करके भला वह लोकतन्त्र की किस सफलता का बखान कर सकता है!
पीछे मुड़कर देखने पर दृष्टि सबसे पहले संविधान की प्रस्तावना पर टिकती है, जहाँ आजाद भारत की परिकल्पना साकार होती दिखाई देती है। भारत को सम्प्रभुता सम्पन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य घोषित करना महज एक संवैधानिक उद्घोषणा नहीं, बल्कि मनुष्य की समता की प्रतिष्ठा है जहाँ लिंग, जाति, धर्म, वर्ग, सम्प्रदाय आदि से परे सबकी समान भूमिका को स्वीकार किया गया। इसलिए यह जानना अपरिहार्य है कि जिस आजादी की बार-बार चर्चा होती है, वह वास्तव में है केवल सत्ता का हस्तान्तरण नहीं है ,यह सबकी भागीदारी, सबके अधिकार और सबके विकास की स्वीकृति भी है।
भारत के सन्दर्भ में आधुनिक स्त्री की यात्रा शुरू होती है बीसवीं सदी से। इससे पहले उन्नीसवीं सदी में स्त्री समाज की नजरों में आयी और यह समझ में आया कि आधी आबादी का मानवोचित गरिमा से वंचित होना समाज के विकास के लिए कितना घातक है। शृंगार और सज्जा की वस्तु से परे उसे पहली बार व्यक्ति माना गया और उसकी दशा में सुधार के प्रयास होने लगे । दरअसल नवजागरण का कोई भी प्रयास स्त्री को लिए बिना अधूरा ही होता। स्त्री अवमानना के उस अन्तिम सोपान पर खड़ी थी जहाँ उसके साथ समाज के पराभव की ही राह बचती थी। निश्चय ही इसके आरम्भिक प्रणेता पुरुष बने किन्तु सदी के उत्तरार्द्ध तक पहुँचने के पहले ही इसकी बागडोर स्त्रियों ने अपने हाथों में ले ली। सावित्री बाई फुले, रमाबाई, रख्माबाई, सीमंतिनी उपदेशिका, माई भगवती जैसी स्त्रियों ने अपनी अपनी तरह से हस्तक्षेप किया और स्त्री जागृति की आगे की राह प्रशस्त की। बीसवीं सदी में वह नागरिक बनी और आन्दोलनों के माध्यम से स्त्री अधिकारों की ओर उन्मुख हुई।
भारतीय नवजागरण की शुरुआत स्त्री प्रश्नों से हुई, पर स्त्री स्वयं उस विमर्श के केन्द्र में नहीं थी। उसके केन्द्र में समाज की उन्नति थी। स्त्री की दशा में सुधार जरूरी था क्योंकि इससे सन्तति और समाज का विकास अवरुद्ध हो रहा था। स्त्री की दशा में सुधार के शुरुआती प्रयास पुरुष सुधारकों के थे। किन्तु बीसवीं सदी में स्त्री संगठन बने और स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी शुरू हुई। यहाँ आकर स्त्री मुक्ति राष्ट्रीय मुक्ति के साथ एकाकार हो गयी।
आजादी के बाद समानता के संवैधानिक आश्वासन ने स्त्री आन्दोलनों को कुछ समय के लिए शिथिल कर दिया। यह ठीक है कि जिस वोट के अधिकार को पाने के लिए पश्चिम में स्त्रियों को लम्बा संघर्ष करना पड़ा वह आजादी के साथ ही यहाँ स्वतः उपलब्ध हो गया। यह सर्वविदित है कि पश्चिमी लोकतन्त्रों में स्त्रियों को लम्बे संघर्ष के बाद मताधिकार मिला। बिना प्रयास के मताधिकार पाने का परिणाम यह हुआ कि वह मनोभूमि नहीं तैयार नहीं हो पायी जो उसके महत्त्व को समझ पाती और अपने को उसके लिए तैयार कर पाती। भारत में भले ही संविधान ने प्रारम्भ से ही यह अधिकार दिया, पर लोकतान्त्रिक चेतना के बिना इस अधिकार का अर्थ सीमित ही रहा। स्त्रियों के मतदान के निर्णय लम्बे समय तक घर के पुरुष तय करते रहे।

