
नदियाँ केवल पानी की धाराएँ नहीं होतीं। वे सभ्यता की धड़कन होती हैं। किसी भी शहर का इतिहास, संस्कृति और जीवनशैली उसकी नदी से जुड़ी होती है। भारत जैसे देश में तो नदियाँ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं रहीं, बल्कि पूजा, परम्परा और सामूहिक स्मृति का हिस्सा रही हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा जैसी नदियों के साथ-साथ देश की सैकड़ों छोटी-बड़ी नदियों ने शहरों और गाँवों को जीवन दिया है। पुराने समय में लोग नदियों के साथ रहते थे, उनके खिलाफ नहीं। बरसात के दिनों में नदी फैलती थी, तो लोग उसके रास्ते से हट जाते थे। गर्मियों में जब नदी सिकुड़ती थी, तो लोग उसके किनारों पर खेती और गतिविधियाँ करते थे। नदी का स्वभाव समझा जाता था, उसे बाँधने या कैद करने की कोशिश नहीं की जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे आधुनिक शहरों का विस्तार हुआ, यह रिश्ता बदलता चला गया।
शहरी विकास और नदियों का बदलता रिश्ता
बीते पचास-साठ वर्षों में भारत के शहर तेजी से फैले हैं। आबादी बढ़ी, गाड़ियाँ बढ़ीं, कारखाने लगे, ऊँची इमारतें बनीं। विकास की इस दौड़ में नदियाँ सबसे ज्यादा उपेक्षित रहीं। शहरों का गन्दा पानी नदियों में जाने लगा। औद्योगिक कचरा बिना उपचार के बहाया जाने लगा। नदी किनारे की जमीन पर मकान, सड़कें और कॉलोनियाँ बन गयीं।
आज हालत यह है कि देश की अधिकांश शहरी नदियाँ साफ पानी की बजाय सीवेज ढो रही हैं। कहीं वे खुले नाले बन चुकी हैं, तो कहीं कंक्रीट की दीवारों में कैद कर दी गयी हैं। नदी को ‘समस्या’ माना जाने लगा, समाधान नहीं। जयपुर की द्रव्यावती नदी भी इसी कहानी का एक अहम अध्याय है।
जयपुर और द्रव्यावती: पानी की कीमत समझने वाला शहर
जयपुर कोई साधारण शहर नहीं है। यह एक ऐसे क्षेत्र में बसा है जहाँ पानी हमेशा से दुर्लभ रहा है। रेगिस्तानी और अर्ध-शुष्क इलाके में बसे इस शहर ने सदियों पहले यह समझ लिया था कि बारिश के हर कण को सहेजना जरूरी है। इसीलिए पुराने जयपुर में तालाब, बावड़ियाँ, कुण्ड, जोहड़ और नालों की एक सुव्यवस्थित व्यवस्था बनाई गयी थी। ये संरचनाएँ न केवल पानी जमा करती थीं, बल्कि भूजल को भी रिचार्ज करती थीं। शहर की योजना ही पानी के हिसाब से बनाई गयी थी।
द्रव्यावती नदी, जिसे पहले आमनीशाह नाला कहा जाता था, इसी पूरी जल प्रणाली की रीढ़ थी। यह नदी अरावली की पहाड़ियों से निकलकर जयपुर शहर से गुजरती हुई नीचे के ग्रामीण क्षेत्रों तक जाती थी। यह एक मौसमी नदी थी—बरसात में बहती थी, और बाकी समय धरती के भीतर पानी भरने का काम करती थी। किसान इसी नदी के पानी से खेत सींचते थे। पशुपालक अपने जानवरों को इसी में पानी पिलाते थे। धोबी कपड़े धोते थे, कुम्हार मिट्टी लेते थे। नदी केवल पानी नहीं देती थी, रोजगार भी देती थी। लोग इसे जानते थे, पहचानते थे और इसका सम्मान करते थे।
जब विकास ने नदी को पीछे छोड़ दिया
समय बदला। जयपुर बढ़ने लगा। आबादी लाखों से करोड़ों की ओर बढ़ी। नयी कॉलोनियाँ बनीं—मानसरोवर, प्रतापनगर, जगतपुरा। उद्योग लगाए गये—विश्वकर्मा, सीतापुरा जैसे औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए। लेकिन इस विकास की योजना बनाते समय यह नहीं सोचा गया कि नदी का क्या होगा। धीरे-धीरे शहर का सारा सीवेज द्रव्यावती में जाने लगा। औद्योगिक इलाकों का रसायन मिला पानी भी इसी में छोड़ा जाने लगा। नदी के किनारों पर अतिक्रमण होने लगा। जहाँ कभी बरसात में पानी फैलता था, वहाँ अब पक्के निर्माण खड़े हो गये।
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कुछ ही वर्षों में नदी का स्वरूप बदल गया। साफ बहती मौसमी नदी अब बदबूदार नाले में बदलने लगी। पानी काला पड़ने लगा। मच्छर बढ़ने लगे। लोग नदी के पास जाने से कतराने लगे। द्रव्यावती अब लोगों की नजर में नदी नहीं रही। उसे ‘गन्दा नाला’ कहा जाने लगा। बच्चे उसके किनारे खेलने नहीं जाते थे। बुजुर्ग वहाँ बैठने से बचते थे। शहर और नदी के बीच का रिश्ता टूटता चला गया।
