
इस आलेख का हमने एक ‘विवादास्पद शीर्षक’ दिया है : “गाँधीयन–ट्रॉट्स्काइट” थे सच्चिदानन्द सिन्हा। मुझे पता नहीं यह कितना सही है! सही है भी या नहीं? लेकिन मैं स्वर्गीय सच्चिदानन्द सिन्हा को जितना पढ़कर जाना–समझा है, उससे मेरे मन में यह शीर्षक आकार लेता चला गया। और आज हमने इसका प्रयोग यहाँ किया है। और ऐसा प्रयोग हमने जानबूझकर किया है। आदरणीय सच्चिदा बाबू के लेखन के आधार पर किया है।
इसमें कोई दो मत नहीं कि आचार्य नरेन्द्र देव, जेपी, डॉक्टर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता और किशन पटनायक के बाद सच्चिदा बाबू सबसे प्रतिभावान, प्रखर और प्रतिबद्ध संवाहक थे—समाजवाद के। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के संक्रमणकालीन युग के गवाह भी थे सच्चिदा बाबू। अगर उन्हें इस संक्रमण काल का अद्भुत एवं अतुल्य साधक कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं मानी जानी चाहिए।
मेरा मानना है कि सच्चिदा बाबू पर गाँधी और ट्रॉट्स्की का मिलाजुला वैचारिक प्रभाव था। उन्होंने अपने पर लिखे गए संग्रह “सच्चिदानन्द सिन्हा रचनावली” (जिसे प्रखर पत्रकार अरविन्द मोहन ने संकलित किया है) की प्रस्तावना में अपने बारे में लिखा है कि 18 वर्ष के लम्बे दिल्ली प्रवास के दौरान उन्होंने कई पुस्तकें समाजवादी कार्यकर्ताओं को ध्यान में रखकर लिखीं।
इनमें से एक पुस्तक ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। उस पुस्तक का शीर्षक है—“अनआर्म्ड प्रोफेट”। कितना आकर्षित करने वाला शीर्षक है यह! मुझे भी पहली नजर में ही इस शीर्षक ने प्रभावित किया। जब शीर्षक की गहराई से तहकीकात करने लगा तब मुझे जानकारी मिली कि इस शीर्षक से एक पुस्तक रूस में छप चुकी थी। यह पुस्तक ट्रॉट्स्की के विचारों और क्रियाकलापों पर केन्द्रित थी, जिसके लेखक थे—आइजक ड्यूचर।
इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में लेखक ने ट्रॉट्स्की को वैश्विक समाजवाद का प्रवर्तक और लोकतान्त्रिक एवं अहिंसक समाजवाद का पुरोधा बताया है। शायद यह पुस्तक सच्चिदा बाबू ने पढ़ी होगी और गाँधी के सन्दर्भ में उन्हें यह शीर्षक अधिक सटीक लगा होगा। वैसे सच्चिदा बाबू के विचारों की यात्रा की गहन समीक्षा की जाए तो मेरा मानना है कि उन पर गाँधी और ट्रॉट्स्की दोनों के विचारों की छाप थी। सम्भव है कि ट्रॉट्स्की पर भी गाँधी अपना प्रभाव छोड़ रहे हों। क्योंकि यह काल था 1917 से 1940 तक का। और तब तक गाँधी अहिंसक आन्दोलन के प्रवर्तक के तौर पर पूरी दुनिया में चर्चित हो चुके थे। चर्चिल से लेकर चार्ली चैप्लिन तक को अपने अहिंसक आन्दोलन से प्रभावित कर चुके थे। तब केवल विश्व के राजनीतिक नेता ही नहीं, बल्कि अल्बर्ट आइंस्टाइन जैसे वैज्ञानिक भी गाँधी के विचारों की परिधि में आ चुके थे।
शायद पाठकों को यह पता होगा कि ट्रॉट्स्की गाँधी से दस वर्ष छोटे थे और वे भी रूस की बोल्शेविक पार्टी के पाँच महत्त्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। समाजवादी क्रान्ति के बाद उन्हें सत्ता के दूसरे पायदान यानी विदेश मन्त्री बनाया गया था। इस पद पर रहते हुए भारत में चल रहे गाँधी के आन्दोलन ने स्वाभाविक रूप से उन्हें प्रभावित किया होगा। और यह सच है कि भारत के अधिकांश तत्कालीन समाजवादी नेताओं को ट्रॉट्स्की के लोकतान्त्रिक विचारों ने आकर्षित किया था। भारत में लोकतान्त्रिक समाजवाद के जनक लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉक्टर राममनोहर लोहिया थे। आचार्य नरेन्द्र देव का झुकाव मार्क्सवाद की ओर अधिक था, लेकिन वे भी सोवियत संघ की एकाधिकारवादी शासन प्रणाली के मुखर विरोधी थे। युवा समाजवादी सच्चिदा बाबू की घनिष्ठता जेपी और लोहिया से थी। इसी कारण डॉक्टर लोहिया ने उन्हें “मैनकाइंड” जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका के सम्पादन का भार सौंपा और 1956 में हैदराबाद बुलाया। यह सच्चिदानन्द सिन्हा की प्रतिभा की पहचान थी, जिसे डॉक्टर लोहिया जैसे युवा–प्रेमी और सद्गुणों के पारखी ही समझ सकते थे।