आजादी तो मिली पर दुर्भाग्य यह रहा कि आजादी के मूल्य हमारे सामाजिक जीवन का अंग नहीं बन सके। सामन्ती और पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियाँ समाज के विभिन्न स्तरों पर अपनी पकड़ बनाए रहीं। नब्बे के दशक में अस्मिता आन्दोलनों का उभार इसी विफलता का प्रतिफल था। हम अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचने में, उसे उसकी जगह देने में असफल रहे। विशेषकर हिन्दी पट्टी में नवजागरण की चेतना अपनी जड़ें जमाने से पहले ही राजनीतिक आन्दोलनों में विलीन हो गयी। परिणामस्वरूप वर्चस्ववादी प्रवृत्तियाँ—अचेत जीवाणुओं की तरह—अनुकूल अवसर पाते ही बार-बार सक्रिय होती रही हैं।
लोकतन्त्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति है। परिवार, समाज, शिक्षा और संस्थानों में लोकतान्त्रिक चेतना विकसित किए बिना लोकतन्त्र की सफलता सम्भव नहीं। इस सदी के पहले तक स्त्रियों की दुनिया घर की चारदीवारी में कैद रही। उसके पास न निर्णय का अधिकार था और न ही पर्याप्त शिक्षा। ऐसे में लोकतन्त्र में उसकी भूमिका नगण्य ही रही। पितृसत्ता द्वारा प्रयासपूर्वक राजनीति में स्त्रियों के आरक्षण के अधिकार को कई बहानों से टाला जाता रहा। स्त्री चूँकि लगभग आधी आबादी है, तो उसकी पूर्ण और समान भागीदारी के बिना लोकतन्त्र की कोई भी परिकल्पना अधूरी ही रहेगी। लोकसभा में स्त्रियों का तेरह या पंद्रह प्रतिशत प्रतिनिधित्व लोकतन्त्र को सार्थक माहौल नहीं दे सकता। सच तो यह है कि दहलीज के बाहर की दुनिया चाहे वह सार्वजनिक स्थल हो, कार्यक्षेत्र हो, उद्योग और व्यापार जगत हो या संसद हो, स्त्रियाँ जितनी अधिक संख्या में होंगी, माहौल उतना ही उनके उपयुक्त होगा। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि संविधान में जिस लोकतन्त्र की प्रस्थापना की प्रतिज्ञा है, उसका वास्तविक अर्थ क्या है? आधी आबादी को अदृश्य रखकर किस लोकतन्त्र की बात की जा रही है? क्या लोकतन्त्र केवल पाँच वर्षों में एक बार वोट डालने का नाम है? इन प्रश्नों से टकराए बिना लोकतन्त्र की सार्थकता पर विचार सम्भव नहीं।
बिहार का उदाहरण इस सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण है। नवजागरण काल में जहाँ अन्य क्षेत्रों में स्त्री चेतना मुखर हुई, बिहार में स्त्री की छवि बीसवीं सदी के अन्तिम दशक तक दांतों में दबाए आँचल में अर्द्धमुकुलित चेहरे की बनी रही। नयी सदी में यह बिम्ब टूटा है—साइकिल योजना, पंचायतों में पचास प्रतिशत आरक्षण, जीविका योजना, आँगनबाड़ी, पुलिस सेवा में भर्ती और 2025 के चुनावों ने स्त्री चेतना के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी। इन सब योजनाओं का प्रभाव यह पड़ा कि समाज की जड़ता टूटी, स्त्रियों के लिए दहलीज के बाहर की दुनिया खुली, बन्धन ढीले पड़े और बड़ी संख्या में स्त्रियाँ कार्यक्षेत्र में आयीं। साइकिल योजना ने तो लड़कियों को मानो पंख दे दिए। अब वे अपने और परिवार के उन कार्यों को करने में सक्षम हुईं जिनके लिए उन्हें पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था। साथ ही