‘पुनर्जीवन’ का बड़ा वादा
जब हालात बहुत खराब हो गये, तब सरकार और प्रशासन की नजर इस ओर गयी। साल 2016 में द्रव्यावती नदी पुनर्जीवन परियोजना की घोषणा की गयी। इसे देश की सबसे बड़ी और सबसे महँगी नदी परियोजनाओं में से एक बताया गया। लगभग 1600 करोड़ रुपये की लागत से नदी को ‘पुनर्जीवित’ करने का दावा किया गया।
वादा किया गया कि:
- नदी साफ होगी
- गन्दा पानी ट्रीट होकर जाएगा
- नदी के दोनों ओर हरियाली होगी
- पार्क, सैरगाह और साइकिल ट्रैक बनेंगे
- जयपुर को एक नयी पहचान मिलेगी
शुरुआत में यह सब बहुत भव्य लगा। भारी मशीनें आयीं। नदी की खुदाई हुई। कंक्रीट की चौड़ी दीवारें बनाई गयीं। दोनों ओर घास और पौधे लगाए गये। रात में लाइटें लगीं। तस्वीरें अखबारों और सोशल मीडिया में छा गयीं। द्रव्यावती अब किसी यूरोपीय शहर की नदी जैसी दिखने लगी। लेकिन सवाल यह था—क्या नदी सच में जिन्दा हो रही थी, या सिर्फ सजाई जा रही थी?
ऊपर की धारा: जहाँ नदी अभी भी साँस लेती है
अगर हम जयपुर से ऊपर, अरावली की पहाड़ियों की ओर जाएँ, तो द्रव्यावती का एक अलग रूप दिखाई देता है। यहाँ नदी अभी भी मौसमी रूप में बहती है। बरसात में पानी आता है, बहाव होता है। यहाँ पानी अपेक्षाकृत साफ दिखता है। किनारों पर झाड़ियाँ और पेड़ हैं। पक्षी उड़ते नजर आते हैं। कीड़े-मकोड़े दिखाई देते हैं। यानी जीवन अभी भी मौजूद है। यह हिस्सा बताता है कि नदी मर नहीं गयी है। अगर उस पर दबाव कम हो, प्रदूषण न हो, तो वह खुद को सम्भाल सकती है। यहाँ नदी को ज्यादा कंक्रीट में नहीं बाँधा गया है, शायद इसी कारण वह अब भी नदी जैसी महसूस होती है।
बीड झील: उम्मीद से निराशा तक
जैसे ही नदी आगे बढ़ती है, वह बीड झील से होकर गुजरती है। कभी यह झील जयपुर की जल व्यवस्था का अहम हिस्सा थी। यह बरसाती पानी को रोकती थी, धीरे-धीरे जमीन में उतारती थी।आज हालात बिल्कुल उलट हैं। बीड झील अब गन्दे पानी का ठहराव बन चुकी है। यहाँ पानी का रंग बदला हुआ है। सतह पर झाग तैरता दिखाई देता है। तेल और रसायनों जैसी परत दिखती है। मछलियाँ या अन्य जलीय जीव लगभग गायब हैं। जो झील कभी नदी को साफ रखने में मदद करती थी, वह अब प्रदूषण को और बढ़ा रही है।
उद्योग और नदी: सबसे खतरनाक मेल
द्रव्यावती का सबसे बुरा हाल तब होता है जब वह विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र और सीतापुरा जैसे इलाकों से गुजरती है। यहाँ सैकड़ों कारखाने हैं—टेक्सटाइल, केमिकल, धातु, प्लास्टिक।
इन इलाकों से निकलने वाला गन्दा पानी कई बार बिना पूरी सफाई के नदी में चला जाता है। नतीजा साफ दिखाई देता है—नदी की सतह पर सफेद झाग, तेज बदबू और ठहरा हुआ काला पानी। यह पानी न केवल नदी को मारता है, बल्कि नीचे के इलाकों के लिए भी खतरा बन जाता है।
शहर के बीच ‘सुन्दर’ लेकिन बीमार नदी
जयपुर शहर के अन्दर, खासकर मानसरोवर और जगतपुरा जैसे इलाकों में, द्रव्यावती बिल्कुल अलग रूप में दिखाई देती है। यहाँ कंक्रीट की ऊँची दीवारें हैं। दोनों ओर पार्क बने हैं। साइकिल ट्रैक और पैदल पथ बनाए गये हैं।
दूर से देखने पर सब कुछ बहुत सुन्दर लगता है। लेकिन जैसे ही आप नदी के पास जाते हैं, सच्चाई सामने आ जाती है। पानी बदबूदार है। रंग अस्वाभाविक है। उसमें कोई मछली, कोई जीवन दिखाई नहीं देता। लोग पार्क में आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, लेकिन ज्यादा देर नहीं रुकते। गर्मियों में बदबू इतनी तेज होती है कि लोग जल्दी लौट जाते हैं।
केवल डिजाइन से इसका वास्तविक पुनर्जीवन सम्भव नहीं है?