यहाँ उनके कुछ वैचारिक पहलुओं को उद्धृत करना प्रासंगिक है। कला, संस्कृति और समाजवाद के बारे में उनके विचार वैश्विक सन्दर्भों से होते हुए गाँधी तक कैसे पहुँचते हैं, इसे समझना आज के विचारकों के लिए भी आवश्यक है। वे लिखते हैं कि कला और संस्कृति के बारे में मेरी अवधारणा यह है कि संसार मनुष्य को एक विखण्डित रूप में दिखाई देता है। इससे मनुष्य में एक प्रकार का मानसिक तनाव बना रहता है। उससे उबरने के लिए वह एक निश्चित स्वरूप खोजता है, जिसमें तारतम्य हो। इसी प्रक्रिया की दो अभिव्यक्तियाँ होती हैं—एक विज्ञान की और दूसरी कला की। दोनों ही एक विखण्डित संसार को निश्चित आकृति प्रदान करने की प्रक्रिया हैं।
एक में वस्तुपरक रुझान की अभिव्यक्ति होती है और दूसरे में व्यक्ति अपनी भावनाओं के अनुरूप संसार का निर्माण करता है। पहला विज्ञान का आधार है और दूसरा कला का। समाजवाद भी विशृंखलित दुनिया को बौद्धिक रूप से व्यवस्थित आधार प्रदान करने का प्रयास है ताकि मनुष्य को उसके आन्तरिक तनाव से मुक्ति मिल सके।
असल में, औद्योगिक क्रान्ति के साथ समाज में एक विशृंखलन की प्रक्रिया शुरू हुई। उसमें समाज को एक निश्चित व्यवस्था देने के प्रयास में समाजवाद की उत्पत्ति हुई, जिसमें योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था स्थापित करने के प्रयास हुए। लेकिन समाज को व्यवस्थित रूप कैसे दिया जाए, इस पर कोई सहमति नहीं थी। अलग–अलग लोगों की अलग–अलग राय थी। इंग्लैंड में फैबियन लोग धीमी प्रगति से थोड़े–थोड़े सुधार के साथ व्यवस्था परिवर्तन करना चाहते थे। दूसरे छोर पर मार्क्सवादी और अराजकतावादी समाज के सभी क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन की बात करते थे। लेकिन उनमें भी एक बुनियादी मतभेद था। जहाँ अराजकतावादी सभी राज्य व्यवस्थाओं को खत्म करना चाहते थे, वहीं मार्क्सवादी राज्य व्यवस्था का सहारा लेकर समाज में आमूलचूल बदलाव के साथ नयी व्यवस्था बनाना चाहते थे।
भारत में भी पश्चिम से आई अवधारणाओं को मोटे तौर पर स्वीकार किया गया। लेकिन महात्मा गाँधी के प्रयोगों ने समाज परिवर्तन की दिशा के बारे में एक नयी चुनौती उपस्थित कर दी, जिसमें हिंसक बदलाव की जगह शान्तिपूर्ण ढंग से लोगों के विचार परिवर्तन और समाज के ढाँचे में शान्तिपूर्ण परिवर्तन की बात कही गयी। यह भारतीय समाजवाद का एक स्वरूप था जो पश्चिमी विचारधारा से अलग दिशा देता था। इससे भारत में कम्युनिस्टों और समाजवादियों में मतभेद हुए और समाजवादियों ने गाँधीवादी तरीकों को अपनाने का प्रयास किया।
समाजवादी आन्दोलन में गाँधी की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए सच्चिदा बाबू गाँधी के विचारों की महत्ता को स्वीकार करते हैं। वे गाँधी के इन शब्दों को उद्धृत करते हैं—
“गाँधीवाद नाम की कोई वस्तु नहीं है और मैं अपने पीछे कोई सम्प्रदाय नहीं छोड़ना चाहता। मेरा ऐसा दावा नहीं कि मैंने कोई नया सिद्धांत आरम्भ किया है। मैंने अपने ढंग से शाश्वत सत्यों को रोजमर्रा की जिन्दगी और इसकी समस्याओं में लागू करने की कोशिश की है। मैंने जो राय बनायी है या जिन नतीजों पर पहुँचा हूँ, वे अन्तिम नहीं हैं और कल मैं इन्हें बदल भी सकता हूँ।”
इसके बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि गाँधी के प्रयोगों ने विश्व स्तर पर गहरी छाप छोड़ी है। समाजवादियों की दृष्टि यही हो सकती है कि गाँधी के विचारों और प्रयोगों से वे सबक लें जो उनकी समस्याओं के समाधान में सहायक हों।
लेकिन प्रश्न उठता है कि यदि गाँधी के मूल उद्देश्य समाजवाद के मूल उद्देश्यों से भिन्न हों तो गाँधी के प्रयोगों से हम कैसे कुछ सीख सकते हैं? इसका समाधान गाँधी की उस सलाह में मिलता है जिसमें उन्होंने कहा था—
“जब भी तुम्हें शंका हो या अहं हावी होता दिखाई पड़े तो सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो और सोचो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो, क्या उससे उसे कोई लाभ होगा? क्या यह उसे नयी जिन्दगी देगा?”