स्कूल कॉलेज और कार्यस्थलों पर भी जाना उनके लिए आसान हो गया। पुलिस सेवा पर भी बड़े पैमाने पर हुई नियुक्तियों ने स्त्रियों को साहस और आत्मविश्वास दिया और उनके प्रति समाज का नजरिया भी बदला है और उनकी शिक्षा पर परिवार ध्यान देने लगे हैं। कभी कात्यायनी की ‘हॉकी खेलती लड़कियाँ’ ने स्त्री के पारम्परिक सौंदर्यशास्त्र को उलट दिया था, आज बिहार के मैदानों में आत्मविश्वास से दौड़ती और खेलती लड़कियाँ को सहज ही देखा जा सकता है। पंचायती व्यवस्था में भी स्वयं निर्णय लेने का साहस स्त्रियों में आ रहा है।
पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में तो नया ही परिदृश्य था। ऐन चुनाव से पहले स्वरोजगार के नाम पर लोन के रूप में एकमुश्त राशि दी गयी और उसके परिणाम चौंकाने वाले थे। स्त्री वोट की उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी गयी। इस परिघटना ने राजनीति में स्त्रियों की स्थिति को नये सिरे से परिभाषित किया। इसे सकारात्मक रूप में लेते हुए यह कहा गया कि स्त्री को जो जीविका के नाम पर राशि उपलब्ध कराई गयी है, उसके सार्थक परिणाम होंगे क्योंकि स्त्री के हाथ में जब पैसे आते हैं तो उसका उपयोग परिवार के लिए होता है। यह भी एक प्रकार से जेण्डर सोच ही है। कुछ सुविधाओं को कानूनी या प्रशासनिक वैधता से परे दया की तर्ज पर स्त्री के लिए उपलब्ध करा दिया जाता है। यह उसकी नागरिकता की पात्रता की अवहेलना है। स्त्री को दया के रूप में भीख नहीं, अनुकूल परिवेश, सहयोग और अधिकार चाहिए। उन्हें चाहिए शिक्षा का अधिकार, तकनीकी शिक्षा, कार्यक्षेत्र में सुरक्षा का आश्वासन, समान वेतन का अधिकार, यौन हिंसा के विरुद्ध त्वरित और कठोर कार्रवाई की व्यवस्था और चाहिए राजनीति में भागीदारी ताकि उसकी आवाज सुनी जा सके। जबकि स्थिति यह है कि संसद में स्त्रियों की संख्या पर्याप्त से बहुत कम है। राजनीति में स्त्री आरक्षण मजाक बनकर रह गया है। स्त्री आरक्षण विधेयक पास भी हुआ है तो अनेक शर्तों के साथ, न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी की तर्ज पर। जनगणना, परिसीमन और राज्यों द्वारा जब स्वीकृति होगी, तब आरक्षण लागू होगा और इसमें कितना वक्त लगेगा, यह कोई नहीं कह सकता। कानूनी जामा देकर इसे एक बार फिर ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया है। स्त्री को आर्थिक मदद देकर स्व रोजगार को प्रेरित किया जाना चाहिए, पर यह सुनियोजित प्रयासों से होना चाहिए, न कि वोट लेने के लिए प्रलोभन की तर्ज पर। स्त्रियों को भेड़-बकरी नहीं, नागरिक बनाने की जरूरत है। बिहार के चुनाव में स्त्रियों ने जाति, धर्म आदि से ऊपर उठकर जिस एकजुटता का परिचय दिया वह एक वर्ग के रूप में उसकी शक्ति का परिचायक है जिसकी अवहेलना अब कोई भी दल नहीं कर सकता। निश्चय ही देश की राजनीति भी इससे प्रभावित होगी। किन्तु क्या इतना भर पर्याप्त है? राजनीतिक दलों के द्वारा स्त्री को वोट बैंक बनाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। असल सवाल यह है कि स्त्रियाँ स्वयं अपनी शक्ति को कब पहचानेंगी? ऐसा क्यों होता है कि यौन उत्पीड़न और बलात्कार के आरोपी चुनाव जीत जाते हैं और निर्भीक होकर फिर उसी प्रकार की घटना को अंजाम देते हैं। उन्हें स्त्रियों के वोट का भय क्यों नहीं सताता, यह एक बड़ा सवाल तो है और इसका जवाब स्त्रियों की तरफ से आना चाहिए।