जयपुर की द्रव्यावती नदी कभी शहर की जीवनरेखा हुआ करती थी। इसी नदी के किनारे बस्तियाँ बसीं, खेती हुई और लोगों का दैनिक जीवन चलता था। लेकिन समय के साथ द्रव्यावती एक प्राकृतिक नदी से ज्यादा नाले जैसी बनती चली गयी। हाल के वर्षों में इसके ‘पुनर्जीवन’ के नाम पर नदी किनारे बड़े पैमाने पर डिजाइन और सौन्दर्यीकरण का काम किया गया। सुन्दर घाट, चौड़े रास्ते और हरियाली दिखाई देती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या द्रव्यावती वास्तव में जीवित हो पायी है?
पर्यावरणीय दृष्टि से किसी नदी का पुनर्जीवन केवल दिखावे का नहीं होता। इसका मतलब है कि नदी में प्राकृतिक जल प्रवाह हो, पानी साफ हो, जलीय जीवन लौटे और लोग नदी से फिर से जुड़ सकें। द्रव्यावती के मामले में केवल डिजाइन आधारित विकास इन लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया।
सबसे बड़ी समस्या ऊपरी क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषण है। द्रव्यावती का जलग्रहण क्षेत्र जयपुर और उसके आसपास के कई इलाकों में फैला है। शहर और आसपास की बस्तियों से निकलने वाला सीवेज और गन्दा पानी आज भी नदी में पहुँचता है। नदी किनारे किया गया विकास तब तक प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक पूरे कैचमेंट क्षेत्र में सीवेज ट्रीटमेंट, नालों का नियन्त्रण और भूमि उपयोग की सख्त निगरानी न हो।

दूसरी गम्भीर समस्या है नदी का अपने प्राकृतिक स्वरूप से कट जाना। द्रव्यावती को कई हिस्सों में कंक्रीट से बाँध दिया गया है। तटबन्ध और सीधा चैनल नदी को एक नियन्त्रित नहर में बदल देते हैं। इससे न तो बाढ़ का पानी फैल पाता है और न ही आसपास की जमीन में पानी रिसकर भूजल को रिचार्ज कर पाता है। नदी और उसके बाढ़ क्षेत्र का प्राकृतिक रिश्ता टूट गया है, जिसे केवल डिजाइन से वापस नहीं जोड़ा जा सकता।
तीसरा मुद्दा है संस्थागत और प्रशासनिक तालमेल की कमी। द्रव्यावती नदी नगर निगम, जल विभाग, प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड और विकास प्राधिकरण जैसे कई संस्थानों के अधीन आती है। नदी किनारे पार्क और पथ बनाने वाली एजेंसियाँ अक्सर सीवेज प्रबन्धन और प्रदूषण नियन्त्रण से सीधे जुड़कर काम नहीं करतीं। इस बिखरे हुए शासन ढाँचे के कारण नदी सुधार अधूरा रह जाता है।
द्रव्यावती के पुनर्जीवन में सामाजिक पहलू भी अहम है। सौन्दर्यीकरण के बाद नदी किनारे की जमीन की कीमतें बढ़ी हैं। इससे पहले जिन लोगों का जीवन नदी से जुड़ा था—जैसे पशुपालक, छोटे किसान या स्थानीय बस्तियाँ—उनकी पहुँच सीमित होती जा रही है। नदी किनारे बने नये स्थान आम लोगों से ज्यादा घूमने वालों और विशेष वर्ग के लिए उपयोगी लगते हैं। इससे नदी और समाज का पुराना रिश्ता कमजोर पड़ता है।
एक और महत्त्वपूर्ण समस्या है रखरखाव और संचालन। द्रव्यावती जैसी नदी को जीवित रखने के लिए लगातार गाद निकालना, पौधों की देखभाल करना, सीवेज के बहाव को रोकना और कचरा फेंकने पर नियन्त्रण जरूरी है। लेकिन अक्सर बड़े प्रोजेक्ट पूरे होने के बाद रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान और धन नहीं दिया जाता, जिससे धीरे-धीरे हालात फिर बिगड़ने लगते हैं।