मार्क्स ने जब सर्वहारा को क्रान्ति का अगुवा माना था तब उसकी दृष्टि भी मूल रूप से इसी तरह की थी। उसकी मान्यता थी कि जब समाज का विकास ऐसे वर्ग के हित में होगा जो सबसे अधिक शोषित है और जिसका शोषण में कोई निहित स्वार्थ नहीं है, तभी सही अर्थ में समाज शोषण–विहीन हो पाएगा। इस जगह तमाम भेदों के बावजूद मार्क्स और गाँधी एक ही बिन्दु पर आ जाते हैं।
गाँधी की सोच की बुनियाद नैतिक मूल्यों में है, जबकि मार्क्स मूल रूप से दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टि से समाज की समस्याओं को देखते हैं। फिर भी मार्क्स की दृष्टि भी अन्ततः नैतिक है। ईसाई धर्म के मूल्यों में भी यह कल्पना थी कि स्वर्ग में धनी व्यक्ति का प्रवेश कठिन है। गाँधी के विचारों पर भी बाइबिल का गहरा प्रभाव था।

रस्किन की पुस्तक ‘आन टू द लास्ट’ के प्रभाव में गाँधी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि साधारण मजदूर का श्रम उतना ही आदर के योग्य है जितना विद्वतापूर्ण काम। इसी प्रभाव में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स आश्रम में प्रेस चलाया और पत्रिका निकाली। यहाँ उन्होंने दिमागी और शारीरिक श्रम के फर्क को मिटाने का प्रयास किया।
मार्क्स की कल्पना थी कि एक ही व्यक्ति सुबह मजदूरी करेगा और शाम को दार्शनिक विवादों में भाग लेगा। गाँधी हर चीज को प्रयोग द्वारा ईंट–ईंट जोड़कर बनाना चाहते थे। शायद मार्क्स और गाँधी दोनों अपने–अपने ढंग से यूटोपियन थे। गाँधी की यह कल्पना कि निजी प्रयोगों द्वारा एक आदर्श समाज बनाया जा सकता है, स्वप्नवादी थी। स्वयं गाँधी ने बाद में व्यापक जन–राजनीति की ओर रुख किया।
मार्क्स की यह कल्पना भी यूटोपियन सिद्ध हुई कि मजदूर क्रान्ति से वैसा समाज बनेगा जैसा उन्होंने सोचा था। अब तक सर्वहारा क्रान्ति के नाम पर जो कुछ हुआ है, उससे ऐसी व्यवस्था बनी है जो मार्क्स की कल्पना के विपरीत है।
समाजवाद का दर्शन कोई मन्त्र नहीं है जिसे दोहराने से वर्ग–समाज से प्राप्त मूल्य समाप्त हो जाएँ। यदि समाजवादी क्रान्ति के आधी सदी बाद भी रूस में पूँजीवाद की ओर जाने की प्रवृत्तियाँ दिखती हैं, तो यह स्पष्ट है कि कहीं न कहीं बुनियादी खोट रही है।
यदि भारत के समाजवादी अपने जीवन में नैतिक परिवर्तन करें तो विचार और कर्म का अन्तर तथा नैतिक अवमूल्यन की प्रक्रिया रुक सकती है। निस्सन्देह मार्क्स, लेनिन, रोजा लक्ज़मबर्ग और माओ व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं से ऊपर थे, लेकिन उन्होंने वैयक्तिक आचरण की कोई स्पष्ट कसौटी नहीं बनायी जिससे उनके अनुयायियों की सत्ता–लिप्सा पर अंकुश लग सके।
इन सभी प्रसंगों को पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि सच्चिदा बाबू मार्क्स और गाँधी को समलक्ष्य–समबोध वाले विचारक मानते थे। हाँ, उनके रास्ते अलग–अलग थे।