स्त्रियों के लिए बाहर की दुनिया खुली है, किन्तु इसी के समानान्तर उनपर हिंसा भी बढ़ रही है, लगातार जिसकी रपटें अखबारों और सोशल मीडिया पर दिखती हैं। इस हिंसा को इस रूप में देखे जाने की जरूरत है कि पुरुष समुदाय अपने बीच स्त्रियों की उपस्थिति का आदी नहीं है। इसे वह अपने पारम्परिक क्षेत्र का अतिक्रमण मान रहा है। उसकी यह कुण्ठा उसे स्त्रियों के प्रति हिंसक बना रही है। इसलिए जरूरी है कार्यक्षेत्र में स्त्रियों की अधिक से अधिक उपस्थिति ताकि स्त्रियों के लिए यह दुनिया सुरक्षित हो सके। यह जरूर है कि अब स्त्रियाँ यौन हिंसा को सहने को तैयार नहीं हैं। दिल्ली के निर्भया काण्ड के बाद इतना बदलाव तो आया है कि इस तरह की घटनाओं की रिपोर्टिंग होने लगी है, पर लचर व्यवस्था में न्याय पाना कितना मुश्किल है, यह सर्वविदित है। इसलिए कठोर कानून, त्वरित कार्रवाई और समुचित न्याय व्यवस्था का होना बहुत जरूरी है।
स्त्रियों के लिए दुनिया बदली है, बदल रही है, पर अभी भी बहुत कुछ शेष है। सबसे पहले तो उन्हें निर्णय का अधिकार मिले जो कि समुचित शिक्षा, जिसमें तकनीकी शिक्षा भी शामिल है, से ही सम्भव है। लड़कियों तक आते आते शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा का औचित्य समाप्त हो जाता है, कभी सुरक्षा के नाम पर, कभी जेण्डर के नाम पर और कभी साधनों की उपलब्धता के नाम पर, और अधिकतर तो आर्थिक असमर्थता के कारण। उन परिवारों में जिनकी आय कम है, वहाँ बच्चियों तक आते आते पोषण की उपलब्धता ही कम पड़ जाती है, ऐसे में शिक्षा और तकनीक की शिक्षा लड़कों तक ही सीमित रह जाती है। इसलिए स्त्रियाँ बड़ी संख्या में असंगठित क्षेत्र में काम करने को मजबूर हैं और ये वे क्षेत्र हैं जहाँ स्थायित्व, सुरक्षा और वेतन में समानता का घोर अभाव है। कार्य स्थलों पर स्त्री सम्बन्धी सुविधाओं का अभाव है, यौन शोषण एक भयानक जन्तु की तरह गिरफ्त में लेने को तैयार है। स्त्रियों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के अभाव में इन सवालों पर ध्यान नहीं जाता। राजनीतिक दलों को स्त्री की तरफ से सोचने की कोई जरूरत नहीं महसूस होती। स्त्रियों को टिकट देने में राजनीतिक दल पीछे रह जाते हैं, यौन उत्पीड़न के आरोपियों को टिकट देने में कोई संकोच नहीं होता। बलात्कारियों को आराम से जमानत या पेरोल मिल जाता। जरूरी है इन मुद्दों पर आवाज उठाना ताकि स्त्रियों के लिए एक सुरक्षित समाज बन सके। सिर्फ विरोध प्रदर्शनों से कुछ नहीं होने वाला, जरूरी है उन स्थानों पर स्त्री की पहुँच जहाँ कानून और न्याय व्यवस्था को वह अपने अनुकूल बना सके। इस जेण्डर वाली धारणा को दूर करने की जरूरत है कि राजनीति का क्षेत्र स्त्रियों के उपयुक्त नहीं है। उसे अपने उपयुक्त करना होगा और इसके लिए स्त्रियों को स्वयं आगे आना होगा।