इन अनुभवों से यह साफ है कि द्रव्यावती का वास्तविक पुनर्जीवन तभी सम्भव है जब समेकित दृष्टिकोण अपनाया जाए। पूरे जलग्रहण क्षेत्र में प्रदूषण नियन्त्रण, नदी के प्राकृतिक बहाव और बाढ़ क्षेत्रों को दोबारा जोड़ना, स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना और दीर्घकालीन रखरखाव की ठोस व्यवस्था करना जरूरी है |
शहर से नीचे: किसानों की मजबूरी
जयपुर से बाहर निकलने के बाद द्रव्यावती ग्रामीण इलाकों से गुजरती है। यहाँ किसान अब भी इसी नदी के पानी से खेत सींचते हैं, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। यह गन्दा पानी धीरे-धीरे मिट्टी को खराब कर रहा है। फसल की गुणवत्ता गिर रही है। पैदावार कम हो रही है। किसानों को ज्यादा खाद और कीटनाशक डालने पड़ रहे हैं। कई किसान त्वचा और पेट की बीमारियों की शिकायत करते हैं। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है—यह सीधे लोगों की रोजी-रोटी और सेहत से जुड़ा सवाल है।
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट: दावा और हकीकत
परियोजना के तहत कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाए गये। कहा गया कि नदी में जाने से पहले सारा गन्दा पानी साफ किया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत अलग तस्वीर दिखाती है। कई जगह मशीनें ठीक से काम नहीं कर रहीं। कहीं उपचारित पानी भी बदबूदार है। इसका मतलब यह है कि नदी में बह रहा पानी अभी भी जहरीला है। पानी बह रहा है, लेकिन जीवन नहीं लौटा है।
नदी और समाज: टूटा हुआ रिश्ता
जब नदी गन्दी होती है, तो समाज उससे कट जाता है। द्रव्यावती के साथ भी यही हुआ है। अब नदी के किनारे पूजा नहीं होती। बच्चे वहाँ खेलने नहीं जाते। बुजुर्ग बैठकर बातें नहीं करते। नदी लोगों की स्मृति और संस्कृति से बाहर होती जा रही है। यहाँ तक कि उसका नाम भी बदल गया है। कई लोग उसे द्रव्यावती नहीं, बल्कि “सांगानेरी गन्दा नाला” कहते हैं। यह नाम अपने आप में समाज की निराशा और दूरी को दिखाता है।
इतने पैसे, फिर भी सवाल
1600 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी अगर नदी साफ नहीं है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या हमने नदी को समझे बिना उसे सिर्फ सजाने की कोशिश की?
असल समस्या यही है। नदी को एक जीवित तन्त्र नहीं, बल्कि एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट माना गया। कंक्रीट डाल दी गयी, लेकिन पानी के स्रोत और प्रवाह को नहीं समझा गया।

आगे की राह: नदी को सच में कैसे बचाएँ
द्रव्यावती हमें एक बड़ी सीख देती है। नदियों को बचाने के लिए सुन्दरता काफी नहीं है। सबसे पहले प्रदूषण रोकना होगा। उद्योगों और सीवेज पर सख्त नियन्त्रण जरूरी है। नदी को फैलने और साँस लेने की जगह देनी होगी। अतिक्रमण हटाना होगा। सबसे जरूरी—स्थानीय लोगों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा। नदी को नाला नहीं, बल्कि जीवित साथी की तरह देखना होगा।
द्रव्यावती नदी की कहानी सिर्फ जयपुर की नहीं है। यह देश के कई शहरों की कहानी है। यह हमें चेतावनी देती है कि अगर विकास के नाम पर प्रकृति को नजरअन्दाज किया गया, तो नुकसान भी हमें ही उठाना पड़ेगा। नदी को सजाने से पहले उसे समझना जरूरी है। क्योंकि नदी अगर जिन्दा होगी, तभी शहर भी सच में जिन्दा रह पाएगा।










